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Thursday, 10 September 2026

आर्ज-ए-इश्क - 20



श्रेयांश से मिलकर घर आने के बाद गुरनूर दिल्ली वापिस जाने के लिए पैकिंग कर रही थी की तभी रावी ने उसे पीछे से आकर गले लगा लिया और कहा, “मैं तुम्हें बहुत मिस करूँगी।” 

रावी की बात सुनकर गुरनूर बिना कुछ कहे मुस्कुरा उठी तो रावी ने बेड पर रखे हुए गुरनूर के कपड़ो को साइड कर वहाँ बैठते हुए कहा, “तुम मुझे मिस नहीं करोगी क्या या फिर तुम्हें बस श्रेयांश की याद ही आएगी?” 

गुरनूर ने उसके पास बैठकर अपनी दोनों बाहें साइड से उसके आसपास लपेटते हुए कहा, “मैं तुझे तो सबसे ज्यादा मिस करूँगी। तू मेरी बचपन की दोस्त ही नहीं, मेरी बहन भी है और तेरी जगह तो श्रेयांश भी नहीं ले सकता।”

“बस बस, ज्यादा मक्खन मत लगाओ मुझे।” रावी ने अपने दोनों हाथों से गुरनूर की बाजू को पकड़ते हुए कहा। वो दोनों वैसे ही बैठकर हँसते हुए बातें कर रही थी की तभी रावी के कमरे के बाहर से गुजरते हुए नील की नज़र उनके ऊपर गई। 

नील ने कमरे के अंदर आकर अपने हाथों से उनकी नज़र उतारते हुए कहा, “तुम दोनों बहनों में कितना प्यार है। किसी की नज़र ना लगे तुम दोनों को।” 

“हमें किसी की नज़र नही लगती।” रावी ने कहा। नील भी वहीं बैठ गया और गुरनूर उन दोनों से बातें करते हुए अपनी पैकिंग करने लग गई। 

अगली सुबह गुरनूर दिल्ली वापिस जाने के लिए तैयार थी। नील और रावी उसे छोड़ने जा रहे थे। गुरनूर जैसे ही मधु से मिली, मधु भावुक होकर रोने लगी क्योंकि ये पहली बार था जब गुरनूर इतने वक्त तक उनके साथ दिन रात रही थी। वैसे तो जब वो लोग दिल्ली में रहते थे तो बस गुरनूर दिन में एक बार कुछ वक्त के लिए ही आती थी। ज्यादातर रावी गुरनूर के घर पर उसके साथ रहती थी। अब जब मधु को गुरनूर को दिन रात देखने की आदत हो गई तो उसके वापिस जाने का समय आ गया। 

गुरनूर ने मधु को रोते हुए देखा तो उसे अच्छा नही लगा। उसने मधु के आँसू पोंछते हुए कहा, “आंटी, आप ऐसे रोने लगोगे तो मैं जा नहीं पाऊँगी। मैं आपसे वादा करती हूँ मैं बहुत जल्दी दोबारा आपके पास रहने आऊँगी।” 

मधु ने प्यार से गुरनूर के गाल को छूकर मुस्कुराते हुए हाँ में सिर हिला दिया। गुरनूर फिर शुभम से मिलकर नील और रावी के साथ घर से स्टेशन पहुँचने के लिए निकल गई। 

उसे जाता हुआ देखकर मधु फिर से थोड़ा इमोशनल हो गई। मधु को इमोशनल होता हुआ देखकर शुभम ने उसे कंधो से पकड़ा और कहा, “अरे भाग्यवान, इतना रोने की क्या जरूरत है। अगर तुम्हें गुरनूर से इतना ही प्यार है तो हम उसे हमेशा के अपना बनाकर इस घर में ले आते है। हम विक्रम से नील के लिए गुरनूर का हाथ माॅंग लेंगे।” 

“क्या सच में?” मधु ने खुश होकर कहा और फिर उदास होते हुए कहा, “पर अगर गुरनूर या नील नही माने तो?” 

“तुम अपने बेटे से पूछे बिना ही इस बात का अंदाजा कैसे लगा सकती हो। उससे उसकी पसंद पूछेंगे न हम। बस थोड़ा इंतजार करना होगा तुम्हें। नील की अभी अभी जॉब लगी है और गुरनूर भी अभी पूरी तरह से अपने करियर पर ध्यान दे रही है। एक बार उन दोनों को अपने अपने करियर में पूरी तरह से सैटल होने दो। उसके बाद मैं विक्रम से बात करूँगा।” शुभम ने कहा। उसकी बात सुनकर मधु ने मुस्कुराते हुए कहा, “ठीक है। अगर आप ये गारंटी दे की गुरनूर मेरी बहु बनकर इस घर में आएगी तो मुझे इंतजार करने में कोई दिक्कत नही।” 

“भगवान से प्रार्थना करो की ऐसा ही हो।” शुभम ने मधु के गाल को छूकर कहा और अपने काम पर जाने के लिए निकल गए। 

वहीं स्टेशन पहुँचकर नील, रावी और गुरनूर ट्रेन में अपनी सीट पर आकर बैठ गए। उनकी सीट दरवाज़े के पास ही थी। नील ने सामान रखकर गुरनूर और रावी को देखते हुए कहा, “तुम दोनों बैठो। मैं अभी आता हूँ।” 

नील को चलती हुई ट्रेन के दरवाज़े पर खड़े होना अच्छा लगता था इसलिए वो दरवाज़े पर आकर खड़ा हो गया। वो वहाँ खड़े होकर आसपास देख ही रहा था की तभी एक लड़की उसके सामने आई जिसने अपने हाथ में दो भारी भारी बैग पकड़े हुए थे। वो लड़की बहुत ज्यादा हाफ रही थी। नील ने उसे देखकर अंदाजा लगाया की शायद उसे स्टेशन छोड़ने कोई नहीं आया है इसलिए उसे अकेले ही दो भारी भरकम बैग उठाने पड़े जिसकी वजह से वो अब हाफ रही थी और लंबी सांसें ले रही थी। 

नील ने उसे देखकर कहा, “क्या मैं आपकी हेल्प करूँ।” 

उस लड़की ने नील को देखकर हाफते हुए कहा, “येस, प्लीज़।” 

नील ने ट्रेन से उतरकर उस लड़की के दोनों बैग ट्रेन में चढ़ाए। गुरनूर और रावी अपनी ही बातों में लगी हुई थी इसलिए उन्होंने नील की तरफ ध्यान नहीं दिया। उस लड़की के ट्रेन पर चढ़ने के बाद नील भी ट्रेन पर वापिस चढ़ गया। उस लड़की ने अपने बैग से निकालकर पानी पीया। नील तो लगातार उसे देखे जा रहा था।

रावी से बातें करते हुए गुरनूर की नज़र नील और उस लड़की पर गई तो वो हैरान हो गई। उसने नील की तरफ इशारा करते हुए रावी से कहा, “जरा उधर देखो।” 

नील को किसी लड़की के साथ देखकर रावी को भी बहुत ज्यादा हैरानी हुई। उस लड़की ने थोड़ा सा रिलैक्स होकर नील की तरफ अपना हाथ बढ़ाते हुए कहा, “थैंक यू, मेरी हेल्प करने के लिए।” 

नील ने उससे हाथ मिलाते हुए कहा, “वेलकम। चलिए आपको आपकी सीट तक छोड़ देता हूँ।” 

उसने लड़की ने अपने हाथ में पकड़ी टिकट में अपना सीट नंबर देखा और उस सीट पर आ गई जहाँ गुरनूर और रावी बैठी हुई थी। नील उसके बैग लेकर वहाँ आया और उसने हैरानी से उस लड़की को पूछा, “ये आपकी सीट है।” 

उस लड़की ने मुस्कुराकर कहा, “येस, वो विंडो वाली।” 

“फिर तो आप मेरे साथ ही बैठेंगी। आपके साथ वाली सीट मेरी ही है।” नील ने भी मुस्कुराते हुए कहा। रावी और गुरनूर उसे ही देख रही थी। गुरनूर ने थोड़ा शरारत से रावी को देखते हुए नील को सुनाने के लिए कहा, “रावी, इन दिनों लोगों के साथ इत्तेफाक बहुत होते है।” 

उस लड़की को गुरनूर की बात समझ नहीं आई लेकिन नील समझ गया की गुरनूर क्या कहना चाह रही है। वो लड़की नील को देखकर अपनी सीट पर बैठ गई। नील ने ध्यान से उसके बैग ऊपर रख दिए और फिर उसके पास आकर बैठ गया। 

उस लड़की ने अपना नाम नील को बताते हुए कहा, “मेरा नाम अर्पिता है।” 

नील ने भी उस लड़की को अपना नाम बताया और फिर रावी और गुरनूर की तरफ इशारा करते हुए कहा, “ये मेरी बहन है रावी और ये इसकी दोस्त है, गुरनूर।” 

अर्पिता ने रावी और गुरनूर से हेलो कहा तो दोनों मुस्कुरा उठी। थोड़ी देर में ट्रेन चलने लगी। नील का ध्यान बार बार अर्पिता की तरफ जा रहा था। अर्पिता भी बीच बीच में नील को देख लेती क्योंकि उसे नील का केयरिंग नेचर अच्छा लगा था। 

अर्पिता नील के साथ बीच बीच में बातें भी कर रही थी और बातों ही बातों में उन दोनों ने अपने नम्बर भी एक दूसरे को दे दिए। गुरनूर का ध्यान जब इस बात पर गया तो उसने रावी से कहा, “लगता है तुम्हारे भाई की लव स्टोरी भी अब शुरू होने वाली है।” 

नील ने गुरनूर की बात पर कोई ध्यान नहीं दिया क्योंकि उसका ध्यान अर्पिता में था। रावी ने नील और अर्पिता को देखकर गुरनूर से कहा, “मतलब अब मैं ही सिंगल बची हूँ।” 

रावी की ये बात सुनकर गुरनूर हँसने लगी। 

Continued In आर्ज-ए-इश्क - 21

आर्ज-ए-इश्क - 19



अगली सुबह गुरनूर सबके साथ बैठकर नाश्ता कर रही थी की तभी उसका फोन बजा। उसने चम्मच नीचे प्लेट में रखकर टेबल से फोन उठाकर देखा तो उसके ऊपर पापा लिखा आ रहा था। विक्रम का फोन था इसलिए गुरनूर ने जल्दी से फोन उठाते हुए कहा, “हेलो, पापा।” 

“कैसी हो, बेटा और तुम वापिस कब आओगी। तुम्हारे पापा का मन नही लग रहा तुम्हारे बिना।” विक्रम ने कहा तो गुरनूर के होठों पर मुस्कान आ गई और उसने कहा, “कल मेरा एक लास्ट ओपन माइक अटेंड करना रहता है यहाँ। उसे अटेंड करने के बाद आ जाऊॅंगी।” 

गुरनूर की बात सुनकर रावी थोड़ा हैरान हो गई क्योंकि गुरनूर ने उसे ऐसा कुछ भी नही बताया था की उसका कोई और ओपन माइक है। रावी ने गुरनूर को देखा पर सबके सामने उससे कुछ नही पूछा। गुरनूर ने विक्रम से ये बात इसलिए कही थी क्योंकि दिल्ली वापिस जाने से पहले उसे आखिरी बार श्रेयांश से मिलना था। 

विक्रम से थोड़ी देर बात करने के बाद गुरनूर ने फोन काटकर टेबल पर वापिस रख दिया और नाश्ता करने लगी। रावी को जानना था की गुरनूर ने विक्रम से ओपन माइक शो का क्यों कहा इसलिए उसने जल्दी से अपना नाश्ता खत्म करकर गुरनूर से कहा, “मुझे तुमसे कुछ बात करनी है। तुम अभी चलो मेरे साथ।” 

रावी ने गुरनूर का हाथ पकड़ लिया। मधु ने देखा की रावी गुरनूर का हाथ पकड़कर उसे ठीक से नाश्ता नहीं करने दे रही और उसे नाश्ते से उठाना चाह रही है तो उसने रावी को डाटते हुए कहा, “रावी, ये क्या कर रही हो तुम। जो भी बात करनी है बाद में कर लेना उससे। कहीं भाग थोड़ी रही है वो। उसे नाश्ता तो आराम से करने दो। हाथ छोड़ो उसका।” 

रावी ने गुरनूर का हाथ छोड़ दिया। गुरनूर जल्दी से नाश्ता करने लगी। जैसे ही उसने नाश्ता खत्म किया और कुर्सी से खड़ी हुई, रावी बिना वक्त गवाए उसका हाथ पकड़कर उसे अपने साथ ऊपर अपने कमरे में ले जाने लगी। उन्हें जाता हुआ देखकर मधु ने शुभम से कहा, “पता नही ये क्या खिचड़ी पकाना चाहती है अब गुरनूर के साथ मिलकर।” 

“मम्मी, आपको पता तो है वो दोनों बचपन से ऐसी ही रही है। पहले मिलकर प्लैन बनाती है। फिर उसे पूरा डिस्कस करने के बाद किसी बड़े से परमिशन लेने आती है। आप इतना मत सोचो। ज्यादा से ज्यादा शॉपिंग या घूमने का ही प्लैन बना लेंगी ना। जाने देना आप दोनों को। वैसे भी, गुरनूर के दिल्ली जाने के बाद इन दोनों बचपन की सहेलियों ने अलग ही रहना है। करने दीजिए एन्जॉय उन्हें साथ में।” नील ने कहा तो शुभम ने भी उसकी बातों को समझते हुए कहा, “नील सही कह रहा है। यही वक्त है इन दोनों सहेलियों के पास। एन्जॉय करने दो उन्हें साथ में। आने वाले वक्त में क्या पता दोनों में से किसकी शादी कहाँ हो जाए। फिर क्या पता एक दूसरे से ऐसे हर आए दिन मिल पाएंगी दोनों या नही।” 

दोनों बाप बेटे की बात सुनकर मधु मुस्कुराने लगी। 

रावी ने गुरनूर को अपने कमरे में लाकर कमरे का दरवाज़ा बंद किया और फिर गुरनूर से पूछा, “तुमने अंकल से ओपन माइक के बारे में क्यों कहा? अब तो कोई ओपन माइक नहीं है या फिर तुमने मुझे इस बारे में बताया नही?” 

गुरनूर ने बेड पर बैठकर रावी को देखते हुए कहा, “रिलैक्स हो जाओ। मैंने ऐसा इसलिए कहा क्योंकि मैं जाने से पहले श्रेयांश से मिलने चाहती हूँ।” 

“तो तुमने ओपन माइक का बहाना क्यों बनाया?” रावी ने पूछा तो गुरनूर ने हैरानी से उसे देखकर कहा, “तो क्या मैं सीधा सीधा सबके सामने श्रेयांश का ज़िक्र कर देती। थोड़ा तो सोचा कर रावी।” 

“ये तो मैंने सोचा ही नहीं। सॉरी यार।” रावी ने भी उसके पास बैठते हुए कहा। 

अगले दिन गुरनूर जाकर श्रेयांश से मिली। विवेक के घर में आज विवेक के अलावा कोई भी नही था इसलिए उसने गुरनूर को वहीं बुला लिया और वो विवेक के घर में आ भी गई क्योंकि उसे श्रेयांश पर पूरा भरोसा था। 

इस वक्त श्रेयांश गुरनूर के साथ विवेक के कमरे में था और विवेक उन दोनों को डिस्टर्ब ना करने के लिए अपने पेरेंट्स के कमरे में बैठकर अपनी गर्लफ्रेंड से बात कर रहा था। 

श्रेयांश बेड पर गुरनूर को अपनी बाहों में भरकर बैठा हुआ था। गुरनूर उसके सीने से लगी हुई उसके दिल की धड़कनों को सुन रही थी। उसने गुरनूर के बालों को सहलाते हुए पूछा, “तुम फिर कब आओगी?” 

“अब तुम आना।” गुरनूर ने श्रेयांश के सीने पर अपने दाएं हाथ की उंगलियाँ फेरते हुए मुस्कुराकर कहा। श्रेयांश ने गुरनूर का वो हाथ पकड़ लिया तो उसकी नज़र गुरनूर की रिंग फिंगर में पहनी हुई अंगूठी पर गई। वो एक चांदी की अंगूठी थी जिसमें हल्के गुलाबी रंग का मोती लगा हुआ था। उसने उस अंगूठी को देखते हुए पूछा, “ये रिंग किसने दी तुम्हें?” 

“तुम्हें जलन हो रही है?” गुरनूर ने अपना सिर उठाकर श्रेयांश की आँखों में देखते हुए कहा। श्रेयांश ने कुछ नहीं कहा तो गुरनूर ने फिर से उसके सीने पर अपना सिर रखकर उस अंगूठी को देखते हुए कहा, “ये रिंग मुझे दादी ने दिलाई थी। उनकी आखिरी याद है मेरे पास इसलिए पहनती हूँ।” 

“तुम अपनी फैमिली को लेकर बहुत सेंसिटिव और इमोशनल हो ना।” श्रेयांश ने पूछा। 

गुरनूर ने अपनी बाहें श्रेयांश की कमर पर लपेटते हुए खामोशी से हाँ में सिर हिला दिया। थोड़ी देर बाद गुरनूर ने श्रेयांश से थोड़ा सा दूर होकर टाइम देखा और फिर श्रेयांश की आँखों में देखते हुए कहा, “अब मुझे चलना चाहिए।” 

श्रेयांश ने फिर से गुरनूर को अपने करीब खींचकर उसे अपनी बाहों में कसते हुए कहा, “मुझे थोड़ी देर और अपना एहसास लेने दो, प्लीज़।” 

गुरनूर ने श्रेयांश के दिल की धड़कनों को महसूस करते हुए अपनी आँखें बंद कर ली। श्रेयांश ने उसे गले लगाए हुए ही उसके माथे पर किस किया। 

दोनों ही इस वक्त अपने बीच की करीबियों को पूरी तरह से महसूस कर रहे थे बिना इस बात की परवाह किए की आगे ये करीबियाँ और ज्यादा बढ़ेंगी या दोनों के बीच इन करीबियों की जगह दूरियाॅं ले लेंगी।

Continued In आर्ज-ए-इश्क - 20



लव आजकल - 1



आज जैसे ही विहान ने अपने कॉलेज में कदम रखा, उसे वहां का माहौल रोज के दिनों से काफी अलग लगा। जहां पूरे कॉलेज के स्टूडेंट्स क्लास में कम बैठकर कैम्पस में घूमते रहते थे, वही आज उसे कैम्पस में सिर्फ लड़कियां ही दिखाई दी। 

वो अंदर आया तो उसे कारिडोर में अपना सबसे अच्छा दोस्त, अभय खड़ा हुआ दिखाई दिया। उसने उसके पास आकर पूछा, “हमारा कॉलेज गर्ल्स कॉलेज बन गया है क्या? आज कोई लड़का नजर ही नही आ रहा।” 

“आ दिखाता हूं तुझे की सारे लड़के कहां है।” कहते हुए अभय विहान को लाइब्रेरी के बाहर ले आया जहां सभी लड़के भीड़ लगाकर खड़े थे और बार बार अंदर देखने की कोशिश कर रहे थे। ये सब देख विहान ने पूछा, “ये सब ऐसे लाइब्रेरी के बाहर भीड़ लगाए क्यों खड़े है?” 

“भाई, वो क्या है न कि होली के टाइम पर कॉलेज में दिवाली वाला पटाखा आया है। उसी पटाखे को देखने के लिए ये सब ऐसे खड़े है।” अभय ने कहा। 

“पागल हो गए है ये सब। चल क्लास में चलते है।” कहकर विहान क्लास की तरफ जाने लगा। 

“भाई, वो लड़की सच में बहुत खूबसूरत और हॉट है यार। तू एक बार उसे देखेगा न तो देखता ही रह जाएगा और पहली नजर में ही तुझे उससे प्यार हो जाएगा। तुझे ऐसा लगेगा की तेरे आसपास इश्क की हवाएं चलने लग गई है। वायोलिन बजने लगेगा और बटरफ्लाईज फील होंगी।” कहते हुए अभय विहान के पीछे पीछे आया। विहान ने उसे देखा और कहा, “ऐसा सिर्फ मूवीज में होता है। ये हकीकत है और पता नही तुझे मेरे सिंगल होने से क्या प्रोब्लम है।” 

विहान क्लास के अंदर जाकर बैठ गया। अभय उसके पास आकर बैठा और कहा, “तुझे देखकर किसी एंगल से नहीं लगता की तेरे पेरेंट्स की इतनी रोमेंटिक लव स्टोरी होगी। रोमांस का आर तक नहीं है तेरे अंदर।” 

“मुझे मेरे पेरेंट्स की लव स्टोरी की याद मत दिला। रोज ही सुनता हूं पापा से मैं उनकी महान ओल्ड स्कूल लव स्टोरी।” विहान ने चिढ़ते हुए कहा।

“उनकी लव स्टोरी को ऐसा मत कह यार। उनकी लव स्टोरी मेरे लिए इंस्पिरेशन है।” अभय ने कहा तो विहान ने उसे कुछ नही कहा। 

प्रोफेसर ने आकर लेक्चर शुरू किया तो विहान ने अपना सारा ध्यान उसमें लगा लिया। लेक्चर खत्म होने के बाद विहान अभय के साथ कैम्पस के गार्डन में आकर बैठ गया। वो दोनों आपस में बातें कर ही रहे थे की तभी विहान की नजर सामने से आती हुई लड़की पर गई और वो बातें करते करते रुक गया। 

हल्के नीले रंग की ड्रेस में वो लड़की बहुत ही प्यारी लग रही थी। उसके लंबे काले बाल खुले हुए थे और चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कान थी। हल्की धूप में उसका गोरा रंग चमक रहा था। सभी लड़कों की नज़रें उसके ऊपर ही थी। 

अभय ने जब महसूस किया कि विहान बोलते बोलते रुक गया है और सामने देख रहा है, तो उसकी नजरों का पीछा करते हुए उसने भी सामने देखा। विहान एकटक उस लड़की को देखे जा रहा था। उसे ऐसे देख अभय ने कहा, “क्यों भाई, चलने लग गई न इश्क की हवाएं, वायोलिन बजने लगा और बटरफ्लाईज फील हो रही है?” 

“हां, यार।” विहान ने उस लड़की को मुस्कुराकर देखते हुए कहा। वो इतना खो गया था की उसे अपने आसपास का कोई होश ही नही था। वो होश में तब आया जब वो लड़की उसके पास से होकर निकली और उस लड़की के परफ्यूम की तेज खुशबू विहान की नाक से टकराई। 

अभय ने उसे देखा और पूछा, “हो गया न पहली नजर में ही प्यार?” 

“कुछ भी बोल रहा है तू।” विहान ने उससे नज़रे चुराते हुए कहा। 

“हां हां, कुछ भी बोल रहा हूं मैं।” अभय ने कहा तो विहान ने उसे देखकर पूछा, “कौन थी ये लड़की? पहले तो इसे कभी यहां नही देखा।” 

“ओह, इंटरेस्टेड है मतलब तू उसमें।” अभय ने मजे लेते हुए कहा। 

“तुझे नहीं बताना तो मत बता। मैं जा रहा हूं।” कहकर विहान जाने लगा तो अभय ने उसे रोकते हुए कहा, “ऐसे मत जा। मैं मजाक कर रहा था। आ बताता हूं।” 

विहान फिर से उसके पास आकर बैठ गया तो अभय ने कहा, “यही है वो दिवाली वाला पटाखा। इशिका शर्मा नाम है उसका। अपने प्रिंसिपल सर की भतीजी है। कितनी ब्यूटीफुल है यार वो।” 

“चल घर चलते है। अब क्लास तो कोई और है नहीं। सर अब्सेंट है आज।” विहान ने अपना बैग कंधे पर डालते हुए कहा। 

“चल भाई।” अभय ने कहा और वो दोनों कॉलेज से घर जाने के लिए विहान की बाइक पर बैठ गए। 

अभय को घर छोड़ने के बाद विहान जैसे ही अपने घर में आया, उसकी नज़र लिविंग रूम में बैठे हुए अपने पेरेंट्स पर गई। वो दोनों साथ बैठकर अपने प्यार के दिनों को याद कर रहे थे। 

विहान उन्हें देखकर मुस्कुरा उठा और लिविंग रूम में उनके पास आया। उसे देखकर उसके पापा राज ने कहा, “अरे विहान, तुम आ गए।” 

“तुम आज इतनी जल्दी आ गए, बेटा।” उसकी मम्मी, सिमरन ने उससे पूछा।

“यस मॉम, सर आए नही थे आज।” विहान ने सोफे पर बैठते हुए कहा। 

“चलो, तुम बैठो। मैं खाना लगवाती हूं।” कहते हुए सिमरन सोफे से उठकर बाहर चली गई। उन सबने खाना खाया और अपने अपने कमरे में थोड़ी देर रेस्ट करने के लिए चले गए। 

शाम में उठने के बाद विहान अभय के साथ जिम चला गया। विहान एक्सरसाइज कर रहा था और अभय उसके साथ बातें करते हुए पूछ रहा था, “भाई, तुझे इशिका सच में खूबसूरत नही लगी?” 

विहान एक्सरसाइज करते हुए रुक गया और उसने अभय को देखते हुए कहा, “हर खूबसूरत चीज खतरनाक होती है।” 

एक्सर्साइज करने के बाद वो जिम से घर पहुंचा तो देखा की राज एक फोटो एल्बम लेकर बैठे हुए थे। वो फोटो एल्बम देखते ही विहान समझ गया कि आज फिर उसे राज से उनकी वही लव स्टोरी सुननी पड़ेगी जो उसकी नज़रों में अब दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे के राज और सिमरन की स्टोरी से भी ज्यादा फेमस हो गई थी। 

राज ने उसे अपने पास बैठा लिया और उसे फोटोस दिखाते हुए अपनी लव स्टोरी सुनाने लगे। कहानी सुनते हुए विहान की आंखो के सामने इशिका का चेहरा आ गया और वो उसमें खो गया। उसने मुस्कुराते हुए सोचा, “मेरी लव स्टोरी भी अब जल्दी ही शुरू होगी। आई लाइक यू इशिका।”

Continued In लव आजकल - 2

आर्ज-ए-इश्क - 18


 
श्रेयांश थोड़ी देर तक ऐसे ही बैठा खामोशी से गुरनूर को देखता रहा। उसे समझ नहीं आ रहा था की वो गुरनूर के सवाल का क्या जवाब दे इसलिए उसने कहा, “पता नहीं। इतनी गहराई से मोहब्बत अभी तक महसूस नही हुई की मैं तुम्हारे इस सवाल का जवाब दे सकूँ।” 

“अच्छा, फिर ये बताओ कि तुम्हें इश्क का दूसरा नाम पता है?” गुरनूर ने पूछा तो श्रेयांश ने कहा, “नही, तुम बता दो।”

गुरनूर मुस्कुराई और उसने कहा, “सुकून, जिससे हम इश्क करते हैं उसके साथ रहकर ही सुकून मिलता है। उसका चेहरा देखना, उसकी आवाज सुनना, उसे महसूस करना। सब सुकून बन जाता है।” 

“मैं महसूस कर रहा हूँ ये।” श्रेयांश ने भी मुस्कुराते हुए कहा और फिर उसने अपने हाथ में पहनी हुई वॉच में टाइम देखकर कहा, “नौ बज गए है। चलो अब तुम्हें घर छोड़ आता हूँ।” 

श्रेयांश ने खड़े होकर गुरनूर की तरफ अपना हाथ बढ़ाया तो गुरनूर ने मुस्कुराते हुए अपना हाथ उसके हाथ पर रखा और उसका हाथ पकड़कर खड़ी हो गई। वो दोनों विवेक और रावी के पास आ गए। श्रेयांश ने विवेक को देखते हुए कहा, “इन दोनों को लेट हो रहा है। चल घर छोड़ देते है इन्हें।” 

वो सभी पार्क से बाहर आ गए। गुरनूर श्रेयांश के पीछे बैठ गई और रावी विवेक के पीछे। वो दोनों बाइक चलाने लगे। 

थोड़ी देर बाद दोनों ने ही अपनी बाइक रावी के घर से कुछ दूरी पर रोक दी। गुरनूर ने बाइक से उतरकर श्रेयांश को गले लगाया और फिर रावी के साथ घर चली गई। 

श्रेयांश अपने घर नही जाना चाहता था इसलिए वो विवेक के साथ उसके घर आ गया। विवेक फ्रेश होने के लिए बाथरूम में गया हुआ था। श्रेयांश उसके बेड पर बैठा हुआ फोन में इंस्टाग्राम पर रील्स देख रहा था जिससे वो बहुत ही जल्दी बोर होने लगा। उसने फोन बंद कर अपनी जेब में रखा तो उसकी नज़र विवेक के कमरे में दीवार पर लगे हुए टीवी पर गई। श्रेयांश ने टीवी देखने का सोचा और रिमोट ढूंढने लगा। उसे रिमोट बेड पर उससे थोड़ी दूर रखा हुआ दिखाई दिया। उसने थोड़ा आगे हाथ करके रिमोट उठाया और जैसे ही टीवी ऑन किया, उसपर कोई पाकिस्तानी ड्रामा चल रहा था। 

श्रेयांश कुछ और लगाने ही वाला था की तभी बाथरूम का दरवाज़ा खोलकर विवेक कमरे में आया। श्रेयांश का ध्यान विवेक के ऊपर चला गया। विवेक ने उसके पास आकर उसका हाथ पकड़ लिया और उसके हाथ को देखने लगा। श्रेयांश बिना कुछ और लगाए ही टीवी का रिमोट बेड पर वापिस रखकर विवेक को देखने लगा। विवेक ने उसे देखा और कहा, “इतनी ज़ोर से मुक्का मारने की क्या ज़रूरत थी उस लड़के को। अपना हाथ देख। कितनी ज्यादा लगी है।” 

“चलता है इतना तो।” श्रेयांश ने लापरवाही से कहा। 
“तेरा कुछ नहीं हो सकता।” कहकर विवेक कमरे से बाहर जाकर फर्स्ट एड बॉक्स ले आया। वो श्रेयांश के सामने बैठकर उसके हाथ पर लगी चोट को डेटॉल से साफ करने लगा। उसकी चोट साफ करते हुए विवेक ने कहा, “तुझे सच में प्यार हो गया है गुरनूर से।” 

ये सुनकर श्रेयांश ने हैरानी से विवेक को देखा। विवेक का सारा ध्यान अभी भी श्रेयांश की चोट पर ही था जिसके ऊपर वो अब दवाई लगा रहा था। श्रेयांश ने एक गहरी सांस ली और कहा, “मैंने सिर्फ उसकी इज्ज़त बचाई।” 

श्रेयांश के हाथ में दवाई लगाकर विवेक ने उसकी आँखों में देखा और ना में सिर हिलाते हुए कहा, “नहीं, सबने तेरी आँखों में गुस्सा देखा जिसकी वजह सबके लिए है उस लड़के का गुरनूर को हाथ लगाना पर मुझे गुस्से के साथ तेरी आँखों में प्यार भी नजर आया।” 

“नहीं है प्यार।” श्रेयांश ने जैसे ही कहा, टीवी पर चल रहे पाकिस्तानी ड्रामा में आ रहे गाने की एक लाइन उन दोनों के कानों में पड़ी जो थी, 

"इश्क सब ही करते हैं, 
मानने से डरते हैं।" 

ये सुनते ही श्रेयांश और विवेक, दोनों हँसने लगे। श्रेयांश ने अपनी हँसी कंट्रोल की और विवेक से पूछा, “तू कब से ये सारे पाकिस्तानी ड्रामाज देखने लगा।” 

“मेरी बहन भी है जो ये सब देखती है। वो देख रही होगी मेरे कमरे में आकर।” विवेक ने कहा और फिर थोड़ी देर बाद श्रेयांश से पूछा, “तू पक्का सीरियस नहीं है ना गुरनूर को लेकर?” 

“एक ही सवाल कितनी बार पूछेगा यार तू।” श्रेयांश ने चिढ़ते हुए कहा। विवेक ने सीरियस होते हुए कहा, “देख श्रेयांश, अभी बहुत कुछ करना है तुझे। ये प्यार व्यार के चक्करों में फसकर नही कर पाएगा। इसलिए कह रहा हूँ।”

श्रेयांश ने उसे देखा और कहा, “ये गर्लफ्रेंड बनाने का आइडिया भी तूने ही दिया था। अगर तुझे पता था कि इसमे फंसकर मैं करियर की तरफ ध्यान नहीं दे पाऊंगा तो क्यों दिया था इसका आइडिया तूने।” 

विवेक ने अब कुछ नहीं कहा तो श्रेयांश ने कहा, “नही हूँ मैं सीरियस।” 

गुरनूर रावी के साथ बेड पर लेटे हुए श्रेयांश के बारे में सोच रही थी जब श्रेयांश ने क्लब में उसके लिए उस लड़के को पीटा था। उसने रावी की तरफ पलटकर उससे पूछा, “रावी, क्या तू सो गई?” 

“नही।” रावी ने भी उसकी तरफ पलटते हुए कहा। खिड़की से आती हुई चाॅंद की रोशनी में उसका चेहरा चमक रहा था। 

गुरनूर ने श्रेयांश के बारे में सोचते हुए ही रावी से पूछा, “क्या तुम्हें भी श्रेयांश की आँखों में आज मेरे लिए प्यार नज़र आया?” 

“तो श्रेयांश तो तुमसे प्यार करता ही है।” रावी ने कहा। गुरनूर ने उठकर बेड पर बैठते हुए कहा, “तू समझ नही रही है, रावी। आज कुछ अलग ही था। आज मैंने प्यार के साथ इज़ाफ़ियत भी देखी उसकी आँखों में। वो मुझे लेकर पॉजेसिव भी हो चूका है और उसने मेरे लिए उर्दू भी सीखी है।” 

रावी ने मुस्कुराकर कहा, “सच्चा प्यार है। प्यार को सच्चे प्यार में तो बदलना ही था।” 

“मज़ा तो तब आएगा जब सच्चा प्यार इश्क़ में बदलेगा।” गुरनूर ने मुस्कुराते हुए कहा। 

“प्यार और इश्क़ में फ़र्क ही क्या है, गुरनूर?” रावी ने पूछा।

“प्यार आबाद करता है और इश्क़ बर्बाद पर इस इश्क़ में न जुनूनियत बहुत होती है।” गुरनूर ने खिड़की से आसमान में चमक रहे चाॅंद को देखते हुए कहा। 

उसने थोड़ी देर तक वैसे ही रावी से बातें की और फिर बेड पर लेटकर श्रेयांश के बारे में सोचते हुए सो गई। 



Continued In आर्ज-ए-इश्क - 19

Sunday, 23 August 2026

आर्ज-ए-इश्क - 17


 

गुरनूर को जब महसूस हुआ की उसे कोई छू रहा है तो उसने अपने साइड में देखा। वो उस लड़के पर चिल्ला पाती, इससे पहले श्रेयांश ने पीछे से जाकर उस लड़के की शर्ट की कॉलर को पकड़कर उसे अपनी तरफ किया और जोर से एक मुक्का उसके चेहरे पर मारा। 


श्रेयांश ने उस लड़के को इतनी जोर से मारा था की वो लड़का जमीन पर गिर गया। क्लब में जो गाने बज रहे थे वो बंद हो चुके थे। क्लब में मौजूद सभी लोगों की नज़रें श्रेयांश और उस लड़के पर थी। विवेक और श्रेयांश के सारे दोस्त उस तरफ आ गए थे। गुरनूर भी श्रेयांश को ऐसे देखकर घबरा गई थी। उसने कसकर रावी का हाथ पकड़ लिया। श्रेयांश ने एक नजर गुरनूर को देखा और फिर नीचे झुककर उस लड़के को थोड़ा और पीटने लगा। उस लड़के को पिटता हुआ देखकर उसके दोस्त ने उसे बचाने के लिए आगे आना चाहा पर उसे विवेक और श्रेयांश के बाकी दोस्तों ने रोक लिया। श्रेयांश ने उस लड़के की कॉलर पकड़कर उसकी आँखों में देखते हुए कहा, “इस बार सिर्फ थोड़ा सा पीटा है। अगर इसे अगली बार छूने की हिम्मत की तो मैं तेरा वो हश्र करूँगा की तेरी रूह कापेगी किसी को भी हाथ लगाने से पहले। गुरनूर कौर ता कयामत तक सिर्फ श्रेयांश शर्मा की है।” 


गुरनूर इस वक्त श्रेयांश को देखकर डरी और घबराई हुई थी फिर भी उसने इस बात पर ध्यान दिया की श्रेयांश ने ये बात उर्दू में कही है। 


श्रेयांश ने खड़े होकर गुरनूर का हाथ पकड़ा और उसे क्लब से बाहर ले जाने लगा। उसे बाहर जाता देखकर विवेक ने रावी को इशारा किया और वो दोनों भी उनके पीछे पीछे बाहर आ गए। 


श्रेयांश का मूड खराब हो चुका था। उसने अपनी बाइक स्टार्ट की तो गुरनूर बिना कुछ कहे उसके पीछे बैठ गई। श्रेयांश बाइक चलाने लगा। विवेक ने भी बाइक स्टार्ट कर रावी को बैठने के लिए कहा और श्रेयांश के पीछे जाने लगा।


थोड़ी देर बाद वो सभी एक पार्क में आकर बैठे हुए थे। गुरनूर श्रेयांश के साथ बैठी हुई थी। विवेक और रावी बेंच पर बैठे हुए उन दोनों को देख रहे थे। गुरनूर श्रेयांश को देखकर मुस्कुरा रही थी। श्रेयांश ने उसे देखते हुए पूछा, “मुस्कुराते हुए यही सोच रही हो ना की किस गुंडे से प्यार कर लिया है तुमने?” 


श्रेयांश की ये बात सुनकर गुरनूर हँसने लगी। उसने अपनी हँसी कंट्रोल की और कहा, “अपना हाथ दिखाओ। ज्यादा तो नही लगी।” 


“कुछ नही हुआ है।” श्रेयांश ने अपने हाथ को देखते हुए कहा। 


“तुमने मेरे लिए उर्दू कब सीखी?” गुरनूर ने पूछा। उसका सवाल सुनकर श्रेयांश ने उसे हैरानी से पूछा, “तुमने नोटिस किया?” 


इसपर गुरनूर ने शरारत से कहा, “मैंने तो ये भी नोटिस किया की तुमने कैसे उस लड़के को करांटे के मूव्स यूज करके मारा।” 


“इंटरनेशनल लेवल चैंपियन हूँ मैं करांटे का। मैंने पाँच साल तक करांटे किया है।” श्रेयांश ने कहा तो पहले गुरनूर ने हैरानी से उसे देखा और फिर खुशी और हैरानी के मिले जुले भावों के साथ पूछा, “क्या सच में?” 


श्रेयांश ने मुस्कुराते हुए हाँ में सिर हिला दिया। वहीं दूसरी तरफ रावी ने श्रेयांश और गुरनूर को देखते हुए विवेक से पूछा, “क्या यही सब तुम दोनों की लाइफ है जिसे देखने के लिए गुरनूर इतनी एक्साइटेड थी?”


“येस, यही हम दोनों की लाइफ है। बाइक एण्ड पार्टीज।” विवेक ने रावी को देखते हुए कहा तो रावी ने कहा, “बेकार है काफी।”


“लेकिन हम इसे एन्जॉय करते है और तुम्हारी दोस्त ने तो शायद इसे एक्सेपट भी कर लिया है।” कहकर विवेक फिर से श्रेयांश और गुरनूर को देखने लगा। 


रावी ने मुस्कुराते हुए कहा, “ऐसा इसलिए है क्योंकि वो इस वक़्त श्रेयांश की मोहब्बत में है और उसकी मोहब्बत की डेफनिशन यही है। किसी की मोहब्बत में उसका सब कुछ अपना बना लो। बुरी आदतें भी। अगर वो भी तुमसे मोहब्बत करता होगा तो अपनी बुरी आदतें सुधार लेगा।” 


विवेक ने उसकी बातों में दिलचस्पी दिखाते हुए पूछा, “और तुम्हारे लिए मोहब्बत क्या है?”


“ये तो अभी मुझे भी नहीं पता पर मैं मोहब्बत के नाम किसी की बुरी आदतों को एक्सेपट नहीं करूॅंगी। मैं ये ऐसे अपने बॉयफ्रेंड का क्लब में जाना, ड्रिंक्स करना और ऐसे किसी को भी पीटना बर्दाश्त नहीं करूँगी। मेरे बॉयफ्रेंड में अगर ऐसी कोई भी बुरी आदत हुई तो उसे वो सुधारनी पड़ेगी।” रावी ने कहा। उसकी बातें सुनकर विवेक ने दबी आवाज़ में कहा, “तुम मोहब्बत करके तो देखो। मैं खुद को पूरी तरह से सुधार लूँगा।”


विवेक को अपनी इस बात पर हैरानी हुई। कहाँ वो श्रेयांश को गुरनूर के लिए सीरियस न होने के लिए कहता था और कहाँ इस वक्त वो रावी ने साथ मोहब्बत के बारे में सोच रहा था। रावी ने भी उसे हैरानी से देखकर पूछा, “क्या कहा तुमने?”


विवेक को एक पल के लिए लगा की रावी ने उसकी बात सुन ली है इसलिए उसने अपनी बात संभालते हुए कहा, “मैंने कहा की श्रेयांश ने तुम्हारी दोस्त के लिए ही उस लड़के को इतना मारा पीटा। बाकी अब उसे गुरनूर से मोहब्बत है तो जैसा तुमने कहा, सुधार लेगा वो खुद को।” 


रावी ने हाँ में सिर हिलाया और अपनी घड़ी में टाइम देखा। अभी थोड़ा वक्त था उसके और गुरनूर के पास इसलिए उसने सोचा की गुरनूर को श्रेयांश के साथ थोड़ा और वक्त बिताने देना चाहिए। 


श्रेयांश ने प्यार से गुरनूर को देखते हुए पूछा, “कैसी लगी मेरी दुनिया, तुम्हें?” 


गुरनूर ने मुस्कुराते हुए कहा, “अच्छी है। एटलीस्ट तुम इसी से अपनी लाइफ एन्जॉय तो कर लेते हो।” 


“तुम्हें सच में अच्छी लगी?” श्रेयांश ने हैरानी से पूछा।


“जब हम किसी से इश्क करते हैं ना तो उसका सब कुछ अच्छा लगता है।” गुरनूर ने प्यार से उसकी आँखों में देखते हुए कहा। 


श्रेयांश हल्का सा मुस्कुराया और उसने कहा, “मेरे लिए तो ये एक्सटेसी है। एक्सटेसी इन फन।” 


“एक्सटेसी इन फन तो तुम अच्छे से जानते हो। ये बताओ की एक्स्टेसी इन लव क्या है तुम्हारे लिए?” गुरनूर ने पूछा तो श्रेयांश खामोशी से उसे देखने लगा क्योंकि उसने तो दिल से आजतक गुरनूर के लिए मोहब्बत को महसूस ही नहीं किया था। बल्कि गुरनूर की वजह से उसका दिल उसके दिमाग से लड़ता रहता था।


Continued In आर्ज-ए-इश्क - 18

Friday, 21 August 2026

आर्ज-ए-इश्क - 16


 

नाश्ता करने के बाद गुरनूर रावी के साथ कमरे में आई और शाम को पहनने के लिए कपड़े देखने लगी। उसने दो टॉप उठाकर रावी को दिखाते हुए कहा, “रावी, बता ना मैं इन दोनों में से कौन सा टॉप पहनू आज रात।” 


रावी ने उन दोनों टॉप्स को देखा। एक टॉप गुलाबी रंग का था जिसके ऊपर बस फूलों वाला प्रिंट था और दूसरा नीले रंग का टॉप था जिसके गले पर हल्के नीले और सफेद रंग के फूलों से डिज़ाइन बना हुआ था। रावी ने नीले टॉप को पसंद कर दिया। उसके बाद गुरनूर ने रावी से पूछा, “इसके साथ जींस कौन सी पहनू। ब्लू या ब्लैक?” 


“ब्लैक कलर की।” रावी ने कहा और अपने पहनने के लिए भी कपड़े देखने लगी। 


श्रेयांश गुरनूर को छह बजे लेने आने वाला था इसलिए उसने रावी के साथ चार बजे से तैयार होना शुरू कर दिया। तैयार होने के बाद वो दोनों श्रेयांश के फोन का इंतज़ार करने लगी क्योंकि वो विवेक के साथ उन दोनों को लेने आने वाला था। 


थोड़ी देर बाद ही गुरनूर को श्रेयांश का फोन आ गया और वो सबसे मिलकर रावी के साथ घर से बाहर आ गई। वो दोनों चलकर कॉलोनी से बाहर आ गई जहाँ श्रेयांश और विवेक उन दोनों का इंतज़ार कर रहे थे। 


श्रेयांश की नज़र जब गुरनूर पर गई तो वो उसे देखता ही रह गया। गुरनूर बहुत ही ज्यादा खूबसूरत लग रही थी। गुरनूर श्रेयांश के करीब आकर उसके गले लग गई। विवेक ने ये देखा तो उसने श्रेयांश को मुस्कुराकर देखते हुए आँख मार दी जैसे कहना चाहता हो की ये होते है गर्लफ्रेंड होने के मज़े पर श्रेयांश ने उसके ऊपर ध्यान नहीं दिया क्योंकि उसे पता था की गुरनूर ने उसे मोहब्बत में गले लगाया है और यही वजह थी जो गुरनूर के गले लगते ही उसे सुकून और घबराहट एक साथ महसूस होती थी। गुरनूर की मोहब्बत उसके लिए सुकून तो थी पर इसी मोहब्बत के एहसासों से उसे घबराहट भी होती थी ये सोचकर की वो गुरनूर के जज़्बातों के साथ खेल रहा है। 


गुरनूर ने श्रेयांश से दूर होकर विवेक को हेलो कहा। श्रेयांश ने भी रावी को हेलो कहा। गुरनूर श्रेयांश के पीछे उसकी बाइक पर बैठ गई। उसने रावी को देखा और कहा, “तुम भी विवेक के पीछे बैठ जाओ।”


रावी भी विवेक के पीछे आकर बैठ गई और उसने विवेक को कमर से पकड़ लिया। रावी के ऐसा करने से विवेक को बहुत अलग सा एहसास हुआ। विवेक, जो लड़कियों के साथ प्यार के नाम पर सिर्फ टाइमपास करता था, आज उसे रावी के साथ कुछ अलग ही एहसास महसूस हो रहा था। ये एहसास इतना मजबूत था की उसके मन में इश्क़ के ख्याल आने लगे। श्रेयांश ने बाइक स्टार्ट कर आगे बढ़ा दी। उसे जाते हुए देख विवेक ने अपने मन में चल रहे सारे ख्यालों को झटका और बाइक स्टार्ट कर आगे बढ़ा दी। 


वो सभी पार्टी में पहुँचे। ये पार्टी इंदौर के बहुत ही फेमस क्लब के अंदर थी। गुरनूर और रावी जैसे ही श्रेयांश और विवेक के साथ अंदर गई, दोनों ही हैरान रह गई। क्लब में कुछ लड़के लड़कियाँ नाच रहे थे तो कुछ साथ बैठे हुए ड्रिंक्स कर रहे थे। लड़कियाँ भी ड्रिंक कर रही थी जिसे देखकर गुरनूर और रावी को और ज्यादा हैरानी हुई। वो दोनों हैरानी से अपने चारों तरफ देख रही थी क्योंकि दोनों ही ऐसी किसी जगह पर पहली बार आई थी।


श्रेयांश गुरनूर का हाथ पकड़कर उसे ड्रिंक्स वाले एरिया की तरफ ले आया। विवेक ने भी ऐसा ही किया और रावी ने उसे रोका भी नहीं क्योंकि अपनी हैरानी के चलते उसने इस बात पर ध्यान ही नहीं दिया था की विवेक ने इसका हाथ पकड़ा है। 


श्रेयांश ने बार टेंडर से कुछ कहा और वहीं खड़े होकर इंतजार करने लगा। विवेक भी रावी को लेकर उसके पास आकर खड़ा हो गया। रावी सामने देख रही थी लेकिन गुरनूर ने पीछे मुड़कर क्लब में नाच रहे लड़के लड़कियों को देखा जो एक दूसरे से चिपक पर नाच रहे थे। गुरनूर ने उनसे नज़रें हटाकर सामने देखा तो श्रेयांश उसके लिए ड्रिंक लेकर खड़ा हुआ था। उस ड्रिंक को देखकर गुरनूर ने कहा, “मैं ड्रिंक नहीं करती।” 


श्रेयांश ने गुरनूर और रावी, दोनों को देखकर कहा, “दोनों अनकंफर्टेबल मत हो। मैं और विवेक हैं यहाँ तुम्हारे साथ और मैं जानता हूँ तुम दोनों ड्रिंक नहीं करती इसलिए ये सॉफ्ट ड्रिंक्स है। इन्हें पी सकती हो तुम दोनों।” 


रावी के हाथ में तो पहले से ही गिलास था। गुरनूर ने श्रेयांश के हाथ से गिलास ले लिया और धीरे धीरे पीने लगी। श्रेयांश ने भी अपनी ड्रिंक उठाते हुए गुरनूर को देखकर कहा, “मैं विवेक के साथ अपने दोस्तों से मिलने जा रहा हूँ। तुम रावी के साथ यहीं खड़ी रहना। इधर उधर मत जाना।” 


गुरनूर ने हाँ में सिर हिला दिया। श्रेयांश विवेक के साथ अपने दोस्तों के पास चला गया। गुरनूर रावी से थोड़ी बहुत बातें करने लगी। विवेक ने जब अपने दोस्तों को दूर से ही गुरनूर को दिखाया तो सभी श्रेयांश को छेड़ने लगे और उसके दोस्त रवि ने उससे कहा, “भाई, तू हम सबको मिलवाएगा नही उससे। बस दूर से दिखा दी कौन है।”


“नही, वो पहली बार यहाँ आई है इसलिए थोड़ी अनकंफर्टेबल है। तुम लोगों को ऐसे उसके पास लेकर जाऊॅंगा तो वो और ज्यादा अनकंफर्टेबल हो जाएगी।” श्रेयांश ने कहा तो विवेक ने उसे शक भरी नज़रों से देखते हुए कहा, “तुझे बड़ी फिक्र है उसकी और तू इतना तक समझ गया की वो अनकंफर्टेबल है।” 


“फीलिंग जो भी हो। इस वक्त वो मेरी रिस्पांसिबिलिटी है।” श्रेयांश ने कहा तो विवेक खामोश हो गया। 


श्रेयांश अपने दोस्तों से बातें कर रहा था पर उसकी नज़रें गुरनूर के ऊपर ही थी। बातें करते हुए उसकी नज़र क्लब के कोने में खड़े दो लड़कों पर गई। उनमें से एक लड़का गुरनूर को ही देख रहा था। श्रेयांश ने एक नज़र गुरनूर को देखा और फिर उसने वापिस से उस लड़के को देखा तो इस बार वो लड़का गुरनूर को देखते हुए अपनी गर्दन पर हाथ फेर रहा था। 


ये देख श्रेयांश को गुस्सा आ गया पर उसने अपने गुस्से को काबू में रखने की कोशिश की क्योंकि वो वहाँ कोई तमाशा नहीं करना चाहता था। 


गुरनूर को बिल्कुल अकेला समझकर वो लड़का उसके करीब गया और उसने साइड से अपने हाथ को गुरनूर के हाथ से छुआ। ये देखकर श्रेयांश को अब और ज्यादा गुस्सा आ गया और वो गुस्से से उस लड़के की तरफ बढ़ गया।


Continued In आर्ज-ए-इश्क - 17

Wednesday, 19 August 2026

आर्ज-ए-इश्क - 15

 


श्रेयांश के दिल और दिमाग के बीच में जंग चल रही थी क्योंकि उसे लग रहा था वो गुरनूर के साथ गलत कर रहा है और ये होना ही था क्योंकि बेशक उसका साथ विवेक जैसे दोस्तों का हो पर उसके अंदर संस्कार तो उसकी माँ के दिए हुए थे जो उसे ये इजाजत नही देते थे की वो किसी लड़की के दिल के साथ खेले पर इस वक्त वो विवेक के प्रभाव में भी था जो उसे गुरनूर के साथ सीरियस होने की इजाज़त नही देता था। 


ये सब सोचकर उसका मूड खराब हो चुका था पर उसने इस बारे में गुरनूर से कुछ भी कहना ठीक नही समझा क्योंकि वो गुरनूर के साथ पहली बार ऐसे डेट पर आया था इसलिए वो उसका भी मूड खराब नही करना चाहता था। 


रास्ते भर बस गुरनूर बिना कुछ कहे श्रेयांश की करीबियों के एहसास को महसूस करती रही। थोड़ी देर बाद श्रेयांश ने बाइक एक बहुत ही खूबसूरत जगह पर लाकर रोकी। 


इस जगह पर काफी हरियाली थी जिसे देखकर गुरनूर को अच्छा लग रहा था। बाइक से उतरकर गुरनूर उस जगह को देखने लगी। वो सच में बहुत खुश थी। श्रेयांश भी बाइक पार्क कर उसके पास आया और उसने थोड़ा जबरदस्ती गुरनूर के आगे मुस्कुराने का नाटक करते हुए कहा, “चले अंदर।”


श्रेयांश अपने खराब मूड के चलते गुरनूर के आगे जबरदस्ती मुस्कुराने की कोशिश कर रहा था पर गुरनूर ने अपनी खुशी के चलते इस बात पर ध्यान ही नही दिया। 


श्रेयांश गुरनूर को नीचे ले आया जहाँ सामने एक बहुत ही खूबसूरत झरना था। इस झरने का नाम पातालपानी झरना था। उस झरने को देखकर गुरनूर और ज्यादा खुश हो गई क्योंकि उसने पहली बार अपनी जिंदगी में झरना देखा था। ऊपर से वो श्रेयांश के साथ थी। गुरनूर ने मुस्कुराते हुए श्रेयांश का हाथ थाम लिया पर श्रेयांश को गुरनूर की मुस्कुराहट और गुरनूर का इस तरह से उसका हाथ पकड़ना बेचैन कर रहा था। उसने गुरनूर से कुछ नही कहा, बस चुपचाप उसके साथ चलता रहा। वहीं गुरनूर को भी खामोशियाँ ज्यादा भा रही थी। 


वो श्रेयांश के साथ पातालपानी झरना घूम रही थी की तभी उसने एक प्रेमी जोड़े को देखा। उन्हें देखकर ऐसा लग रहा था जैसे उनकी नई नई शादी हुई है। उसने उन्हें श्रेयांश को दिखाते हुए कहा, “श्रेयांश, शादी के बाद हम भी इतने ही अच्छे लगेंगे न साथ में।” 


श्रेयांश का मूड तो आगे ही खराब था। उसे गुरनूर की ये बात सुनकर गुस्सा भी आने लगा जिसे उसने कंट्रोल करते हुए प्यार से गुरनूर को समझाने के लिए कहा, “गुरनूर, तुम ये शादी के बेफिजूल ख़्वाब देखना बंद करो अभी के लिए। मैं इन सब के लिए न अभी तैयार हूँ और न ही इन सब के बारे में सोचना चाहता हूँ। वैसे भी, तुम शायद हमारे रिलीजियस और कल्चरल डिफरेंस को नही देख पा रही हो।” 


श्रेयांश ने ये बात इस अंदाज में कही की गुरनूर उसके खराब मूड को समझ ही नही पाई। उसने इस बात पर भी ध्यान नही दिया की श्रेयांश ने अपनी बात में उर्दू के शब्दों का इस्तेमाल किया है। गुरनूर ने मुस्कुराते हुए श्रेयांश को देखा और कहा, “क्या तुमने ये सब मुझसे अपनी मोहब्बत का इजहार करते वक्त देखा था?” 


श्रेयांश के पास गुरनूर के इस सवाल का कोई जवाब नही था इसलिए वो खामोश रहा। उसे खामोश देखकर गुरनूर ने धीरे से उसके करीब आकर उसकी आँखों में देखते हुए कहा, “मेरा दीन और धर्म अब सिर्फ इश्क़ है। वो इश्क़ जिसमें मैंने तुम्हारा सब कुछ अपना बना लिया है। मैं तुम्हारे साथ सबसे पहले रूह के फेरे ले चुकी हूँ। कौन अलग कर सकता है हमें।” 


“फिर भी मेरी दुनिया तुम्हारी दुनिया से अलग है।” श्रेयांश ने भी उसकी आँखों में देखते हुए कहा तो गुरनूर ने मुस्कुराकर कहा, “तो फिर दिखाओ कैसी है तुम्हारी दुनिया। तुम्हारी दुनिया का ही तो हिस्सा बनना है मुझे।”


“ये पागलपन है, गुरनूर।” श्रेयांश ने उससे दूर होते हुए गुस्से के साथ थोड़ा तेज आवाज़ में कहा। 


गुरनूर ने उसे प्यार से देखते हुए कहा, “ये मेरा विश्वास है जिसकी वजह से मैं तुम्हें रोज़ भगवान से जाकर माँगती हूँ।”


“ये पागलपन है सिर्फ। ऐसा कुछ नहीं होता।” श्रेयांश ने फिर गुस्से से कहा तो गुरनूर ने कहा, “प्यार में पागलपन भी जरूरी होता है। तुम्हें मेरे जैसी मिलेगी क्या कहीं। अब बताओ कब दिखा रहे हो अपनी दुनिया मुझे।”


श्रेयांश को समझ आ गया की अपने इश्क़ के आगे गुरनूर कुछ और नहीं समझने वाली इसलिए उसने अपने गुस्से को शांत करते हुए कहा, “मेरी दुनिया देखने के लिए तुम्हें शाम में आना होगा।”


“मैं संडे की शाम को आ जाऊँगी घर पर कोई बहाना बनाकर।” गुरनूर ने खुश होते हुए कहा। 


शाम होने से पहले पहले श्रेयांश ने गुरनूर को घर छोड़ने के लिए बाइक रावी के घर से थोड़ी ही दूरी पर रोकी। गुरनूर ने बाइक से उतरकर मुस्कुराते हुए श्रेयांश को देखा और उसके गले लग गई। श्रेयांश को गुरनूर के ऐसे गले लगाने से बेचैनी तो हो रही थी पर फिर भी उसने गुरनूर को गले से लगा लिया। थोड़ी देर बाद गुरनूर वहाँ से घर के अंदर चली गई। 


रात में गुरनूर ने रावी को अपने और श्रेयांश के बीच हुई बातों के बारे में बताया जिसपर रावी ने कहा, “वो सब तो ठीक है लेकिन घर में मम्मी पापा से क्या कहकर जाएँगे।”


“अब कोई बहाना तो बनाना ही पड़ेगा उनके आगे।” गुरनूर ने धीरे से रावी को देखते हुए कहा। दोनों ने बेड पर लेटकर थोड़ी देर तक इस बारे में बात की और फिर सो गई। 


संडे वाले दिन सुबह सुबह सभी नाश्ता कर रहे थे। गुरनूर ने रावी को देखा तो रावी ने अपनी पलकें झपकाई और फिर शुभम को देखकर कहा, “पापा, आपसे परमिशन चाहिए थी।” 


“किस लिए?” शुभम ने चाय पीते हुए उससे पूछा तो रावी ने कहा, “वो पापा मेरे कॉलेज की फ्रेंड थी ना, राशि। वो यहीं आकर सैटल हो गई थी अपनी फैमिली के साथ। उसने और मैंने मिलकर मूवी देखने का प्लैन बनाया है। मैं गुरनूर को भी अपने साथ ले जाना चाहती हूँ। ये घर पर अकेले मेरे बिना क्या करेगी न। तो अगर आप परमिशन दे देते तो हम दोनों चले जाते। आई प्रॉमिस हम दोनों दस बजे तक घर आ जाएँगे।” 


शुभम ने पहले एक नजर गुरनूर को देखा, जो चुपचाप अपना नाश्ता कर रही थी और फिर रावी को देखकर कहा, “ठीक है। तुम दोनों चली जाना और टाइम से घर वापिस आ जाना। कोई प्रॉब्लम हो तो मुझे या नील को फोन कर देना।” 


शुभम ने जैसी ही हाँ कहा, गुरनूर मन ही मन में खुश हो गई पर उसने अपनी खुशी अपने चेहरे पर नही आने दी। शुभम से परमिशन मिलने के बाद उसकी एक्साइटमेंट बढ़ गई थी। वो सच में श्रेयांश की दुनिया को देखने और उसका हिस्सा बनने के लिए काफी एक्साइटेड थी। उसे ये भी नही पता था की श्रेयांश की दुनिया उसे पसंद आएगी या नहीं। वो तो बस इतना जानती थी की अपनी मोहब्बत में वो श्रेयांश की दुनिया को भी अपना बना लेगी।


Continued In आर्ज-ए-इश्क - 16