गुरनूर ने जब श्रेयांश से कहा की वो भगवान से क्यों नहीं कहता की वो उसे उसके पास भेज दे तो श्रेयांश ने कहा, “मैं भगवान पर विश्वास नहीं करता गुरनूर। मैं तो मंदिर भी नहीं जाता हूँ। दूर रहता हूँ इन सब से मैं।”
“कोई बात नहीं। ये सब अपने अपने विश्वास और भरोसे की बात है।” गुरनूर ने कहा कि तभी उसे शीतल की आवाज़ आई जो उसे नीचे बुला रही थी।
“मैं तुमसे बाद में बात करती हूँ। मम्मी बुला रही हैं।” कहकर गुरनूर ने फोन काट दिया। श्रेयांश फोन की स्क्रीन को देखते हुए गुरनूर के बारे में सोचने लगा।
अगले दिन सुबह सुबह ही श्रेयांश अपनी बाइक लेकर किसी काम से जा रहा था की तभी वो मंदिर के सामने से गुजरा। मंदिर को देखकर उसे गुरनूर की कही बात याद आ गई। उसने अपनी बाइक वापिस मोड़कर मंदिर के सामने लाकर रोकी।
वो बाइक से उतरा और जूते उतारकर मंदिर के अंदर चला गया। उसने महादेव की बड़ी सी मूर्ति को देखते हुए हाथ जोड़े और कहने लगा, “मैं आपके ऊपर ज्यादा विश्वास नहीं रखता और ना ही आप में मानता हूँ पर गुरनूर ने कहा की मैं एक बार आपसे कहकर देखूं की आप उसे मेरे पास भेज दें। वो शायद इस बात पर यकीन करती है की आपसे जो माँगो वो मिल ही जाता हैं। अगर आप भेज सकते है तो उसे मेरे पास भेज दीजिए। मेरे विश्वास के लिए तो नहीं हो सकता क्योंकि मेरा विश्वास तो बहुत कमज़ोर है। आप गुरनूर के विश्वास के लिए ये कर दीजिए।”
उसने कहना खत्म ही किया था की पंडित जी ने उसके पास आकर उसे टीका लगाते हुए कहा, “तुम जो भी माँग रहे हो वो जरूर मिलेगा तुम्हें। तुम यहाँ खुद नहीं आए। तुम्हारी किस्मत तुम्हें यहाँ लाई है और तुम्हारी किस्मत वही है जिसे तुम माँग रहे हो और जिसके लिए तुम माँग रहे हो।”
श्रेयांश ने कुछ नहीं कहा। वो महादेव की मूर्ति को देखकर बाहर आ गया। उसने जूते पहने और बाइक लेकर वहाँ से निकल गया। बाइक चलाते हुए उसने खुद से ही कहा, “गुरनूर मेरी किस्मत कैसे हो सकती हो। मैं तो उसे लेकर सीरियस भी नहीं हूँ।”
गुरनूर के लिए श्रेयांश ने थोड़ी थोड़ी उर्दू सीखनी शुरू की। वो ये क्यों कर रहा था उसे समझ नहीं आ रहा था जिस वजह से उसे ये अजीब भी लग रहा था और अच्छा भी।
गुरनूर इस वक्त श्रेयांश से बात करने के बाद छत पर खड़ी थी की तभी रावी वहाँ आई और उसने गुरनूर को पीछे से गले लगाते हुए कहा, “मेरे पास इस वक्त तुम्हारे लिए एक बैड न्यूज़ भी है और एक गुड न्यूज़ भी। कौन सी सुनोगी पहले।”
“बैड क्या है?” गुरनूर ने पूछा तो रावी ने उदास होते हुए कहा, “पापा का ट्रांसफर हो गया है। मुझे तुम्हें छोड़कर जाना होगा।”
“और गुड।” गुरनूर ने फिर पूछा तो इस बार रावी ने खुश होते हुए कहा, “गुड ये है की पापा का ट्रांसफर इंदौर में हुआ है। मैं तुम्हें श्रेयांश से मिलवाने अपने साथ ले जा सकती हूँ।”
गुरनूर ने पहले उसे खुशी से देखते हुए कहा, “क्या सच में?” पर फिर उसने उदास होकर कहा, “मम्मी पापा को मनाकर उनसे परमिशन कौन लेगा।”
ये सुनकर रावी ने भी सोचते हुए कहा, “अब ये तो प्रॉब्लम है।”
“बात तो एक को ही करनी होगी।” कहते हुए गुरनूर ने रावी की तरफ इशारा कर दिया तो रावी ने कहा, “मैं बात नहीं करने वाली। तुम खुद करो।”
गुरनूर ने थोड़ी इमोशनल सी शक्ल बनाकर रावी को देखकर उसे मनाने के लिए कहा, “दोस्त नहीं है।”
रावी ने एक गहरी साँस ली और कहा, “प्रेम कहानी तुम्हारी और बात मैं करूॅं। चलो मेरे साथ।”
रावी गुरनूर के साथ नीचे विक्रम से बात करने के लिए आ गई। विक्रम लिविंग रूम में बैठे हुए कोई किताब पढ़ रहे थे। उसने गुरनूर के साथ विक्रम के सामने आकर कहा, “अंकल, मुझे आपसे कुछ बात करनी है।”
“बोलो बेटा क्या बात है?” विक्रम ने अपने हाथ में पकड़ी किताब को साइड रखकर अपना चश्मा उतारते हुए कहा।
रावी उनके पास बैठी और उसने कहा, “अंकल, आप तो जानते ही हैं की पापा का ट्रांसफर इंदौर में हो चुका है। मैं चाहती हूँ की आप गुरनूर को मेरे साथ थोड़े दिनों के लिए इंदौर भेज दे। वो अंकल नई नई जगह है तो इतनी जल्दी मेरा मन वहाँ लगेगा नहीं इसलिए मैं चाहती हूँ गुरनूर मेरे साथ चले। एक बार वहाँ मेरा मन लग जाएगा तो मैं इसे नील भैया के साथ वापिस छोड़ने आ जाऊँगी।”
विक्रम ने कुछ नहीं कहा तो रावी ने कहा, “प्लीज़ अंकल, इसे मेरे साथ इंदौर भेज दीजिए।”
“ठीक है। जाओ जीलो अपनी जिंदगी दोनों।” विक्रम ने मुस्कुराते हुए कहा तो वो दोनों खुश हो गई और उन्हें थैंक यू बोलकर वहाँ से चली गई।
शीतल जो अबतक रसोई में खड़े होकर उनकी बातें सुन रही थी, रावी और गुरनूर के जाते ही बाहर आई और उसने विक्रम से पूछा, “विक्रम, आपने गुरनूर को जाने के लिए अलाउ क्यों किया?”
“शीतल, कई बार बच्चों को समझा करो। वो बचपन से एक साथ रही हैं। अब एकदम से अलग होना उन्हें अच्छा थोड़ी लगेगा और वैसे भी तुम तो अच्छे से जानती हो, उन्हें जब भी किसी बात के लिए हमसे परमिशन लेनी होती हैं तो वो दोनों एक दूसरे के साथ डिस्कस करने के बाद हमारे पास आती हैं। इस बार भी वो यही करकर आई होंगी। हमारी गुरनूर को पहले से ही पता था की रावी ने मुझसे क्या बात करनी है। इनफैक्ट, ये आइडिया ही गुरनूर का होगा की रावी मुझसे बात करे क्योंकि वो जाना चाहती हैं तो उसे जाने दो और वैसे भी हमारी गुरनूर का तो कोई भाई बहन भी नहीं है। जो हैं रावी और नील ही है। जाने दो तुम गुरनूर को। उसे भी थोड़ा ब्रेक मिल जाएगा।” विक्रम ने शीतल को समझाने के लिए कहा तो शीतल मान गई।
रात को खाना खाने के बाद गुरनूर ने अपने कमरे में आकर श्रेयांश को फोन लगाया लेकिन श्रेयांश ने उसका फोन नहीं उठाया। उसने दोबारा फोन लगाया तो इस बार श्रेयांश ने फोन उठा लिया। गुरनूर ने अपनी खुशी से भरी आवाज़ में कहा, “मेरे पास तुम्हारे लिए एक गुड न्यूज़ है। गैस करो क्या हो सकता है।”
“क्या बात है, गुरनूर?” श्रेयांश ने पूछा तो गुरनूर ने कहा, “गैस तो करो एक बार।”
श्रेयांश ने थोड़ी देर सोचा पर उसके मन में ऐसा कुछ नहीं आया इसलिए उसने कहा, “मैं नहीं समझ पा रहा, गुरनूर। तुम बता दो ना मुझे।”
“तुम चाहते थे ना मैं तुम्हारे पास आ जाऊँ। मैं आ रही हूँ।” गुरनूर ने खुशी से चहकते हुए कहा लेकिन उसकी ये बात सुनकर श्रेयांश हैरान रह गया।
Continued In आर्ज-ए-इश्क - 13






