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Friday, 2 October 2026

आर्ज-ए-इश्क - 26

 



शुभम ने रावी को पानी लाने के लिए कहकर गुरनूर को सोफे पर बैठाते हुए कहा, “तुम्हें घबराना बिल्कुल नहीं है, बेटा। सब ठीक हो जाएगा। विक्रम से मैं बात करूँगा। डरना नहीं है तुम्हें। तुमने बिल्कुल सही फैसला किया है। जबरदस्ती शादी करके खुश रहने का नाटक करने से अच्छा है उस शादी से बचना।” 


रावी ने पानी का गिलास लाकर शुभम को दे दिया। शुभम ने गुरनूर को पानी पिलाया। 


“रावी, तुम गुरनूर को कमरे में लेकर जाओ। ये फ्रेश हो जाएगी तो ठीक महसूस करेगी।” शुभम को गुरनूर की हालत ठीक नही लग रही थी इसलिए उसने रावी से कहा और फिर मधु को देखकर कहा, “गुरनूर जब फ्रेश हो जाए तो इसे अच्छे से और प्यार से नाश्ता करवा देना।” 


रावी गुरनूर को ऊपर अपने कमरे में ले आई। विक्रम और नील भी अपना नाश्ता खत्म कर अपने अपने ऑफिस जाने के लिए निकल गए। 


रावी गुरनूर से सब कुछ जानना चाहती थी कि वो भागी कैसे और श्रेयांश से उसकी मुलाकात हुई या नही लेकिन गुरनूर की हालत देखते हुए उसने उससे कुछ भी पूछना ठीक नही समझा। गुरनूर नहाकर आई तो अभी भी उसके चेहरे पर काफी उदासी थी। रावी को लगा कि शायद वो विक्रम की वजह से परेशान है इसलिए उदास है। उसने गुरनूर को गले लगाते हुए कहा, “तुम टेंशन मत लो। सब ठीक हो जाएगा।” 


“अब कुछ ठीक नहीं होगा, रावी।” गुरनूर ने उसके गले लगे हुए ही मन ही मन में कहा। 


रावी ने उसे बेड पर बैठा दिया। गुरनूर इतने लंबे सफर में बैठे हुए आई थी इसलिए काफी ज्यादा थक चुकी थी। मधु उसके लिए कमरे में ही नाश्ता ले आई। गुरनूर का मन नही था फिर भी रावी और मधु ने मिलकर उसे नाश्ता करवाया और फिर गुरनूर को सुला दिया। थकावट की वजह से गुरनूर को जल्दी नींद आ गई। 


***


दिल्ली में नीत ने गुस्से से विक्रम से कहा, “तुम्हारी बेटी की वजह से हमें कितनी शर्मिंदगी उठानी पड़ी है लड़के वालों के सामने और वो भागकर टेंशन फ्री होकर घूम रही होगी कहीं।” 


“मुझे पता है वो कहाँ गई है।“ विक्रम ने नीत के सवाल को नज़रअंदाज़ करते हुए कहा और फिर शीतल को देखकर कहा, “तैयारी करो जाने की।” 


***


गुरनूर जब से उठी थी, वो एक बार भी कमरे से बाहर ही नहीं आई थी। वो बस रोए जा रही थी। शुभम ने ऑफिस से आकर रावी से उसके बारे में पूछा तो रावी ने कहा, “वो तो बस रोए जा रही है, पापा। डरी हुई भी है।” 


शुभम फ्रेश होकर रावी के साथ उसके कमरे में आए तो देखा की गुरनूर बेड पर लेटकर रो रही थी। शुभम ने पीछे से उसके पास जाकर उसके सिर पर हाथ रखा तो गुरनूर ने मुड़कर अपनी आँसूओं से भरी हुई आँखों से उन्हें देखा। शुभम ने उसे बेड पर बैठने के लिए कहा और फिर प्यार से उसे समझाते हुए कहा, “क्यों रो रही हो, बेटा? मैंने कहा न तुमने कुछ गलत नहीं किया है। तुम किसी से भी मत डरो। विक्रम आएगा तो उससे मैं बात करलूॅंगा।” 


गुरनूर को समझाने के बाद शुभम वहाँ से चले गए। उनके जाने के बाद गुरनूर ने मन ही मन में सोचा, “गलत तो मैंने किया है, अंकल। मैंने एक ऐसे इंसान से प्यार किया जो  बस अपनी इगो की वजह से मेरे दिल के साथ खेल रहा था।” 


विक्रम शीतल और नीत के साथ इंदौर पहुँच गया। गुरनूर रावी, शुभम और नील के साथ लिविंग रूम में बैठी हुई थी जब दरवाजे की घंटी बजी। मधु ने जाकर दरवाज़ा खोला तो देखा कि सामने विक्रम शीतल और नीत के साथ खड़ा था। उसने उन्हें अंदर बुलाया। गुरनूर को देखते ही विक्रम को गुस्सा आ गया और वो उसे थप्पड़ मारने ही वाला था कि तभी शुभम ने उसका हाथ पकड़कर उसे रोक दिया। विक्रम ने शुभम को देखते हुए कहा, “शुभम भाई, मेरा हाथ छोड़ दीजिए। इस लड़की ने इतना भी सोचना या समझना ठीक नहीं समझा की इसके भागने से मुझ पर क्या बीतेगी।” 


“तुमने गुरनूर को समझने की कोशिश की। नहीं ना। बस किसी की बातों में आकर उसकी जबरदस्ती शादी कराने लग गए तुम। इतने खुले विचारों वाले हो तुम। तुमसे ये उम्मीद नहीं थी मुझे।” शुभम ने विक्रम का हाथ छोड़ते हुए कहा। 


“मैं अच्छा सोच रहा था, इसका।” विक्रम ने कहा जिसे सुनकर शुभम ने उन्हें देखते हुए कहा, “अगर तुम्हें गुरनूर का अच्छा सोचना है तो इसे इसके पैरों पर खड़े होने दो पहले और अगर अपने पैरों पर खड़ी नहीं भी होती तो एकलौती बेटी है, जबरदस्ती नहीं करो इसके साथ। शादी एक ज़िम्मेदारी है। जब इसे लगेगा की ये तैयार है इस जिम्मेदारी को निभाने के लिए तो कर लेगी ये शादी अपने आप। हर जगह तुमने इसे समझा है तो जब इसकी जिंदगी का इतना बड़ा फैसला लेने की बारी आई तो तुम टिपिकल इंडियन फादर बन गए। इसकी बातें छोड़कर दूसरो की सुनने लग गए तुम। कहता नहीं था पर शुरू से ही तुम ओपन माइंडेड के साथ-साथ टिपिकल फादर भी रहे हो। तुम हल्का सा चिल्ला भी देते थे तो वो बच्ची अंदर तक सहम जाती थी। कभी सोचा जहाँ इसे भेजने की तैयारी कर रहे थे वहाँ इसके साथ ऐसा होता तो कैसे रहती ये।” 


विक्रम ने पास शुभम की बातों का कोई जवाब नही था। उसे खामोश देखकर शुभम ने आगे कहा, “गुरनूर को उसका लाइफ पार्टनर खुद चुनने दो। अरेंज मैरिज में भी। ऐसे जबरदस्ती मत करो। भागकर आई वो क्योंकि तुमने उसकी बात ना सुनकर उसे मजबूर कर दिया था।” 


गुरनूर की आँखें ये सब सुनकर आँसुओं से भरी हुई थी। विक्रम को अपनी गलती का एहसास हो गया। नीत और शीतल, दोनों ही अब तक खामोश खड़ी थी। विक्रम ने गुरनूर के पास आकर उसके सिर पर हाथ रखकर कहा, “आई एम सॉरी, बेटा। अपने पापा को माफ करदो।” 


गुरनूर ने उनसे कुछ नही कहा और ना ही उनकी तरफ देखा। मधु सबको बैठने का कहकर सबके लिए चाय बनाने चली गई। गुरनूर बस खामोशी से विक्रम के पास बैठी हुई थी। शीतल इसी बात से परेशान हो रही थी की गुरनूर ने अभी तक कुछ नही कहा था। उसके चेहरे पर अभी भी उदासी ही थी।


Continued In आर्ज-ए-इश्क - 27

Thursday, 1 October 2026

आर्ज-ए-इश्क - 25



गुरनूर की शादी किसी और से होने वाली थी, ये बात सुनकर श्रेयांश बहुत ज्यादा हैरान हो गया था क्योंकि पिछले दिनों में उसने जब भी गुरनूर से बात की थी, गुरनूर ने उसे ऐसा कुछ भी नही बताया था। गुरनूर की किसी और से शादी के बारे में सोचते ही श्रेयांश के दिल में बेहद तकलीफ हुई लेकिन उसने भी खुद को समझा रखा था की उसे गुरनूर के लिए सीरियस नही होना है। उसने गुस्से में गुरनूर से कहा, “तुम दिल की जगह दिमाग से क्यों नही सोचती हो कभी। पागल हो क्या। बिना सोचे समझे घर से भाग आई।” 


गुरनूर ने अपने आँसू पोंछकर श्रेयांश को हैरानी से देखते हुए कहा, “वो जबरदस्ती मेरी शादी कहीं और करवा रहे थे।” 


“तो कर लेती शादी। यहाँ क्यों आ गई?” श्रेयांश ने कहा जिसे सुनकर गुरनूर को एक झटका सा लगा। वो ये देखकर हैरान हो गई थी की श्रेयांश ने कितनी आसानी से उसे किसी और के साथ शादी करने के लिए कह दिया। उसने गुस्से और बेबसी से श्रेयांश को देखते हुए कहा, “कैसे कर लेती जब मैं तुमसे प्यार करती हूँ और तुम मुझसे।” 


वहाँ आसपास आते जाते हुए लोग उन्हें देख रहे थे। श्रेयांश ने उसे देखा और कहा, “तो तुम इस उम्मीद में यहाँ आ गई हो कि मैं तुमसे शादी कर लूँगा। अगर ये सोचकर यहाँ आई हो तो अभी के अभी वापिस लौट जाओ क्योंकि ऐसा कभी नहीं होगा, गुरनूर। मुझे नहीं है प्यार तुमसे और वैसे भी, मैं दो महीने बाद तेरह तारीख को जा रहा हूँ यहाँ से।” 


“तुम ये क्या कह रहे हो, श्रेयांश। तुम्हारी आँखों में दिखता है प्यार मेरे लिए।” गुरनूर ने श्रेयांश का हाथ पकड़कर कहा तो श्रेयांश ने अपना हाथ उसके हाथ से छुड़वाते हुए कहा, “नहीं, यकीन मुझे किसी प्यार में और न ही मुझे कभी प्यार हो सकता है। तुम्हारे साथ जो कुछ भी था, वो बस टाइमपास था।” 


“तुम अपने करियर की वजह से ये सब कह रहे हो ना क्योंकि तुम तीन साल के लिए जा रहे हो। देखो अगर ऐसा है तो मैं तुम्हारा इंतजार करूॅंगी श्रेयांश। तुम्हारे करियर में प्रॉबलम कभी नहीं बनूंगी मैं। मेरे साथ रहकर भी तुम अपना करियर बना सकते हो।” गुरनूर ने श्रेयांश की बातों पर यकीन न करते हुए कहा। उसे अभी भी उम्मीद थी की श्रेयांश कह देगा की ये सब कुछ झूठ है लेकिन श्रेयांश ने अगले ही पल उसकी सारी उम्मीदों पर पानी फेरते हुए कहा, “मैंने तुम्हें सच बता दिया है, गुरनूर। वो सब सिर्फ टाइमपास था।” 


गुरनूर ने अपने दोनों हाथों से श्रेयांश की कॉलर पकड़कर उसकी आँखों में देखते हुए कहा, “तुम मेरे साथ इतना बड़ा फरेब नहीं कर सकते। मैंने तुम्हें अपनी जिंदगी में वहाँ जगह दी है जहाँ मेरे लिए सब कुछ मेरे सपने थे। क्यों…क्यों इतना बड़ा झूठ बोला तुमने मुझसे कि तुम मुझसे प्यार करते हो।” 


“तुमने भी तो मुझसे झूठ कहा था कि तुम्हारा बॉयफ्रेंड है। मैंने भी हिसाब बराबर करने के लिए ये कह दिया कि मुझे तुमसे प्यार है क्योंकि मुझे नही पसंद की कोई मुझसे झूठ बोले।” श्रेयांश ने गुरनूर के हाथों से अपनी कॉलर छुड़वाते हुए कहा। 


गुरनूर ने खीचकर एक थप्पड़ श्रेयांश के गाल पर मारा और कहा, “पहले जब मुझे तुमसे मतलब नहीं था तो तुम मेरे इतने करीब आए कि मुझे तुम्हारी आदत लग गई, और अब जब मुझे तुम्हारी इतनी आदत लग गई है तो तुम दूर जाना चाहते हो मुझसे। किसी की फीलिंग्स के साथ भी खेलना सीखा है क्या तुमने। प्यार जैसी इतनी प्योर फीलिंग का मज़ाक बना दिया तुमने।” 


“वापिस चली जाओ जहाँ से आई हो। भुला दूॅंगा आसानी से मैं तुम्हें।” कहकर श्रेयांश वहाँ से जाने लगा। 


“नहीं जाऊॅंगी। जब तक तुम यहाँ हो, मैं भी यहीं रह कर तुम्हें अपने प्यार का एहसास दिलाने की कोशिश करूँगी और जहाँ तक बात है मुझे भुलाने की तो तुम मुझे कभी भूला नहीं पाओगे। हर जगह तुम मुझे देखोगे और हर किसी में मेरी तलाश करोगे तुम।” गुरनूर ने उसे जाते हुए देखकर कहा तो श्रेयांश मुड़ा और उसके करीब आकर कहा, “कोई कोशिश मत करना मुझे एहसास दिलाने की क्योंकि इसका कोई फ़ायदा नहीं होगा।” 


श्रेयांश गुरनूर को वहाँ छोड़कर चला गया। गुरनूर बेबसी से बस उसे जाते हुए देखती रही। उसके दिल में इस वक्त बहुत तकलीफ हो रही थी। गुरनूर के पास पैसे थे इसलिए थोड़ी देर वहाँ ऐसे ही खड़े रहने के बाद वो ऑटो में बैठकर रावी के घर जाने के लिए निकल गई। 


रावी सबके साथ बैठकर नाश्ता कर रही थी की तभी उनके घर की डोरबेल बजी। रावी ने उठते हुए कहा, “आप सब नाश्ता कीजिए। मैं देखती हूँ।” 


रावी ने दरवाज़े की तरफ आकर जैसे ही दरवाज़ा खोला, वो अपने सामने गुरनूर को देखकर हैरान रह गई। गुरनूर को देखकर लग रहा था की वो इस वक्त बहुत डरी हुई है और पूरे रास्ते रोते हुए आई है। रावी ने गुरनूर को देखते हुए कहा, “गुरनूर, तुम यहाँ क्या कर रही हो और ये क्या हाल बना रखा है तुमने अपना?”


श्रेयांश की वजह से गुरनूर पूरे रास्ते रोते हुए आई थी जिसकी वजह से उसकी आँखें और नाक लाल हो चुकी थी। गुरनूर ने बिना कुछ कहे रावी को गले लगा लिया और रोने लगी। 


गुरनूर का नाम सुनकर शुभम और मधु ने एक दूसरे को देखा और फिर उठकर गुरनूर के पास आ गए। नील भी उनके पीछे आ गया। मधु मन ही मन में गुरनूर को अपने पास देखकर खुश हो रही थी लेकिन उसे हैरानी भी थी की गुरनूर ऐसे अकेले यहाँ कैसे आ गई। नील और रावी भी काफी हैरान थे। मधु खुश तो बहुत थी लेकिन जब उसने गुरनूर को रोते हुए देखा तो उसे तकलीफ होने लगी। 


शुभम ने गुरनूर के सिर पर हाथ रखा तो उसने रावी से अलग होकर उसे देखा। शुभम ने गुरनूर के हाथ से उसका बैग लेकर नील को दिया और उसके आँसू पोंछे। शुभम ने प्यार से उसके कंधे पर हाथ रखा और उसे अंदर ले आया। उसे गुरनूर के यहाँ आने से ज्यादा हैरानी बिल्कुल भी नही हुई थी क्योंकि शायद उन्हें मालूम था की गुरनूर घर से भागकर यहाँ आएगी।


Continued In आर्ज-ए-इश्क - 25

Monday, 28 September 2026

आर्ज-ए-इश्क - 24

 



गुरनूर ने फैसला तो कर लिया था कि वो घर भाग जाएगी पर ये उसके लिए इतना आसान नही था क्योंकि नीत उसके ऊपर कड़ी नज़र रखती थी। शादी का दिन आने में ज़्यादा वक़्त नहीं बचा था इसलिए नीत के कहने पर शीतल ने जल्दी जल्दी उसे उसकी शादी की शॉपिंग करवायी और शादी की सारी तैय्यारियाँ भी कर ली। जब विक्रम ने शुभम को जल्दी ही गुरनूर की शादी करने के बारे में बताया और उन्हें शादी में आने के लिए कहा तो शुभम को काफी हैरानी हुई क्योंकि वो अच्छे से जानते थे की गुरनूर इस शादी के लिए तैयार नहीं होगी इसके बावजूद विक्रम उसकी जबरदस्ती शादी कर रहे हैं। वो विक्रम से इस बारे में कुछ नही कहना चाहते थे इसलिए उन्होंने विक्रम से कहा कि नील और अपने काम की वजह से वो चार दिन पहले पहुँच जाएंगे। रावी भी गुरनूर के लिए काफ़ी परेशान थी लेकिन वो भी कुछ नही कर सकती थी। रावी की नज़रों में अगर गुरनूर को इस शादी से कोई बचा सकता था तो वो श्रेयांश था लेकिन गुरनूर ने उसे श्रेयांश को इस बारे में कुछ भी बताने के लिए मना किया था। 


वहीं श्रेयांश इन सबसे बेख़बर विवेक के साथ लंदन जाने के लिए शॉपिंग खत्म करने में बिजी था। गुरनूर से उसकी बात तो होती थी मैसेज पर लेकिन गुरनूर ने खुद ही उसे इस बात का एहसास नहीं होने दिया कि वो किस प्रॉब्लम में है।


गुरनूर के घर में शादी के लिए कुछ करीबी मेहमान आ चुके थे। नीत भी गुरनूर को लेकर उनके साथ बैठी हुई थी और शीतल उनके लिए खाने की तैयारी में लगी हुई थी। गुरनूर के पास यही सही मौका था की वो अपने कमरे में जाकर घर से भागने के लिए पैकिंग कर सके इसलिए वो बहाना बनाकर ऊपर अपने कमरे में आ गई और अपने कमरे का दरवाज़ा अंदर से बंद कर भागने के लिए पैकिंग करने में लग गई। जैसे ही उसने पैकिंग खत्म की, किसी ने उसके कमरे का दरवाज़ा खटखटाया। गुरनूर ने जल्दी से बैग को साइड में छुपाकर दरवाजा खोला तो देखा सामने नीत की छोटी बेटी, रूही खड़ी हुई थी। रूही ने उसे देखकर कहा, “दीदी, आप यहाँ क्या कर रही है? नीचे सब आपके बारे में पूछ रहे है।” 


“वो मैं अपने कपड़े सही करने आई थी। चलो नीचे चले।” कहते हुए गुरनूर ने अपने कमरे का दरवाज़ा बंद किया और रूही के साथ नीचे आकर सबके बीच चुपचाप बैठ गई। 


शादी के फंक्शनस की शुरुआत होने के दिन गुरनूर पाँच बजे उठ गई। उसने अपने पास में रूही को सोते हुए देखा तो थोड़ा परेशान हो गई लेकिन फिर बहुत ही ध्यान से बेड से उतरकर वो अपना बैग लेकर कमरे से बाहर आ गई। देर रात सोने की वजह से पूरे घर में अभी कोई भी नहीं जगा था जिसका फ़ायदा उठाकर गुरनूर बहुत ही ध्यान से घर से भाग गई। 


शीतल सुबह उठकर गुरनूर को फंक्शन के लिए उठाने के लिए आई तो   गुरनूर उसे पूरे कमरे में कहीं भी दीखाई नहीं दी। उसने रूही को उठाते हुए पूछा, “रूही, गुरनूर कहाँ है?” 


“यहीं कहीं होगी, मामी।” रूही ने अलसाई सी आवाज में उठते हुए कहा। शीतल गुरनूर को ना पाकर परेशानी हो गई। 


वहीं गुरनूर इस वक्त इंदौर जाने वाली ट्रेन में अकेली बैठी हुई थी। वो डरी हुई तो काफी थी लेकिन श्रेयांश का प्यार उसे कहीं ना कहीं हिम्मत भी दे रहा था। 


शीतल ने विक्रम और नीत को गुरनूर के भाग जाने के बारे में बताया। उन्होंने गुरनूर को कई बार फोन किया लेकिन गुरनूर ने अपना फोन स्विच ऑफ कर लिया था। विक्रम को भी अब गुस्सा आ रहा था जिसे देख शीतल ने कहा कि उन्हें गुरनूर का इंतजार करना चाहिए। नीत ने शीतल को देखकर हल्के गुस्से में कहा, “आप अपनी बेटी पर ठीक से नज़र नही रख सकती थी, भाभी।” 


“ये बात आप मुझसे न ही कहे तो बेहतर होगा। एक तो मेरी बेटी की मर्ज़ी के खिलाफ आपने उसकी शादी तय की और जब वो आपके इस जबरदस्ती के फैसले से बचने के लिए भाग गई तो इल्जाम मेरे ऊपर की मैंने उसपर ठीक से नज़र नही रखी। जरा पूछिए अपने भाई से। मैंने इन्हें पहले ही कह दिया था की अगर गुरनूर ने इस शादी से बचने के लिए कल को कोई भी ऐसा वैसा कदम उठाया तो मुझे मत कहे इसलिए बेहतर होगा मेरे ऊपर ये इल्जाम न लगाए आप। ये जो कुछ भी गुरनूर ने किया है ना इसके जिम्मेदार आप दोनों भाई बहन खुद है। अगर आप दोनों उसकी मर्ज़ी के बिना उसकी शादी न करवा रहे होते तो वो कभी नहीं भागती। ये जो इल्जाम है ना अपने और अपने भाई पर लगाइए आप, दीदी।” कहकर शीतल गुस्से में वहाँ से चली गई। 


सुबह के वक्त इंदौर में आकर गुरनूर ने सबसे पहले अपना फोन ऑन किया और श्रेयांश को फोन लगाया। जैसे ही श्रेयांश ने दूसरी तरफ से फोन उठाया, गुरनूर ने जल्दी से कहा, “इंदौर रेलवे स्टेशन पर मिलने आ जाओ अभी।” 


श्रेयांश ये सुनकर हैरान हो गया। उसे समझ नही आया की इतनी सुबह सुबह गुरनूर इंदौर रेलवे स्टेशन पर कर क्या रही है। वो गुरनूर के साथ इस रिश्ते में सीरियस नही होना चाहता था लेकिन उसके दिल में गुरनूर के लिए मोहब्बत थी जो उसे गुरनूर के पास जाने के लिए कह रही थी। श्रेयांश खुद को रोक नही पाया और अपने घर से बाहर आकर अपनी बाइक पर बैठ स्टेशन जाने के लिए निकल गया। 


जल्दी ही वो स्टेशन पहुँच गया। बाइक पार्किंग में लगाकर वो अंदर जाने लगा तो देखा की गुरनूर बाहर खड़ी हुई थी। वो उसके पास आया और उसने गुस्से में पूछा, “ये क्या पागलपन है अब तुम्हारा गुरनूर? अचानक से तुम यहाँ क्यों आ गई हो? वो भी बिल्कुल अकेले।” 


श्रेयांश गुरनूर के चेहरे को देखकर समझ रहा था की वो इस वक्त कितना डरी हुई है और वो बहुत ज्यादा रोई भी है क्योंकि उसकी आँखें रोने की वजह से सूजी हुई थी। गुरनूर की आँखों में फिर से आँसू आ गए और उसने कहा, “मैं भागकर आई हूॅं। पापा जबरदस्ती  मेरी शादी करवा रहे थे बुआ के कहने पर।” 


गुरनूर की शादी की बात सुनकर श्रेयांश बहुत ज्यादा हैरान हो गया।


Continued In आर्ज-ए-इश्क - 25

Tuesday, 22 September 2026

आर्ज-ए-इश्क - 23

 


मधु ने गुरनूर और नील की शादी को लेकर अब तक अपने दिल में बहुत सारे ख़्वाब सजाए थे जिन्हें अब वो टूटता हुआ देख रही थी। शुभम ने उनके कंधे पर हाथ रखकर उन्हें समझाते हुए कहा, “मधु समझने की कोशिश करो। मैं ऐसे ही विक्रम को फोन कर गुरनूर का रिश्ता तोड़ने की बात नही कह सकता। तुम भगवान से दुआ करो क्योंकि मेरा दिल कह रहा है ये शादी गुरनूर बिल्कुल नहीं करेगी।” 


शुभम बहुत देर तक मधु को समझाते रहे और मधु समझ भी गई। 


गुरनूर ने उस दिन बहुत मुश्किल से श्रेयांश से बात की। वो अपनी आवाज़ से श्रेयांश को इस बात का एहसास नही होने देना चाहती थी की वो उदास या परेशान है पर श्रेयांश इस बात को अपने दिल से महसूस कर पा रहा था की गुरनूर काफी तकलीफ़ में है लेकिन उसने गुरनूर से इस बारे में कुछ नहीं पूछा। 


गुरनूर के रोके को अभी तीन दिन ही हुए थे की विक्रम को नीत का फोन आया और नीत ने विक्रम से जो कुछ कहा, उसे सुनकर वो थोड़ा परेशान हो गए। शीतल भी वहीं खड़ी होकर उन्हें देख रही थी। जैसे ही विक्रम ने फोन रखा, शीतल ने पूछा, “क्या कहा है दीदी ने?” 


“लड़के वाले शादी जल्दी करना चाहते है इसलिए कल वो हमसे मिलने आएंगे।“ विक्रम ने कहा तो शीतल ने गुस्से से कहा, “मुझे एक बात बताइए। क्या दीदी को हमसे ये नही पूछना चाहिए था की हम कल उनसे मिल सकते है या नहीं। आपकी बहन की न कुछ ज्यादा ही आदत है हमारे घर में दखल देने की। पूछती नही है कुछ भी। सीधा बताती है की ये कर लेना। अरे, उनका हक़ है अपने मायके पर लेकिन इसका मतलब ये तो नही की वो अपने फैसले भी हमसे मनवाएंगी।” 


शीतल गुस्से में वहाँ से चली गई। विक्रम को भी अब समझ नही आ रहा था की वो क्या करे। वो अपनी बहन से कुछ कह नहीं सकते थे क्योंकि वो बड़ी थी और शीतल से भी नही क्योंकि उन्हें मालूम था की शीतल भी गलत नही है। 


अगले दिन लड़केवाले नीत के साथ आ गए और सबने मिलकर शादी की तारीख अगले महीने की तय कर दी। विक्रम और शीतल को छोड़कर सभी खुश थे और गुरनूर, उसकी उदासी को तो किसी ने देखा तक नही। गुरनूर ने नजर उठाकर उस लड़के को देखा जिससे उसकी शादी होने वाली थी तो पाया कि वो लड़का उसे हवस भरी नज़र से देख रहा था। गुरनूर को उस लड़के की नज़र को अपने ऊपर महसूस करना अच्छा नहीं लग रहा था क्योंकि श्रेयांश ने उसे आजतक ऐसे कभी नहीं देखा था। ये याद करते ही उसे रोना आ गया। वो वहाँ से एकदम से उठकर ऊपर अपने कमरे में चली गई और बेड पर लेटकर रोने लगी।


शीतल और विक्रम ने गुरनूर को ऐसे जाते हुए देखा तो वो दोनों परेशान हो गए। वहीं लड़केवाले भी हैरानी से उस तरफ देख रहे थे जहाँ गुरनूर गई थी। उन्हें ऐसे देखकर नीत ने बात संभालते हुए कहा, “लगता है हमारी गुरनूर शर्मा गई है। लड़की है ना। अपनी शादी की बात सुनकर शर्मा ही जाती है लड़कीयाँ।” 


लड़केवाले मुस्कुराने लगे। लड़के की माँ ने मुस्कुराकर विक्रम को देखते हुए कहा, “भाई साहब, ये मेरा एक लौता बेटा है इसलिए मैं चाहती हूँ की ये शादी बहुत धूमधाम से हो। किसी को भी कोई कमी न आए और लेन देन भी आपकी तरफ से एकदम बढ़िया हो जिससे मेरे सारे रिश्तेदार खुश हो जाएं।” 


विक्रम को तो जल्दबाजी में कुछ समझ नहीं आ रहा था इसलिए उसने बिना कुछ कहे हाँ में सिर हिला दिया। उनके जाने के बाद शीतल ने गुस्से में विक्रम और नीत को देखते हुए कहा, “अब ये जो इनकी डिमांड है शादी धूमधाम से करने की और सारे लेन देन की। इन सबका इतने कम वक्त में कौन इंतजाम करेगा। पूछ लीजिए अपनी बहन से। जब ये हमारे घर के सभी फैसले खुद लेना चाहती है तो अब पूछिए इनसे। क्या ये करेंगी हमारी गुरनूर की शादी पर इतना सा भी खर्चा।” 


“भाभी, आपको मेरे लिए ऐसा कहने की ज़रूरत नहीं है। मैंने अपना मानकर ही गुरनूर का रिश्ता करवाया है इतने अच्छे घर में। इसमें आपके घर के फैसले लेने वाली कौन सी बात आ गई?” नीत ने कहा। 


ये सुनकर शीतल का गुस्सा सातवें आसमान पर पहूँच गया और उसने कहा, “ना, आप तो पूछती है हमसे। गुरनूर के लिए रिश्ता लाने से पहले भी आपने हमसे पूछा, फिर पक्का होने लगा तो भी आपने गुरनूर के मना करने के बावजूद भी पक्का करवा दिया रिश्ता बिना हमारी मर्ज़ी के, और कल भी आपने हमसे पूछा कहाँ, की भाई भाभी, वो लोग तारीख तय करना चाहते है। क्या आप लोगों के पास इतना पैसा है अभी की शादी में खर्च कर पाओ। नही, आपने तो सीधा फैसला सुनाया की वो आ रहे है शादी पक्की करने।” 


विक्रम जानते थे शीतल गलत नहीं है फिर भी उन्होंने कहा, “शीतल, बस शांत हो जाओ। अब जो होना था वो हो गया। अब हमें मिलकर आगे का सोचना होगा की क्या करना है।” 


“मुझे ही शांत करवाना आप। अपनी बहन को मत समझाना कुछ भी। आजतक जितनी हमने सेविंग्स की है, वो तो लगेंगी ही इस शादी में। जैसी उनकी डिमांड्स है ना, लोन भी लेना पड़ जाएगा हमें।” कहकर शीतल गुस्से में वहाँ से चली गई। 


नीत को अपनी भाभी की बातों का बुरा लगा था इसलिए वो भी अपने घर जाने के लिए निकल गए। विक्रम वहीं बैठकर इन सब के बारे में सोचने लगे। उन्होंने सोचा नही था की एक गुरनूर की शादी को लेकर घर में इतना कलेश होगा। अब उन्हें पछतावा हो रहा था और उन्हें सच में लग रहा था की उन्हें गुरनूर के इनकार के खिलाफ जाकर ये रिश्ता पक्का नही करना चाहिए था। 


थोड़ी देर रोने के बाद गुरनूर ने उठकर अपने आँसू पोंछे। उसने पहले गुस्से से अपने कानों में पहने हुए झुमके उतारकर जमीन पर फैंके और फिर अपने हाथों में पहनी हुई चूड़ियाँ भी उतारकर जमीन पर फैंकने लगी जिससे वो सारी चूड़ियाँ टूट गई। उन टूटी हुई चूड़ियों को देखते हुए गुरनूर ने फैसला किया की वो खुदको और अपनी जिंदगी को ऐसे इन चूड़ियों की तरह टूटकर बिखरने नही देगी। वो घर से भाग जाएगी।


Continued In आर्ज-ए-इश्क - 24

Monday, 21 September 2026

आर्ज-ए-इश्क - 22



लड़के वाले आ गए तो विक्रम और नीत ने अच्छे से उनका स्वागत किया। थोड़ी देर बातें करने के बाद विक्रम ने शीतल से कहा, “जाओ गुरनूर को ले आओ।” 


शीतल ऊपर गुरनूर के कमरे में आई तो देखा गुरनूर अपनी डायरी में कुछ लिख रही थी। उसने बस सूट पहनकर अपने बालों को सही किया हुआ था। उसके चेहरे पर कोई मेकअप नही था और न ही उसने अपने कानों या हाथों में कुछ पहना हुआ था। उसे ऐसे देखकर शीतल ने कहा, “गुरनूर, लड़के वालों के सामने जाने के लिए कोई ऐसे तैयार होता है। कानों में तो कम से कम कुछ पहन लो।” 


“मम्मी, मैं कोई खरीदा या बेचे जाने वाला सामान नही हूँ जिसे आप किसी के सामने बिना मेंटेन किए प्रेसेंट करदेंगी तो वो खरीदने से मना करदेंगे। इंसान हूँ मैं और मुझे ऐसे ही रहना पसंद है। मैं नीचे जा रही हूँ ना आपके साथ। यही बहुत है। पहले ही कह रही हूँ मुझसे और कोई उम्मीद मत रखना।” गुरनूर ने अपनी डायरी बंद कर उसे बेड पर रखते हुए गुस्से में कहा। 


“ठीक है। चलो।” कहते हुए शीतल गुरनूर को नीचे ले आई। गुरनूर ने बेमन से सबको नमस्ते कहा और एक कुर्सी पर बैठ गई। उसने किसी को भी आँख उठाकर देखा तक नही। उसे देखकर लड़के की माँ ने नीत से कहा, “लगता है इसे ज्यादा सजने संवरने का शौंक नही है।” 


नीत ने शीतल को गुस्से से देखा और फिर लड़के की माँ से कहा, “जी, इसे सादगी ज्यादा पसंद है।”


“मेरे बेटे को तो गुरनूर तस्वीर देखते ही पसंद आ गई थी। आप गुरनूर से उसकी मर्जी पूछ लीजिए। अगर उसे भी मेरा बेटा पसंद है तो आज ही रिश्ता पक्का कर देते है।” लड़के की माँ ने मुस्कुराते हुए कहा।


“जी, ज़रूर।” कहते हुए विक्रम खड़े हुए और शीतल के साथ गुरनूर को वहाँ से अपने कमरे में ले आए। उन्होंने गुरनूर से उसकी मर्ज़ी पूछी तो गुरनूर ने गुस्से में कहा, “पापा, मैंने नही करनी शादी। आप मना कर दीजिए सबको। बुआ को भी।” 


गुरनूर कमरे से बाहर निकलकर ऊपर अपने कमरे में चली गई। नीत ने उसे ऊपर जाते हुए देखा तो उसने विक्रम के कमरे में आकर पूछा, “क्या कहा गुरनूर ने?” 


“वो अभी शादी के लिए तैयार नही है, दीदी।” विक्रम ने कहा तो नीत ने उसके कंधे पर हाथ रखकर उसे समझाते हुए कहा, “विक्रम, वो तो बच्ची है। मना करेगी ही। तुम तो समझदार हो ना। उसे समझाओ। इतना अच्छा लड़का और परिवार है। उसकी जिंदगी बन जाएगी। वो लोग रोके की तैयारी करके आए है। मैं तो कहती हूँ अभी रोका करदो। एक बार रोका हो जाएगा तो अपने आप मान जाएगी तुम्हारी गुरनूर।” 


विक्रम ने कुछ सोचा और कहा, “शायद आप ठीक कह रही है, दीदी। रोका कर देते है। गुरनूर मान जाएगी।” 


विक्रम की बात सुनकर शीतल हैरान रह गई। नीत ने मुस्कुराते हुए शीतल को देखा और कमरे से बाहर चली गई। उसके जाते ही शीतल ने गुस्से में विक्रम से कहा, “आपका दिमाग तो नही खराब हो गया, विक्रम। आप देख पा रहे है की मेरी बेटी ये शादी नही करना चाहती, फ़िर भी आप अपनी बहन की बातों में आकर मेरी बेटी का रोका करने की बात कर रहे है। अरे आपकी ये बहन तो चाहती ही यही है कि इस घर में जितने फैसले हो, वो वही ले। उन्हें बस अपने भाई के घर में भी अपनी हुकुमत चाहिए और आप उनकी बातों में आ भी जाते है।” 


विक्रम खामोश रहा क्योंकि वो जानता था शीतल का गुस्सा जायज़ है क्योंकि वो झूठ नहीं बोल रही थी। उसे खामोश देख शीतल ने कहा, “आपको मेरी बेटी का जबरदस्ती रिश्ता तय करना है। कर दीजिए लेकिन अगर गुरनूर ने इस शादी से बचने के लिए कल को कोई भी ऐसा वैसा कदम उठाया तो मुझे मत कहना। इसके जिम्मेदार आप खुद होंगे और आपकी बहन।” 


शीतल भी गुस्से से कमरे से निकल गई। नीत ने शीतल से गुरनूर को नीचे लाने के लिए कहा तो शीतल गुरनूर को समझाकर नीचे ले आई और देखते ही देखते गुरनूर का रोका हो गया। जिस लड़के से उसका रोका हुआ था, वो तो गुरनूर को ही देखे जा रहा था पर इस सबके बीच गुरनूर बस खामोशी से बैठी रही। 


लड़के वालों के जाने के बाद गुरनूर ने अपने कमरे में जाकर गुस्से में वो सारा सामान ज़मीन पर फैंक दिया जो लड़के की माँ ने उसे दिया था। गुरनूर ने अपना कमरा बंद करके रावी को फोन लगाया और उसे इस बारे में सब कुछ बता दिया। 


रावी को ये सब जानकर एक झटका सा लगा और उसने कहा, “विक्रम अंकल तुम्हारे साथ ऐसा नही कर सकते। 


“पर ऐसा कर दिया है उन्होंने रावी।” गुरनूर ने गुस्से में कहा। उसकी आवाज़ में गुस्सा महसूस कर रावी ने कहा, “तुम शांत हो जाओ, गुरनूर।” 


उसकी बात सुनकर गुरनूर ने कहा, “कैसे शांत हो जाऊॅं, रावी। तुम जानती हो ना मैं श्रेयांश…” 


कहते कहते गुरनूर रुक गई तो रावी ने कहा, “मैं श्रेयांश को बताऊँ इस बारे में। वो जरूर कुछ करेगा तुम्हारे लिए।” 


“नहीं, मैं श्रेयांश को नहीं बता सकती। वो शो का कॉन्ट्रैक्ट मिलने की वजह से इतना खुश है और अपने वीज़ा प्रोसेस वैगरह में बिजी है।  मैं उसकी खुशी खराब नहीं करना चाहती।” गुरनूर ने कहा तो रावी ने कहा, “तो तुम्हारी खुशी भी तो श्रेयांश ही है गुरनूर।” 


गुरनूर ने कुछ नही कहा और फोन काट दिया। रावी गुरनूर के लिए परेशान हो गई पर वो कुछ भी नहीं कर सकती थी। श्रेयांश को बताने के लिए भी उसे गुरनूर ने मना कर दिया था। 


वहीं जब विक्रम ने शुभम और मधु को गुरनूर का रिश्ता पक्का हो जाने के बारे में बताया तो वो दोनों भी हैरान रह गए और मधु का दिल टूट गया। वो दोनों इस वक्त अपने कमरे में बैठे हुए थे। मधु ने रोते हुए शुभम से कहा, “आपने मुझसे कहा था की गुरनूर मेरी बहु बनकर मेरे पास आ जाएगी तो उसका रिश्ता कहीं और कैसे हो सकता है। आपने जब मुझसे कहा की हम गुरनूर को अपनी बहु बनाकर इस घर में हमेशा हमेशा के लिए ले आयेंगे तो कितना खुश थी मैं लेकिन अब देखिए, गुरनूर किसी और की बहु बनेगी।” 


शुभम ने जैसे ही मधु को समझाने के लिए कुछ कहना चाहा, मधु ने कहा, “मुझे कुछ नहीं पता। आप अभी विक्रम भैया से बात करकर गुरनूर का रिश्ता माॅंगिए नील के लिए।” 


शुभम जानते थे की मधु अब जिद्द कर रही है पर उन्हें ये भी समझ थी की मधु की जिद्द पूरी करने के लिए वो ऐसे ही विक्रम को फोन कर उन्हें गुरनूर का रिश्ता तोड़ने के लिए तो नही कह सकते थे। उन्हें बस इतना मालूम था की उन्हें इस वक्त मधु को कुछ भी करके समझाना पड़ेगा। 


Continued In आर्ज-ए-इश्क - 23

Monday, 14 September 2026

आर्ज-ए-इश्क - 21


 

लंबे सफर के बाद वो सभी दिल्ली पहुँच गए। गुरनूर ने अपना बैग खुद उठा लिया क्योंकि नील अर्पिता के बैग्स उठाना चाहता था। वो सभी स्टेशन से बाहर आ गए। गुरनूर रावी के साथ एक जगह जाकर खड़ी हो गई और नील ने अर्पिता के बैग्स थोड़ी दूरी पर नीचे रखे। अर्पिता को आखिरी बार देखकर नील गुरनूर और रावी के पास आ गया। जैसे ही वो उन दोनों के पास आया, रावी ने उसे देखकर कहा, “अब उनसे इतनी बातें कर ली है तो स्पेशल वाला बाय बोलना तो उन्हें बनता है। जाइए, स्पेशल वाला बाय बोल दीजिए भैया।” 


रावी की बात सुनकर नील के चेहरे पर मुस्कुराहट आ गई। वो मुस्कुराते हुए अर्पिता के पास जाने के लिए जैसे ही मुड़ा, हैरान रह गया क्योंकि अर्पिता उसके पास आ रही थी। उसे आता हुआ देखकर गुरनूर ने नील से कहा, “लीजिए नील, आप क्या जायेंगे। वही आपके पास आ रही है।” 


अर्पिता ने उनके पास आकर नील से कहा, “वो मैं बाय बोलने आई थी और थैंक यू भी। आपने बहुत हेल्प की है आज मेरी।” 


“बाय क्यों कह रही है, आप। अब बातें और मुलाकातें तो होती ही रहेंगी।” नील ने अर्पिता को देखते हुए कहा, जिसे सुनकर रावी और गुरनूर ने एक दूसरे को देखा। अर्पिता भी इंदौर से ही थी बस कुछ वक्त के लिए दिल्ली में होस्टल में रहकर पढ़ने आई थी।


अर्पिता से मिलकर वो सभी घर आ गए। विक्रम और शीतल ने जैसे ही उन तीनों को देखा, वो खुश हो गए। विक्रम ने प्यार से गुरनूर को गले लगाकर उसके माथे पर किस करते हुए पूछा, “ठीक है मेरी प्रिंसेस?” 


“जी, पापा।” गुरनूर ने कहा और फिर शीतल के गले लग गई। विक्रम ने नील को भी गले लगाया और प्यार से रावी के सिर पर हाथ फेरा। 


विक्रम और शीतल चाहते थे की रावी और नील थोड़े दिन रूके लेकिन नील के काम की वजह से उन्हें अगले दिन ही इंदौर वापिस जाना पड़ा। 


गुरनूर श्रेयांश के साथ फिर से लॉन्ग डिस्टेंस निभाने लग गई और इस बीच श्रेयांश को भी अपने करियर का सबसे बड़ा मौका मिला जिसमें उसे पूरे तीन साल तक एक कंपनी के लिए भारत से बाहर परफॉर्म करना था। वो किसी भी हालत में ये मौका छोड़ना नहीं चाहता था।


जब उसने गुरनूर को बताया की उसे आगे बढ़ने का इतना अच्छा मौका मिल रहा है तो गुरनूर बहुत ही ज्यादा खुश हो गई। 


एक शाम गुरनूर ओपन माइक इवेंट से वापिस आई तो उसने देखा कि घर पर उसकी बुआ, नीत आई हुई है और घर पर ऐसे तैयारिययाँ हो रही हैं जैसे कोई खास मेहमान आने वाला है। नीत से मिलकर उसने किचन में काम कर रही शीतल के पास आकर पूछा, “ये सब क्या हो रहा है, मम्मा?” 


“तुम तैयार हो जाओ जाकर अच्छे से।” शीतल ने नीत के लिए चाय बनाते हुए कहा। 


“पर क्यों मम्मा? बुआ के आने पर मुझे तैयार होने की क्या जरूरत है?” गुरनूर ने हैरानी से पूछा तो शीतल ने उसे देखकर कहा, “तुम्हें लड़के वाले देखने आ रहे है। तुम्हारी बुआ रिश्ता लाई है तुम्हारे लिए।” 


ये सुनकर गुरनूर की आँखों के सामने श्रेयांश का चेहरा आ गया। उसे हैरानी के साथ साथ गुस्सा भी आने लगा और उसने कहा, “पर मम्मी मेरा करियर बनाना रहता है अभी।” 


शीतल कुछ कहती उससे पहले ही नीत ने अंदर आते हुए कहा, “ये करियर का रोना सही है तुम लड़कियों का जबकि इसका फायदा कुछ नही है। घर तो तुम्हें फिर भी संभालना पड़ेगा तो अच्छा है तुम इसी पर ध्यान दो और अपनी मम्मी से घर संभालना सीखो।” 


नीत की बातों ने गुरनूर ने गुस्से को बढ़ा दिया और उसने नीत को देखते हुए कहा, “ये करियर का फायदा और नुकसान तो आप मुझे मत ही बताए क्योंकि आपको अगर इसका फायदा पता होता तो आप अपनी बेटी के करियर पर ध्यान ज़रूर देती जिससे वो अपनी दर्दनाक शादीशुदा जिंदगी से आज़ाद हो पाती लेकिन अफ़सोस आपने उसके घर संभालने पर ज्यादा तवज्जो दी जिससे अब वो उसी लायक रह गई है बस। खुद की बेटी की तो वो हालत कर दी है, दूसरो की बेटी की भी अब वैसी ही हालत चाहती है आप।” 


गुरनूर की बातों से नीत को कहीं न कहीं ये एहसास हो गया था की उसने अपनी बेटी के साथ क्या किया है। गुरनूर की कही बातें कड़वी ज़रूर थी पर सच थी। शीतल ने जब देखा की गुरनूर नीत के आगे ज्यादा बोल रही है तो उसने गुरनूर को शांत करते हुए कहा, “गुरनूर, बुआ से ऐसे बात नही करते। अब हमने उन्हें बुला लिया है ना तो तुम बस एक बार उस लड़के से मिल लो। मिलने में क्या जाता है। पसंद आया अगर हमें तो ही शादी की बात होगी ना। जाओ जाकर तैयार हो जाओ।” 


“सही कहा मम्मी आपने ऐसे बात नही करते बड़ो से पर कई बार न अपने लिए बड़ो को जवाब देना ज़रूरी हो जाता है वरना वो हमारी जिंदगी को अपना बनाकर हमारे लिए खुद से फैसले करने लग जाते है ये सोचते हुए की हम तो बच्चे है, जो वो कहेंगे, हम उसे चुपचाप मान लेंगे।” गुरनूर ने नीत को देखते हुए कहा और फिर तैयार होने ऊपर अपने कमरे में चली गई। 


उसके जाते ही नीत ने शीतल से कहा, “ये सिखाया है भाभी आपने इसे। जुबान चलाना। ससुराल में जाकर यही करेगी क्या।” 


शीतल ने कुछ नही कहा क्योंकि उसे पता था गुरनूर भी गलत नहीं है। शीतल भी नीत की बातों में कम आती थी क्योंकि उसे मालूम था की नीत बस अपने भाई के घर में भी अपनी हुकुमत चाहती है और पूरे घर में एक विक्रम ही है जो नीत की बातों में आ जाता है। 


गुरनूर ने गुस्से से अपने कमरे में आकर अपना बैग बेड पर फैंका और उसपर बैठ गई। उसने अपना गुस्सा थोड़ा सा शांत करने की कोशिश की। थोड़ी देर ऐसे ही बैठे रहने के बाद गुरनूर ने उठकर अलमारी से अपने लिए अनारकली सूट निकाला और उसे पहनकर ये दुआ करते हुए तैयार होने लगी की वो उस लड़के और उसके परिवार को बिल्कुल भी पसंद न आए।


Continued In आर्ज-ए-इश्क - 22

Thursday, 10 September 2026

आर्ज-ए-इश्क - 20



श्रेयांश से मिलकर घर आने के बाद गुरनूर दिल्ली वापिस जाने के लिए पैकिंग कर रही थी की तभी रावी ने उसे पीछे से आकर गले लगा लिया और कहा, “मैं तुम्हें बहुत मिस करूँगी।” 

रावी की बात सुनकर गुरनूर बिना कुछ कहे मुस्कुरा उठी तो रावी ने बेड पर रखे हुए गुरनूर के कपड़ो को साइड कर वहाँ बैठते हुए कहा, “तुम मुझे मिस नहीं करोगी क्या या फिर तुम्हें बस श्रेयांश की याद ही आएगी?” 

गुरनूर ने उसके पास बैठकर अपनी दोनों बाहें साइड से उसके आसपास लपेटते हुए कहा, “मैं तुझे तो सबसे ज्यादा मिस करूँगी। तू मेरी बचपन की दोस्त ही नहीं, मेरी बहन भी है और तेरी जगह तो श्रेयांश भी नहीं ले सकता।”

“बस बस, ज्यादा मक्खन मत लगाओ मुझे।” रावी ने अपने दोनों हाथों से गुरनूर की बाजू को पकड़ते हुए कहा। वो दोनों वैसे ही बैठकर हँसते हुए बातें कर रही थी की तभी रावी के कमरे के बाहर से गुजरते हुए नील की नज़र उनके ऊपर गई। 

नील ने कमरे के अंदर आकर अपने हाथों से उनकी नज़र उतारते हुए कहा, “तुम दोनों बहनों में कितना प्यार है। किसी की नज़र ना लगे तुम दोनों को।” 

“हमें किसी की नज़र नही लगती।” रावी ने कहा। नील भी वहीं बैठ गया और गुरनूर उन दोनों से बातें करते हुए अपनी पैकिंग करने लग गई। 

अगली सुबह गुरनूर दिल्ली वापिस जाने के लिए तैयार थी। नील और रावी उसे छोड़ने जा रहे थे। गुरनूर जैसे ही मधु से मिली, मधु भावुक होकर रोने लगी क्योंकि ये पहली बार था जब गुरनूर इतने वक्त तक उनके साथ दिन रात रही थी। वैसे तो जब वो लोग दिल्ली में रहते थे तो बस गुरनूर दिन में एक बार कुछ वक्त के लिए ही आती थी। ज्यादातर रावी गुरनूर के घर पर उसके साथ रहती थी। अब जब मधु को गुरनूर को दिन रात देखने की आदत हो गई तो उसके वापिस जाने का समय आ गया। 

गुरनूर ने मधु को रोते हुए देखा तो उसे अच्छा नही लगा। उसने मधु के आँसू पोंछते हुए कहा, “आंटी, आप ऐसे रोने लगोगे तो मैं जा नहीं पाऊँगी। मैं आपसे वादा करती हूँ मैं बहुत जल्दी दोबारा आपके पास रहने आऊँगी।” 

मधु ने प्यार से गुरनूर के गाल को छूकर मुस्कुराते हुए हाँ में सिर हिला दिया। गुरनूर फिर शुभम से मिलकर नील और रावी के साथ घर से स्टेशन पहुँचने के लिए निकल गई। 

उसे जाता हुआ देखकर मधु फिर से थोड़ा इमोशनल हो गई। मधु को इमोशनल होता हुआ देखकर शुभम ने उसे कंधो से पकड़ा और कहा, “अरे भाग्यवान, इतना रोने की क्या जरूरत है। अगर तुम्हें गुरनूर से इतना ही प्यार है तो हम उसे हमेशा के अपना बनाकर इस घर में ले आते है। हम विक्रम से नील के लिए गुरनूर का हाथ माॅंग लेंगे।” 

“क्या सच में?” मधु ने खुश होकर कहा और फिर उदास होते हुए कहा, “पर अगर गुरनूर या नील नही माने तो?” 

“तुम अपने बेटे से पूछे बिना ही इस बात का अंदाजा कैसे लगा सकती हो। उससे उसकी पसंद पूछेंगे न हम। बस थोड़ा इंतजार करना होगा तुम्हें। नील की अभी अभी जॉब लगी है और गुरनूर भी अभी पूरी तरह से अपने करियर पर ध्यान दे रही है। एक बार उन दोनों को अपने अपने करियर में पूरी तरह से सैटल होने दो। उसके बाद मैं विक्रम से बात करूँगा।” शुभम ने कहा। उसकी बात सुनकर मधु ने मुस्कुराते हुए कहा, “ठीक है। अगर आप ये गारंटी दे की गुरनूर मेरी बहु बनकर इस घर में आएगी तो मुझे इंतजार करने में कोई दिक्कत नही।” 

“भगवान से प्रार्थना करो की ऐसा ही हो।” शुभम ने मधु के गाल को छूकर कहा और अपने काम पर जाने के लिए निकल गए। 

वहीं स्टेशन पहुँचकर नील, रावी और गुरनूर ट्रेन में अपनी सीट पर आकर बैठ गए। उनकी सीट दरवाज़े के पास ही थी। नील ने सामान रखकर गुरनूर और रावी को देखते हुए कहा, “तुम दोनों बैठो। मैं अभी आता हूँ।” 

नील को चलती हुई ट्रेन के दरवाज़े पर खड़े होना अच्छा लगता था इसलिए वो दरवाज़े पर आकर खड़ा हो गया। वो वहाँ खड़े होकर आसपास देख ही रहा था की तभी एक लड़की उसके सामने आई जिसने अपने हाथ में दो भारी भारी बैग पकड़े हुए थे। वो लड़की बहुत ज्यादा हाफ रही थी। नील ने उसे देखकर अंदाजा लगाया की शायद उसे स्टेशन छोड़ने कोई नहीं आया है इसलिए उसे अकेले ही दो भारी भरकम बैग उठाने पड़े जिसकी वजह से वो अब हाफ रही थी और लंबी सांसें ले रही थी। 

नील ने उसे देखकर कहा, “क्या मैं आपकी हेल्प करूँ।” 

उस लड़की ने नील को देखकर हाफते हुए कहा, “येस, प्लीज़।” 

नील ने ट्रेन से उतरकर उस लड़की के दोनों बैग ट्रेन में चढ़ाए। गुरनूर और रावी अपनी ही बातों में लगी हुई थी इसलिए उन्होंने नील की तरफ ध्यान नहीं दिया। उस लड़की के ट्रेन पर चढ़ने के बाद नील भी ट्रेन पर वापिस चढ़ गया। उस लड़की ने अपने बैग से निकालकर पानी पीया। नील तो लगातार उसे देखे जा रहा था।

रावी से बातें करते हुए गुरनूर की नज़र नील और उस लड़की पर गई तो वो हैरान हो गई। उसने नील की तरफ इशारा करते हुए रावी से कहा, “जरा उधर देखो।” 

नील को किसी लड़की के साथ देखकर रावी को भी बहुत ज्यादा हैरानी हुई। उस लड़की ने थोड़ा सा रिलैक्स होकर नील की तरफ अपना हाथ बढ़ाते हुए कहा, “थैंक यू, मेरी हेल्प करने के लिए।” 

नील ने उससे हाथ मिलाते हुए कहा, “वेलकम। चलिए आपको आपकी सीट तक छोड़ देता हूँ।” 

उसने लड़की ने अपने हाथ में पकड़ी टिकट में अपना सीट नंबर देखा और उस सीट पर आ गई जहाँ गुरनूर और रावी बैठी हुई थी। नील उसके बैग लेकर वहाँ आया और उसने हैरानी से उस लड़की को पूछा, “ये आपकी सीट है।” 

उस लड़की ने मुस्कुराकर कहा, “येस, वो विंडो वाली।” 

“फिर तो आप मेरे साथ ही बैठेंगी। आपके साथ वाली सीट मेरी ही है।” नील ने भी मुस्कुराते हुए कहा। रावी और गुरनूर उसे ही देख रही थी। गुरनूर ने थोड़ा शरारत से रावी को देखते हुए नील को सुनाने के लिए कहा, “रावी, इन दिनों लोगों के साथ इत्तेफाक बहुत होते है।” 

उस लड़की को गुरनूर की बात समझ नहीं आई लेकिन नील समझ गया की गुरनूर क्या कहना चाह रही है। वो लड़की नील को देखकर अपनी सीट पर बैठ गई। नील ने ध्यान से उसके बैग ऊपर रख दिए और फिर उसके पास आकर बैठ गया। 

उस लड़की ने अपना नाम नील को बताते हुए कहा, “मेरा नाम अर्पिता है।” 

नील ने भी उस लड़की को अपना नाम बताया और फिर रावी और गुरनूर की तरफ इशारा करते हुए कहा, “ये मेरी बहन है रावी और ये इसकी दोस्त है, गुरनूर।” 

अर्पिता ने रावी और गुरनूर से हेलो कहा तो दोनों मुस्कुरा उठी। थोड़ी देर में ट्रेन चलने लगी। नील का ध्यान बार बार अर्पिता की तरफ जा रहा था। अर्पिता भी बीच बीच में नील को देख लेती क्योंकि उसे नील का केयरिंग नेचर अच्छा लगा था। 

अर्पिता नील के साथ बीच बीच में बातें भी कर रही थी और बातों ही बातों में उन दोनों ने अपने नम्बर भी एक दूसरे को दे दिए। गुरनूर का ध्यान जब इस बात पर गया तो उसने रावी से कहा, “लगता है तुम्हारे भाई की लव स्टोरी भी अब शुरू होने वाली है।” 

नील ने गुरनूर की बात पर कोई ध्यान नहीं दिया क्योंकि उसका ध्यान अर्पिता में था। रावी ने नील और अर्पिता को देखकर गुरनूर से कहा, “मतलब अब मैं ही सिंगल बची हूँ।” 

रावी की ये बात सुनकर गुरनूर हँसने लगी। 

Continued In आर्ज-ए-इश्क - 21

आर्ज-ए-इश्क - 19



अगली सुबह गुरनूर सबके साथ बैठकर नाश्ता कर रही थी की तभी उसका फोन बजा। उसने चम्मच नीचे प्लेट में रखकर टेबल से फोन उठाकर देखा तो उसके ऊपर पापा लिखा आ रहा था। विक्रम का फोन था इसलिए गुरनूर ने जल्दी से फोन उठाते हुए कहा, “हेलो, पापा।” 

“कैसी हो, बेटा और तुम वापिस कब आओगी। तुम्हारे पापा का मन नही लग रहा तुम्हारे बिना।” विक्रम ने कहा तो गुरनूर के होठों पर मुस्कान आ गई और उसने कहा, “कल मेरा एक लास्ट ओपन माइक अटेंड करना रहता है यहाँ। उसे अटेंड करने के बाद आ जाऊॅंगी।” 

गुरनूर की बात सुनकर रावी थोड़ा हैरान हो गई क्योंकि गुरनूर ने उसे ऐसा कुछ भी नही बताया था की उसका कोई और ओपन माइक है। रावी ने गुरनूर को देखा पर सबके सामने उससे कुछ नही पूछा। गुरनूर ने विक्रम से ये बात इसलिए कही थी क्योंकि दिल्ली वापिस जाने से पहले उसे आखिरी बार श्रेयांश से मिलना था। 

विक्रम से थोड़ी देर बात करने के बाद गुरनूर ने फोन काटकर टेबल पर वापिस रख दिया और नाश्ता करने लगी। रावी को जानना था की गुरनूर ने विक्रम से ओपन माइक शो का क्यों कहा इसलिए उसने जल्दी से अपना नाश्ता खत्म करकर गुरनूर से कहा, “मुझे तुमसे कुछ बात करनी है। तुम अभी चलो मेरे साथ।” 

रावी ने गुरनूर का हाथ पकड़ लिया। मधु ने देखा की रावी गुरनूर का हाथ पकड़कर उसे ठीक से नाश्ता नहीं करने दे रही और उसे नाश्ते से उठाना चाह रही है तो उसने रावी को डाटते हुए कहा, “रावी, ये क्या कर रही हो तुम। जो भी बात करनी है बाद में कर लेना उससे। कहीं भाग थोड़ी रही है वो। उसे नाश्ता तो आराम से करने दो। हाथ छोड़ो उसका।” 

रावी ने गुरनूर का हाथ छोड़ दिया। गुरनूर जल्दी से नाश्ता करने लगी। जैसे ही उसने नाश्ता खत्म किया और कुर्सी से खड़ी हुई, रावी बिना वक्त गवाए उसका हाथ पकड़कर उसे अपने साथ ऊपर अपने कमरे में ले जाने लगी। उन्हें जाता हुआ देखकर मधु ने शुभम से कहा, “पता नही ये क्या खिचड़ी पकाना चाहती है अब गुरनूर के साथ मिलकर।” 

“मम्मी, आपको पता तो है वो दोनों बचपन से ऐसी ही रही है। पहले मिलकर प्लैन बनाती है। फिर उसे पूरा डिस्कस करने के बाद किसी बड़े से परमिशन लेने आती है। आप इतना मत सोचो। ज्यादा से ज्यादा शॉपिंग या घूमने का ही प्लैन बना लेंगी ना। जाने देना आप दोनों को। वैसे भी, गुरनूर के दिल्ली जाने के बाद इन दोनों बचपन की सहेलियों ने अलग ही रहना है। करने दीजिए एन्जॉय उन्हें साथ में।” नील ने कहा तो शुभम ने भी उसकी बातों को समझते हुए कहा, “नील सही कह रहा है। यही वक्त है इन दोनों सहेलियों के पास। एन्जॉय करने दो उन्हें साथ में। आने वाले वक्त में क्या पता दोनों में से किसकी शादी कहाँ हो जाए। फिर क्या पता एक दूसरे से ऐसे हर आए दिन मिल पाएंगी दोनों या नही।” 

दोनों बाप बेटे की बात सुनकर मधु मुस्कुराने लगी। 

रावी ने गुरनूर को अपने कमरे में लाकर कमरे का दरवाज़ा बंद किया और फिर गुरनूर से पूछा, “तुमने अंकल से ओपन माइक के बारे में क्यों कहा? अब तो कोई ओपन माइक नहीं है या फिर तुमने मुझे इस बारे में बताया नही?” 

गुरनूर ने बेड पर बैठकर रावी को देखते हुए कहा, “रिलैक्स हो जाओ। मैंने ऐसा इसलिए कहा क्योंकि मैं जाने से पहले श्रेयांश से मिलने चाहती हूँ।” 

“तो तुमने ओपन माइक का बहाना क्यों बनाया?” रावी ने पूछा तो गुरनूर ने हैरानी से उसे देखकर कहा, “तो क्या मैं सीधा सीधा सबके सामने श्रेयांश का ज़िक्र कर देती। थोड़ा तो सोचा कर रावी।” 

“ये तो मैंने सोचा ही नहीं। सॉरी यार।” रावी ने भी उसके पास बैठते हुए कहा। 

अगले दिन गुरनूर जाकर श्रेयांश से मिली। विवेक के घर में आज विवेक के अलावा कोई भी नही था इसलिए उसने गुरनूर को वहीं बुला लिया और वो विवेक के घर में आ भी गई क्योंकि उसे श्रेयांश पर पूरा भरोसा था। 

इस वक्त श्रेयांश गुरनूर के साथ विवेक के कमरे में था और विवेक उन दोनों को डिस्टर्ब ना करने के लिए अपने पेरेंट्स के कमरे में बैठकर अपनी गर्लफ्रेंड से बात कर रहा था। 

श्रेयांश बेड पर गुरनूर को अपनी बाहों में भरकर बैठा हुआ था। गुरनूर उसके सीने से लगी हुई उसके दिल की धड़कनों को सुन रही थी। उसने गुरनूर के बालों को सहलाते हुए पूछा, “तुम फिर कब आओगी?” 

“अब तुम आना।” गुरनूर ने श्रेयांश के सीने पर अपने दाएं हाथ की उंगलियाँ फेरते हुए मुस्कुराकर कहा। श्रेयांश ने गुरनूर का वो हाथ पकड़ लिया तो उसकी नज़र गुरनूर की रिंग फिंगर में पहनी हुई अंगूठी पर गई। वो एक चांदी की अंगूठी थी जिसमें हल्के गुलाबी रंग का मोती लगा हुआ था। उसने उस अंगूठी को देखते हुए पूछा, “ये रिंग किसने दी तुम्हें?” 

“तुम्हें जलन हो रही है?” गुरनूर ने अपना सिर उठाकर श्रेयांश की आँखों में देखते हुए कहा। श्रेयांश ने कुछ नहीं कहा तो गुरनूर ने फिर से उसके सीने पर अपना सिर रखकर उस अंगूठी को देखते हुए कहा, “ये रिंग मुझे दादी ने दिलाई थी। उनकी आखिरी याद है मेरे पास इसलिए पहनती हूँ।” 

“तुम अपनी फैमिली को लेकर बहुत सेंसिटिव और इमोशनल हो ना।” श्रेयांश ने पूछा। 

गुरनूर ने अपनी बाहें श्रेयांश की कमर पर लपेटते हुए खामोशी से हाँ में सिर हिला दिया। थोड़ी देर बाद गुरनूर ने श्रेयांश से थोड़ा सा दूर होकर टाइम देखा और फिर श्रेयांश की आँखों में देखते हुए कहा, “अब मुझे चलना चाहिए।” 

श्रेयांश ने फिर से गुरनूर को अपने करीब खींचकर उसे अपनी बाहों में कसते हुए कहा, “मुझे थोड़ी देर और अपना एहसास लेने दो, प्लीज़।” 

गुरनूर ने श्रेयांश के दिल की धड़कनों को महसूस करते हुए अपनी आँखें बंद कर ली। श्रेयांश ने उसे गले लगाए हुए ही उसके माथे पर किस किया। 

दोनों ही इस वक्त अपने बीच की करीबियों को पूरी तरह से महसूस कर रहे थे बिना इस बात की परवाह किए की आगे ये करीबियाँ और ज्यादा बढ़ेंगी या दोनों के बीच इन करीबियों की जगह दूरियाॅं ले लेंगी।

Continued In आर्ज-ए-इश्क - 20



आर्ज-ए-इश्क - 18


 
श्रेयांश थोड़ी देर तक ऐसे ही बैठा खामोशी से गुरनूर को देखता रहा। उसे समझ नहीं आ रहा था की वो गुरनूर के सवाल का क्या जवाब दे इसलिए उसने कहा, “पता नहीं। इतनी गहराई से मोहब्बत अभी तक महसूस नही हुई की मैं तुम्हारे इस सवाल का जवाब दे सकूँ।” 

“अच्छा, फिर ये बताओ कि तुम्हें इश्क का दूसरा नाम पता है?” गुरनूर ने पूछा तो श्रेयांश ने कहा, “नही, तुम बता दो।”

गुरनूर मुस्कुराई और उसने कहा, “सुकून, जिससे हम इश्क करते हैं उसके साथ रहकर ही सुकून मिलता है। उसका चेहरा देखना, उसकी आवाज सुनना, उसे महसूस करना। सब सुकून बन जाता है।” 

“मैं महसूस कर रहा हूँ ये।” श्रेयांश ने भी मुस्कुराते हुए कहा और फिर उसने अपने हाथ में पहनी हुई वॉच में टाइम देखकर कहा, “नौ बज गए है। चलो अब तुम्हें घर छोड़ आता हूँ।” 

श्रेयांश ने खड़े होकर गुरनूर की तरफ अपना हाथ बढ़ाया तो गुरनूर ने मुस्कुराते हुए अपना हाथ उसके हाथ पर रखा और उसका हाथ पकड़कर खड़ी हो गई। वो दोनों विवेक और रावी के पास आ गए। श्रेयांश ने विवेक को देखते हुए कहा, “इन दोनों को लेट हो रहा है। चल घर छोड़ देते है इन्हें।” 

वो सभी पार्क से बाहर आ गए। गुरनूर श्रेयांश के पीछे बैठ गई और रावी विवेक के पीछे। वो दोनों बाइक चलाने लगे। 

थोड़ी देर बाद दोनों ने ही अपनी बाइक रावी के घर से कुछ दूरी पर रोक दी। गुरनूर ने बाइक से उतरकर श्रेयांश को गले लगाया और फिर रावी के साथ घर चली गई। 

श्रेयांश अपने घर नही जाना चाहता था इसलिए वो विवेक के साथ उसके घर आ गया। विवेक फ्रेश होने के लिए बाथरूम में गया हुआ था। श्रेयांश उसके बेड पर बैठा हुआ फोन में इंस्टाग्राम पर रील्स देख रहा था जिससे वो बहुत ही जल्दी बोर होने लगा। उसने फोन बंद कर अपनी जेब में रखा तो उसकी नज़र विवेक के कमरे में दीवार पर लगे हुए टीवी पर गई। श्रेयांश ने टीवी देखने का सोचा और रिमोट ढूंढने लगा। उसे रिमोट बेड पर उससे थोड़ी दूर रखा हुआ दिखाई दिया। उसने थोड़ा आगे हाथ करके रिमोट उठाया और जैसे ही टीवी ऑन किया, उसपर कोई पाकिस्तानी ड्रामा चल रहा था। 

श्रेयांश कुछ और लगाने ही वाला था की तभी बाथरूम का दरवाज़ा खोलकर विवेक कमरे में आया। श्रेयांश का ध्यान विवेक के ऊपर चला गया। विवेक ने उसके पास आकर उसका हाथ पकड़ लिया और उसके हाथ को देखने लगा। श्रेयांश बिना कुछ और लगाए ही टीवी का रिमोट बेड पर वापिस रखकर विवेक को देखने लगा। विवेक ने उसे देखा और कहा, “इतनी ज़ोर से मुक्का मारने की क्या ज़रूरत थी उस लड़के को। अपना हाथ देख। कितनी ज्यादा लगी है।” 

“चलता है इतना तो।” श्रेयांश ने लापरवाही से कहा। 
“तेरा कुछ नहीं हो सकता।” कहकर विवेक कमरे से बाहर जाकर फर्स्ट एड बॉक्स ले आया। वो श्रेयांश के सामने बैठकर उसके हाथ पर लगी चोट को डेटॉल से साफ करने लगा। उसकी चोट साफ करते हुए विवेक ने कहा, “तुझे सच में प्यार हो गया है गुरनूर से।” 

ये सुनकर श्रेयांश ने हैरानी से विवेक को देखा। विवेक का सारा ध्यान अभी भी श्रेयांश की चोट पर ही था जिसके ऊपर वो अब दवाई लगा रहा था। श्रेयांश ने एक गहरी सांस ली और कहा, “मैंने सिर्फ उसकी इज्ज़त बचाई।” 

श्रेयांश के हाथ में दवाई लगाकर विवेक ने उसकी आँखों में देखा और ना में सिर हिलाते हुए कहा, “नहीं, सबने तेरी आँखों में गुस्सा देखा जिसकी वजह सबके लिए है उस लड़के का गुरनूर को हाथ लगाना पर मुझे गुस्से के साथ तेरी आँखों में प्यार भी नजर आया।” 

“नहीं है प्यार।” श्रेयांश ने जैसे ही कहा, टीवी पर चल रहे पाकिस्तानी ड्रामा में आ रहे गाने की एक लाइन उन दोनों के कानों में पड़ी जो थी, 

"इश्क सब ही करते हैं, 
मानने से डरते हैं।" 

ये सुनते ही श्रेयांश और विवेक, दोनों हँसने लगे। श्रेयांश ने अपनी हँसी कंट्रोल की और विवेक से पूछा, “तू कब से ये सारे पाकिस्तानी ड्रामाज देखने लगा।” 

“मेरी बहन भी है जो ये सब देखती है। वो देख रही होगी मेरे कमरे में आकर।” विवेक ने कहा और फिर थोड़ी देर बाद श्रेयांश से पूछा, “तू पक्का सीरियस नहीं है ना गुरनूर को लेकर?” 

“एक ही सवाल कितनी बार पूछेगा यार तू।” श्रेयांश ने चिढ़ते हुए कहा। विवेक ने सीरियस होते हुए कहा, “देख श्रेयांश, अभी बहुत कुछ करना है तुझे। ये प्यार व्यार के चक्करों में फसकर नही कर पाएगा। इसलिए कह रहा हूँ।”

श्रेयांश ने उसे देखा और कहा, “ये गर्लफ्रेंड बनाने का आइडिया भी तूने ही दिया था। अगर तुझे पता था कि इसमे फंसकर मैं करियर की तरफ ध्यान नहीं दे पाऊंगा तो क्यों दिया था इसका आइडिया तूने।” 

विवेक ने अब कुछ नहीं कहा तो श्रेयांश ने कहा, “नही हूँ मैं सीरियस।” 

गुरनूर रावी के साथ बेड पर लेटे हुए श्रेयांश के बारे में सोच रही थी जब श्रेयांश ने क्लब में उसके लिए उस लड़के को पीटा था। उसने रावी की तरफ पलटकर उससे पूछा, “रावी, क्या तू सो गई?” 

“नही।” रावी ने भी उसकी तरफ पलटते हुए कहा। खिड़की से आती हुई चाॅंद की रोशनी में उसका चेहरा चमक रहा था। 

गुरनूर ने श्रेयांश के बारे में सोचते हुए ही रावी से पूछा, “क्या तुम्हें भी श्रेयांश की आँखों में आज मेरे लिए प्यार नज़र आया?” 

“तो श्रेयांश तो तुमसे प्यार करता ही है।” रावी ने कहा। गुरनूर ने उठकर बेड पर बैठते हुए कहा, “तू समझ नही रही है, रावी। आज कुछ अलग ही था। आज मैंने प्यार के साथ इज़ाफ़ियत भी देखी उसकी आँखों में। वो मुझे लेकर पॉजेसिव भी हो चूका है और उसने मेरे लिए उर्दू भी सीखी है।” 

रावी ने मुस्कुराकर कहा, “सच्चा प्यार है। प्यार को सच्चे प्यार में तो बदलना ही था।” 

“मज़ा तो तब आएगा जब सच्चा प्यार इश्क़ में बदलेगा।” गुरनूर ने मुस्कुराते हुए कहा। 

“प्यार और इश्क़ में फ़र्क ही क्या है, गुरनूर?” रावी ने पूछा।

“प्यार आबाद करता है और इश्क़ बर्बाद पर इस इश्क़ में न जुनूनियत बहुत होती है।” गुरनूर ने खिड़की से आसमान में चमक रहे चाॅंद को देखते हुए कहा। 

उसने थोड़ी देर तक वैसे ही रावी से बातें की और फिर बेड पर लेटकर श्रेयांश के बारे में सोचते हुए सो गई। 



Continued In आर्ज-ए-इश्क - 19

Sunday, 23 August 2026

आर्ज-ए-इश्क - 17


 

गुरनूर को जब महसूस हुआ की उसे कोई छू रहा है तो उसने अपने साइड में देखा। वो उस लड़के पर चिल्ला पाती, इससे पहले श्रेयांश ने पीछे से जाकर उस लड़के की शर्ट की कॉलर को पकड़कर उसे अपनी तरफ किया और जोर से एक मुक्का उसके चेहरे पर मारा। 


श्रेयांश ने उस लड़के को इतनी जोर से मारा था की वो लड़का जमीन पर गिर गया। क्लब में जो गाने बज रहे थे वो बंद हो चुके थे। क्लब में मौजूद सभी लोगों की नज़रें श्रेयांश और उस लड़के पर थी। विवेक और श्रेयांश के सारे दोस्त उस तरफ आ गए थे। गुरनूर भी श्रेयांश को ऐसे देखकर घबरा गई थी। उसने कसकर रावी का हाथ पकड़ लिया। श्रेयांश ने एक नजर गुरनूर को देखा और फिर नीचे झुककर उस लड़के को थोड़ा और पीटने लगा। उस लड़के को पिटता हुआ देखकर उसके दोस्त ने उसे बचाने के लिए आगे आना चाहा पर उसे विवेक और श्रेयांश के बाकी दोस्तों ने रोक लिया। श्रेयांश ने उस लड़के की कॉलर पकड़कर उसकी आँखों में देखते हुए कहा, “इस बार सिर्फ थोड़ा सा पीटा है। अगर इसे अगली बार छूने की हिम्मत की तो मैं तेरा वो हश्र करूँगा की तेरी रूह कापेगी किसी को भी हाथ लगाने से पहले। गुरनूर कौर ता कयामत तक सिर्फ श्रेयांश शर्मा की है।” 


गुरनूर इस वक्त श्रेयांश को देखकर डरी और घबराई हुई थी फिर भी उसने इस बात पर ध्यान दिया की श्रेयांश ने ये बात उर्दू में कही है। 


श्रेयांश ने खड़े होकर गुरनूर का हाथ पकड़ा और उसे क्लब से बाहर ले जाने लगा। उसे बाहर जाता देखकर विवेक ने रावी को इशारा किया और वो दोनों भी उनके पीछे पीछे बाहर आ गए। 


श्रेयांश का मूड खराब हो चुका था। उसने अपनी बाइक स्टार्ट की तो गुरनूर बिना कुछ कहे उसके पीछे बैठ गई। श्रेयांश बाइक चलाने लगा। विवेक ने भी बाइक स्टार्ट कर रावी को बैठने के लिए कहा और श्रेयांश के पीछे जाने लगा।


थोड़ी देर बाद वो सभी एक पार्क में आकर बैठे हुए थे। गुरनूर श्रेयांश के साथ बैठी हुई थी। विवेक और रावी बेंच पर बैठे हुए उन दोनों को देख रहे थे। गुरनूर श्रेयांश को देखकर मुस्कुरा रही थी। श्रेयांश ने उसे देखते हुए पूछा, “मुस्कुराते हुए यही सोच रही हो ना की किस गुंडे से प्यार कर लिया है तुमने?” 


श्रेयांश की ये बात सुनकर गुरनूर हँसने लगी। उसने अपनी हँसी कंट्रोल की और कहा, “अपना हाथ दिखाओ। ज्यादा तो नही लगी।” 


“कुछ नही हुआ है।” श्रेयांश ने अपने हाथ को देखते हुए कहा। 


“तुमने मेरे लिए उर्दू कब सीखी?” गुरनूर ने पूछा। उसका सवाल सुनकर श्रेयांश ने उसे हैरानी से पूछा, “तुमने नोटिस किया?” 


इसपर गुरनूर ने शरारत से कहा, “मैंने तो ये भी नोटिस किया की तुमने कैसे उस लड़के को करांटे के मूव्स यूज करके मारा।” 


“इंटरनेशनल लेवल चैंपियन हूँ मैं करांटे का। मैंने पाँच साल तक करांटे किया है।” श्रेयांश ने कहा तो पहले गुरनूर ने हैरानी से उसे देखा और फिर खुशी और हैरानी के मिले जुले भावों के साथ पूछा, “क्या सच में?” 


श्रेयांश ने मुस्कुराते हुए हाँ में सिर हिला दिया। वहीं दूसरी तरफ रावी ने श्रेयांश और गुरनूर को देखते हुए विवेक से पूछा, “क्या यही सब तुम दोनों की लाइफ है जिसे देखने के लिए गुरनूर इतनी एक्साइटेड थी?”


“येस, यही हम दोनों की लाइफ है। बाइक एण्ड पार्टीज।” विवेक ने रावी को देखते हुए कहा तो रावी ने कहा, “बेकार है काफी।”


“लेकिन हम इसे एन्जॉय करते है और तुम्हारी दोस्त ने तो शायद इसे एक्सेपट भी कर लिया है।” कहकर विवेक फिर से श्रेयांश और गुरनूर को देखने लगा। 


रावी ने मुस्कुराते हुए कहा, “ऐसा इसलिए है क्योंकि वो इस वक़्त श्रेयांश की मोहब्बत में है और उसकी मोहब्बत की डेफनिशन यही है। किसी की मोहब्बत में उसका सब कुछ अपना बना लो। बुरी आदतें भी। अगर वो भी तुमसे मोहब्बत करता होगा तो अपनी बुरी आदतें सुधार लेगा।” 


विवेक ने उसकी बातों में दिलचस्पी दिखाते हुए पूछा, “और तुम्हारे लिए मोहब्बत क्या है?”


“ये तो अभी मुझे भी नहीं पता पर मैं मोहब्बत के नाम किसी की बुरी आदतों को एक्सेपट नहीं करूॅंगी। मैं ये ऐसे अपने बॉयफ्रेंड का क्लब में जाना, ड्रिंक्स करना और ऐसे किसी को भी पीटना बर्दाश्त नहीं करूँगी। मेरे बॉयफ्रेंड में अगर ऐसी कोई भी बुरी आदत हुई तो उसे वो सुधारनी पड़ेगी।” रावी ने कहा। उसकी बातें सुनकर विवेक ने दबी आवाज़ में कहा, “तुम मोहब्बत करके तो देखो। मैं खुद को पूरी तरह से सुधार लूँगा।”


विवेक को अपनी इस बात पर हैरानी हुई। कहाँ वो श्रेयांश को गुरनूर के लिए सीरियस न होने के लिए कहता था और कहाँ इस वक्त वो रावी ने साथ मोहब्बत के बारे में सोच रहा था। रावी ने भी उसे हैरानी से देखकर पूछा, “क्या कहा तुमने?”


विवेक को एक पल के लिए लगा की रावी ने उसकी बात सुन ली है इसलिए उसने अपनी बात संभालते हुए कहा, “मैंने कहा की श्रेयांश ने तुम्हारी दोस्त के लिए ही उस लड़के को इतना मारा पीटा। बाकी अब उसे गुरनूर से मोहब्बत है तो जैसा तुमने कहा, सुधार लेगा वो खुद को।” 


रावी ने हाँ में सिर हिलाया और अपनी घड़ी में टाइम देखा। अभी थोड़ा वक्त था उसके और गुरनूर के पास इसलिए उसने सोचा की गुरनूर को श्रेयांश के साथ थोड़ा और वक्त बिताने देना चाहिए। 


श्रेयांश ने प्यार से गुरनूर को देखते हुए पूछा, “कैसी लगी मेरी दुनिया, तुम्हें?” 


गुरनूर ने मुस्कुराते हुए कहा, “अच्छी है। एटलीस्ट तुम इसी से अपनी लाइफ एन्जॉय तो कर लेते हो।” 


“तुम्हें सच में अच्छी लगी?” श्रेयांश ने हैरानी से पूछा।


“जब हम किसी से इश्क करते हैं ना तो उसका सब कुछ अच्छा लगता है।” गुरनूर ने प्यार से उसकी आँखों में देखते हुए कहा। 


श्रेयांश हल्का सा मुस्कुराया और उसने कहा, “मेरे लिए तो ये एक्सटेसी है। एक्सटेसी इन फन।” 


“एक्सटेसी इन फन तो तुम अच्छे से जानते हो। ये बताओ की एक्स्टेसी इन लव क्या है तुम्हारे लिए?” गुरनूर ने पूछा तो श्रेयांश खामोशी से उसे देखने लगा क्योंकि उसने तो दिल से आजतक गुरनूर के लिए मोहब्बत को महसूस ही नहीं किया था। बल्कि गुरनूर की वजह से उसका दिल उसके दिमाग से लड़ता रहता था।


Continued In आर्ज-ए-इश्क - 18

Friday, 21 August 2026

आर्ज-ए-इश्क - 16


 

नाश्ता करने के बाद गुरनूर रावी के साथ कमरे में आई और शाम को पहनने के लिए कपड़े देखने लगी। उसने दो टॉप उठाकर रावी को दिखाते हुए कहा, “रावी, बता ना मैं इन दोनों में से कौन सा टॉप पहनू आज रात।” 


रावी ने उन दोनों टॉप्स को देखा। एक टॉप गुलाबी रंग का था जिसके ऊपर बस फूलों वाला प्रिंट था और दूसरा नीले रंग का टॉप था जिसके गले पर हल्के नीले और सफेद रंग के फूलों से डिज़ाइन बना हुआ था। रावी ने नीले टॉप को पसंद कर दिया। उसके बाद गुरनूर ने रावी से पूछा, “इसके साथ जींस कौन सी पहनू। ब्लू या ब्लैक?” 


“ब्लैक कलर की।” रावी ने कहा और अपने पहनने के लिए भी कपड़े देखने लगी। 


श्रेयांश गुरनूर को छह बजे लेने आने वाला था इसलिए उसने रावी के साथ चार बजे से तैयार होना शुरू कर दिया। तैयार होने के बाद वो दोनों श्रेयांश के फोन का इंतज़ार करने लगी क्योंकि वो विवेक के साथ उन दोनों को लेने आने वाला था। 


थोड़ी देर बाद ही गुरनूर को श्रेयांश का फोन आ गया और वो सबसे मिलकर रावी के साथ घर से बाहर आ गई। वो दोनों चलकर कॉलोनी से बाहर आ गई जहाँ श्रेयांश और विवेक उन दोनों का इंतज़ार कर रहे थे। 


श्रेयांश की नज़र जब गुरनूर पर गई तो वो उसे देखता ही रह गया। गुरनूर बहुत ही ज्यादा खूबसूरत लग रही थी। गुरनूर श्रेयांश के करीब आकर उसके गले लग गई। विवेक ने ये देखा तो उसने श्रेयांश को मुस्कुराकर देखते हुए आँख मार दी जैसे कहना चाहता हो की ये होते है गर्लफ्रेंड होने के मज़े पर श्रेयांश ने उसके ऊपर ध्यान नहीं दिया क्योंकि उसे पता था की गुरनूर ने उसे मोहब्बत में गले लगाया है और यही वजह थी जो गुरनूर के गले लगते ही उसे सुकून और घबराहट एक साथ महसूस होती थी। गुरनूर की मोहब्बत उसके लिए सुकून तो थी पर इसी मोहब्बत के एहसासों से उसे घबराहट भी होती थी ये सोचकर की वो गुरनूर के जज़्बातों के साथ खेल रहा है। 


गुरनूर ने श्रेयांश से दूर होकर विवेक को हेलो कहा। श्रेयांश ने भी रावी को हेलो कहा। गुरनूर श्रेयांश के पीछे उसकी बाइक पर बैठ गई। उसने रावी को देखा और कहा, “तुम भी विवेक के पीछे बैठ जाओ।”


रावी भी विवेक के पीछे आकर बैठ गई और उसने विवेक को कमर से पकड़ लिया। रावी के ऐसा करने से विवेक को बहुत अलग सा एहसास हुआ। विवेक, जो लड़कियों के साथ प्यार के नाम पर सिर्फ टाइमपास करता था, आज उसे रावी के साथ कुछ अलग ही एहसास महसूस हो रहा था। ये एहसास इतना मजबूत था की उसके मन में इश्क़ के ख्याल आने लगे। श्रेयांश ने बाइक स्टार्ट कर आगे बढ़ा दी। उसे जाते हुए देख विवेक ने अपने मन में चल रहे सारे ख्यालों को झटका और बाइक स्टार्ट कर आगे बढ़ा दी। 


वो सभी पार्टी में पहुँचे। ये पार्टी इंदौर के बहुत ही फेमस क्लब के अंदर थी। गुरनूर और रावी जैसे ही श्रेयांश और विवेक के साथ अंदर गई, दोनों ही हैरान रह गई। क्लब में कुछ लड़के लड़कियाँ नाच रहे थे तो कुछ साथ बैठे हुए ड्रिंक्स कर रहे थे। लड़कियाँ भी ड्रिंक कर रही थी जिसे देखकर गुरनूर और रावी को और ज्यादा हैरानी हुई। वो दोनों हैरानी से अपने चारों तरफ देख रही थी क्योंकि दोनों ही ऐसी किसी जगह पर पहली बार आई थी।


श्रेयांश गुरनूर का हाथ पकड़कर उसे ड्रिंक्स वाले एरिया की तरफ ले आया। विवेक ने भी ऐसा ही किया और रावी ने उसे रोका भी नहीं क्योंकि अपनी हैरानी के चलते उसने इस बात पर ध्यान ही नहीं दिया था की विवेक ने इसका हाथ पकड़ा है। 


श्रेयांश ने बार टेंडर से कुछ कहा और वहीं खड़े होकर इंतजार करने लगा। विवेक भी रावी को लेकर उसके पास आकर खड़ा हो गया। रावी सामने देख रही थी लेकिन गुरनूर ने पीछे मुड़कर क्लब में नाच रहे लड़के लड़कियों को देखा जो एक दूसरे से चिपक पर नाच रहे थे। गुरनूर ने उनसे नज़रें हटाकर सामने देखा तो श्रेयांश उसके लिए ड्रिंक लेकर खड़ा हुआ था। उस ड्रिंक को देखकर गुरनूर ने कहा, “मैं ड्रिंक नहीं करती।” 


श्रेयांश ने गुरनूर और रावी, दोनों को देखकर कहा, “दोनों अनकंफर्टेबल मत हो। मैं और विवेक हैं यहाँ तुम्हारे साथ और मैं जानता हूँ तुम दोनों ड्रिंक नहीं करती इसलिए ये सॉफ्ट ड्रिंक्स है। इन्हें पी सकती हो तुम दोनों।” 


रावी के हाथ में तो पहले से ही गिलास था। गुरनूर ने श्रेयांश के हाथ से गिलास ले लिया और धीरे धीरे पीने लगी। श्रेयांश ने भी अपनी ड्रिंक उठाते हुए गुरनूर को देखकर कहा, “मैं विवेक के साथ अपने दोस्तों से मिलने जा रहा हूँ। तुम रावी के साथ यहीं खड़ी रहना। इधर उधर मत जाना।” 


गुरनूर ने हाँ में सिर हिला दिया। श्रेयांश विवेक के साथ अपने दोस्तों के पास चला गया। गुरनूर रावी से थोड़ी बहुत बातें करने लगी। विवेक ने जब अपने दोस्तों को दूर से ही गुरनूर को दिखाया तो सभी श्रेयांश को छेड़ने लगे और उसके दोस्त रवि ने उससे कहा, “भाई, तू हम सबको मिलवाएगा नही उससे। बस दूर से दिखा दी कौन है।”


“नही, वो पहली बार यहाँ आई है इसलिए थोड़ी अनकंफर्टेबल है। तुम लोगों को ऐसे उसके पास लेकर जाऊॅंगा तो वो और ज्यादा अनकंफर्टेबल हो जाएगी।” श्रेयांश ने कहा तो विवेक ने उसे शक भरी नज़रों से देखते हुए कहा, “तुझे बड़ी फिक्र है उसकी और तू इतना तक समझ गया की वो अनकंफर्टेबल है।” 


“फीलिंग जो भी हो। इस वक्त वो मेरी रिस्पांसिबिलिटी है।” श्रेयांश ने कहा तो विवेक खामोश हो गया। 


श्रेयांश अपने दोस्तों से बातें कर रहा था पर उसकी नज़रें गुरनूर के ऊपर ही थी। बातें करते हुए उसकी नज़र क्लब के कोने में खड़े दो लड़कों पर गई। उनमें से एक लड़का गुरनूर को ही देख रहा था। श्रेयांश ने एक नज़र गुरनूर को देखा और फिर उसने वापिस से उस लड़के को देखा तो इस बार वो लड़का गुरनूर को देखते हुए अपनी गर्दन पर हाथ फेर रहा था। 


ये देख श्रेयांश को गुस्सा आ गया पर उसने अपने गुस्से को काबू में रखने की कोशिश की क्योंकि वो वहाँ कोई तमाशा नहीं करना चाहता था। 


गुरनूर को बिल्कुल अकेला समझकर वो लड़का उसके करीब गया और उसने साइड से अपने हाथ को गुरनूर के हाथ से छुआ। ये देखकर श्रेयांश को अब और ज्यादा गुस्सा आ गया और वो गुस्से से उस लड़के की तरफ बढ़ गया।


Continued In आर्ज-ए-इश्क - 17

Wednesday, 19 August 2026

आर्ज-ए-इश्क - 15

 


श्रेयांश के दिल और दिमाग के बीच में जंग चल रही थी क्योंकि उसे लग रहा था वो गुरनूर के साथ गलत कर रहा है और ये होना ही था क्योंकि बेशक उसका साथ विवेक जैसे दोस्तों का हो पर उसके अंदर संस्कार तो उसकी माँ के दिए हुए थे जो उसे ये इजाजत नही देते थे की वो किसी लड़की के दिल के साथ खेले पर इस वक्त वो विवेक के प्रभाव में भी था जो उसे गुरनूर के साथ सीरियस होने की इजाज़त नही देता था। 


ये सब सोचकर उसका मूड खराब हो चुका था पर उसने इस बारे में गुरनूर से कुछ भी कहना ठीक नही समझा क्योंकि वो गुरनूर के साथ पहली बार ऐसे डेट पर आया था इसलिए वो उसका भी मूड खराब नही करना चाहता था। 


रास्ते भर बस गुरनूर बिना कुछ कहे श्रेयांश की करीबियों के एहसास को महसूस करती रही। थोड़ी देर बाद श्रेयांश ने बाइक एक बहुत ही खूबसूरत जगह पर लाकर रोकी। 


इस जगह पर काफी हरियाली थी जिसे देखकर गुरनूर को अच्छा लग रहा था। बाइक से उतरकर गुरनूर उस जगह को देखने लगी। वो सच में बहुत खुश थी। श्रेयांश भी बाइक पार्क कर उसके पास आया और उसने थोड़ा जबरदस्ती गुरनूर के आगे मुस्कुराने का नाटक करते हुए कहा, “चले अंदर।”


श्रेयांश अपने खराब मूड के चलते गुरनूर के आगे जबरदस्ती मुस्कुराने की कोशिश कर रहा था पर गुरनूर ने अपनी खुशी के चलते इस बात पर ध्यान ही नही दिया। 


श्रेयांश गुरनूर को नीचे ले आया जहाँ सामने एक बहुत ही खूबसूरत झरना था। इस झरने का नाम पातालपानी झरना था। उस झरने को देखकर गुरनूर और ज्यादा खुश हो गई क्योंकि उसने पहली बार अपनी जिंदगी में झरना देखा था। ऊपर से वो श्रेयांश के साथ थी। गुरनूर ने मुस्कुराते हुए श्रेयांश का हाथ थाम लिया पर श्रेयांश को गुरनूर की मुस्कुराहट और गुरनूर का इस तरह से उसका हाथ पकड़ना बेचैन कर रहा था। उसने गुरनूर से कुछ नही कहा, बस चुपचाप उसके साथ चलता रहा। वहीं गुरनूर को भी खामोशियाँ ज्यादा भा रही थी। 


वो श्रेयांश के साथ पातालपानी झरना घूम रही थी की तभी उसने एक प्रेमी जोड़े को देखा। उन्हें देखकर ऐसा लग रहा था जैसे उनकी नई नई शादी हुई है। उसने उन्हें श्रेयांश को दिखाते हुए कहा, “श्रेयांश, शादी के बाद हम भी इतने ही अच्छे लगेंगे न साथ में।” 


श्रेयांश का मूड तो आगे ही खराब था। उसे गुरनूर की ये बात सुनकर गुस्सा भी आने लगा जिसे उसने कंट्रोल करते हुए प्यार से गुरनूर को समझाने के लिए कहा, “गुरनूर, तुम ये शादी के बेफिजूल ख़्वाब देखना बंद करो अभी के लिए। मैं इन सब के लिए न अभी तैयार हूँ और न ही इन सब के बारे में सोचना चाहता हूँ। वैसे भी, तुम शायद हमारे रिलीजियस और कल्चरल डिफरेंस को नही देख पा रही हो।” 


श्रेयांश ने ये बात इस अंदाज में कही की गुरनूर उसके खराब मूड को समझ ही नही पाई। उसने इस बात पर भी ध्यान नही दिया की श्रेयांश ने अपनी बात में उर्दू के शब्दों का इस्तेमाल किया है। गुरनूर ने मुस्कुराते हुए श्रेयांश को देखा और कहा, “क्या तुमने ये सब मुझसे अपनी मोहब्बत का इजहार करते वक्त देखा था?” 


श्रेयांश के पास गुरनूर के इस सवाल का कोई जवाब नही था इसलिए वो खामोश रहा। उसे खामोश देखकर गुरनूर ने धीरे से उसके करीब आकर उसकी आँखों में देखते हुए कहा, “मेरा दीन और धर्म अब सिर्फ इश्क़ है। वो इश्क़ जिसमें मैंने तुम्हारा सब कुछ अपना बना लिया है। मैं तुम्हारे साथ सबसे पहले रूह के फेरे ले चुकी हूँ। कौन अलग कर सकता है हमें।” 


“फिर भी मेरी दुनिया तुम्हारी दुनिया से अलग है।” श्रेयांश ने भी उसकी आँखों में देखते हुए कहा तो गुरनूर ने मुस्कुराकर कहा, “तो फिर दिखाओ कैसी है तुम्हारी दुनिया। तुम्हारी दुनिया का ही तो हिस्सा बनना है मुझे।”


“ये पागलपन है, गुरनूर।” श्रेयांश ने उससे दूर होते हुए गुस्से के साथ थोड़ा तेज आवाज़ में कहा। 


गुरनूर ने उसे प्यार से देखते हुए कहा, “ये मेरा विश्वास है जिसकी वजह से मैं तुम्हें रोज़ भगवान से जाकर माँगती हूँ।”


“ये पागलपन है सिर्फ। ऐसा कुछ नहीं होता।” श्रेयांश ने फिर गुस्से से कहा तो गुरनूर ने कहा, “प्यार में पागलपन भी जरूरी होता है। तुम्हें मेरे जैसी मिलेगी क्या कहीं। अब बताओ कब दिखा रहे हो अपनी दुनिया मुझे।”


श्रेयांश को समझ आ गया की अपने इश्क़ के आगे गुरनूर कुछ और नहीं समझने वाली इसलिए उसने अपने गुस्से को शांत करते हुए कहा, “मेरी दुनिया देखने के लिए तुम्हें शाम में आना होगा।”


“मैं संडे की शाम को आ जाऊँगी घर पर कोई बहाना बनाकर।” गुरनूर ने खुश होते हुए कहा। 


शाम होने से पहले पहले श्रेयांश ने गुरनूर को घर छोड़ने के लिए बाइक रावी के घर से थोड़ी ही दूरी पर रोकी। गुरनूर ने बाइक से उतरकर मुस्कुराते हुए श्रेयांश को देखा और उसके गले लग गई। श्रेयांश को गुरनूर के ऐसे गले लगाने से बेचैनी तो हो रही थी पर फिर भी उसने गुरनूर को गले से लगा लिया। थोड़ी देर बाद गुरनूर वहाँ से घर के अंदर चली गई। 


रात में गुरनूर ने रावी को अपने और श्रेयांश के बीच हुई बातों के बारे में बताया जिसपर रावी ने कहा, “वो सब तो ठीक है लेकिन घर में मम्मी पापा से क्या कहकर जाएँगे।”


“अब कोई बहाना तो बनाना ही पड़ेगा उनके आगे।” गुरनूर ने धीरे से रावी को देखते हुए कहा। दोनों ने बेड पर लेटकर थोड़ी देर तक इस बारे में बात की और फिर सो गई। 


संडे वाले दिन सुबह सुबह सभी नाश्ता कर रहे थे। गुरनूर ने रावी को देखा तो रावी ने अपनी पलकें झपकाई और फिर शुभम को देखकर कहा, “पापा, आपसे परमिशन चाहिए थी।” 


“किस लिए?” शुभम ने चाय पीते हुए उससे पूछा तो रावी ने कहा, “वो पापा मेरे कॉलेज की फ्रेंड थी ना, राशि। वो यहीं आकर सैटल हो गई थी अपनी फैमिली के साथ। उसने और मैंने मिलकर मूवी देखने का प्लैन बनाया है। मैं गुरनूर को भी अपने साथ ले जाना चाहती हूँ। ये घर पर अकेले मेरे बिना क्या करेगी न। तो अगर आप परमिशन दे देते तो हम दोनों चले जाते। आई प्रॉमिस हम दोनों दस बजे तक घर आ जाएँगे।” 


शुभम ने पहले एक नजर गुरनूर को देखा, जो चुपचाप अपना नाश्ता कर रही थी और फिर रावी को देखकर कहा, “ठीक है। तुम दोनों चली जाना और टाइम से घर वापिस आ जाना। कोई प्रॉब्लम हो तो मुझे या नील को फोन कर देना।” 


शुभम ने जैसी ही हाँ कहा, गुरनूर मन ही मन में खुश हो गई पर उसने अपनी खुशी अपने चेहरे पर नही आने दी। शुभम से परमिशन मिलने के बाद उसकी एक्साइटमेंट बढ़ गई थी। वो सच में श्रेयांश की दुनिया को देखने और उसका हिस्सा बनने के लिए काफी एक्साइटेड थी। उसे ये भी नही पता था की श्रेयांश की दुनिया उसे पसंद आएगी या नहीं। वो तो बस इतना जानती थी की अपनी मोहब्बत में वो श्रेयांश की दुनिया को भी अपना बना लेगी।


Continued In आर्ज-ए-इश्क - 16


Tuesday, 11 August 2026

आर्ज-ए-इश्क - 14

 


गुरनूर को श्रेयांश से मिलने जाना था पर उसने ये नही सोचा था की वो रावी की फैमिली से क्या कहेगी कि वो कहाँ जा रही है और अगर किसी को भी सच पता चला तो वो बचेगी नहीं। उसने उम्मीद भरी नज़रों से पहले रावी को देखा और फिर कुछ कहने ही वाली थी की उससे पहले ही रावी ने उसके लिए शुभम से झूठ बोलते हुए कहा, “पापा, वो ये ओपन माइक्स पर जाती है ना। वहीं जा रही है।”


“यहाँ भी काम, बेटा। यहाँ तो घूमने आई हो तुम।” शुभम ने मुस्कुराते हुए कहा तो गुरनूर ने कहा, “अंकल, दिल्ली में तो बहुत ओपन माइक्स शोज का एक्सपीरिएंस लिया है। मुझे पता चला यहाँ भी होते है इसलिए सोचा एक अटेन्ड करकर देखा जाए यहाँ वाला भी। सिर्फ एक या दो घंटे की ही तो बात है। क्या पता ऐसे दूसरों को देखकर एक्सपीरिएंस लेते हुए एक दिन मैं परफॉर्म भी करने लग जाऊँ।”


गुरनूर ने रावी को मुस्कुराकर देखा और आँखों ही आँखों में उसे थैंकयू कहा। 


“ये तो बहुत अच्छी बात है। इतना कॉन्फिडेंस होना चाहिए।” शुभम ने गुरनूर को मुस्कुराकर देखते हुए कहा और फिर रावी को देखकर कहा, “तुम सीखो कुछ अपनी प्यारी सी दोस्त से। अपने काम और सपनों को लेकर कितनी सिरियस है और एक तुम हो जिससे पढ़ाई भी ठीक से नहीं होती। ज्यादातर तुम गुरनूर के साथ रहती हो फिर भी कुछ नहीं सीखती तुम गुरनूर से।” 


रावी शुभम की बातें सुनते हुए गुस्से से गुरनूर को देख रही थी क्योंकी गुरनूर को बचाने के लिए उसने झूठ बोला था जिसमें वो खुद ही फँस गई थी। उसने गुरनूर को घूरते हुए कहा, “तुम्हें देर हो रही है ना। अगर तुम थोड़ी देर और यहाँ रुकी तो मैं तुम्हें जाने नहीं दूंगी।”


रावी की धमकी सुनकर गुरनूर सबको बाय बोलकर घर से बाहर जाने लगी तो शुभम ने उसे रोकते हुए कहा, “बेटा, नील छोड़ आता है तुम्हें लोकेशन पर।”


“नहीं अंकल, मैं चली जाऊँगी।” कहकर गुरनूर घर से बाहर आ गई। कॉलोनी से थोड़ा बाहर आकर उसने एक ऑटो रुकवाया और उसमें बैठ गई। वो ऑटो में बैठे हुए श्रेयांश के बारे में सोच ही रही थी की तभी उसके फोन पर किसी का मैसेज आया। गुरनूर ने अपने बैग से फोन निकालकर देखा तो रावी का मैसेज आया हुआ था। गुरनूर वो मैसेज पढ़ने लगी। “तुम्हें बचाने के चक्कर में मैंने झूठ बोला जिसमें मैं ही फँस गई और तुम्हारी इतनी ज्यादा तारीफ हुई। कोई नहीं बेटा। श्रेयांश से मिलकर आना तो तुम्हें मेरे घर में ही है। मैं बताऊँगी तुम्हें तारीफ़ें कैसे सुनते है।”


रावी का मैसेज पढ़कर गुरनूर हँसने लगी और उसने लिखा, “दोस्त नहीं है।” 


थोड़ी देर बाद ही रावी का रिप्लाइ आ गया जिसमें लिखा था, “बस तुम्हारा यही कहना है ना मुझे हर बार तुम्हारा साथ देने पर मजबूर करता है।” 


“अच्छा चलो, अब मूड ठीक करलो अपना और मेरा भी रहने दो। मैं खुश हूँ न आज।” गुरनूर ने लिखा तो रावी ने उसे एन्जॉय करने के लिए कहा। 


थोड़ी ही देर बाद गुरनूर एक मार्केट में पहूँच गई। वो ऑटो से उतरकर ऑटो वाले को पैसे देकर जैसे ही मुड़ी, उसके चेहरे पर एक मुस्कान आ गई। उसके बिल्कुल सामने श्रेयांश खड़ा था जो अपनी बाइक के पास खड़े होकर उसका ही इंतजार कर रहा था। 


गुरनूर मुस्कुराते हुए श्रेयांश के करीब आकर उसके गले से लग गई। गुरनूर के एकदम से ऐसे गले लगाने से श्रेयांश हैरान तो हो गया था पर उसे बहुत सुकून भी महसूस हो रहा था। श्रेयांश के दिमाग के हिसाब से उसे गुरनूर से मोहब्बत नही थी फिर गुरनूर के गले लगाते ही उसे इतना सुकून क्यों महसूस हुआ, वो ये नही समझ रहा था या ये कहे की वो दिमाग के आगे अपने दिल की बात नही समझ रहा था क्योंकि उसके दिमाग में विवेक ने ये बात बैठा दी थी की उसे गुरनूर के साथ सीरियस नही होना है। 


गुरनूर जैसे ही उससे दूर होने लगी, श्रेयांश ने अपनी बाहें उसकी कमर पर लपेटते हुए कहा, “ऐसे ही गले लगी रहो थोड़ी देर। मुझे सुकून मिल रहा है।” 


श्रेयांश ने अपने मन में चल रहे सारे ख्यालों को बहुत मुश्किल से झटककर गुरनूर के साथ उस पल को जीने का फैसला किया। गुरनूर ने मुस्कुराते हुए श्रेयांश को फिर से गले लगा लिया। आसपास के लोग उन्हें देख रहे थे। कुछ उम्र में बड़े लोग उन्हें देखकर बातें कर रहे थे और जो जवान प्रेमी जोड़े या दोस्त थे, वो उन्हें देखकर मुस्कुरा रहे थे लेकिन श्रेयांश और गुरनूर को किसी की परवाह नही थी। 


थोड़ी देर ऐसे ही गले लगे रहने के बाद श्रेयांश ने उसे छोड़कर खुद से हल्का सा दूर किया और उसके चेहरे को ध्यान से देखने लगा। गुरनूर मुस्कुराते हुए उसे ही देख रही थी। उसके बाल उसके चेहरे पर आ रहे थे जिन्हें हटाने के लिए श्रेयांश ने उसके चेहरे को छुआ। श्रेयांश के छूने के एहसास से गुरनूर ने अपनी आँखें बंद कर ली। गुरनूर ने आँखें खोलकर श्रेयांश को देखा तो वो मुस्कुराते हुए उसे देख रहा था। 


गुरनूर ने मुस्कुराकर अपनी नज़रें झुका ली जिससे उसकी नज़र श्रेयांश की स्पोर्ट्स बाइक पर गई। वो उस बाइक को देखकर एक्साइटेड हो गई और उसने कहा, “तुम्हारी बाइक कितनी अच्छी है रीयल में देखने में।” 


“तुमने अब देखी है।” श्रेयांश ने हैरानी से कहा तो गुरनूर ने कहा, “फोटोज में देखी थी। रियल में तो आज देखी है ना।” 


“तो चलो अब इसके ऊपर बैठकर भी देख लो।” कहते हुए श्रेयांश बाइक पर बैठ गया और उसे स्टार्ट किया। 


गुरनूर ने बाइक पर उसके पीछे बैठते हुए पूछा, “हम कहाँ जा रहे है?” 


“एक बहुत ही खूबसूरत जगह पर।” कहते हुए श्रेयांश ने उसे देखा और फिर पूछा, “मैं बाइक थोड़ी तेज चलाता हूँ। तुम्हें डर तो नही लगेगा।” 


“मुझे तुम्हारे ऊपर पूरा भरोसा है।” गुरनूर ने कहा तो श्रेयांश के चेहरे पर एक मुस्कान आ गई। वो मुस्कुराते बाइक चलाने लगा। गुरनूर ने अपनी बाहें उसकी कमर पर लपेट दी और अपना सिर उसकी पीठ से लगाकर उसके एहसासों को महसूस करने लगी। 


गुरनूर के ऐसा करने से वो श्रेयांश के बिल्कुल करीब आ गई जिससे उनके नीच दूरियों की कोई गुंजाइश नही थी। गुरनूर को तो ये एहसास अच्छे लग रहे थे पर श्रेयांश को इस एहसास से घबराहट हो रही थी। उसके दिल और दिमाग के बीच में वही जंग फिर शुरू हो गई थी क्योंकि उसे गुरनूर के ऐसे करीब आने से सुकून तो मिल रहा था पर उसे ये भी लग रहा था की वो गुरनूर के साथ गलत कर रहा है।


Continued In आर्ज-ए-इश्क - 15

Monday, 10 August 2026

आर्ज-ए-इश्क - 13

 


गुरनूर इंदौर आ रही है, ये बात सुनकर श्रेयांश हैरान हो गया। उसने गुरनूर से थोड़ी देर बात करने के बाद फोन काट दिया। उसने फोन बेड पर फैंका और फिर बेड के एक कोने में बैठकर अपने दोनों हाथों को आपस में जोड़कर अपनी कोहनियों को घुटनों पर टिकाते हुए आगे की तरफ झुककर अपने हाथों को अपने होठों से लगाते हुए मन ही मन में ऐसे सोचते हुए कहने लगा जैसे वो गुरनूर से कह रहा हो, “क्या पंडित जी ने मुझसे सही कहा था जब मैं मंदिर में गया था। क्या तुम सच में मेरी किस्मत हो गुरनूर जो मुझे मंदिर तक लेकर गई थी और उस दिन मैंने तुम्हारे कहने पर ही भगवान से ये माँगा की वो मुझे तुम्हारे पास भेज दे और अब तुम आ रही हो।” 


श्रेयांश यही सोचते सोचते बेड पर लेट गया और जल्दी ही नींद ने उसे अपनी आगोश में ले लिया। 


अगले दिन श्रेयांश विवेक और अपने दोस्तों के साथ कैफे में बैठा हुआ था। वो सब आपस में बातें कर रहे थे लेकिन श्रेयांश तो कल रात से ही गुरनूर के ख्यालों में खोया हुआ था। उसका ध्यान उन सबकी बातों में बिल्कुल भी नहीं था। विवेक इस बात को नोटिस कर रहा था की श्रेयांश कहीं और ही खोया हुआ है। बातें करते हुए उनके दोस्त, रवि ने शेयांश के बारे में कुछ कहा और फिर उसे देखकर पूछा, “क्यों श्रेयांश, सही कह रहा हूँ न मैं।” 


श्रेयांश ने रवि की बात पर ध्यान ही नहीं दिया। रवि ने एक बार फिर श्रेयांश को आवाज़ लगाकर पूछा पर इस बार भी श्रेयांश कुछ नहीं बोला। रवि ने श्रेयांश के साथ बैठे हुए विवेक और वहाँ बैठे हुए अपने बाकी दोस्तों को देखा। वो सब भी श्रेयांश को ही देख रहे थे। रवि ने फिर से श्रेयांश को देखा और इस बार उसे कंधे से पकड़कर हिलाया तो श्रेयांश ने अपने ख्यालों से बाहर आकर उसे देखते हुए पूछा, “क्या हुआ है?” 


रवि ने उसे देखा और कहा, “ये तो तू बता की क्या हुआ है? मैं कब से तुझे आवाज़ लगा रहा हूँ और तू पता नहीं कहाँ खोया हुआ है?” 


विवेक को पक्का यकीन था की श्रेयांश गुरनूर के ख्यालों में खोया हुआ है इसलिए इससे पहले की श्रेयांश रवि से कुछ कहता, विवेक ने खड़े होकर उससे कहा, “श्रेयांश, मेरे साथ चल। मुझे तुझसे कुछ बात करनी है।” 


श्रेयांश सबको देखकर खड़ा हो गया और विवेक के साथ कैफे के दूसरी तरफ आ गया। विवेक ने उसे देखा और कहा, “चुपचाप पूरी बात बता दे की तुझे हुआ क्या है। ऐसे इतना कहाँ खोया हुआ था तू।” 


श्रेयांश ने विवेक को सब बता दिया की कैसे उसे गुरनूर ने मंदिर जाने के लिए कहा था और जब वो मंदिर में गया तो पंडित से उससे क्या कहा और अब सच में गुरनूर इंदौर आ रही है। ये सब सुनकर विवेक भी एक पल के लिए हैरान रह गया लेकिन फिर उसने श्रेयांश को समझाते हुए कहा, “तू इस बारे में ज्यादा बिल्कुल मत सोच। ये सिर्फ़ एक इतेफाक है। जितना सोचेगा उतना उलझेगा और इस रिश्ते को भी उलझाएगा। याद रख, गुरनूर के साथ सीरियस नहीं होना है तुझे।” 


श्रेयांश ने विवेक के आगे हाँ में सिर हिला दिया लेकिन उसका दिल ये मानने की कोशिश नहीं कर रहा है। विवेक की बातों की वजह से वो कन्फ्यूज हो गया और उसके दिल और दिमाग के बीच इस बारे में सोचते हुए एक अलग ही लड़ाई चलने लग गई। श्रेयांश अपने दोस्तों की बातों में आकर गुरनूर के साथ इस रिश्ते में तो आ गया था लेकिन अब इस रिश्ते को संभालना था या ऐसे ही गुरनूर के साथ रहना था, ये उसे समझ नहीं आ रहा था। एक तरफ उसका अपना दिल था और दूसरी तरफ विवेक की बातें, उसे नहीं समझ आ रहा था की वो किसकी सुने। 


वहीं गुरनूर खुशी खुशी रावी और उसकी फैमिली के साथ इंदौर जाने के लिए अपनी पैकिंग कर रही थी जिसमें शीतल उसकी मदद कर रही थी। उसे अगली सुबह ही इंदौर के लिए निकलना था। 


पैकिंग खत्म होने के बाद गुरनूर ने जाकर खाना खाया और फिर सोने के लिए बेड पर आकर लेट गई लेकिन उसे श्रेयांश से मिलने की इतनी एक्साइटमेंट थी की उसे पूरी रात नींद ही नही आई। 


सुबह वो विक्रम और शीतल से मिलकर रावी की फैमिली के साथ इंदौर जाने के लिए निकल गई। जैसे ही वो सभी ट्रेन में बैठे, गुरनूर के मन की खुशी और ज्यादा बढ़ गई। रावी तो सबकी नज़रों से बचकर गुरनूर को चोरी छुपके छेड़ रही थी क्योंकि श्रेयांश से मिलने जाने की खुशी गुरनूर के चेहरे पर साफ नज़र आ रही थी। 


एक लंबे सफर के बाद वो सभी देर रात इंदौर पहूँच गए। सभी बहुत थके हुए थे और सबको बहुत भूख लग रही थी इसलिए रावी के पिता, शुभम ने घर जाने से पहले बाहर कुछ खाने का फैसला किया। 


नील ने गूगल पर देर रात खुलने वाले रेस्टोरेंट के बारे में सर्च किया और सभी स्टेशन से सीधा उस रेस्टोरेंट में आ गए। खाना खाने के बाद सभी घर पहुँच गए। 


शुभम ने मधु को देखकर कहा, “अभी सब थके हुए हैं इसलिए अभी आराम करो। सुबह उठकर सैटल करलेंगे घर।” 


सभी अपने अपने कमरों में चले गए। गुरनूर ने अपना फोन लेकर श्रेयांश को मैसेज किया, “आ गई हूँ मैं तुम्हारे शहर में।” 


श्रेयांश का तुरंत ही रिप्लाई आ गया, “मुझसे कब मिलने आओगी अब।” 


“परसो तुम मुझे अपना शहर घुमाने ले चलना। मन तो कल ही मिलने का है पर मुझे रावी और आंटी की हेल्प करनी होगी ना सेटल होने में।” गुरनूर ने मुस्कुराते हुए लिखा। 


“समझ सकता हूँ।” श्रेयांश ने लिखा। थोड़ी देर तक वो दोनों ऐसे ही बातें करते रहे और फिर गुरनूर सो गई। 


सुबह नाश्ता करने के बाद सभी मिलकर घर को सेटल करने में लग गए जिसमें गुरनूर भी उनका साथ दे रही थी। घर में सारा फर्नीचर और बहुत सी चीज़ें पहले से ही मौजूद थी इसलिए उन्हें बिना किसी परेशानी के सैटल होने में सिर्फ एक दिन लगा। 


अगले दिन गुरनूर तैयार होकर नीचे आई। वो आज बहुत खुश थी क्योंकि वो श्रेयांश से मिलने जा रही थी। इसके चलते ही वो खुशी से पूरी रात सो नहीं पाई थी। उसने सबके साथ नाश्ता किया और सबको बाय बोलकर जाने लगी तो शुभम ने उससे पूछा, “कहाँ जा रही हो, बेटा तुम?” 


ये सवाल सुनते ही गुरनूर घबरा गई क्योंकि अपनी खुशी में उसने किसी और को अपने बाहर जाने का बताया ही नहीं था और ना ही ये सोचा था की कोई उससे पूछेगा तो वो क्या कहेगी।


Continued In आर्ज-ए-इश्क - 14

Saturday, 8 August 2026

आर्ज-ए-इश्क - 12

 


गुरनूर ने जब श्रेयांश से कहा की वो भगवान से क्यों नहीं कहता की वो उसे उसके पास भेज दे तो श्रेयांश ने कहा, “मैं भगवान पर विश्वास नहीं करता गुरनूर। मैं तो मंदिर भी नहीं जाता हूँ। दूर रहता हूँ इन सब से मैं।” 


“कोई बात नहीं। ये सब अपने अपने विश्वास और भरोसे की बात है।” गुरनूर ने कहा कि तभी उसे शीतल की आवाज़ आई जो उसे नीचे बुला रही थी। 


“मैं तुमसे बाद में बात करती हूँ। मम्मी बुला रही हैं।” कहकर गुरनूर ने फोन  काट दिया। श्रेयांश फोन की स्क्रीन को देखते हुए गुरनूर के बारे में सोचने लगा। 


अगले दिन सुबह सुबह ही श्रेयांश अपनी बाइक लेकर किसी काम से जा रहा था की तभी वो मंदिर के सामने से गुजरा। मंदिर को देखकर उसे गुरनूर की कही बात याद आ गई। उसने अपनी बाइक वापिस मोड़कर मंदिर के सामने लाकर रोकी। 


वो बाइक से उतरा और जूते उतारकर मंदिर के अंदर चला गया। उसने महादेव की बड़ी सी मूर्ति को देखते हुए हाथ जोड़े और कहने लगा, “मैं आपके ऊपर ज्यादा विश्वास नहीं रखता और ना ही आप में मानता हूँ पर गुरनूर ने कहा की मैं एक बार आपसे कहकर देखूं की आप उसे मेरे पास भेज दें। वो शायद इस बात पर यकीन करती है की आपसे जो माँगो वो मिल ही जाता हैं। अगर आप भेज सकते है तो उसे मेरे पास भेज दीजिए। मेरे विश्वास के लिए तो नहीं हो सकता क्योंकि मेरा विश्वास तो बहुत कमज़ोर है। आप गुरनूर के विश्वास के लिए ये कर दीजिए।” 


उसने कहना खत्म ही किया था की पंडित जी ने उसके पास आकर उसे टीका लगाते हुए कहा, “तुम जो भी माँग रहे हो वो जरूर मिलेगा तुम्हें। तुम यहाँ खुद नहीं आए। तुम्हारी किस्मत तुम्हें यहाँ लाई है और तुम्हारी किस्मत वही है जिसे तुम माँग रहे हो और जिसके लिए तुम माँग रहे हो।” 


श्रेयांश ने कुछ नहीं कहा। वो महादेव की मूर्ति को देखकर बाहर आ गया। उसने जूते पहने और बाइक लेकर वहाँ से निकल गया। बाइक चलाते हुए उसने खुद से ही कहा, “गुरनूर मेरी किस्मत कैसे हो सकती हो। मैं तो उसे लेकर सीरियस भी नहीं हूँ।” 


गुरनूर के लिए श्रेयांश ने थोड़ी थोड़ी उर्दू सीखनी शुरू की। वो ये क्यों कर रहा था उसे समझ नहीं आ रहा था जिस वजह से उसे ये अजीब भी लग रहा था और अच्छा भी। 


गुरनूर इस वक्त श्रेयांश से बात करने के बाद छत पर खड़ी थी की तभी रावी वहाँ आई और उसने गुरनूर को पीछे से गले लगाते हुए कहा, “मेरे पास इस वक्त तुम्हारे लिए एक बैड न्यूज़ भी है और एक गुड न्यूज़ भी। कौन सी सुनोगी पहले।” 


“बैड क्या है?” गुरनूर ने पूछा तो रावी ने उदास होते हुए कहा, “पापा का ट्रांसफर हो गया है। मुझे तुम्हें छोड़कर जाना होगा।” 

“और गुड।” गुरनूर ने फिर पूछा तो इस बार रावी ने खुश होते हुए कहा, “गुड ये है की पापा का ट्रांसफर इंदौर में हुआ है। मैं तुम्हें श्रेयांश से मिलवाने अपने साथ ले जा सकती हूँ।” 


गुरनूर ने पहले उसे खुशी से देखते हुए कहा, “क्या सच में?” पर फिर उसने उदास होकर कहा, “मम्मी पापा को मनाकर उनसे परमिशन कौन लेगा।” 


ये सुनकर रावी ने भी सोचते हुए कहा, “अब ये तो प्रॉब्लम है।” 


“बात तो एक को ही करनी होगी।” कहते हुए गुरनूर ने रावी की तरफ इशारा कर दिया तो रावी ने कहा, “मैं बात नहीं करने वाली। तुम खुद करो।” 


गुरनूर ने थोड़ी इमोशनल सी शक्ल बनाकर रावी को देखकर उसे मनाने के लिए कहा, “दोस्त नहीं है।” 


रावी ने एक गहरी साँस ली और कहा, “प्रेम कहानी तुम्हारी और बात मैं करूॅं। चलो मेरे साथ।” 


रावी गुरनूर के साथ नीचे विक्रम से बात करने के लिए आ गई। विक्रम लिविंग रूम में बैठे हुए कोई किताब पढ़ रहे थे। उसने गुरनूर के साथ विक्रम के सामने आकर कहा, “अंकल, मुझे आपसे कुछ बात करनी है।” 


“बोलो बेटा क्या बात है?” विक्रम ने अपने हाथ में पकड़ी किताब को साइड रखकर अपना चश्मा उतारते हुए कहा। 


रावी उनके पास बैठी और उसने कहा, “अंकल, आप तो जानते ही हैं की पापा का ट्रांसफर इंदौर में हो चुका है। मैं चाहती हूँ की आप गुरनूर को मेरे साथ थोड़े दिनों के लिए इंदौर भेज दे। वो अंकल नई नई जगह है तो इतनी जल्दी मेरा मन वहाँ लगेगा नहीं इसलिए मैं चाहती हूँ गुरनूर मेरे साथ चले। एक बार वहाँ मेरा मन लग जाएगा तो मैं इसे नील भैया के साथ वापिस छोड़ने आ जाऊँगी।” 


विक्रम ने कुछ नहीं कहा तो रावी ने कहा, “प्लीज़ अंकल, इसे मेरे साथ इंदौर भेज दीजिए।” 


“ठीक है। जाओ जीलो अपनी जिंदगी दोनों।” विक्रम ने मुस्कुराते हुए कहा तो वो दोनों खुश हो गई और उन्हें थैंक यू बोलकर वहाँ से चली गई। 


शीतल जो अबतक रसोई में खड़े होकर उनकी बातें सुन रही थी, रावी और गुरनूर के जाते ही बाहर आई और उसने विक्रम से पूछा, “विक्रम, आपने गुरनूर को जाने के लिए अलाउ क्यों किया?” 


“शीतल, कई बार बच्चों को समझा करो। वो बचपन से एक साथ रही हैं। अब एकदम से अलग होना उन्हें अच्छा थोड़ी लगेगा और वैसे भी तुम तो अच्छे से जानती हो, उन्हें जब भी किसी बात के लिए हमसे परमिशन लेनी होती हैं तो वो दोनों एक दूसरे के साथ डिस्कस करने के बाद हमारे पास आती हैं। इस बार भी वो यही करकर आई होंगी। हमारी गुरनूर को पहले से ही पता था की रावी ने मुझसे क्या बात करनी है। इनफैक्ट, ये आइडिया ही गुरनूर का होगा की रावी मुझसे बात करे क्योंकि वो जाना चाहती हैं तो उसे जाने दो और वैसे भी हमारी गुरनूर का तो कोई भाई बहन भी नहीं है। जो हैं रावी और नील ही है। जाने दो तुम गुरनूर को। उसे भी थोड़ा ब्रेक मिल जाएगा।” विक्रम ने शीतल को समझाने के लिए कहा तो शीतल मान गई। 


रात को खाना खाने के बाद गुरनूर ने अपने कमरे में आकर श्रेयांश को फोन लगाया लेकिन श्रेयांश ने उसका फोन नहीं उठाया। उसने दोबारा फोन लगाया तो इस बार श्रेयांश ने फोन उठा लिया। गुरनूर ने अपनी खुशी से भरी आवाज़ में कहा, “मेरे पास तुम्हारे लिए एक गुड न्यूज़ है। गैस करो क्या हो सकता है।” 


“क्या बात है, गुरनूर?” श्रेयांश ने पूछा तो गुरनूर ने कहा, “गैस तो करो एक बार।” 


श्रेयांश ने थोड़ी देर सोचा पर उसके मन में ऐसा कुछ नहीं आया इसलिए उसने कहा, “मैं नहीं समझ पा रहा, गुरनूर। तुम बता दो ना मुझे।” 


“तुम चाहते थे ना मैं तुम्हारे पास आ जाऊँ। मैं आ रही हूँ।” गुरनूर ने खुशी से चहकते हुए कहा लेकिन उसकी ये बात सुनकर श्रेयांश हैरान रह गया।


Continued In आर्ज-ए-इश्क - 13

Thursday, 6 August 2026

आर्ज-ए-इश्क - 11



गुरनूर मंदिर के बाहर रूककर अंदर देखने लगी। रावी ने उसे ऐसे देखा तो कहा, “तुम मंदिर के अंदर जाना चाहती हो क्या?” 


गुरनूर ने अंदर देखते हुए कहा, “मन कर रहा है की आज जाऊॅं और थोड़ी दुआ महादेव के आगे भी करूॅं श्रेयांश के लिए।” 


“पर आज से पहले तो तुम कभी नहीं गई मंदिर के अंदर मेरे साथ।” रावी ने कहा तो गुरनूर ने कहा, “आज से पहले इश्क़ भी तो नहीं हुआ था।” 


गुरनूर मंदिर के अंदर चली गई। रावी भी उसके पीछे पीछे अंदर चली गई। गुरनूर हाथ जोड़कर आँखें बंद कर महादेव से प्रार्थना करने लगी। रावी ने गुरनूर को देखते हुए सोचा, “क्या इश्क़ में सच में इतनी ताकत होती हैं की इंसान जिससे प्यार करे, उसका सब कुछ अपनाने के लिए तैयार हो जाए।” 


गुरनूर ने मुस्कुराकर आँखें खोली और माथा टेककर रावी के साथ मंदिर से बाहर आ गई। 


जैसे जैसे दिन बीत रहे थे गुरनूर श्रेयांश को लेकर काफ़ी सीरियस होती जा रही थी। वो उसके साथ शादी के ख़्वाब देखती। उसका फोन आता तो अपना सारा काम छोड़कर उससे बात करने लग जाती। रावी को ये सब सही नहीं लगता था क्योंकि गुरनूर अपने ख़्वाबों से ज्यादा अब श्रेयांश को वक्त देती थी लेकिन उसने कुछ नहीं कहा क्योंकि उसे लगता था की शायद नया नया प्यार है इसलिए गुरनूर ऐसा कर रही है। 


वहीं श्रेयांश इस वक्त विवेक के साथ एक रेस्टोरेंट में बैठकर बर्गर खा रहा  था की तभी उसके फोन पर गुरनूर का मैसेज आया। श्रेयांश ने अपने हाथ में पकड़ा हुआ बर्गर ट्रे में रखा और अपना फोन उठाकर बिना एक भी सेकंड गवाए गुरनूर के मैसेज का रिप्लाई किया। उसके साथ बैठे विवेक ने उसे ये करते हुए देखा तो कहा, “मुझे लगा रहा है तू गुरनूर को लेकर सीरियस हो गया है।” 


श्रेयांश ने फोन की स्क्रीन से नज़रे हटाकर विवेक को देखते हुए कहा, “मैं कभी किसी चीज को लेकर सीरियस नहीं होता और गुरनूर को लेकर तो सीरियस बिल्कुल भी नहीं हूँ मैं।”


श्रेयांश को मोहब्बत तो हो चुकी थी गुरनूर से बस वो मान नहीं पा रहा था। ऐसा शायद उसके दोस्तों की वजह से था या शायद उसके अपने एटिट्यूट की वजह से। 


रात में श्रेयांश को गुरनूर के बारे में सोचते हुए नींद नहीं आ रही थी। विवेक की कही हुई बात उसके दिमाग में बार बार गूंज रही थी। उसने खुद से ही सवाल किया, “मैं गुरनूर को लेकर सीरियस कैसे हो सकता हूँ।” 


वो अपना फोन लेकर कमरे से बाहर आया और छत पर चला गया। उसने गुरनूर को फोन लगाया। गुरनूर सो चुकी थी लेकिन श्रेयांश के फोन की वजह से जाग गई। उसने फोन उठाकर अपनी नींद से भरी आवाज़ में कहा, “हेलो।” 


गुरनूर की आवाज़ सुनकर श्रेयांश को एहसास हुआ की वो सो रही थी इसलिए उसने कहा, “सॉरी, मैंने तुम्हें जगा दिया।” 


“तुम्हारे फोन कॉल का इंतजार करते करते ही सोई थी।” गुरनूर ने कहा। 


“मुझे नींद नहीं आ रही और मैंने पहले कॉल इसलिए नहीं किया क्योंकि मैं तुम्हारे बारे में सोच रहा था।” श्रेयांश ने कहा तो गुरनूर मुस्कुराने लगी और उसने पूछा, “मेरे बारे में क्या सोच रहे थे?” 


श्रेयांश ने गुरनूर के सवाल को नजरअंदाज करते हुए पूछा, “गुरनूर, तुम्हारे सपने क्या है?” 


“इसका ख्याल कहाँ से आ गया तुम्हें आज?” गुरनूर ने उसका सवाल सुनकर हैरान होते हुए पूछा। 


“बताओ ना।” श्रेयांश ने कहा तो गुरनूर ने उसे अपने ख्वाबों के बारे में बताते हुए कहा, “मेरा ख़्वाब है एक फेमस राइटर बनना और मुझे न अपने लिए एक पर्सनल लाइब्रेरी भी चाहिए जहाँ मैं अपनी बुक्स रखूॅं और वहीं बैठकर लिखूं। फिर सक्सेसफुल होने के बाद तुमसे शादी करूॅं और हम दोनों मिलकर अपनी फैमिलीज के साथ रहे।” 


“फैमिलीज? क्या तुम सच में इस बारे में इतनी ज्यादा सीरियस हो?” श्रेयांश ने पूछा तो गुरनूर ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “मैं जिन्हें चाहती हूँ उनके लिए सीरियस ही रहती हूँ बहुत और तुम्हारी फैमिली भी तो मेरी ही हुई न अब।” 


गुरनूर की बात सुनकर श्रेयांश ने अपने मन में सोचा, “और एक मैं हूँ जो कभी किसी को लेकर सीरियस नहीं होता।” 


श्रेयांश ने थोड़ी देर उससे बात की और फिर नीचे आकर अपने कमरे में सो गया। 


अगले दिन वो विवेक और अपने दोस्त, शान के साथ एक रेस्टोरेंट में बैठा हुआ था। उसने विवेक को देखते हुए कहा, “यार मुझे एक बात बताओ। बस लड़की से बात करने को ही फन कहते हो तुम लोग।” 


विवेक ने उसे देखा और कहा, “अब तेरी वाली लॉन्ग डिस्टेंस में है इसमें हमारी क्या गलती।” 


श्रेयांश ने उनके साथ कुछ खाया पीया और फिर वहाँ से अपने घर आ गया। उसने जल्दी से अपने कमरे में आकर गुरनूर को फोन लगाया। 


जैसे ही गुरनूर ने फोन उठाया, श्रेयांश ने जल्दी से कहा, “गुरनूर, तुम मेरे पास नहीं आ सकती।” 


उसकी ये बात सुनकर गुरनूर के चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कान आ गई और उसने कहा, “तिशनगी हो रही हैं तुम्हें मेरी।” 


“तिशनगी मतलब।” श्रेयांंश ने पूछा।


“उर्दू वर्ड है। डिजायर होता है इसका मतलब।” गुरनूर ने कहा तो श्रेयांश ने पूछा, “तुम इतने उर्दू वर्ड्स क्यों यूज करती हो?” 


“क्योंकि मुझे उर्दू अच्छी लगती है। वैसे मैंने फ्रेंच भी पढ़ी हुई है जिसे सब मोस्ट रोमांटिक लैंग्वेज कहते हैं लेकिन जब मैंने उर्दू सीखी तो मुझे सबसे रोमांटिक लैंग्वेज ये लगने लग गई और ये बहुत खूबसूरत भी है।” गुरनूर ने कहा। 


“लगता हैं तुमसे बात करने के लिए थोड़ी सी उर्दू मुझे भी सीखनी पड़ेगी। फिल्हाल तुम मुझे ये बताओ की क्या तुम मेरे पास आ सकती हो?” श्रेयांश ने बेताब होते हुए पूछा जिसका गुरनूर ने प्यार से जवाब देते हुए कहा, “पास ही हूँ मैं तुम्हारे। अपने दिल में देखो। तुम्हारे दिल में हूँ मैं।” 


“वो वाला पास नहीं गुरनूर। वो वाला पास जिसमें मैं तुम्हें गले लगा सकूं। तुम्हें छूकर तुम्हें महसूस कर सकूं।” श्रेयांश ने उस पल के एहसास के बारे में सोचते हुए कहा। 


गुरनूर ने मुस्कराते हुए कहा, “उम्म हम्म, तुम्हारे पास आने का मन मेरा भी करता है क्योंकि मुझे तो तुमसे दूर रहकर ही तुम्हारी आदत सी हो गई है।” 


“आ जाओ ना फिर।” श्रेयांश ने इस बार और ज्यादा बेताबी से कहा तो गुरनूर ने उसे कहा, “तुम भगवान जी से क्यों नहीं कहकर देखते की वो मुझे तुम्हारे पास भेजने के लिए कोई चमत्कार करदे।”


Continued In आर्ज-ए-इश्क - 12