श्रेयांश थोड़ी देर तक ऐसे ही बैठा खामोशी से गुरनूर को देखता रहा। उसे समझ नहीं आ रहा था की वो गुरनूर के सवाल का क्या जवाब दे इसलिए उसने कहा, “पता नहीं। इतनी गहराई से मोहब्बत अभी तक महसूस नही हुई की मैं तुम्हारे इस सवाल का जवाब दे सकूँ।”
“अच्छा, फिर ये बताओ कि तुम्हें इश्क का दूसरा नाम पता है?” गुरनूर ने पूछा तो श्रेयांश ने कहा, “नही, तुम बता दो।”
गुरनूर मुस्कुराई और उसने कहा, “सुकून, जिससे हम इश्क करते हैं उसके साथ रहकर ही सुकून मिलता है। उसका चेहरा देखना, उसकी आवाज सुनना, उसे महसूस करना। सब सुकून बन जाता है।”
“मैं महसूस कर रहा हूँ ये।” श्रेयांश ने भी मुस्कुराते हुए कहा और फिर उसने अपने हाथ में पहनी हुई वॉच में टाइम देखकर कहा, “नौ बज गए है। चलो अब तुम्हें घर छोड़ आता हूँ।”
श्रेयांश ने खड़े होकर गुरनूर की तरफ अपना हाथ बढ़ाया तो गुरनूर ने मुस्कुराते हुए अपना हाथ उसके हाथ पर रखा और उसका हाथ पकड़कर खड़ी हो गई। वो दोनों विवेक और रावी के पास आ गए। श्रेयांश ने विवेक को देखते हुए कहा, “इन दोनों को लेट हो रहा है। चल घर छोड़ देते है इन्हें।”
वो सभी पार्क से बाहर आ गए। गुरनूर श्रेयांश के पीछे बैठ गई और रावी विवेक के पीछे। वो दोनों बाइक चलाने लगे।
थोड़ी देर बाद दोनों ने ही अपनी बाइक रावी के घर से कुछ दूरी पर रोक दी। गुरनूर ने बाइक से उतरकर श्रेयांश को गले लगाया और फिर रावी के साथ घर चली गई।
श्रेयांश अपने घर नही जाना चाहता था इसलिए वो विवेक के साथ उसके घर आ गया। विवेक फ्रेश होने के लिए बाथरूम में गया हुआ था। श्रेयांश उसके बेड पर बैठा हुआ फोन में इंस्टाग्राम पर रील्स देख रहा था जिससे वो बहुत ही जल्दी बोर होने लगा। उसने फोन बंद कर अपनी जेब में रखा तो उसकी नज़र विवेक के कमरे में दीवार पर लगे हुए टीवी पर गई। श्रेयांश ने टीवी देखने का सोचा और रिमोट ढूंढने लगा। उसे रिमोट बेड पर उससे थोड़ी दूर रखा हुआ दिखाई दिया। उसने थोड़ा आगे हाथ करके रिमोट उठाया और जैसे ही टीवी ऑन किया, उसपर कोई पाकिस्तानी ड्रामा चल रहा था।
श्रेयांश कुछ और लगाने ही वाला था की तभी बाथरूम का दरवाज़ा खोलकर विवेक कमरे में आया। श्रेयांश का ध्यान विवेक के ऊपर चला गया। विवेक ने उसके पास आकर उसका हाथ पकड़ लिया और उसके हाथ को देखने लगा। श्रेयांश बिना कुछ और लगाए ही टीवी का रिमोट बेड पर वापिस रखकर विवेक को देखने लगा। विवेक ने उसे देखा और कहा, “इतनी ज़ोर से मुक्का मारने की क्या ज़रूरत थी उस लड़के को। अपना हाथ देख। कितनी ज्यादा लगी है।”
“चलता है इतना तो।” श्रेयांश ने लापरवाही से कहा।
“तेरा कुछ नहीं हो सकता।” कहकर विवेक कमरे से बाहर जाकर फर्स्ट एड बॉक्स ले आया। वो श्रेयांश के सामने बैठकर उसके हाथ पर लगी चोट को डेटॉल से साफ करने लगा। उसकी चोट साफ करते हुए विवेक ने कहा, “तुझे सच में प्यार हो गया है गुरनूर से।”
ये सुनकर श्रेयांश ने हैरानी से विवेक को देखा। विवेक का सारा ध्यान अभी भी श्रेयांश की चोट पर ही था जिसके ऊपर वो अब दवाई लगा रहा था। श्रेयांश ने एक गहरी सांस ली और कहा, “मैंने सिर्फ उसकी इज्ज़त बचाई।”
श्रेयांश के हाथ में दवाई लगाकर विवेक ने उसकी आँखों में देखा और ना में सिर हिलाते हुए कहा, “नहीं, सबने तेरी आँखों में गुस्सा देखा जिसकी वजह सबके लिए है उस लड़के का गुरनूर को हाथ लगाना पर मुझे गुस्से के साथ तेरी आँखों में प्यार भी नजर आया।”
“नहीं है प्यार।” श्रेयांश ने जैसे ही कहा, टीवी पर चल रहे पाकिस्तानी ड्रामा में आ रहे गाने की एक लाइन उन दोनों के कानों में पड़ी जो थी,
"इश्क सब ही करते हैं,
मानने से डरते हैं।"
ये सुनते ही श्रेयांश और विवेक, दोनों हँसने लगे। श्रेयांश ने अपनी हँसी कंट्रोल की और विवेक से पूछा, “तू कब से ये सारे पाकिस्तानी ड्रामाज देखने लगा।”
“मेरी बहन भी है जो ये सब देखती है। वो देख रही होगी मेरे कमरे में आकर।” विवेक ने कहा और फिर थोड़ी देर बाद श्रेयांश से पूछा, “तू पक्का सीरियस नहीं है ना गुरनूर को लेकर?”
“एक ही सवाल कितनी बार पूछेगा यार तू।” श्रेयांश ने चिढ़ते हुए कहा। विवेक ने सीरियस होते हुए कहा, “देख श्रेयांश, अभी बहुत कुछ करना है तुझे। ये प्यार व्यार के चक्करों में फसकर नही कर पाएगा। इसलिए कह रहा हूँ।”
श्रेयांश ने उसे देखा और कहा, “ये गर्लफ्रेंड बनाने का आइडिया भी तूने ही दिया था। अगर तुझे पता था कि इसमे फंसकर मैं करियर की तरफ ध्यान नहीं दे पाऊंगा तो क्यों दिया था इसका आइडिया तूने।”
विवेक ने अब कुछ नहीं कहा तो श्रेयांश ने कहा, “नही हूँ मैं सीरियस।”
गुरनूर रावी के साथ बेड पर लेटे हुए श्रेयांश के बारे में सोच रही थी जब श्रेयांश ने क्लब में उसके लिए उस लड़के को पीटा था। उसने रावी की तरफ पलटकर उससे पूछा, “रावी, क्या तू सो गई?”
“नही।” रावी ने भी उसकी तरफ पलटते हुए कहा। खिड़की से आती हुई चाॅंद की रोशनी में उसका चेहरा चमक रहा था।
गुरनूर ने श्रेयांश के बारे में सोचते हुए ही रावी से पूछा, “क्या तुम्हें भी श्रेयांश की आँखों में आज मेरे लिए प्यार नज़र आया?”
“तो श्रेयांश तो तुमसे प्यार करता ही है।” रावी ने कहा। गुरनूर ने उठकर बेड पर बैठते हुए कहा, “तू समझ नही रही है, रावी। आज कुछ अलग ही था। आज मैंने प्यार के साथ इज़ाफ़ियत भी देखी उसकी आँखों में। वो मुझे लेकर पॉजेसिव भी हो चूका है और उसने मेरे लिए उर्दू भी सीखी है।”
रावी ने मुस्कुराकर कहा, “सच्चा प्यार है। प्यार को सच्चे प्यार में तो बदलना ही था।”
“मज़ा तो तब आएगा जब सच्चा प्यार इश्क़ में बदलेगा।” गुरनूर ने मुस्कुराते हुए कहा।
“प्यार और इश्क़ में फ़र्क ही क्या है, गुरनूर?” रावी ने पूछा।
“प्यार आबाद करता है और इश्क़ बर्बाद पर इस इश्क़ में न जुनूनियत बहुत होती है।” गुरनूर ने खिड़की से आसमान में चमक रहे चाॅंद को देखते हुए कहा।
उसने थोड़ी देर तक वैसे ही रावी से बातें की और फिर बेड पर लेटकर श्रेयांश के बारे में सोचते हुए सो गई।
Continued In आर्ज-ए-इश्क - 19

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