गुरनूर को श्रेयांश से मिलने जाना था पर उसने ये नही सोचा था की वो रावी की फैमिली से क्या कहेगी कि वो कहाँ जा रही है और अगर किसी को भी सच पता चला तो वो बचेगी नहीं। उसने उम्मीद भरी नज़रों से पहले रावी को देखा और फिर कुछ कहने ही वाली थी की उससे पहले ही रावी ने उसके लिए शुभम से झूठ बोलते हुए कहा, “पापा, वो ये ओपन माइक्स पर जाती है ना। वहीं जा रही है।”
“यहाँ भी काम, बेटा। यहाँ तो घूमने आई हो तुम।” शुभम ने मुस्कुराते हुए कहा तो गुरनूर ने कहा, “अंकल, दिल्ली में तो बहुत ओपन माइक्स शोज का एक्सपीरिएंस लिया है। मुझे पता चला यहाँ भी होते है इसलिए सोचा एक अटेन्ड करकर देखा जाए यहाँ वाला भी। सिर्फ एक या दो घंटे की ही तो बात है। क्या पता ऐसे दूसरों को देखकर एक्सपीरिएंस लेते हुए एक दिन मैं परफॉर्म भी करने लग जाऊँ।”
गुरनूर ने रावी को मुस्कुराकर देखा और आँखों ही आँखों में उसे थैंकयू कहा।
“ये तो बहुत अच्छी बात है। इतना कॉन्फिडेंस होना चाहिए।” शुभम ने गुरनूर को मुस्कुराकर देखते हुए कहा और फिर रावी को देखकर कहा, “तुम सीखो कुछ अपनी प्यारी सी दोस्त से। अपने काम और सपनों को लेकर कितनी सिरियस है और एक तुम हो जिससे पढ़ाई भी ठीक से नहीं होती। ज्यादातर तुम गुरनूर के साथ रहती हो फिर भी कुछ नहीं सीखती तुम गुरनूर से।”
रावी शुभम की बातें सुनते हुए गुस्से से गुरनूर को देख रही थी क्योंकी गुरनूर को बचाने के लिए उसने झूठ बोला था जिसमें वो खुद ही फँस गई थी। उसने गुरनूर को घूरते हुए कहा, “तुम्हें देर हो रही है ना। अगर तुम थोड़ी देर और यहाँ रुकी तो मैं तुम्हें जाने नहीं दूंगी।”
रावी की धमकी सुनकर गुरनूर सबको बाय बोलकर घर से बाहर जाने लगी तो शुभम ने उसे रोकते हुए कहा, “बेटा, नील छोड़ आता है तुम्हें लोकेशन पर।”
“नहीं अंकल, मैं चली जाऊँगी।” कहकर गुरनूर घर से बाहर आ गई। कॉलोनी से थोड़ा बाहर आकर उसने एक ऑटो रुकवाया और उसमें बैठ गई। वो ऑटो में बैठे हुए श्रेयांश के बारे में सोच ही रही थी की तभी उसके फोन पर किसी का मैसेज आया। गुरनूर ने अपने बैग से फोन निकालकर देखा तो रावी का मैसेज आया हुआ था। गुरनूर वो मैसेज पढ़ने लगी। “तुम्हें बचाने के चक्कर में मैंने झूठ बोला जिसमें मैं ही फँस गई और तुम्हारी इतनी ज्यादा तारीफ हुई। कोई नहीं बेटा। श्रेयांश से मिलकर आना तो तुम्हें मेरे घर में ही है। मैं बताऊँगी तुम्हें तारीफ़ें कैसे सुनते है।”
रावी का मैसेज पढ़कर गुरनूर हँसने लगी और उसने लिखा, “दोस्त नहीं है।”
थोड़ी देर बाद ही रावी का रिप्लाइ आ गया जिसमें लिखा था, “बस तुम्हारा यही कहना है ना मुझे हर बार तुम्हारा साथ देने पर मजबूर करता है।”
“अच्छा चलो, अब मूड ठीक करलो अपना और मेरा भी रहने दो। मैं खुश हूँ न आज।” गुरनूर ने लिखा तो रावी ने उसे एन्जॉय करने के लिए कहा।
थोड़ी ही देर बाद गुरनूर एक मार्केट में पहूँच गई। वो ऑटो से उतरकर ऑटो वाले को पैसे देकर जैसे ही मुड़ी, उसके चेहरे पर एक मुस्कान आ गई। उसके बिल्कुल सामने श्रेयांश खड़ा था जो अपनी बाइक के पास खड़े होकर उसका ही इंतजार कर रहा था।
गुरनूर मुस्कुराते हुए श्रेयांश के करीब आकर उसके गले से लग गई। गुरनूर के एकदम से ऐसे गले लगाने से श्रेयांश हैरान तो हो गया था पर उसे बहुत सुकून भी महसूस हो रहा था। श्रेयांश के दिमाग के हिसाब से उसे गुरनूर से मोहब्बत नही थी फिर गुरनूर के गले लगाते ही उसे इतना सुकून क्यों महसूस हुआ, वो ये नही समझ रहा था या ये कहे की वो दिमाग के आगे अपने दिल की बात नही समझ रहा था क्योंकि उसके दिमाग में विवेक ने ये बात बैठा दी थी की उसे गुरनूर के साथ सीरियस नही होना है।
गुरनूर जैसे ही उससे दूर होने लगी, श्रेयांश ने अपनी बाहें उसकी कमर पर लपेटते हुए कहा, “ऐसे ही गले लगी रहो थोड़ी देर। मुझे सुकून मिल रहा है।”
श्रेयांश ने अपने मन में चल रहे सारे ख्यालों को बहुत मुश्किल से झटककर गुरनूर के साथ उस पल को जीने का फैसला किया। गुरनूर ने मुस्कुराते हुए श्रेयांश को फिर से गले लगा लिया। आसपास के लोग उन्हें देख रहे थे। कुछ उम्र में बड़े लोग उन्हें देखकर बातें कर रहे थे और जो जवान प्रेमी जोड़े या दोस्त थे, वो उन्हें देखकर मुस्कुरा रहे थे लेकिन श्रेयांश और गुरनूर को किसी की परवाह नही थी।
थोड़ी देर ऐसे ही गले लगे रहने के बाद श्रेयांश ने उसे छोड़कर खुद से हल्का सा दूर किया और उसके चेहरे को ध्यान से देखने लगा। गुरनूर मुस्कुराते हुए उसे ही देख रही थी। उसके बाल उसके चेहरे पर आ रहे थे जिन्हें हटाने के लिए श्रेयांश ने उसके चेहरे को छुआ। श्रेयांश के छूने के एहसास से गुरनूर ने अपनी आँखें बंद कर ली। गुरनूर ने आँखें खोलकर श्रेयांश को देखा तो वो मुस्कुराते हुए उसे देख रहा था।
गुरनूर ने मुस्कुराकर अपनी नज़रें झुका ली जिससे उसकी नज़र श्रेयांश की स्पोर्ट्स बाइक पर गई। वो उस बाइक को देखकर एक्साइटेड हो गई और उसने कहा, “तुम्हारी बाइक कितनी अच्छी है रीयल में देखने में।”
“तुमने अब देखी है।” श्रेयांश ने हैरानी से कहा तो गुरनूर ने कहा, “फोटोज में देखी थी। रियल में तो आज देखी है ना।”
“तो चलो अब इसके ऊपर बैठकर भी देख लो।” कहते हुए श्रेयांश बाइक पर बैठ गया और उसे स्टार्ट किया।
गुरनूर ने बाइक पर उसके पीछे बैठते हुए पूछा, “हम कहाँ जा रहे है?”
“एक बहुत ही खूबसूरत जगह पर।” कहते हुए श्रेयांश ने उसे देखा और फिर पूछा, “मैं बाइक थोड़ी तेज चलाता हूँ। तुम्हें डर तो नही लगेगा।”
“मुझे तुम्हारे ऊपर पूरा भरोसा है।” गुरनूर ने कहा तो श्रेयांश के चेहरे पर एक मुस्कान आ गई। वो मुस्कुराते बाइक चलाने लगा। गुरनूर ने अपनी बाहें उसकी कमर पर लपेट दी और अपना सिर उसकी पीठ से लगाकर उसके एहसासों को महसूस करने लगी।
गुरनूर के ऐसा करने से वो श्रेयांश के बिल्कुल करीब आ गई जिससे उनके नीच दूरियों की कोई गुंजाइश नही थी। गुरनूर को तो ये एहसास अच्छे लग रहे थे पर श्रेयांश को इस एहसास से घबराहट हो रही थी। उसके दिल और दिमाग के बीच में वही जंग फिर शुरू हो गई थी क्योंकि उसे गुरनूर के ऐसे करीब आने से सुकून तो मिल रहा था पर उसे ये भी लग रहा था की वो गुरनूर के साथ गलत कर रहा है।
Continued In आर्ज-ए-इश्क - 15






