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Monday, 21 September 2026

आर्ज-ए-इश्क - 22



लड़के वाले आ गए तो विक्रम और नीत ने अच्छे से उनका स्वागत किया। थोड़ी देर बातें करने के बाद विक्रम ने शीतल से कहा, “जाओ गुरनूर को ले आओ।” 


शीतल ऊपर गुरनूर के कमरे में आई तो देखा गुरनूर अपनी डायरी में कुछ लिख रही थी। उसने बस सूट पहनकर अपने बालों को सही किया हुआ था। उसके चेहरे पर कोई मेकअप नही था और न ही उसने अपने कानों या हाथों में कुछ पहना हुआ था। उसे ऐसे देखकर शीतल ने कहा, “गुरनूर, लड़के वालों के सामने जाने के लिए कोई ऐसे तैयार होता है। कानों में तो कम से कम कुछ पहन लो।” 


“मम्मी, मैं कोई खरीदा या बेचे जाने वाला सामान नही हूँ जिसे आप किसी के सामने बिना मेंटेन किए प्रेसेंट करदेंगी तो वो खरीदने से मना करदेंगे। इंसान हूँ मैं और मुझे ऐसे ही रहना पसंद है। मैं नीचे जा रही हूँ ना आपके साथ। यही बहुत है। पहले ही कह रही हूँ मुझसे और कोई उम्मीद मत रखना।” गुरनूर ने अपनी डायरी बंद कर उसे बेड पर रखते हुए गुस्से में कहा। 


“ठीक है। चलो।” कहते हुए शीतल गुरनूर को नीचे ले आई। गुरनूर ने बेमन से सबको नमस्ते कहा और एक कुर्सी पर बैठ गई। उसने किसी को भी आँख उठाकर देखा तक नही। उसे देखकर लड़के की माँ ने नीत से कहा, “लगता है इसे ज्यादा सजने संवरने का शौंक नही है।” 


नीत ने शीतल को गुस्से से देखा और फिर लड़के की माँ से कहा, “जी, इसे सादगी ज्यादा पसंद है।”


“मेरे बेटे को तो गुरनूर तस्वीर देखते ही पसंद आ गई थी। आप गुरनूर से उसकी मर्जी पूछ लीजिए। अगर उसे भी मेरा बेटा पसंद है तो आज ही रिश्ता पक्का कर देते है।” लड़के की माँ ने मुस्कुराते हुए कहा।


“जी, ज़रूर।” कहते हुए विक्रम खड़े हुए और शीतल के साथ गुरनूर को वहाँ से अपने कमरे में ले आए। उन्होंने गुरनूर से उसकी मर्ज़ी पूछी तो गुरनूर ने गुस्से में कहा, “पापा, मैंने नही करनी शादी। आप मना कर दीजिए सबको। बुआ को भी।” 


गुरनूर कमरे से बाहर निकलकर ऊपर अपने कमरे में चली गई। नीत ने उसे ऊपर जाते हुए देखा तो उसने विक्रम के कमरे में आकर पूछा, “क्या कहा गुरनूर ने?” 


“वो अभी शादी के लिए तैयार नही है, दीदी।” विक्रम ने कहा तो नीत ने उसके कंधे पर हाथ रखकर उसे समझाते हुए कहा, “विक्रम, वो तो बच्ची है। मना करेगी ही। तुम तो समझदार हो ना। उसे समझाओ। इतना अच्छा लड़का और परिवार है। उसकी जिंदगी बन जाएगी। वो लोग रोके की तैयारी करके आए है। मैं तो कहती हूँ अभी रोका करदो। एक बार रोका हो जाएगा तो अपने आप मान जाएगी तुम्हारी गुरनूर।” 


विक्रम ने कुछ सोचा और कहा, “शायद आप ठीक कह रही है, दीदी। रोका कर देते है। गुरनूर मान जाएगी।” 


विक्रम की बात सुनकर शीतल हैरान रह गई। नीत ने मुस्कुराते हुए शीतल को देखा और कमरे से बाहर चली गई। उसके जाते ही शीतल ने गुस्से में विक्रम से कहा, “आपका दिमाग तो नही खराब हो गया, विक्रम। आप देख पा रहे है की मेरी बेटी ये शादी नही करना चाहती, फ़िर भी आप अपनी बहन की बातों में आकर मेरी बेटी का रोका करने की बात कर रहे है। अरे आपकी ये बहन तो चाहती ही यही है कि इस घर में जितने फैसले हो, वो वही ले। उन्हें बस अपने भाई के घर में भी अपनी हुकुमत चाहिए और आप उनकी बातों में आ भी जाते है।” 


विक्रम खामोश रहा क्योंकि वो जानता था शीतल का गुस्सा जायज़ है क्योंकि वो झूठ नहीं बोल रही थी। उसे खामोश देख शीतल ने कहा, “आपको मेरी बेटी का जबरदस्ती रिश्ता तय करना है। कर दीजिए लेकिन अगर गुरनूर ने इस शादी से बचने के लिए कल को कोई भी ऐसा वैसा कदम उठाया तो मुझे मत कहना। इसके जिम्मेदार आप खुद होंगे और आपकी बहन।” 


शीतल भी गुस्से से कमरे से निकल गई। नीत ने शीतल से गुरनूर को नीचे लाने के लिए कहा तो शीतल गुरनूर को समझाकर नीचे ले आई और देखते ही देखते गुरनूर का रोका हो गया। जिस लड़के से उसका रोका हुआ था, वो तो गुरनूर को ही देखे जा रहा था पर इस सबके बीच गुरनूर बस खामोशी से बैठी रही। 


लड़के वालों के जाने के बाद गुरनूर ने अपने कमरे में जाकर गुस्से में वो सारा सामान ज़मीन पर फैंक दिया जो लड़के की माँ ने उसे दिया था। गुरनूर ने अपना कमरा बंद करके रावी को फोन लगाया और उसे इस बारे में सब कुछ बता दिया। 


रावी को ये सब जानकर एक झटका सा लगा और उसने कहा, “विक्रम अंकल तुम्हारे साथ ऐसा नही कर सकते। 


“पर ऐसा कर दिया है उन्होंने रावी।” गुरनूर ने गुस्से में कहा। उसकी आवाज़ में गुस्सा महसूस कर रावी ने कहा, “तुम शांत हो जाओ, गुरनूर।” 


उसकी बात सुनकर गुरनूर ने कहा, “कैसे शांत हो जाऊॅं, रावी। तुम जानती हो ना मैं श्रेयांश…” 


कहते कहते गुरनूर रुक गई तो रावी ने कहा, “मैं श्रेयांश को बताऊँ इस बारे में। वो जरूर कुछ करेगा तुम्हारे लिए।” 


“नहीं, मैं श्रेयांश को नहीं बता सकती। वो शो का कॉन्ट्रैक्ट मिलने की वजह से इतना खुश है और अपने वीज़ा प्रोसेस वैगरह में बिजी है।  मैं उसकी खुशी खराब नहीं करना चाहती।” गुरनूर ने कहा तो रावी ने कहा, “तो तुम्हारी खुशी भी तो श्रेयांश ही है गुरनूर।” 


गुरनूर ने कुछ नही कहा और फोन काट दिया। रावी गुरनूर के लिए परेशान हो गई पर वो कुछ भी नहीं कर सकती थी। श्रेयांश को बताने के लिए भी उसे गुरनूर ने मना कर दिया था। 


वहीं जब विक्रम ने शुभम और मधु को गुरनूर का रिश्ता पक्का हो जाने के बारे में बताया तो वो दोनों भी हैरान रह गए और मधु का दिल टूट गया। वो दोनों इस वक्त अपने कमरे में बैठे हुए थे। मधु ने रोते हुए शुभम से कहा, “आपने मुझसे कहा था की गुरनूर मेरी बहु बनकर मेरे पास आ जाएगी तो उसका रिश्ता कहीं और कैसे हो सकता है। आपने जब मुझसे कहा की हम गुरनूर को अपनी बहु बनाकर इस घर में हमेशा हमेशा के लिए ले आयेंगे तो कितना खुश थी मैं लेकिन अब देखिए, गुरनूर किसी और की बहु बनेगी।” 


शुभम ने जैसे ही मधु को समझाने के लिए कुछ कहना चाहा, मधु ने कहा, “मुझे कुछ नहीं पता। आप अभी विक्रम भैया से बात करकर गुरनूर का रिश्ता माॅंगिए नील के लिए।” 


शुभम जानते थे की मधु अब जिद्द कर रही है पर उन्हें ये भी समझ थी की मधु की जिद्द पूरी करने के लिए वो ऐसे ही विक्रम को फोन कर उन्हें गुरनूर का रिश्ता तोड़ने के लिए तो नही कह सकते थे। उन्हें बस इतना मालूम था की उन्हें इस वक्त मधु को कुछ भी करके समझाना पड़ेगा। 


Continued In आर्ज-ए-इश्क - 23

Monday, 14 September 2026

आर्ज-ए-इश्क - 21


 

लंबे सफर के बाद वो सभी दिल्ली पहुँच गए। गुरनूर ने अपना बैग खुद उठा लिया क्योंकि नील अर्पिता के बैग्स उठाना चाहता था। वो सभी स्टेशन से बाहर आ गए। गुरनूर रावी के साथ एक जगह जाकर खड़ी हो गई और नील ने अर्पिता के बैग्स थोड़ी दूरी पर नीचे रखे। अर्पिता को आखिरी बार देखकर नील गुरनूर और रावी के पास आ गया। जैसे ही वो उन दोनों के पास आया, रावी ने उसे देखकर कहा, “अब उनसे इतनी बातें कर ली है तो स्पेशल वाला बाय बोलना तो उन्हें बनता है। जाइए, स्पेशल वाला बाय बोल दीजिए भैया।” 


रावी की बात सुनकर नील के चेहरे पर मुस्कुराहट आ गई। वो मुस्कुराते हुए अर्पिता के पास जाने के लिए जैसे ही मुड़ा, हैरान रह गया क्योंकि अर्पिता उसके पास आ रही थी। उसे आता हुआ देखकर गुरनूर ने नील से कहा, “लीजिए नील, आप क्या जायेंगे। वही आपके पास आ रही है।” 


अर्पिता ने उनके पास आकर नील से कहा, “वो मैं बाय बोलने आई थी और थैंक यू भी। आपने बहुत हेल्प की है आज मेरी।” 


“बाय क्यों कह रही है, आप। अब बातें और मुलाकातें तो होती ही रहेंगी।” नील ने अर्पिता को देखते हुए कहा, जिसे सुनकर रावी और गुरनूर ने एक दूसरे को देखा। अर्पिता भी इंदौर से ही थी बस कुछ वक्त के लिए दिल्ली में होस्टल में रहकर पढ़ने आई थी।


अर्पिता से मिलकर वो सभी घर आ गए। विक्रम और शीतल ने जैसे ही उन तीनों को देखा, वो खुश हो गए। विक्रम ने प्यार से गुरनूर को गले लगाकर उसके माथे पर किस करते हुए पूछा, “ठीक है मेरी प्रिंसेस?” 


“जी, पापा।” गुरनूर ने कहा और फिर शीतल के गले लग गई। विक्रम ने नील को भी गले लगाया और प्यार से रावी के सिर पर हाथ फेरा। 


विक्रम और शीतल चाहते थे की रावी और नील थोड़े दिन रूके लेकिन नील के काम की वजह से उन्हें अगले दिन ही इंदौर वापिस जाना पड़ा। 


गुरनूर श्रेयांश के साथ फिर से लॉन्ग डिस्टेंस निभाने लग गई और इस बीच श्रेयांश को भी अपने करियर का सबसे बड़ा मौका मिला जिसमें उसे पूरे तीन साल तक एक कंपनी के लिए भारत से बाहर परफॉर्म करना था। वो किसी भी हालत में ये मौका छोड़ना नहीं चाहता था।


जब उसने गुरनूर को बताया की उसे आगे बढ़ने का इतना अच्छा मौका मिल रहा है तो गुरनूर बहुत ही ज्यादा खुश हो गई। 


एक शाम गुरनूर ओपन माइक इवेंट से वापिस आई तो उसने देखा कि घर पर उसकी बुआ, नीत आई हुई है और घर पर ऐसे तैयारिययाँ हो रही हैं जैसे कोई खास मेहमान आने वाला है। नीत से मिलकर उसने किचन में काम कर रही शीतल के पास आकर पूछा, “ये सब क्या हो रहा है, मम्मा?” 


“तुम तैयार हो जाओ जाकर अच्छे से।” शीतल ने नीत के लिए चाय बनाते हुए कहा। 


“पर क्यों मम्मा? बुआ के आने पर मुझे तैयार होने की क्या जरूरत है?” गुरनूर ने हैरानी से पूछा तो शीतल ने उसे देखकर कहा, “तुम्हें लड़के वाले देखने आ रहे है। तुम्हारी बुआ रिश्ता लाई है तुम्हारे लिए।” 


ये सुनकर गुरनूर की आँखों के सामने श्रेयांश का चेहरा आ गया। उसे हैरानी के साथ साथ गुस्सा भी आने लगा और उसने कहा, “पर मम्मी मेरा करियर बनाना रहता है अभी।” 


शीतल कुछ कहती उससे पहले ही नीत ने अंदर आते हुए कहा, “ये करियर का रोना सही है तुम लड़कियों का जबकि इसका फायदा कुछ नही है। घर तो तुम्हें फिर भी संभालना पड़ेगा तो अच्छा है तुम इसी पर ध्यान दो और अपनी मम्मी से घर संभालना सीखो।” 


नीत की बातों ने गुरनूर ने गुस्से को बढ़ा दिया और उसने नीत को देखते हुए कहा, “ये करियर का फायदा और नुकसान तो आप मुझे मत ही बताए क्योंकि आपको अगर इसका फायदा पता होता तो आप अपनी बेटी के करियर पर ध्यान ज़रूर देती जिससे वो अपनी दर्दनाक शादीशुदा जिंदगी से आज़ाद हो पाती लेकिन अफ़सोस आपने उसके घर संभालने पर ज्यादा तवज्जो दी जिससे अब वो उसी लायक रह गई है बस। खुद की बेटी की तो वो हालत कर दी है, दूसरो की बेटी की भी अब वैसी ही हालत चाहती है आप।” 


गुरनूर की बातों से नीत को कहीं न कहीं ये एहसास हो गया था की उसने अपनी बेटी के साथ क्या किया है। गुरनूर की कही बातें कड़वी ज़रूर थी पर सच थी। शीतल ने जब देखा की गुरनूर नीत के आगे ज्यादा बोल रही है तो उसने गुरनूर को शांत करते हुए कहा, “गुरनूर, बुआ से ऐसे बात नही करते। अब हमने उन्हें बुला लिया है ना तो तुम बस एक बार उस लड़के से मिल लो। मिलने में क्या जाता है। पसंद आया अगर हमें तो ही शादी की बात होगी ना। जाओ जाकर तैयार हो जाओ।” 


“सही कहा मम्मी आपने ऐसे बात नही करते बड़ो से पर कई बार न अपने लिए बड़ो को जवाब देना ज़रूरी हो जाता है वरना वो हमारी जिंदगी को अपना बनाकर हमारे लिए खुद से फैसले करने लग जाते है ये सोचते हुए की हम तो बच्चे है, जो वो कहेंगे, हम उसे चुपचाप मान लेंगे।” गुरनूर ने नीत को देखते हुए कहा और फिर तैयार होने ऊपर अपने कमरे में चली गई। 


उसके जाते ही नीत ने शीतल से कहा, “ये सिखाया है भाभी आपने इसे। जुबान चलाना। ससुराल में जाकर यही करेगी क्या।” 


शीतल ने कुछ नही कहा क्योंकि उसे पता था गुरनूर भी गलत नहीं है। शीतल भी नीत की बातों में कम आती थी क्योंकि उसे मालूम था की नीत बस अपने भाई के घर में भी अपनी हुकुमत चाहती है और पूरे घर में एक विक्रम ही है जो नीत की बातों में आ जाता है। 


गुरनूर ने गुस्से से अपने कमरे में आकर अपना बैग बेड पर फैंका और उसपर बैठ गई। उसने अपना गुस्सा थोड़ा सा शांत करने की कोशिश की। थोड़ी देर ऐसे ही बैठे रहने के बाद गुरनूर ने उठकर अलमारी से अपने लिए अनारकली सूट निकाला और उसे पहनकर ये दुआ करते हुए तैयार होने लगी की वो उस लड़के और उसके परिवार को बिल्कुल भी पसंद न आए।


Continued In आर्ज-ए-इश्क - 22

लव आजकल - 2


 

कॉलेज में सभी लड़के इशिका के पीछे पड़े हुए थे। वो जब से कॉलेज में आई थी, रोज उसे हर कोई अलग अलग तरीकों से इंप्रेस करने की कोशिश में लगा हुआ था। कोई उसे अलग अलग गिफ्ट्स दे रहा था तो कोई उसे सीधा कॉफी डेट पर ले जाने के लिए कह चुका था। कई लड़के तो उसे लव नोट्स लिखकर भी भेज रहे थे। इशिका इन सब से सच में बहुत परेशान हो चुकी थी लेकिन वो किसी की भी शिकायत नही करना चाहती थी।


वही दूसरी तरफ विहान भी अभय से इस बारे में बात कर रहा था की वो इशिका को कैसे इंप्रेस करे। विहान ने जब बताया की उसे इशिका पहली नजर में ही पसंद आ गई है तो अभय ने कहा, “मुझे पता था की तुझे भी इशिका जरूर पसंद आएगी। पूरा कॉलेज उसके पीछे दीवाना हो रखा है।” 


“बेशक पूरा कॉलेज उसके पीछे दीवाना है लेकिन वो सिर्फ तेरे भाई के पीछे दीवानी होगी। देखता जा बस तू।” विहान ने कहा।


“पर भाई तू उसे इंप्रेस कैसे करेगा? पिछले दिनों में बहुत लड़कों ने उसे इंप्रेस करने की कोशिश की है अलग अलग तरीकों से लेकिन वो किसी से भी इंप्रेस नही हुई।” अभय ने उसे देखते हुए कहा।


ये सुनकर विहान मुस्कुराया और उसने कहा, “क्योंकि वो तेरे भाई से इंप्रेस होगी।” 


“उसे इंप्रेस करने के लिए तुझे बहुत पापड़ बेलने पड़ेंगे। इतनी आसानी से इंप्रेस नही होगी वो। उसे देखकर लगता है की उसे एक्सपेंसिव गिफ्ट्स देकर इंप्रेस करना होगा।” अभय ने कहा। 


“करूंगा। उसके लिए सब कुछ करूंगा।” विहान ने कुछ सोचते हुए कहा। 


घर जाने से पहले विहान ने शॉपिंग मॉल जाकर इशिका के लिए एक प्यारी सी ड्रेस खरीदी और घर आ गया। उससे तो इंतजार नही हो रहा था की तब वो अगले दिन कॉलेज जाकर इशिका को ये गिफ्ट दे। 


अगली सुबह विहान इतनी जल्दी जल्दी नाश्ता करने में लगा हुआ था की खाते खाते खाना उसके गले में अटक गया और वो खांसने लगा। सिमरन ने जल्दी से उसे पानी देकर उसकी पीठ पर हाथ फेरते हुए कहा, “आराम से खाओ न विहान। तुम तो इतनी जल्दी खा रहे हो जैसे आज तुम्हारे कॉलेज में सबसे पहले आने का कंपटीशन है जिसमें तुम लेट पहुंचे तो लास्ट आ जाओगे।” 


“सॉरी मॉम।” विहान ने पानी पीकर कहा और आराम से खाने लगा। नाश्ता करकर वो जल्दी से कॉलेज के लिए निकल गया। उसे जाते देख सिमरन ने कहा, “पता नही इस लड़के को हो क्या गया है? आज से पहले तो ये कभी इतनी जल्दी कॉलेज नही जाता था।” 


“मुझे लगता है की हमारे बेटे को कोई लड़की पसंद आ गई है। पक्का प्यार का चक्कर है जो विहान आज इतनी जल्दी कॉलेज जाना चाहता था।” राज ने कहा। 


सिमरन ने उसे देखा और कहा, “कुछ भी मत कहो तुम। आज से पहले तो मैंने देखा नही की कोई लड़की विहान की दोस्त हो।” 


“अरे, बेटा तो हमारा ही है। जब हमें प्यार हो सकता है तो उसे किसी से प्यार क्यों नही हो सकता। भूल गई वो दिन जब हम भी एक दूसरे से मिलने के लिए जल्दी जल्दी कॉलेज आया करते थे।“ राज ने अपने कॉलेज के दिनों को याद करते हुए कहा। 


“वो सारे दिन तो मैं जिंदगी भर नही भूलूंगी।“ सिमरन ने मुस्कुराते हुए कहा।


“विहान के साथ पक्का लड़की का चक्कर है। प्यार हो गया है उसे। देख लेना तुम।“ राज ने कहा तो सिमरन ने कहा, “ऐसा कुछ हुआ तो विहान हमें बता ही देगा।” 


कॉलेज पहुंचकर विहान ने इशिका को ढूंढना शुरू कर दिया। थोड़ा ढूंढने के बाद इशिका उसे अपनी दोस्तों के साथ कॉलेज के गार्डन में खड़ी हुई दिखाई दी। 


विहान ने एक गहरी सांस ली और इशिका के पास आकर उसे हेलो कहा। इशिका ने उसे देखा और कहा, “मैं तुम्हारी क्या हेल्प कर सकती हूं।” 


अभय भी इस वक्त वहीं था और उन्हें छुपकर देख रहा था। विहान इशिका को सामने देखकर बिल्कुल भूल गया था की उसे इशिका से क्या कहना था। इशिका ने फिर से विहान से वही सवाल पूछा तो विहान ने बहुत हिम्मत करके इशिका के लिए लाई हुई ड्रेस अपने बैग से निकालकर उसे दी और कहा, “ये मैं तुम्हारे लिए लाया था। आई होप तुम्हें पसंद आएगी।” 


इशिका ने अपने हाथ में पकड़ी हुई ड्रेस को देखा और उसे विहान को वापिस देते हुए कहा, “मुझे इन सब में इंटरेस्ट नही है। ये ड्रेस तुम ही रखो।” 


इशिका वहां से अपने दोस्तों के साथ चली गई। विहान उसे जाता हुआ देख सोचने लगा की इशिका के कहने का मतलब क्या था। वो वही खड़ा ये सब सोच ही रहा था की तभी अभय उसके पास आया और उसने कहा, “तो मिस इशिका शर्मा की रिजेक्शन लिस्ट में तेरा नाम भी शामिल हो ही गया।” 


“ऐसा कुछ नही है। मैं उसे इंप्रेस करके रहूंगा। फिलहाल तू ये ड्रेस पकड़। अपनी गर्लफ्रेंड को दे देना।” कहते हुए विहान ने वो ड्रेस अभय को दे दी। 


“काशवी तो ये ड्रेस देखकर मुझसे इंप्रेस हो जाएगी पर इशिका तूझसे इंप्रेस होगी, ये मुझे फ्यूचर में नही होता हुआ नज़र आ रहा है।” अभय ने कहा। 


“तू मेरा दोस्त है या दुश्मन।” कहकर विहान आगे जाने लगा। 


अभय उसके पीछे आया और कहा, “मैं तेरा दोस्त ही हूं भाई। चल कैंटीन चलते है।” 


अगले दिन विहान ने इशिका को एक परफ्यूम गिफ्ट किया लेकिन इशिका ने उसे वो भी वापिस कर दिया। ऐसे करते करते विहान पूरे बीस दिन तक इशिका को कुछ न कुछ गिफ्ट देता रहा लेकिन इशिका को कोई फर्क ही नही पड़ा। अगर इन सब से किसी को फर्क पड़ा था तो वो था अभय क्योंकि जो गिफ्ट्स इशिका विहान को वापिस कर देती, वो उन्हें अभय को दे देता और अभय उन्हें आगे अपनी गर्लफ्रेंड को दे देता जिससे उसकी गर्लफ्रेंड उससे बहुत खुश हो जाती। 


विहान बहुत ही ज्यादा परेशान था ये सोचते हुए की अब ऐसा क्या करे जिससे इशिका इंप्रेस हो। उसे कुछ समझ नही आया तो उसने फैसला किया की इशिका को एक बार और कोई गिफ्ट देकर इंप्रेस करने की आखिरी कोशिश करेगा। वहीं इशिका इस वक्त अपनी दोस्तों के साथ अपने कमरे में बैठी हुई थी और वो सब विहान के बारे में ही बातें कर रही थी। 


“यार इशिका इतना अच्छा लड़का है वो। इतने एफर्ट्स कर रहा है तुम्हारे लिए। बाकी लड़को ने तो सिर्फ एक या दो दिन में ही हर मान ली लेकिन ये बेचारा पूरे बीस दिन से लगा हुआ है तुम्हें इंप्रेस करने में।” इशिका की बेस्ट फ्रेंड, काजल ने कहा। 


“लेकिन उसे वो करना चाहिए न जो मैं चाहती हूं।” इशिका ने कहा।


काजल ने उसे देखा और कहा, “ओह हो, इशिका। अब उस बेचारे को ख्वाब थोड़ी आएगा की आज के इस मॉडर्न जमाने में भी तुम नाइंटीज वाला ओल्ड स्कूल लव चाहती हो। ये तो तुम्हें ही उसे बताना होगा न।” 


इशिका विहान के बारे में सोचने लग गई।


Continued In लव आजकल - 3


Thursday, 10 September 2026

आर्ज-ए-इश्क - 20



श्रेयांश से मिलकर घर आने के बाद गुरनूर दिल्ली वापिस जाने के लिए पैकिंग कर रही थी की तभी रावी ने उसे पीछे से आकर गले लगा लिया और कहा, “मैं तुम्हें बहुत मिस करूँगी।” 

रावी की बात सुनकर गुरनूर बिना कुछ कहे मुस्कुरा उठी तो रावी ने बेड पर रखे हुए गुरनूर के कपड़ो को साइड कर वहाँ बैठते हुए कहा, “तुम मुझे मिस नहीं करोगी क्या या फिर तुम्हें बस श्रेयांश की याद ही आएगी?” 

गुरनूर ने उसके पास बैठकर अपनी दोनों बाहें साइड से उसके आसपास लपेटते हुए कहा, “मैं तुझे तो सबसे ज्यादा मिस करूँगी। तू मेरी बचपन की दोस्त ही नहीं, मेरी बहन भी है और तेरी जगह तो श्रेयांश भी नहीं ले सकता।”

“बस बस, ज्यादा मक्खन मत लगाओ मुझे।” रावी ने अपने दोनों हाथों से गुरनूर की बाजू को पकड़ते हुए कहा। वो दोनों वैसे ही बैठकर हँसते हुए बातें कर रही थी की तभी रावी के कमरे के बाहर से गुजरते हुए नील की नज़र उनके ऊपर गई। 

नील ने कमरे के अंदर आकर अपने हाथों से उनकी नज़र उतारते हुए कहा, “तुम दोनों बहनों में कितना प्यार है। किसी की नज़र ना लगे तुम दोनों को।” 

“हमें किसी की नज़र नही लगती।” रावी ने कहा। नील भी वहीं बैठ गया और गुरनूर उन दोनों से बातें करते हुए अपनी पैकिंग करने लग गई। 

अगली सुबह गुरनूर दिल्ली वापिस जाने के लिए तैयार थी। नील और रावी उसे छोड़ने जा रहे थे। गुरनूर जैसे ही मधु से मिली, मधु भावुक होकर रोने लगी क्योंकि ये पहली बार था जब गुरनूर इतने वक्त तक उनके साथ दिन रात रही थी। वैसे तो जब वो लोग दिल्ली में रहते थे तो बस गुरनूर दिन में एक बार कुछ वक्त के लिए ही आती थी। ज्यादातर रावी गुरनूर के घर पर उसके साथ रहती थी। अब जब मधु को गुरनूर को दिन रात देखने की आदत हो गई तो उसके वापिस जाने का समय आ गया। 

गुरनूर ने मधु को रोते हुए देखा तो उसे अच्छा नही लगा। उसने मधु के आँसू पोंछते हुए कहा, “आंटी, आप ऐसे रोने लगोगे तो मैं जा नहीं पाऊँगी। मैं आपसे वादा करती हूँ मैं बहुत जल्दी दोबारा आपके पास रहने आऊँगी।” 

मधु ने प्यार से गुरनूर के गाल को छूकर मुस्कुराते हुए हाँ में सिर हिला दिया। गुरनूर फिर शुभम से मिलकर नील और रावी के साथ घर से स्टेशन पहुँचने के लिए निकल गई। 

उसे जाता हुआ देखकर मधु फिर से थोड़ा इमोशनल हो गई। मधु को इमोशनल होता हुआ देखकर शुभम ने उसे कंधो से पकड़ा और कहा, “अरे भाग्यवान, इतना रोने की क्या जरूरत है। अगर तुम्हें गुरनूर से इतना ही प्यार है तो हम उसे हमेशा के अपना बनाकर इस घर में ले आते है। हम विक्रम से नील के लिए गुरनूर का हाथ माॅंग लेंगे।” 

“क्या सच में?” मधु ने खुश होकर कहा और फिर उदास होते हुए कहा, “पर अगर गुरनूर या नील नही माने तो?” 

“तुम अपने बेटे से पूछे बिना ही इस बात का अंदाजा कैसे लगा सकती हो। उससे उसकी पसंद पूछेंगे न हम। बस थोड़ा इंतजार करना होगा तुम्हें। नील की अभी अभी जॉब लगी है और गुरनूर भी अभी पूरी तरह से अपने करियर पर ध्यान दे रही है। एक बार उन दोनों को अपने अपने करियर में पूरी तरह से सैटल होने दो। उसके बाद मैं विक्रम से बात करूँगा।” शुभम ने कहा। उसकी बात सुनकर मधु ने मुस्कुराते हुए कहा, “ठीक है। अगर आप ये गारंटी दे की गुरनूर मेरी बहु बनकर इस घर में आएगी तो मुझे इंतजार करने में कोई दिक्कत नही।” 

“भगवान से प्रार्थना करो की ऐसा ही हो।” शुभम ने मधु के गाल को छूकर कहा और अपने काम पर जाने के लिए निकल गए। 

वहीं स्टेशन पहुँचकर नील, रावी और गुरनूर ट्रेन में अपनी सीट पर आकर बैठ गए। उनकी सीट दरवाज़े के पास ही थी। नील ने सामान रखकर गुरनूर और रावी को देखते हुए कहा, “तुम दोनों बैठो। मैं अभी आता हूँ।” 

नील को चलती हुई ट्रेन के दरवाज़े पर खड़े होना अच्छा लगता था इसलिए वो दरवाज़े पर आकर खड़ा हो गया। वो वहाँ खड़े होकर आसपास देख ही रहा था की तभी एक लड़की उसके सामने आई जिसने अपने हाथ में दो भारी भारी बैग पकड़े हुए थे। वो लड़की बहुत ज्यादा हाफ रही थी। नील ने उसे देखकर अंदाजा लगाया की शायद उसे स्टेशन छोड़ने कोई नहीं आया है इसलिए उसे अकेले ही दो भारी भरकम बैग उठाने पड़े जिसकी वजह से वो अब हाफ रही थी और लंबी सांसें ले रही थी। 

नील ने उसे देखकर कहा, “क्या मैं आपकी हेल्प करूँ।” 

उस लड़की ने नील को देखकर हाफते हुए कहा, “येस, प्लीज़।” 

नील ने ट्रेन से उतरकर उस लड़की के दोनों बैग ट्रेन में चढ़ाए। गुरनूर और रावी अपनी ही बातों में लगी हुई थी इसलिए उन्होंने नील की तरफ ध्यान नहीं दिया। उस लड़की के ट्रेन पर चढ़ने के बाद नील भी ट्रेन पर वापिस चढ़ गया। उस लड़की ने अपने बैग से निकालकर पानी पीया। नील तो लगातार उसे देखे जा रहा था।

रावी से बातें करते हुए गुरनूर की नज़र नील और उस लड़की पर गई तो वो हैरान हो गई। उसने नील की तरफ इशारा करते हुए रावी से कहा, “जरा उधर देखो।” 

नील को किसी लड़की के साथ देखकर रावी को भी बहुत ज्यादा हैरानी हुई। उस लड़की ने थोड़ा सा रिलैक्स होकर नील की तरफ अपना हाथ बढ़ाते हुए कहा, “थैंक यू, मेरी हेल्प करने के लिए।” 

नील ने उससे हाथ मिलाते हुए कहा, “वेलकम। चलिए आपको आपकी सीट तक छोड़ देता हूँ।” 

उसने लड़की ने अपने हाथ में पकड़ी टिकट में अपना सीट नंबर देखा और उस सीट पर आ गई जहाँ गुरनूर और रावी बैठी हुई थी। नील उसके बैग लेकर वहाँ आया और उसने हैरानी से उस लड़की को पूछा, “ये आपकी सीट है।” 

उस लड़की ने मुस्कुराकर कहा, “येस, वो विंडो वाली।” 

“फिर तो आप मेरे साथ ही बैठेंगी। आपके साथ वाली सीट मेरी ही है।” नील ने भी मुस्कुराते हुए कहा। रावी और गुरनूर उसे ही देख रही थी। गुरनूर ने थोड़ा शरारत से रावी को देखते हुए नील को सुनाने के लिए कहा, “रावी, इन दिनों लोगों के साथ इत्तेफाक बहुत होते है।” 

उस लड़की को गुरनूर की बात समझ नहीं आई लेकिन नील समझ गया की गुरनूर क्या कहना चाह रही है। वो लड़की नील को देखकर अपनी सीट पर बैठ गई। नील ने ध्यान से उसके बैग ऊपर रख दिए और फिर उसके पास आकर बैठ गया। 

उस लड़की ने अपना नाम नील को बताते हुए कहा, “मेरा नाम अर्पिता है।” 

नील ने भी उस लड़की को अपना नाम बताया और फिर रावी और गुरनूर की तरफ इशारा करते हुए कहा, “ये मेरी बहन है रावी और ये इसकी दोस्त है, गुरनूर।” 

अर्पिता ने रावी और गुरनूर से हेलो कहा तो दोनों मुस्कुरा उठी। थोड़ी देर में ट्रेन चलने लगी। नील का ध्यान बार बार अर्पिता की तरफ जा रहा था। अर्पिता भी बीच बीच में नील को देख लेती क्योंकि उसे नील का केयरिंग नेचर अच्छा लगा था। 

अर्पिता नील के साथ बीच बीच में बातें भी कर रही थी और बातों ही बातों में उन दोनों ने अपने नम्बर भी एक दूसरे को दे दिए। गुरनूर का ध्यान जब इस बात पर गया तो उसने रावी से कहा, “लगता है तुम्हारे भाई की लव स्टोरी भी अब शुरू होने वाली है।” 

नील ने गुरनूर की बात पर कोई ध्यान नहीं दिया क्योंकि उसका ध्यान अर्पिता में था। रावी ने नील और अर्पिता को देखकर गुरनूर से कहा, “मतलब अब मैं ही सिंगल बची हूँ।” 

रावी की ये बात सुनकर गुरनूर हँसने लगी। 

Continued In आर्ज-ए-इश्क - 21

आर्ज-ए-इश्क - 19



अगली सुबह गुरनूर सबके साथ बैठकर नाश्ता कर रही थी की तभी उसका फोन बजा। उसने चम्मच नीचे प्लेट में रखकर टेबल से फोन उठाकर देखा तो उसके ऊपर पापा लिखा आ रहा था। विक्रम का फोन था इसलिए गुरनूर ने जल्दी से फोन उठाते हुए कहा, “हेलो, पापा।” 

“कैसी हो, बेटा और तुम वापिस कब आओगी। तुम्हारे पापा का मन नही लग रहा तुम्हारे बिना।” विक्रम ने कहा तो गुरनूर के होठों पर मुस्कान आ गई और उसने कहा, “कल मेरा एक लास्ट ओपन माइक अटेंड करना रहता है यहाँ। उसे अटेंड करने के बाद आ जाऊॅंगी।” 

गुरनूर की बात सुनकर रावी थोड़ा हैरान हो गई क्योंकि गुरनूर ने उसे ऐसा कुछ भी नही बताया था की उसका कोई और ओपन माइक है। रावी ने गुरनूर को देखा पर सबके सामने उससे कुछ नही पूछा। गुरनूर ने विक्रम से ये बात इसलिए कही थी क्योंकि दिल्ली वापिस जाने से पहले उसे आखिरी बार श्रेयांश से मिलना था। 

विक्रम से थोड़ी देर बात करने के बाद गुरनूर ने फोन काटकर टेबल पर वापिस रख दिया और नाश्ता करने लगी। रावी को जानना था की गुरनूर ने विक्रम से ओपन माइक शो का क्यों कहा इसलिए उसने जल्दी से अपना नाश्ता खत्म करकर गुरनूर से कहा, “मुझे तुमसे कुछ बात करनी है। तुम अभी चलो मेरे साथ।” 

रावी ने गुरनूर का हाथ पकड़ लिया। मधु ने देखा की रावी गुरनूर का हाथ पकड़कर उसे ठीक से नाश्ता नहीं करने दे रही और उसे नाश्ते से उठाना चाह रही है तो उसने रावी को डाटते हुए कहा, “रावी, ये क्या कर रही हो तुम। जो भी बात करनी है बाद में कर लेना उससे। कहीं भाग थोड़ी रही है वो। उसे नाश्ता तो आराम से करने दो। हाथ छोड़ो उसका।” 

रावी ने गुरनूर का हाथ छोड़ दिया। गुरनूर जल्दी से नाश्ता करने लगी। जैसे ही उसने नाश्ता खत्म किया और कुर्सी से खड़ी हुई, रावी बिना वक्त गवाए उसका हाथ पकड़कर उसे अपने साथ ऊपर अपने कमरे में ले जाने लगी। उन्हें जाता हुआ देखकर मधु ने शुभम से कहा, “पता नही ये क्या खिचड़ी पकाना चाहती है अब गुरनूर के साथ मिलकर।” 

“मम्मी, आपको पता तो है वो दोनों बचपन से ऐसी ही रही है। पहले मिलकर प्लैन बनाती है। फिर उसे पूरा डिस्कस करने के बाद किसी बड़े से परमिशन लेने आती है। आप इतना मत सोचो। ज्यादा से ज्यादा शॉपिंग या घूमने का ही प्लैन बना लेंगी ना। जाने देना आप दोनों को। वैसे भी, गुरनूर के दिल्ली जाने के बाद इन दोनों बचपन की सहेलियों ने अलग ही रहना है। करने दीजिए एन्जॉय उन्हें साथ में।” नील ने कहा तो शुभम ने भी उसकी बातों को समझते हुए कहा, “नील सही कह रहा है। यही वक्त है इन दोनों सहेलियों के पास। एन्जॉय करने दो उन्हें साथ में। आने वाले वक्त में क्या पता दोनों में से किसकी शादी कहाँ हो जाए। फिर क्या पता एक दूसरे से ऐसे हर आए दिन मिल पाएंगी दोनों या नही।” 

दोनों बाप बेटे की बात सुनकर मधु मुस्कुराने लगी। 

रावी ने गुरनूर को अपने कमरे में लाकर कमरे का दरवाज़ा बंद किया और फिर गुरनूर से पूछा, “तुमने अंकल से ओपन माइक के बारे में क्यों कहा? अब तो कोई ओपन माइक नहीं है या फिर तुमने मुझे इस बारे में बताया नही?” 

गुरनूर ने बेड पर बैठकर रावी को देखते हुए कहा, “रिलैक्स हो जाओ। मैंने ऐसा इसलिए कहा क्योंकि मैं जाने से पहले श्रेयांश से मिलने चाहती हूँ।” 

“तो तुमने ओपन माइक का बहाना क्यों बनाया?” रावी ने पूछा तो गुरनूर ने हैरानी से उसे देखकर कहा, “तो क्या मैं सीधा सीधा सबके सामने श्रेयांश का ज़िक्र कर देती। थोड़ा तो सोचा कर रावी।” 

“ये तो मैंने सोचा ही नहीं। सॉरी यार।” रावी ने भी उसके पास बैठते हुए कहा। 

अगले दिन गुरनूर जाकर श्रेयांश से मिली। विवेक के घर में आज विवेक के अलावा कोई भी नही था इसलिए उसने गुरनूर को वहीं बुला लिया और वो विवेक के घर में आ भी गई क्योंकि उसे श्रेयांश पर पूरा भरोसा था। 

इस वक्त श्रेयांश गुरनूर के साथ विवेक के कमरे में था और विवेक उन दोनों को डिस्टर्ब ना करने के लिए अपने पेरेंट्स के कमरे में बैठकर अपनी गर्लफ्रेंड से बात कर रहा था। 

श्रेयांश बेड पर गुरनूर को अपनी बाहों में भरकर बैठा हुआ था। गुरनूर उसके सीने से लगी हुई उसके दिल की धड़कनों को सुन रही थी। उसने गुरनूर के बालों को सहलाते हुए पूछा, “तुम फिर कब आओगी?” 

“अब तुम आना।” गुरनूर ने श्रेयांश के सीने पर अपने दाएं हाथ की उंगलियाँ फेरते हुए मुस्कुराकर कहा। श्रेयांश ने गुरनूर का वो हाथ पकड़ लिया तो उसकी नज़र गुरनूर की रिंग फिंगर में पहनी हुई अंगूठी पर गई। वो एक चांदी की अंगूठी थी जिसमें हल्के गुलाबी रंग का मोती लगा हुआ था। उसने उस अंगूठी को देखते हुए पूछा, “ये रिंग किसने दी तुम्हें?” 

“तुम्हें जलन हो रही है?” गुरनूर ने अपना सिर उठाकर श्रेयांश की आँखों में देखते हुए कहा। श्रेयांश ने कुछ नहीं कहा तो गुरनूर ने फिर से उसके सीने पर अपना सिर रखकर उस अंगूठी को देखते हुए कहा, “ये रिंग मुझे दादी ने दिलाई थी। उनकी आखिरी याद है मेरे पास इसलिए पहनती हूँ।” 

“तुम अपनी फैमिली को लेकर बहुत सेंसिटिव और इमोशनल हो ना।” श्रेयांश ने पूछा। 

गुरनूर ने अपनी बाहें श्रेयांश की कमर पर लपेटते हुए खामोशी से हाँ में सिर हिला दिया। थोड़ी देर बाद गुरनूर ने श्रेयांश से थोड़ा सा दूर होकर टाइम देखा और फिर श्रेयांश की आँखों में देखते हुए कहा, “अब मुझे चलना चाहिए।” 

श्रेयांश ने फिर से गुरनूर को अपने करीब खींचकर उसे अपनी बाहों में कसते हुए कहा, “मुझे थोड़ी देर और अपना एहसास लेने दो, प्लीज़।” 

गुरनूर ने श्रेयांश के दिल की धड़कनों को महसूस करते हुए अपनी आँखें बंद कर ली। श्रेयांश ने उसे गले लगाए हुए ही उसके माथे पर किस किया। 

दोनों ही इस वक्त अपने बीच की करीबियों को पूरी तरह से महसूस कर रहे थे बिना इस बात की परवाह किए की आगे ये करीबियाँ और ज्यादा बढ़ेंगी या दोनों के बीच इन करीबियों की जगह दूरियाॅं ले लेंगी।

Continued In आर्ज-ए-इश्क - 20



लव आजकल - 1



आज जैसे ही विहान ने अपने कॉलेज में कदम रखा, उसे वहां का माहौल रोज के दिनों से काफी अलग लगा। जहां पूरे कॉलेज के स्टूडेंट्स क्लास में कम बैठकर कैम्पस में घूमते रहते थे, वही आज उसे कैम्पस में सिर्फ लड़कियां ही दिखाई दी। 

वो अंदर आया तो उसे कारिडोर में अपना सबसे अच्छा दोस्त, अभय खड़ा हुआ दिखाई दिया। उसने उसके पास आकर पूछा, “हमारा कॉलेज गर्ल्स कॉलेज बन गया है क्या? आज कोई लड़का नजर ही नही आ रहा।” 

“आ दिखाता हूं तुझे की सारे लड़के कहां है।” कहते हुए अभय विहान को लाइब्रेरी के बाहर ले आया जहां सभी लड़के भीड़ लगाकर खड़े थे और बार बार अंदर देखने की कोशिश कर रहे थे। ये सब देख विहान ने पूछा, “ये सब ऐसे लाइब्रेरी के बाहर भीड़ लगाए क्यों खड़े है?” 

“भाई, वो क्या है न कि होली के टाइम पर कॉलेज में दिवाली वाला पटाखा आया है। उसी पटाखे को देखने के लिए ये सब ऐसे खड़े है।” अभय ने कहा। 

“पागल हो गए है ये सब। चल क्लास में चलते है।” कहकर विहान क्लास की तरफ जाने लगा। 

“भाई, वो लड़की सच में बहुत खूबसूरत और हॉट है यार। तू एक बार उसे देखेगा न तो देखता ही रह जाएगा और पहली नजर में ही तुझे उससे प्यार हो जाएगा। तुझे ऐसा लगेगा की तेरे आसपास इश्क की हवाएं चलने लग गई है। वायोलिन बजने लगेगा और बटरफ्लाईज फील होंगी।” कहते हुए अभय विहान के पीछे पीछे आया। विहान ने उसे देखा और कहा, “ऐसा सिर्फ मूवीज में होता है। ये हकीकत है और पता नही तुझे मेरे सिंगल होने से क्या प्रोब्लम है।” 

विहान क्लास के अंदर जाकर बैठ गया। अभय उसके पास आकर बैठा और कहा, “तुझे देखकर किसी एंगल से नहीं लगता की तेरे पेरेंट्स की इतनी रोमेंटिक लव स्टोरी होगी। रोमांस का आर तक नहीं है तेरे अंदर।” 

“मुझे मेरे पेरेंट्स की लव स्टोरी की याद मत दिला। रोज ही सुनता हूं पापा से मैं उनकी महान ओल्ड स्कूल लव स्टोरी।” विहान ने चिढ़ते हुए कहा।

“उनकी लव स्टोरी को ऐसा मत कह यार। उनकी लव स्टोरी मेरे लिए इंस्पिरेशन है।” अभय ने कहा तो विहान ने उसे कुछ नही कहा। 

प्रोफेसर ने आकर लेक्चर शुरू किया तो विहान ने अपना सारा ध्यान उसमें लगा लिया। लेक्चर खत्म होने के बाद विहान अभय के साथ कैम्पस के गार्डन में आकर बैठ गया। वो दोनों आपस में बातें कर ही रहे थे की तभी विहान की नजर सामने से आती हुई लड़की पर गई और वो बातें करते करते रुक गया। 

हल्के नीले रंग की ड्रेस में वो लड़की बहुत ही प्यारी लग रही थी। उसके लंबे काले बाल खुले हुए थे और चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कान थी। हल्की धूप में उसका गोरा रंग चमक रहा था। सभी लड़कों की नज़रें उसके ऊपर ही थी। 

अभय ने जब महसूस किया कि विहान बोलते बोलते रुक गया है और सामने देख रहा है, तो उसकी नजरों का पीछा करते हुए उसने भी सामने देखा। विहान एकटक उस लड़की को देखे जा रहा था। उसे ऐसे देख अभय ने कहा, “क्यों भाई, चलने लग गई न इश्क की हवाएं, वायोलिन बजने लगा और बटरफ्लाईज फील हो रही है?” 

“हां, यार।” विहान ने उस लड़की को मुस्कुराकर देखते हुए कहा। वो इतना खो गया था की उसे अपने आसपास का कोई होश ही नही था। वो होश में तब आया जब वो लड़की उसके पास से होकर निकली और उस लड़की के परफ्यूम की तेज खुशबू विहान की नाक से टकराई। 

अभय ने उसे देखा और पूछा, “हो गया न पहली नजर में ही प्यार?” 

“कुछ भी बोल रहा है तू।” विहान ने उससे नज़रे चुराते हुए कहा। 

“हां हां, कुछ भी बोल रहा हूं मैं।” अभय ने कहा तो विहान ने उसे देखकर पूछा, “कौन थी ये लड़की? पहले तो इसे कभी यहां नही देखा।” 

“ओह, इंटरेस्टेड है मतलब तू उसमें।” अभय ने मजे लेते हुए कहा। 

“तुझे नहीं बताना तो मत बता। मैं जा रहा हूं।” कहकर विहान जाने लगा तो अभय ने उसे रोकते हुए कहा, “ऐसे मत जा। मैं मजाक कर रहा था। आ बताता हूं।” 

विहान फिर से उसके पास आकर बैठ गया तो अभय ने कहा, “यही है वो दिवाली वाला पटाखा। इशिका शर्मा नाम है उसका। अपने प्रिंसिपल सर की भतीजी है। कितनी ब्यूटीफुल है यार वो।” 

“चल घर चलते है। अब क्लास तो कोई और है नहीं। सर अब्सेंट है आज।” विहान ने अपना बैग कंधे पर डालते हुए कहा। 

“चल भाई।” अभय ने कहा और वो दोनों कॉलेज से घर जाने के लिए विहान की बाइक पर बैठ गए। 

अभय को घर छोड़ने के बाद विहान जैसे ही अपने घर में आया, उसकी नज़र लिविंग रूम में बैठे हुए अपने पेरेंट्स पर गई। वो दोनों साथ बैठकर अपने प्यार के दिनों को याद कर रहे थे। 

विहान उन्हें देखकर मुस्कुरा उठा और लिविंग रूम में उनके पास आया। उसे देखकर उसके पापा राज ने कहा, “अरे विहान, तुम आ गए।” 

“तुम आज इतनी जल्दी आ गए, बेटा।” उसकी मम्मी, सिमरन ने उससे पूछा।

“यस मॉम, सर आए नही थे आज।” विहान ने सोफे पर बैठते हुए कहा। 

“चलो, तुम बैठो। मैं खाना लगवाती हूं।” कहते हुए सिमरन सोफे से उठकर बाहर चली गई। उन सबने खाना खाया और अपने अपने कमरे में थोड़ी देर रेस्ट करने के लिए चले गए। 

शाम में उठने के बाद विहान अभय के साथ जिम चला गया। विहान एक्सरसाइज कर रहा था और अभय उसके साथ बातें करते हुए पूछ रहा था, “भाई, तुझे इशिका सच में खूबसूरत नही लगी?” 

विहान एक्सरसाइज करते हुए रुक गया और उसने अभय को देखते हुए कहा, “हर खूबसूरत चीज खतरनाक होती है।” 

एक्सर्साइज करने के बाद वो जिम से घर पहुंचा तो देखा की राज एक फोटो एल्बम लेकर बैठे हुए थे। वो फोटो एल्बम देखते ही विहान समझ गया कि आज फिर उसे राज से उनकी वही लव स्टोरी सुननी पड़ेगी जो उसकी नज़रों में अब दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे के राज और सिमरन की स्टोरी से भी ज्यादा फेमस हो गई थी। 

राज ने उसे अपने पास बैठा लिया और उसे फोटोस दिखाते हुए अपनी लव स्टोरी सुनाने लगे। कहानी सुनते हुए विहान की आंखो के सामने इशिका का चेहरा आ गया और वो उसमें खो गया। उसने मुस्कुराते हुए सोचा, “मेरी लव स्टोरी भी अब जल्दी ही शुरू होगी। आई लाइक यू इशिका।”

Continued In लव आजकल - 2

आर्ज-ए-इश्क - 18


 
श्रेयांश थोड़ी देर तक ऐसे ही बैठा खामोशी से गुरनूर को देखता रहा। उसे समझ नहीं आ रहा था की वो गुरनूर के सवाल का क्या जवाब दे इसलिए उसने कहा, “पता नहीं। इतनी गहराई से मोहब्बत अभी तक महसूस नही हुई की मैं तुम्हारे इस सवाल का जवाब दे सकूँ।” 

“अच्छा, फिर ये बताओ कि तुम्हें इश्क का दूसरा नाम पता है?” गुरनूर ने पूछा तो श्रेयांश ने कहा, “नही, तुम बता दो।”

गुरनूर मुस्कुराई और उसने कहा, “सुकून, जिससे हम इश्क करते हैं उसके साथ रहकर ही सुकून मिलता है। उसका चेहरा देखना, उसकी आवाज सुनना, उसे महसूस करना। सब सुकून बन जाता है।” 

“मैं महसूस कर रहा हूँ ये।” श्रेयांश ने भी मुस्कुराते हुए कहा और फिर उसने अपने हाथ में पहनी हुई वॉच में टाइम देखकर कहा, “नौ बज गए है। चलो अब तुम्हें घर छोड़ आता हूँ।” 

श्रेयांश ने खड़े होकर गुरनूर की तरफ अपना हाथ बढ़ाया तो गुरनूर ने मुस्कुराते हुए अपना हाथ उसके हाथ पर रखा और उसका हाथ पकड़कर खड़ी हो गई। वो दोनों विवेक और रावी के पास आ गए। श्रेयांश ने विवेक को देखते हुए कहा, “इन दोनों को लेट हो रहा है। चल घर छोड़ देते है इन्हें।” 

वो सभी पार्क से बाहर आ गए। गुरनूर श्रेयांश के पीछे बैठ गई और रावी विवेक के पीछे। वो दोनों बाइक चलाने लगे। 

थोड़ी देर बाद दोनों ने ही अपनी बाइक रावी के घर से कुछ दूरी पर रोक दी। गुरनूर ने बाइक से उतरकर श्रेयांश को गले लगाया और फिर रावी के साथ घर चली गई। 

श्रेयांश अपने घर नही जाना चाहता था इसलिए वो विवेक के साथ उसके घर आ गया। विवेक फ्रेश होने के लिए बाथरूम में गया हुआ था। श्रेयांश उसके बेड पर बैठा हुआ फोन में इंस्टाग्राम पर रील्स देख रहा था जिससे वो बहुत ही जल्दी बोर होने लगा। उसने फोन बंद कर अपनी जेब में रखा तो उसकी नज़र विवेक के कमरे में दीवार पर लगे हुए टीवी पर गई। श्रेयांश ने टीवी देखने का सोचा और रिमोट ढूंढने लगा। उसे रिमोट बेड पर उससे थोड़ी दूर रखा हुआ दिखाई दिया। उसने थोड़ा आगे हाथ करके रिमोट उठाया और जैसे ही टीवी ऑन किया, उसपर कोई पाकिस्तानी ड्रामा चल रहा था। 

श्रेयांश कुछ और लगाने ही वाला था की तभी बाथरूम का दरवाज़ा खोलकर विवेक कमरे में आया। श्रेयांश का ध्यान विवेक के ऊपर चला गया। विवेक ने उसके पास आकर उसका हाथ पकड़ लिया और उसके हाथ को देखने लगा। श्रेयांश बिना कुछ और लगाए ही टीवी का रिमोट बेड पर वापिस रखकर विवेक को देखने लगा। विवेक ने उसे देखा और कहा, “इतनी ज़ोर से मुक्का मारने की क्या ज़रूरत थी उस लड़के को। अपना हाथ देख। कितनी ज्यादा लगी है।” 

“चलता है इतना तो।” श्रेयांश ने लापरवाही से कहा। 
“तेरा कुछ नहीं हो सकता।” कहकर विवेक कमरे से बाहर जाकर फर्स्ट एड बॉक्स ले आया। वो श्रेयांश के सामने बैठकर उसके हाथ पर लगी चोट को डेटॉल से साफ करने लगा। उसकी चोट साफ करते हुए विवेक ने कहा, “तुझे सच में प्यार हो गया है गुरनूर से।” 

ये सुनकर श्रेयांश ने हैरानी से विवेक को देखा। विवेक का सारा ध्यान अभी भी श्रेयांश की चोट पर ही था जिसके ऊपर वो अब दवाई लगा रहा था। श्रेयांश ने एक गहरी सांस ली और कहा, “मैंने सिर्फ उसकी इज्ज़त बचाई।” 

श्रेयांश के हाथ में दवाई लगाकर विवेक ने उसकी आँखों में देखा और ना में सिर हिलाते हुए कहा, “नहीं, सबने तेरी आँखों में गुस्सा देखा जिसकी वजह सबके लिए है उस लड़के का गुरनूर को हाथ लगाना पर मुझे गुस्से के साथ तेरी आँखों में प्यार भी नजर आया।” 

“नहीं है प्यार।” श्रेयांश ने जैसे ही कहा, टीवी पर चल रहे पाकिस्तानी ड्रामा में आ रहे गाने की एक लाइन उन दोनों के कानों में पड़ी जो थी, 

"इश्क सब ही करते हैं, 
मानने से डरते हैं।" 

ये सुनते ही श्रेयांश और विवेक, दोनों हँसने लगे। श्रेयांश ने अपनी हँसी कंट्रोल की और विवेक से पूछा, “तू कब से ये सारे पाकिस्तानी ड्रामाज देखने लगा।” 

“मेरी बहन भी है जो ये सब देखती है। वो देख रही होगी मेरे कमरे में आकर।” विवेक ने कहा और फिर थोड़ी देर बाद श्रेयांश से पूछा, “तू पक्का सीरियस नहीं है ना गुरनूर को लेकर?” 

“एक ही सवाल कितनी बार पूछेगा यार तू।” श्रेयांश ने चिढ़ते हुए कहा। विवेक ने सीरियस होते हुए कहा, “देख श्रेयांश, अभी बहुत कुछ करना है तुझे। ये प्यार व्यार के चक्करों में फसकर नही कर पाएगा। इसलिए कह रहा हूँ।”

श्रेयांश ने उसे देखा और कहा, “ये गर्लफ्रेंड बनाने का आइडिया भी तूने ही दिया था। अगर तुझे पता था कि इसमे फंसकर मैं करियर की तरफ ध्यान नहीं दे पाऊंगा तो क्यों दिया था इसका आइडिया तूने।” 

विवेक ने अब कुछ नहीं कहा तो श्रेयांश ने कहा, “नही हूँ मैं सीरियस।” 

गुरनूर रावी के साथ बेड पर लेटे हुए श्रेयांश के बारे में सोच रही थी जब श्रेयांश ने क्लब में उसके लिए उस लड़के को पीटा था। उसने रावी की तरफ पलटकर उससे पूछा, “रावी, क्या तू सो गई?” 

“नही।” रावी ने भी उसकी तरफ पलटते हुए कहा। खिड़की से आती हुई चाॅंद की रोशनी में उसका चेहरा चमक रहा था। 

गुरनूर ने श्रेयांश के बारे में सोचते हुए ही रावी से पूछा, “क्या तुम्हें भी श्रेयांश की आँखों में आज मेरे लिए प्यार नज़र आया?” 

“तो श्रेयांश तो तुमसे प्यार करता ही है।” रावी ने कहा। गुरनूर ने उठकर बेड पर बैठते हुए कहा, “तू समझ नही रही है, रावी। आज कुछ अलग ही था। आज मैंने प्यार के साथ इज़ाफ़ियत भी देखी उसकी आँखों में। वो मुझे लेकर पॉजेसिव भी हो चूका है और उसने मेरे लिए उर्दू भी सीखी है।” 

रावी ने मुस्कुराकर कहा, “सच्चा प्यार है। प्यार को सच्चे प्यार में तो बदलना ही था।” 

“मज़ा तो तब आएगा जब सच्चा प्यार इश्क़ में बदलेगा।” गुरनूर ने मुस्कुराते हुए कहा। 

“प्यार और इश्क़ में फ़र्क ही क्या है, गुरनूर?” रावी ने पूछा।

“प्यार आबाद करता है और इश्क़ बर्बाद पर इस इश्क़ में न जुनूनियत बहुत होती है।” गुरनूर ने खिड़की से आसमान में चमक रहे चाॅंद को देखते हुए कहा। 

उसने थोड़ी देर तक वैसे ही रावी से बातें की और फिर बेड पर लेटकर श्रेयांश के बारे में सोचते हुए सो गई। 



Continued In आर्ज-ए-इश्क - 19