Welcome To Ibtidaa-E-Ishq, The World Of Love ♥️. Hope you enjoy our stories.

Saturday, 1 August 2026

आर्ज-ए-इश्क - 6



गुरनूर ने जब इश्क़ कहा तो श्रेयांश ने मुस्कुराकर उसे देखते हुए कहा, “सिर्फ लिखती ही हो या कभी करके भी देखा है।” 


“नहीं किया कभी और इश्क़ न किया नही जाता। हो जाता है अपने आप। वैसे तुम्हें इससे क्या मतलब की मुझे इश्क़ हुआ है या नहीं।” गुरनूर ने चिढ़ते हुए कहा। 


“लिखने से क्या होता। इश्क़ करके देखना चाहिए तुम्हें।” श्रेयांश ने कहा तो रावी ने जल्दी से कहा, “मैं भी इससे यही कहती हूँ की इसे इश्क़ करकर देखना चाहिए। कबतक लिखती रहेगी।” 


गुरनूर ने रावी को देखा तो वो दूसरी साइड देखने लगी। गुरनूर ने उससे नजर हटाकर श्रेयांश से कहा, “किससे करूं इश्क़। तुमसे।” 


श्रेयांश ये सुन मुस्कुराने लगा तो गुरनूर ने उसे उँगली दिखाते हुए कहा, “तुम न अपने काम से काम रखो।” 


गुरनूर ने रावी का हाथ पकड़ा और उसके साथ बाहर जाते हुए कहने लगी, “ये हीरो समझता है क्या खुदको। इश्क़ करके देखो। एक दिन भी पूरा नहीं हुआ इससे मिले हुए। इतने कम टाइम में ही पूरा दिमाग खराब कर दिया है इसने।” 


श्रेयांश गुरनूर को जाते हुए देख रहा था। विवेक ने उसे बाजू पकड़कर हिलाया तो उसकी तंद्रा टूटी। विवेक ने उसे देखकर कहा, “वो जा चुकी है, भाई।” 


श्रेयांश मुस्कुराकर बाहर की तरफ चला गया। विवेक भी उसे देखकर सिर हिलाते हुए उसके पीछे आ गया। श्रेयांश ने बाहर आकर देखा की गुरनूर पार्किंग से अपनी स्कूटी लेकर बाहर आ रही थी। रावी उसके पीछे बैठी हुई थी। श्रेयांश गुरनूर की स्कूटी के सामने आकर खड़ा हो गया। उसे सामने देखकर गुरनूर ने जल्दी से ब्रेक लगाई और चिल्लाते हुए कहा, “तुम्हें क्या शौंक चढ़ा है मरने का।” 


“मरने का शौंक।” श्रेयांश ने कन्फ्यूजन में कहा। 


“तुम्हारे दोस्त ने ही तो कल रात बताया था की तुम्हें मरने के अलग अलग तरीके अपनाने का बहुत शौंक है। देखो, अगर तुम मरने का ये तरीका अपनाना चाहते हो ना तो कोई दूसरी गाड़ी या स्कूटी को ढूंढो। मेरी ही मासूम सी स्कूटी मिली है तुम्हें अपना ये स्टूपिड मरने का तरीका अपनाने के लिए।” गुरनूर ने कहा तो श्रेयांश ने विवेक को देखा जो उसे देखकर मुस्कुराने लगा क्योंकि उसे अच्छे से पता था की कल रात उसने गुरनूर के आगे जो बकवास की थी उसके लिए श्रेयांश उसे छोड़ने वाला नही था। 


श्रेयांश ने हल्का सा मुस्कुराकर गुरनूर से कहा, “मैं यहाँ तुम्हारी स्कूटी के नीचे आकर मरने नहीं बल्कि तुम्हारा नम्बर लेने आया हूँ।” 


गुरनूर ने हैरान होकर पूछा, “तुम्हें क्यों चाहिए मेरा नम्बर? कुछ ज्यादा ही जल्दी आगे नहीं बढ़ना चाह रहे हो तुम?” 


“तुम कहो तो दोबारा तुम्हारा नम्बर लेने दिल्ली आ जाऊँगा।” श्रेयांश ने गुरनूर को छेड़ने वाले अंदाज में कहा। 


गुरनूर ने श्रेयांश को देखा और फिर कहा, “रहने ही दो. तुमसे बार बार कौन टकराए।” 


गुरनूर ने अपने बैग से पेन और डायरी को निकाला और उसके एक पेज पर अपना नम्बर लिखकर वो पेज फाड़कर श्रेयांश को दे दिया।


श्रेयांश ने पेपर पर लिखे नम्बर को देखते हुए कहा, “मुझसे बार बार कौन टकराए। अच्छा तरीका है नम्बर देने का।”


गुरनूर ने स्कूटी के हैंडल पर हाथ टिकाकर हल्का सा आगे झुकते हुए उसे देखकर कहा, “तुम्हारे नम्बर माँगने के तरीके से तो कई ज्यादा बैटर है।” 


उसे बाय बोलकर गुरनूर ने स्कूटी स्टार्ट की और रावी के साथ वहाँ से चली गई। श्रेयांश उसे जाते हुए देखता रहा और फिर मुस्कुराने लगा। 


अगले दिन वो विवेक के साथ वापिस इंदौर जाने के लिए निकल गया। जैसे ही वो अपने घर के अंदर आया, सोफे पर बैठे हुए शिवम ने कहा, “तो आ गए तुम वापिस। थोड़े दिन और रुक जाते। घर में थोड़े दिन और सुकून रहता।” 


श्रेयांश उनसे कुछ कहता इससे पहले ही ज्योति ने उसके पास आकर उसके गाल पर हाथ रखते हुए शिवम से कहा, “क्या आप भी। देख नही रहे मेरा बेटा कितना थका हुआ है।” 


“मजदूरी करके नही आया तुम्हारा बेटा जो थक गया है।” शिवम ने कहा पर ज्योति ने उनकी बात पर ध्यान न देते हुए श्रेयांश से कहा, “बेटा, तुम इनकी बातों पर ध्यान न दो और अपने रूम में जाकर थोड़ी देर रेस्ट करलो।” 


श्रेयांश अपना बैग लेकर अपने कमरे में चला गया। रात के खाने के बाद श्रेयांश ने बेड पर लेटकर अपने फोन में गुरनूर का नम्बर सेव कर उसे मैसेज किया। “हेलो, मैडम।” 


थोड़ी देर बाद ही गुरनूर का रिप्लाई आया। “हेलो।” 


“क्या कर रही हो?” श्रेयांश ने पूछा। 


“कुछ नहीं। तुम?” गुरनूर ने पूछा। 


“किसी की यादों में खो रखा हूँ।” श्रेयांश ने मुस्कुराते हुए टाइप किया। ये पढ़कर गुरनूर मुस्कुराने लगी और उसने आगे लिखा, “किसकी यादों में।” 


“तुम्हें मालूम है।” श्रेयांश ने लिखा। वो दोनों काफी देर तक एक दूसरे से बातें करते रहे। 


सुबह श्रेयांश विवेक से एक कैफे में मिला। वो दोनों विवेक की गर्लफ्रेंड का इंतजार कर रहे थे। विवेक ने अपनी कोल्ड कॉफी पीते हुए उससे पूछा, “बात हुई तेरी गुरनूर से।” 


“हम्म्म, कल रात की थी मैंने उससे बात।” श्रेयांश ने कहा। 


“भाई, एक बार उससे कंफर्म करले वो सिंगल है या नहीं। वो जितनी खूबसूरत है ना मुझे नहीं लगता वो सिंगल होगी।” विवेक ने उसे देखते हुए कहा। 


“उसकी बातों से तो नहीं लगा और वैसे भी, तुझे याद है जब हम दिल्ली में थे तो उसकी दोस्त ने कहा था की उसे इश्क करके देखना चाहिए। इससे पता चलता है की वो सिंगल हैं।” श्रेयांश ने सोचते हुए कहा जिसपर विवेक ने कहा, “क्या पता उसका बॉयफ्रेंड हो और उसकी दोस्त को इस बारे में न पता हो।” 


श्रेयांश की नजर दरवाज़े पर गई जहाँ से विवेक की गर्लफ्रेंड, जिया अंदर आकर उनकी तरफ आ रही थी। उसे देखकर श्रेयांश ने विवेक से कहा, “तू गुरनूर को लेकर मेरे मन में डाउट्स पैदा करना बंद कर और अपनी वाली पर ध्यान दे।” 


जिया ने उनके पास आकर विवेक को गले लगाया और श्रेयांश को हेलो बोलकर विवेक के साथ वाली कुर्सी पर बैठ गई। विवेक उसके साथ बातें करने लग गया। श्रेयांश सोचना नही चाहता था की गुरनूर का कोई बॉयफ्रेंड होगा लेकिन विवेक ने उसके मन में अब ये डाउट डाल दिया था जो अब उसे परेशान कर रहा था। उसने अपनी कॉफी खत्म की और विवेक और जिया को बाय बोलकर उन्हें अकेला छोड़कर बाहर आ गया। उसने तय किया की अपने इस डाउट को निकालने के लिए वो गुरनूर से बात करेगा। 


रात में खाने के बाद उसने गुरनूर के साथ मैसेज पर बात करते हुए पूछा, “गुरनूर, क्या तुम्हारा कोई बॉयफ्रेंड है?” 


गुरनूर समझ रही थी श्रेयांश ये क्यों पूछ रहा है इसलिए उसने झूठ बोलते हुए लिखा, “हाँ, है ना।”


Continued In आर्ज-ए-इश्क - 7


Friday, 31 July 2026

आर्ज-ए-इश्क - 5

 


गुरनूर की दोस्त, जो और कोई नही बल्कि रावी ही थी ने उसके पास आकर कहा, “मैं और प्रिया कबसे इंतज़ार कर रहे है तुम्हारा। खाना ठंडा हो रहा है। क्या कर रही हो तुम इतनी देर से यहाँ।”


“हाँ, चलते है रावी। एक मिनट दो बस मुझे।” कहकर गुरनूर ने श्रेयांश को गुस्से से घूरकर देखते हुए कहा, “तुम्हारे पास एक मिनट है। जल्दी से माजरत करो।” 

   

श्रेयांश को उसकी बात समझ नहीं आई तो उसने विवेक और ऋतिक की तरफ देखा। उनको भी गुरनूर की बात समझ नही आई थी इसलिए दोनों ने श्रेयांश को देखकर अपने कंधे उचका दिए। श्रेयांश को कन्फ्यूज देखकर रावी ने उसे समझाते हुए कहा, ‘‘ये आपको सॉरी बोलने के लिए कह रही है उर्दू में। इसे उर्दू लैंग्वेज काफी पसंद है न।’’ 


उसने फिर गुरनूर को देखकर पूछा, ‘‘सॉरी किस बात के लिए लेकिन। क्या किया है इन्होंने तुम्हारे साथ।’’


‘‘क्या किया इन्होंने। ये देखो, इनकी वजह से सारा जूस गिर गया हमारा।’’ गुरनूर ने रावी को दिखाते हुए कहा।    


‘‘आइ एम रेयली वेरी सॉरी मिस।’’ श्रेयांश ने कहा तो गुरनूर उसे घुरते हुए रावी के साथ वहाँ से चली गई। 


उसे जाते देख श्रेयांश ने मन ही मन में कहा, “गुरनूर, सच में ही जान से मारकर जा चुकी हो तुम मुझे। तुम्हारी खूबसूरती ने मेरे दिल के अंदर जो थोड़ी सी मोहब्बत पैदा कर दी है, उसके तीर सीधा दिल पर लगे है।’’ 


उन तीनों ने वहीं पर खाते पीते हुए खूब एन्जॉय किया और फिर घर आकर सो गए।  


अगली सुबह श्रेयांश विवेक के साथ ओपन माइक शो में जाने के लिए निकल गया। ऋतिक को अपनी जॉब पर जाना था इसलिए वो उनके साथ नहीं गया।


वहीं गुरनूर ने भी अपने छोटे से बैग में अपनी डायरी और पेन डाला और अपने पापा, विक्रम और मम्मी, शीतल को बाय बोलकर रावी के साथ ओपन माइक शो में जाने के लिए निकल गई। 


वो दोनों थोड़ी ही देर में वेन्यू पर पहुँच गई। स्कूटी पार्क कर वो दोनों बातें करते हुए अंदर जा ही रही थी की तभी गुरनूर की टक्कर दूसरी तरफ से आते हुए श्रेयांश से हो गई। वो गिरने ही वाली थी लेकिन श्रेयांश ने उसे कमर से पकड़कर गिरने से बचा लिया। श्रेयांश उसकी ब्राउन आँखों में खो गया। 


उसे वहाँ देखकर गुरनूर को फिर से गुस्सा आ गया। उसने सीधा खड़ा होकर श्रेयांश के हाथ अपनी कमर से हटाते हुए उसके ऊपर चिल्लाकर कहा, ‘‘तुमने मुझसे टकराने का कान्ट्रैक्ट लिया हुआ है क्या किसी से और तुम यहाँ क्या कर रहे हो। पीछा कर रहे हो मेरा।’’


उसकी बातें सुन अब श्रेयांश को भी गुस्सा आ गया और उसने कहा, “लिस्टेन मैडम, मुझे कोई शौंक नहीं है तुमसे टकराने का और तुम्हारा पीछा करने का। श्रेयांश को एक ही काम दोबारा दोबारा करना बिल्कुल नहीं पसंद और कल रात मेरी गलती थी इसलिए सॉरी बोल दिया मैंने तुम्हें। इस बार नहीं बोलूँगा क्योंकि यहाँ मेरे साथ साथ तुम्हारी भी गलती है।’’


गुरनूर उसे बिना कुछ कहे रावी का हाथ पकड़कर अंदर चली गई और हमेशा की तरह अपनी फेवरेट जगह पर जाकर बैठ गई। श्रेयांश भी अंदर आ गया। वो यहाँ परफॉर्म करने आया था लेकिन गुरनूर हर बार की तरह यहाँ पर सिर्फ कविताएं सुनने और लिखने के लिए आई थी। गुरनूर ने अपने बैग में से अपनी डायरी और पेन निकालकर लिखना शुरू किया। ओपन माइक शो शुरू हो गया। श्रेयांश की नजर गुरनूर के ऊपर गई तो वो उसे देखने लग गया। गुरनूर चेहरे पर मुस्कान के साथ लिखे जा रही थी। जब वो पेन होठों में दबाकर कुछ सोचने लगती तो और भी ज्यादा प्यारी लगती। शो से ध्यान हटाकर श्रेयांश गुरनूर में पूरी तरह से खो गया। कुछ लोगों के परफॉर्म करने के बाद होस्ट ने उसका नाम अनाउन्स किया लेकिन उसे तो जैसे कुछ सुनाई ही नहीं दे रहा था। वहीं गुरनूर उसका नाम सुनकर हैरान हो गई और उसने श्रेयांश को देखते हुए खुद से कहा, “ये भी पोएटरी करता है। वेरी इम्प्रेसिव!’’


विवेक ने जब श्रेयांश को गुरनूर को देखते हुए पाया तो धीरे से उसके हाथ पर चुटी काटकर कहा, “भाई, थोड़ी देर के लिए गुरनूर से ध्यान हटा ले। तेरा नाम अनाउन्स हो रहा है स्टेज पर।’’


श्रेयांश गुरनूर से नजरे हटाकर स्टेज की तरफ गया। उसकी पोएटरी सुनने के लिए गुरनूर ने अपने हाथ में पकड़ा हुआ पेन डायरी पर रखा और उसे देखने लगी लेकिन जब श्रेयांश ने कॉमेडी करनी शुरू की तो गुरनूर को चिढ़ सी महसूस हुई जिसकी वजह उसे समझ नहीं आई। 


“यार, ये कितना हॉट है।’’ रावी ने कहा तो गुरनूर ने उसे घूरकर देखा। 


परफॉर्म करने के बाद श्रेयांश वापिस अपनी जगह पर आकर बैठ गया और फिर से गुरनूर को देखने लगा। ये देख विवेक ने उससे कहा, “भाई, तू इसे ऐसे देखे जा रहा है। पसंद आ गई क्या।’’


“ये कितनी खूबसूरत है, यार। मन तो कर रहा है अब इससे एक बार और टकराऊँ जिससे इस बार हमारे  साथ साथ हमारे नैन से नैन भी टकरा जाएँ।’’ श्रेयांश ने कहा। 


“बनाले फिर गर्लफ्रेंड इसे।’’ विवेक ने कहा। कुछ और लोगों के परफॉर्म करने के बाद इवेंट खत्म हो गया। श्रेयांश गुरनूर के पास आया तो गुरनूर ने गुस्से में कहा, “दोबारा टकराना है मुझसे तुम्हें।” 


“इरादा तो यही है।” श्रेयांश ने खोए हुए कहा जिसे सुन गुरनूर ने हैरानी से कहा, “क्या?” 


श्रेयांश को जब एहसास हुआ की उसने क्या कहा है तो वो अपनी बात संभालते हुए बोला, “मैं देखे जा रहा हूॅं की तुम सिर्फ लिखे जा रही हो। कुछ सुनाया नही तुमने। ये पूछने आया था मैं तो तुमसे।” 


रावी श्रेयांश को ही देखे जा रही थी लेकिन उसका सारा ध्यान तो गुरनूर में था। गुरनूर ने हल्का सा मुस्कुराकर कहा, “मैं सिर्फ सुनने आती हूँ और सिर्फ अपने लिए लिखती हूँ।”


“कभी तो मेरे लिए भी लिखोगी ही।” श्रेयांश ने मुस्कुराते हुए कहा तो गुरनूर ने उसे देखते हुए कहा, “क्या मैं आपको इतने अच्छे से जानती हूँ, मिस्टर और मैं कॉमेडी नही लिखती।” 


“तो अब जान लो।” कहकर श्रेयांश ने गुरनूर को अपना परिचय दिया और फिर पूछा, “आप क्या लिखती है, गुरनूर?” 


गुरनूर ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “इश्क़।” 


Continued In आर्ज-ए-इश्क - 6

Thursday, 30 July 2026

आर्ज-ए-इश्क - 4

 


रावी ने गुरनूर को देखा और कहा, “हाॅं हाॅं, पता है मुझे तुम्हारी ख्वाहिशों की लंबी लिस्ट का।” 


“एनीवेज, तुम कल चल रही हो ना मेरे साथ ओपन माइक शो में।” गुरनूर ने खड़े होते हुए पूछा और किचन की तरफ जाने लगी। 


“ऑफकोर्स चलूंगी यार। तुम्हारी वजह से ही तो पापा मुझे घर से बाहर आने देते है आसानी से।” रावी ने कहा। 


गुरनूर ने किचन के गेट से हल्का सा बाहर निकलकर उसे देखते हुए कहा, “वैसे न अंकल इतने भी स्ट्रिक्ट नही है जितना तुमने और नील भैया ने उन्हें बना दिया है।” 


गुरनूर की बात सुनकर रावी हॅंसने लगी। 


श्रेयांश और विवेक जैसे ही दिल्ली रेलवे स्टेशन से बाहर निकले, श्रेयांश ने कहा, “फाइनली, इतने वक्त के बाद इंदौर से निकलने का मौका मिला है।” 


विवेक उसे देखकर मुस्कुराने लगा। उनका दोस्त, ऋतिक उन्हें वहाॅं लेने आया। ऋतिक उन्हें अपनी गाड़ी में बैठाकर अपने फ्लैट में ले आया। 


श्रेयांश रात में खिड़की के पास खड़े होकर दिल्ली की चका चौंध को देख रहा था। ऊॅंची इमारतें, सड़कों पर चलता हुआ ट्रैफिक। सड़कों भर भागती हुई गाड़ियों को देखकर श्रेयांश ने सोचा, “इन बड़े शहरों में हर कोई ऐसे ही जल्दी में रहता है। एक जगह ठहरकर उस लम्हें को खुलकर जीना तो शायद इन्होंने सीखा ही नही है। बस सब जल्दी से आने वाले समय को पकड़ने की  रेस में है।” 


श्रेयांश को हैरानी हुई की वो ये सब क्या सोच रहा है क्योंकि ऐसे टॉपिक्स से तो उसका कुछ लेना देना ही नही था। वो दिल्ली आया तो बहुत एक्साइटमेंट के साथ था लेकिन अब उसे ये सब देखते हुए हर बार जैसे बोरियत महसूस होने लग गई थी। 


ऋतिक ने उसके पास आकर उसे एक ड्रिंक देते हुए कहा, “दिल्ली की खूबसूरती देख रहा है।” 


“भाई, तू ये बिल्डिंग्स और ये ट्रैफिक को देखकर बोर नही होता क्या जो इसे खूबसूरती बता रहा है।” श्रेयांश ने कहा तो विवेक, जो सोफे पर आराम से बैठकर अपनी गर्लफ्रेंड से चैटिंग करने में लगा हुआ था, जोर जोर से हॅंसने लगा। ऋतिक ने एक नजर विवेक को देखा और फिर श्रेयांश को देखकर कहा, “भाई, बोर मत हो। चलो तुम दोनों को बाहर लेकर चलता हूॅं।” 


तीनों फ्लैट से बाहर आ गए। ऋतिक ने फ्लैट लॉक किया और उन दोनों के साथ नीचे आ गया। 


“बाइक मैं चलाऊॅंगा।” कहते हुए श्रेयांश ने चाबी लेने के लिए हाथ आगे बढ़ा दिया। विवेक ने ऋतिक को मना करने के लिए की वो श्रेयांश के हाथ में चाबी न दे, ना में गर्दन दिला दी और अपने हाथ को चाकू समझते हुए अपनी गर्दन के पास लेजाकर चलाया जैसे कहना चाह रहा हो की अगर इसे चाबी दी तो हम दोनों मरेंगे इसके साथ ही। 


ऋतिक विवेक को देख ही रहा था की श्रेयांश ने इतने में ही उसके हाथ से चाबी शीन ली और बाइक स्टार्ट कर उन दोनों को बैठने के लिए कहा। ऋतिक और विवेक भगवान से दुआ करते हुए बाइक पर बैठ गए। उनके बैठने के बाद श्रेयांश ने बाइक चलानी शुरू की। ऋतिक पीछे बैठा हुआ उसे रास्ता बता रहा था। 


मार्केट में पहुॅंचकर श्रेयांश ने बाइक की स्पीड बिल्कुल बढ़ा दी। मार्केट में अलग ही चका चौंध थी। गाड़ियाॅं और बाइक बिल्कुल बीच में से निकल रहे थे और साइड पर तरह तरह की दुकानें की, जिनपर लोग शॉपिंग कर रहे थे और खाने के स्टॉल थे, जिनपर लड़के लड़कियाॅं खड़े होकर खाने को एंजॉय कर रहे थे। वहीं कुछ प्रेमी जोड़े हाथों में हाथ डाले घूम रहे थे। 


श्रेयांश बाइक चलाते हुए इन सब को देख रहा था। उसके पीछे बैठे हुए विवेक और ऋतिक की जान बाइक की बड़ी हुई स्पीड की वजह से हलक में अटकी हुई थी। ट्रैफिक और आसपास की आवाज ज्यादा होने की वजह से विवेक ने श्रेयांश से तेज आवाज़ में कहा, “भाई, मार्केट में है हम लोग और यहाॅं ट्रैफिक बहुत है। स्पीड स्लो करदे वरना किसी से टक्कर हो जाएगी हमारी।”


“कुछ नही होगा। रिलैक्स बैठ।” श्रेयांश ने हल्का सा पीछे मुड़कर उसे देखते हुए कहा और फिर जैसे ही सामने देखा, उसकी बाइक की टक्कर एक कार से होने वाली थी। विवेक और ऋतिक के तो ये देखकर प्राण ही उड़ गए। तेज स्पीड की वजह से ब्रेक लगाना मुश्किल था लेकिन फिर भी उसने टाइम से ब्रेक लगा दी और बाइक एक साइड पर ले आया। 


श्रेयांश ने पीछे मुड़कर मुस्कुराते हुए विवेक को देखा जिसने गुस्से से कहा, “तू पागल है क्या? तेरे इस फन और एक्स्टेसी के चक्कर में अभी मर जाते हम।” 


“मरे तो नही ना और मुझे ये सब करकर एक अलग खुशी मिलती है।” श्रेयांश ने कहा। 


“पहला बंदा देखा है जिसे अपने साथ साथ दूसरों की जिंदगी दाव पर लगाकर खुशी मिलती है। तू ऐसे काम अकेले कर लिया कर। हमें ये हमारी जिंदगी ना बहुत प्यारी है।” विवेक ने बाइक से उतरते हुए कहा। 


“अच्छा, चल अब आगे से नही करूॅंगा।” श्रेयांश ने कहा। विवेक को पता था की श्रेयांश झूठ बोल रहा है पर उसने कुछ नही कहा। बाइक पार्क कर वो तीनों एक खाने के स्टॉल की तरफ जाने लगे। श्रेयांश विवेक और ऋतिक की तरफ मुड़ गया और उनसे बातें करते हुए उल्टा चलने लगा। क्योंकि श्रेयांश को पीछे का कुछ दिखाई नही दे रहा था, वो अपने पीछे से आती हुई लड़की से टकरा गया, जो बहुत ही सावधानी से अपने हाथ में जूस के गिलास पकड़कर सामने देखते हुए चल रही थी। उस लड़की के हाथ में जो जूस के गिलास थे, वो टकराने की वजह से आधे श्रेयांश की टी शर्ट पर और आधे नीचे गिर गए थे। 


गिरे हुए गिलास को देखकर उस लड़की को श्रेयांश के ऊपर गुस्सा आ गया और उसने गुस्से से श्रेयांश के कंधे पर हाथ रखकर उसे अपनी तरफ करते हुए कहा, “ए मिस्टर, क्या भगवान ने तुम्हें पीछे की तरफ आँखें दी है जो ऐसे चल रहे हो।” 


उस लड़की की बात सुनकर विवेक और ऋतिक हॅंसने लगे। श्रेयांश ने कुछ नही कहा। वो तो बस उस लड़की को देखे जा रहा था। खूबसूरत ब्राउन आँखें, गोरा रंग, गुलाब की पंखुड़ियों के जैसे होंठ। खुले बालों में वो लड़की बला की खूबसूरत लग रही थी। श्रेयांश को कुछ न कहता देखकर उस लड़की ने कहा, “मेरा सारा जूस गिरा दिया। इतनी मुश्किल से लिया था मैंने। मन तो कर रहा है तुम्हें पीट दूं यहीं पर ही।” 


विवेक और ऋतिक को ये सुनकर और भी ज्यादा हॅंसी आ गई क्योंकि दोनों जानते थे की श्रेयांश इंटरनेशनल लेवल कराटे चैंपियन था जिसकी वजह से आजतक किसी ने उसे पीटने की कोशिश तो दूर की बात है, इस बारे में सोचा तक नही था और ये लड़की उसे उसके सामने ही पीटने की बातें कर रही थी। विवेक ने मजे लेते हुए कहा, “तो पीट दो। इनफैक्ट मार ही दो जान से। इसे मरने के अलग अलग तरीके अपनाने का बहुत शौंक है। ये तरीका भी एक्सपीरियंस कर लेगा ये की लड़की के हाथों कैसे मरते है।” 


ये सुनकर श्रेयांश ने गुस्से से विवेक को घूरा। वो लड़की कुछ कहती इससे पहले ही उसकी दोस्त ने उसके पास आते हुए उसे आवाज लगाई, “गुरनूर, क्या हो गया?” 


Continued In आर्ज-ए-इश्क - 5

Tuesday, 28 July 2026

आर्ज-ए-इश्क - 3



श्रेयांश ने बालकनी की रेलिंग के सहारे उसके ऊपर खड़े होकर शिवम से पूछा, “पापा, आप सोए नही अभी तक?” 


“पहले अंदर तो आ जाओ। पाइप चढ़ने में इतनी मेहनत की है तुमने।” शिवम ने कहा। 


“अंदर आया तो आप मारोगे। पीछे डंडा पकड़ रखा है आपने अपने हाथों में।” श्रेयांश ने घबराते हुए कहा।


शिवम ने उसे देखते हुए कहा, “चुपचाप अंदर आ जाओ। कुछ नही कहूॅंगा तुम्हें और न ही मारूॅंगा। प्यार से कह रहा हूॅं। अंदर आ जाओ।” 


“रहने दीजिए पापा। बहुत अच्छे से समझता हूॅं आपके इस स्कैम को मैं। बचपन से चलता आ रहा है ये। हर बार आप प्यार से यही कहकर अंदर बुलाते है और फिर आपके अंदर टिपिकल इंडियन फादर की आत्मा आ जाती है।” श्रेयांश ने शिवम को देखकर कहा। उनकी बातों के शोर से ज्योति और श्रेयांश के भाई, कुशाग्र की नींद भी खुल गई। वो दोनों भी कमरे से बाहर आ गए। श्रेयांश अंदर नही आया तो शिवम ने इस बार थोड़ा सख्ती से कहा, “अंदर आ रहे हो या यहीं से हाथ पर डंडा मारकर नीचे गिराऊॅं तुम्हें।” 


शिवम की ये बात सुनकर श्रेयांश डर के मारे अंदर आने लगा पर जैसे ही उसकी नजर पीछे खड़ी ज्योति पर गई, वो मुस्कुराते हुए अंदर आ गया क्योंकि उसे पता था ज्योति उसे मार खाने से बचा लेंगी। शिवम जैसी ही श्रेयांश को डंडे से मारने लगे, ज्योति ने पीछे से आकर वो डंडा पकड़ लिया और शिवम को घुरकर देखते हुए कहा, “ज्यादा ना कमीशनर बनने के जरूरत नही है मेरे बच्चों के ऊपर, यहाॅं की डिफेंस मिनिस्टर और होम मिनिस्टर मैं हूॅं। लाइए डंडा दीजिए इधर।” 


शिवम ने डंडा ज्योति को दे दिया। ज्योति सबको सोने के लिए कहकर वहाॅं से अपने कमरे में चली गई। श्रेयांश ने शिवम को देखा और उनसे पूछा, “आपको कैसे पता चला की मैं घर आ चुका हूॅं और मैं बालकनी से ही अंदर आऊॅंगा।” 


“तुम शायद भूल रहे हो की तुम्हें मैंने ही पालकर बड़ा किया है। अच्छी तरह से पता है मुझे की तुम क्या क्या करते हो और तुम्हारी वो बाइक, जो बहुत शोर करती है ना, वो भी तुम्हारी जिद्द पर तुम्हें मैंने ही लेकर दी है।” शिवम ने कहा। 


“तो अब आप मुझे फिर से छोटा करना चाहते है और बाइक वापिस लेना चाहते है।” श्रेयांश ने शरारत से कहा तो शिवम ने जानबूझकर दुख भरी आवाज में कहा, “काश मैं फिर से तुम्हें छोटा कर सकता। जिंदगी सुकून में रहती। तुम्हारी परेशानी में नही।” 


श्रेयांश ने चिढ़ते हुए कहा, “मैं कहाॅं परेशान करता हूॅं पापा आपको।” 


“परेशान ही हूॅं मैं तुम्हें लेकर क्योंकि तुम अपनी जिंदगी में सीरियस नही हो बिल्कुल भी बल्कि तुम तो जिंदगी को लेकर भी सीरियस नही हो। कभी तुम बाइक ऐसे चलाओगे की तुम्हारा एक्सीडेंट ही हो जाए और तभी ये पाइप पर चढ़कर आने जैसी हरकते करोगे जिससे तुमने चोट लगे गिरकर या तुम्हारी जान ही निकले। मिलता क्या है तुम्हें इन सब में।” शिवम ने गुस्से में कहा। 


“एक्स्टेसी।” श्रेयांश ने जवाब दिया। 


शिवम ने उसे घुरकर देखते हुए कहा, “तुम्हारा ये सब करना मुझे बेवकूफी लगता है।” 


श्रेयांश ने थोड़ी देर तक उन्हें देखा और कहा, “पिछले तीन सालों से मैं एक ही चीज को लेकर तो काफी सीरियस हूॅं, पापा। बहुत ज्यादा वक्त बिता दिया है मैंने स्टैंड अप कॉमेडी करते हुए बाकी सारी एक्टिविटीज के बजाए।” 


“बेटा, तुम समझते क्यों नही। इन सब से तो कुछ भी नही मिलने वाला है तुम्हें। मैं चाहता हूॅं तुम अपने किसी जॉब या बिज़नेस को लेकर सीरियस हो।” शिवम ने थोड़ा प्यार से कहा। 


“आप जानते है पापा की ये कभी नही होने वाला और मैं स्टैंड अप कॉमेडी में सक्सेस होकर आपको गलत प्रूफ करकर दिखाऊॅंगा। कल दिल्ली जा रहा हूॅं मैं। अपना पहला आउट ऑफ स्टेट शो करने।” कहकर श्रेयांश अपने कमरे में जाने लगा। 


उसे जाता हुआ देखकर शिवम ने कहा, “मैं फिर से कह रहा हूॅं तुम्हें जॉब करनी चाहिए।” 


श्रेयांश रुक गया और उसने शिवम को चिढ़कर देखते हुए कहा, “ये डिस्कशन हम हर बार क्यों करते है।” 


“क्योंकि तुम देख नही पा रहे हो की तुम कहाॅं जा रहे हो रिस्पॉन्सिबल बनने की एज में। बस ये बेकार के शोज करना, फ्रैंड्स के साथ देर रात तक ऐसे अवारा बनकर घूमना और पार्टी करना। यही सब है तुम्हारी लाइफ में। कोई ढंग का काम तो है ही नही। ऊपर से मेरी गलती है जो तुम्हारी जिद्द पर और तुम्हारी माॅं की सिफारिश पर तुम्हें बाइक और दिला दी।” शिवम ने फिर गुस्से में कहा। 


“बस कर दीजिए, पापा। मैं जा रहा हूॅं कल। आपके चार दिन मुझे देखे बिना सुकून से निकलेंगे।” कहकर श्रेयांश अपने कमरे में चला गया और पैकिंग करने लगा। 


सुबह वो तैयार होकर नाश्ते करने के बाद ज्योति, शिवम और कुशाग्र से मिलकर विवेक के साथ दिल्ली जाने के लिए निकल गया। 


गुरनूर खिड़की के पास हाथों में अपनी डायरी और पेन लिए हुए कुर्सी पर बैठी हुई थी। वो बाहर एक छोटी सी चिड़िया को देखकर मुस्कुराते हुए डायरी में कुछ लिख रही थी की तभी रावी वहाॅं आई। उसने गुरनूर के हाथों में डायरी और पेन को देखकर कहा, “अब क्या लिख रही हो, मैडम?” 


“इश्क ही लिखती हूॅं मैं हर बार।” गुरनूर ने खोए हुए कहा और फिर रावी को देखा। 


“हाय, इश्क लिखती ही रहोगी क्या। कभी करके भी देखो।” रावी ने गुरनूर को छेड़ते हुए कहा। 


गुरनूर ने अपनी डायरी को बंद कर उसे देखा और कहा, “इश्क न किया नही जाता। बस हो जाता है। मुझे जब इश्क होना तो अपने आप ही जाएगा। तब न मैं इस दिल को इश्क करने से रोक पाऊॅंगी और न ही कोई और रोक पाएगा।”


“तुम इतनी गहरी बातें कैसे कर लेती हो?” रावी ने पूछा जिसपर गुरनूर ने हॅंसते हुए कहा, “जैसे तुम बेवकूफी वाली करती हो।“ 


ये सुनते ही रावी ने गुरनूर के हाथ पर मारते हुए कहा, “वेरी फनी! वैसे तुम्हें अपने आप प्यार होगा कैसे। लड़को से तो तुम दूर भागती हो।” 


“मैं बेकार लड़को से दूर भागती हूॅं। तुम तो जानती ही हो की मुझे ये टाइमपास और फन वाला प्यार पसंद नही है। जब मेरे जिंदगी में मेरा ड्रीम बॉय आएगा तो देखना। उसके और मेरे इश्क में कितना जुनून होगा।” गुरनूर ने मुस्कुराकर कहा। 


Continued In आर्ज-ए-इश्क - 4

Monday, 27 July 2026

आर्ज-ए-इश्क - 2



 

श्रेयांश ऐसे ही खामोशी से बैठा रहा तो विवेक ने उससे कहा, “भाई, तू गर्लफ्रेंड क्यों नही बना लेता।” 


श्रेयांश ने अपने दोस्तों को देखकर कहा, “तुम सबको मेरे सिंगल होने से क्या प्रॉब्लम है।” 


“भाई, कॉमेडी तो तू करता ही है पर जिंदगी में हॅंसी मजाक के साथ फन भी तो होना चाहिए न।” विवेक ने कहा।


“ये कर ही रहा हूॅं फन इस वक्त। तुम सब के साथ बाइक रेसेस करता हूॅं, पार्टीज करता हूॅं। फन ही है ये सब। जिंदगी में एक लड़की के आने से ज्यादा फन हो जाएगा।” श्रेयांश ने बीयर की सिप लेकर कहा। 


विवेक उसके साथ आकर बैठा और उसने उसके कंधे पर हाथ रखकर कहा, “भाई, तू एक बार गर्लफ्रेंड बनाकर तो देख। तुझे पता लग जाएगा तू लाइफ में क्या मिस कर रहा है।” 


“मुझे कोई इंटरेस्ट नही है।” श्रेयांश ने उसे देखते हुए कहा।


विवेक ने उसे देखा और कहा, “क्यों नही है। हमें देख ले। हम सबकी भी तो गर्लफ्रेंड है और तेरे लिए तो गर्लफ्रेंड बनाना और भी आसान है क्योंकि तुझे आदत है किसी भी चीज को लेकर ज्यादा सीरियस न होने की।”


“मेरे किसी बात को लेकर सीरियस न होने का इससे क्या कनेक्शन है?” श्रेयांश ने कंफ्यूज होते हुए पूछा।


“भाई, तुझे क्या लगता है। हम सब अपनी अपनी गर्लफ्रेंड्स के साथ सीरियस रिलेशनशिप में है। नही, हम सब सिर्फ टाइमपास कर रहे है उनके साथ। आज कल की लड़कियाँ भी ऐसे ही रिलेशनशिप चाहती है तो तू भी कोई लड़की ढूंढकर ऐसा ही टाइमपास वाला रिलेशनशिप बना ले। सीरियस होने की वैसे भी कौन सा तुझे आदत है।” विवेक ने उसे समझाते हुए कहा। 


श्रेयांश ने कुछ नही कहा। उसने अपनी बीयर खत्म कर सोफे से उठते हुए विवेक से कहा, “चल एक बाइक रेस हो जाए।” 


श्रेयांश सबको बाय कहकर विवेक के साथ उस कमरे से बाहर आ गया। ये कमरा उनके ही किसी एक दोस्त का था जो उसने अपने अकेले रहने के लिए खरीदा था। वो अकेला रहता था इसलिए सभी हर बार उसके इस कमरे में आकर ही पार्टी किया करते थे। 


श्रेयांश और विवेक ने लिफ्ट से नीचे आकर हेलमेट पहनकर अपनी बाइक स्टार्ट की और बहुत ही तेज़ स्पीड में बाइक चलाते हुए वहाॅं से निकल गए। 


एक खाली सड़क पर आकर श्रेयांश ने अपनी बाइक की स्पीड विवेक की बाइक की स्पीड से तेज की और एकदम से विवेक की बाइक के सामने साइड से घुमाकर रोक दी। विवेक ने बहुत ही मुश्किल से ब्रेक लगाई। उसकी बाइक का टायर बिल्कुल श्रेयांश के पैर के करीब आकर रुका।

“तू पागल हो गया है क्या। अभी एक्सीडेंट हो जाता।” विवेक ने हेलमेट उतारकर चिल्लाते हुए कहा। श्रेयांश ने भी अपना हेलमेट उतार दिया। 


“फन करवाना चाह रहा था तुझे।” श्रेयांश ने बिल्कुल अलग ही अंदाज में आगे बाइक के हैंडल की तरफ झुककर अपनी दोनों बाजू बाइक के हैंडल के ऊपर टिकाकर विवेक को देखते हुए कहा। 


उसकी बात सुनकर विवेक को गुस्सा आ गया और उसने कहा, “तेरे इस फन के चक्कर में अभी हम घर के बजाय सीधा ऊपर पहुॅंचते।” 


“ज्यादा से ज्यादा मर ही जाते ना। जीकर भी क्या कर पा रहे है हम। कुछ बन पाए है जीकर आजतक पैरेंट्स की नजरों में। मरकर कम से कम भूत तो बनेंगे।” श्रेयांश ने हॅंसते हुए कहा। 


“तेरी इस सोच को तो सलामी दिलवानी चाहिए।” विवेक ने कहा तो श्रेयांश और ज्यादा हॅंसने लगा जिसे देख विवेक ने चिढ़ते हुए कहा, “तू ही मर इतनी जल्दी। मैं तो गिनती भी भूल चुका हूॅं की कितनी बार ऐसा करकर तूने खुदको और मुझे मारने की कोशिश की है। देख भाई, तू मर सकता है पर मुझे जीना है क्योंकि मेरे पास जीने की बहुत सारी वजह है।”  


“और हर बार हम दोनों बच जाते है और ये जीने की वजह क्या है। ऐसा सब भी सोचता है तू।” श्रेयांश ने कहा। 


विवेक ने हेलमेट फिर से पहनते हुए कहा, “ये सारे सीरियस टॉपिक्स है और तू रहता है सीरियसनेस से कोसों दूर वरना एक बार जीने की वजह ढूंढने की सोचे तो पता लगे कि किसी के लिए जीना भी कितना खूबसूरत होता है।” 


“मेरे पास तो सारी वजह मरने की है और किसी के लिए जीना। ये मुझसे नही होगा। मैं अगर जी रहा हूॅं तो सिर्फ खुद के लिए और मरना चाहता हूॅं तो वो भी खुद के लिए। मैं किसी और के लिए न जीना चाहता हूॅं, न मरना और वैसे भी अगर ये सोच रही तो सिर्फ कुछ वक्त तक रहेगी। जैसे चार दिन की चाॅंदनी। उसके बाद फिर अंधेरी रात है।” श्रेयांश ने मुस्कुराकर कहा तो विवेक ने कहा, “तेरा कुछ नही हो सकता।” 


“हो सकता है। मैं मरने के बाद भूत बन सकता हूॅं।” श्रेयांश ने कहकर हॅंसते हुए अपनी बाइक स्टार्ट की। विवेक ने भी अपनी बाइक स्टार्ट की और वो दोनों फिर से बाइक चलाने लगे। 


एक मोड़ पर आकर दोनों ने अपनी बाइक रोकी क्योंकि यहाॅं से उन दोनों के घर जाने का रास्ता अलग था। श्रेयांश ने विवेक को बाय कहा और उनके रास्ते अलग हो गए। 


कुछ वक्त बाद श्रेयांश ने बाइक अपने घर के सामने रोकी। रात के दो बज रहे थे इसलिए उसे लगा कि शिवम अभी तक सो चुके होंगे और ये सच भी था लेकिन उसकी बाइक की आवाज इतनी तेज थी की वो उससे जाग चुके थे। उन्हें मालूम था की श्रेयांश पाइप चढ़कर बालकनी से घर के अंदर आएगा क्योंकि घर मेन डोर तो बंद था। वो उठकर अपने कमरे से बाहर आए और श्रेयांश का अच्छे से स्वागत करने के लिए एक डंडा लेकर बालकनी के सामने जाकर खड़े हो गए। 


श्रेयांश ने अपनी बाइक पार्क की और हेलमेट उतारकर रखते हुए कहा, “मेन डोर तो बंद होगा। चलो श्रेयांश बेटा, पाइप चढ़कर घर में एंट्री ले।” 


पाइप की तरफ आकर वो उसके ऊपर चढ़ने लगा। जैसे ही वो चढ़ते हुए बालकनी तक पहुॅंचा, सामने शिवम को खड़ा हुआ देखकर हैरान हो गया। शिवम के हाथ पीछे की तरफ थे क्योंकि उन्होंने हाथ में डंडा पकड़ा हुआ था। उनके हाथों को पीछे की तरफ देखकर श्रेयांश समझ गया की उनके हाथ में डंडा है जो उसका पीटकर स्वागत करने के लिए उन्होंने पकड़ा हुआ है। श्रेयांश बस दुआ करने लगा की हर बार की तरह ज्योति आकर उसे बचा ले।


Continued In आर्ज-ए-इश्क - 3


Sunday, 26 July 2026

आर्ज-ए-इश्क - 1



इंदौर के एमरल्ड हाई स्कूल में इस वक्त पेरेंट्स टीचर्स मीटिंग चल रही थी। स्कूल में पेरेंट्स अपने बच्चों के साथ आ जा रहे थे लेकिन मिस्टर एंड मिसेज शर्मा अकेले ही आए थे। जैसे ही वो अपने बेटे की टीचर से मिलकर उनके सामने बैठे, टीचर ने कहा, “मिस्टर एंड मिसेज शर्मा, श्रेयांश पढ़ाई में बहुत अच्छा है। इस बात पर तो कोई डाउट ही नही है लेकिन उसकी बस एक कंप्लेंट है। वो ये है की जब भी हम कोई टॉपिक क्लास में बच्चों के लिए रिपीट करते है तो उसे वो बोरिंग लगता है और वो उस वजह से क्लास में अटेंटिव होकर नही बैठता। हम पूछे तो कहता है की वो टॉपिक वो पहले ही पढ़ चुका है।”


“आप टेंशन मत लीजिए मैम। मैं बात करती हूॅं श्रेयांश से आज ही।” मिसेज शर्मा ने कहा। 


एक कमरे में एक लड़का, जिसकी उम्र लगभग तेरह साल के करीब होगी, चुपचाप अपनी माँ, ज्योति और अपने पिता, शिवम के सामने नज़रे झुकाए खड़ा था। उसके खड़े होने के अंदाज से ही पता चल रहा था की उसे इस वक्त बहुत ज्यादा डांट पड़ रही है। 


“श्रेयांश, ऐसे चुपचाप खड़े रहोगे या बताओगे की ये सब क्या है?” ज्योति ने उससे तेज आवाज़ में पूछा। 


श्रेयांश ने नज़रें उठाकर ज्योति को देखा और कहा, “मुझसे अब पढ़ाई नही होती है, मम्मा।” 


उसकी बात सुनकर ज्योति ने हैरान होकर कहा, “क्या मतलब पढ़ाई नही होती है। तुम तो इतने इंटेलिजेंट हो। इतने अच्छे मार्क्स आते है तुम्हारे।” 


“मम्मा मुझे सेम टॉपिक्स बार बार पढ़ना बोरिंग लगता है और मैं पढ़ाई के लिए नही, स्पोर्ट्स के लिए बना हूँ बाकी एग्जाम्स की टेंशन आप न करें। मैं क्लियर करलूॅंगा।” श्रेयांश ने कॉन्फिडेंस के साथ कहा। उसकी बात सुनकर ज्योति ने अपने साथ बैठे शिवम को देखा और उनसे कहा, “आप भी कुछ कह दीजिए इससे। सबकुछ मैं ही बोलती रहूॅं।” 


“मैं अभी क्या कह सकता हूँ। इसकी उम्र ही ऐसी चल रही है कि अभी इसे हम कुछ भी कह दे, इसे बिल्कुल समझ नही आएगा।” शिवम ने कहा।


ज्योति ने श्रेयांश को वापिस देखा और कहा, “तुम स्पोर्ट्स के लिए बने हो। सिर्फ कुछ ट्रॉफीज और मेडल्स से तुम कोई इतने बड़े एथलीट नही बन गए हो। पढ़ाई के टॉपिक्स रिपीट करना भी जरूरी है। अभी से ये हाल है। पता नही आगे क्या क्या दिखाओगे तुम हमें।” 


उस दिन श्रेयांश ने अच्छे से ज्योति से अपना डांट का कोटा पूरा किया। 


***


वो अपने हाथों में कोई स्टोरी बुक पकड़े हुए आराम से उसे पढ़ने में खोई हुई थी। बारह साल की उस लड़की को उस वक्त कोई भी देखता तो यही सोचता की उस स्टोरी बुक के अंदर की दुनिया ही उसकी हकीकत की दुनिया है जो काफी हद तक उसके खुद के लिए सही भी था। वो अपनी हकीकत को नजर अंदाज कर सबसे ज्यादा कहानियों की दुनिया में रहना पसंद करती थी। 


“गुरनूर, तुम्हें क्या मिलता है ये कहानियाँ पढ़कर। ये सब तो हकीकत भी नही है?” उसकी सबसे अच्छी दोस्त, रावी ने उसके पास बैठते हुए पूछा।


“मेरे लिए तो यही हकीकत है। अगर असल हकीकत की दुनिया देखी तो वो बहुत बुरी है। कम से कम मेरी इस झूठी हकीकत में सुकून तो है।” गुरनुर ने मुस्कुराते हुए कहा।  


“तुम अभी से ही बहुत गहरी बातें करती हो।” रावी ने कहा जिसे सुन गुरनूर मुस्कुरा उठी। 


***


उन्नीस साल का श्रेयांश आज पहली बार ओपन माइक के स्टेज पर अपना पहला स्टैंड अप कॉमेडी का परफॉर्मेंस देने जा रहा था क्योंकि पिछले कुछ दिनों में वो एक फेमस स्टैंड अप कॉमेडियन से काफी प्रभावित हुआ था। वैसे तो पिछले छह सालों में उसने स्कूल में बहुत सारी फील्ड्स जैसे पेंटिंग, म्यूज़िक, हर किस्म के स्पोर्ट्स जैसे बास्केटबॉल, टेनिस, गोल्फ और करांटे इत्यादि में अपना इंटरेस्ट दिखाया। इन सब में से उसने करांटे पूरे पाँच साल तक किया था। इन्हीं स्पोर्ट्स की वजह से उसका कमरा मेडल्स और ट्रोफीज से भरा पड़ा था लेकिन ये सब सिर्फ कुछ कुछ वक्त के लिए रहता था। वो करांटे को छोड़कर कभी किसी और फील्ड, और चीज को लेकर ज्यादा सीरियस नही हुआ लेकिन स्कूल से निकलते ही उसने वो भी छोड़ दिया। पढ़ाई उसे काफी हद तक बोरिंग लगती थी इसलिए वो हर टॉपिक को बस एक बार ही पढ़ा करता था और इसके बावजूद भी उसके अच्छे नंबर आते थे क्योंकि वो बहुत ज्यादा इंटेलिजेंट था। उसकी याद रखने की क्षमता इतनी अच्छी थी की एक बार अगर वो कुछ पढ़ लेता तो वो उसे याद रहता था। 


उसने स्टैंड अप कॉमेडी शोज करते हुए ही साथ में अपनी ग्रेजुएशन खत्म की थी जिससे उसके मां बाप को यकीन हो गया था की उनका बेटा अब इस चीज को लेकर सीरियस है क्योंकि उसने पूरे तीन साल ये करते हुए निकाल दिए थे। 


स्टैंड अप कॉमेडी करते हुए उसे पूरे तीन साल हो चुके थे लेकिन उसे इतनी ज्यादा कामयाबी नही मिली थी जिसकी वजह से उसके पिता चाहते थे की वो किसी जॉब करने को लेकर सीरियस हो लेकिन उन्हें मालूम था की ऐसा कभी नही होने वाला है। 


एक कमरे में कुछ लड़के बैठकर पार्टी कर रहे थे। उन्हीं के बीच श्रेयांश भी बैठा हुआ था। ये सभी लड़के श्रेयांश के दोस्त थे और इस वक्त अपनी अपनी गर्लफ्रेंड्स के बारे में बातें कर रहे थे। श्रेयांश को इन सब में कोई इंटरेस्ट नही था क्योंकि कॉलेज के पूरे तीन सालों में उसने कोई गर्लफ्रेंड् नही बनाई थी हालांकि कॉलेज में बहुत सारी लड़कियां उसकी गर्लफ्रेंड बनना चाहती थी जिसकी वजह थी उसकी पर्सनेलिटी। तेरह से बाइस साल का होने तक उसके लुक्स में काफी ज्यादा बदलाव आए थे। छह फीट के करीब की हाइट और उसके हैंडसम लुक्स ने उसे काफी आकर्षक बना दिया था। 


बातें करते हुए श्रेयांश के सबसे अच्छे दोस्त, विवेक ने उसकी तरफ देखकर शरारत से कहा, “अपने ग्रुप में एक ही बंदा है जो सिंगल है।”


सभी ने श्रेयांश की तरफ देखा जो मजे से सोफे पर बैठे हुए बीयर पी रहा था। उसके अंदाज से ही लग रहा था की उन सबकी बातों का उसके ऊपर कोई असर नही हो रहा है। 


Continued In आर्ज-ए-इश्क - 2


Saturday, 25 July 2026

जिंदा रहती है हमेशा मोहब्बतें - 38


 

अयांश जल्दी ही कबीर के साथ अपने घर पहुँच गया। राकेश, रिद्धिमा और नुपुर उस वक्त लिविंग रूम में बैठे हुए थे। जैसे ही उन सबने अयांश को देखा, वो सब एक पल के लिए खुश हो गए ये सोचकर की अयांश वापिस आ गया है पर जब उन्होंने अयांश के चेहरे पर गुस्से को देखा तो वो सब घबरा गए। 


अयांश के पीछे कबीर भी खामोशी के साथ खड़े थे। अयांश राकेश के सामने गया और कहने लगा, “आपको मैंने आहना का ख्याल रखने के लिए कहा था। उसकी जान लेने के लिए नही।” 


राकेश ने जैसे ही ये सुना उन्होंने हैरानी से अयांश को देखा ये सोचते हुए की उसे इस बारे में कैसे पता चला। उन्हें ऐसे देखकर अयांश ने कहा, “मैं आपसे सच जानना चाहता हूँ की क्यों किया आपने ऐसा।” 


राकेश अयांश से नजरें नही मिला पा रहे थे। अयांश को गुस्सा आने लगा तो उसने कहा, “मैंने आपसे कुछ पूछा है पापा। आखिर आपकी ऐसी कौन सी मजबूरी थी की आपने नुपुर का साथ दिया आहना को मारने के लिए।” 


“अपने बिज़नेस के लिए।” राकेश ने अचानक से कहा तो अयांश और कबीर चौंक गए। राकेश ने आगे कहा, “तुम्हारे मामा ने रिद्धिमा के कहने पर एक लेटर ऑफिस में भिजवाया था जिसमें लिखा था की जो बिजनेस तुम्हारे मामा ने मुझे दिया था, वो उसे वापिस लेना चाहते है। कबीर के सामने की ही बात है ये। मुझे पता था ये सब तुम्हारी माँ ने किया है इसलिए मैं उससे पूछने घर आया की उसने ये क्यों किया। उस वक्त इसने मुझसे कहा की ये मेरे बिज़नेस को कुछ नही होने देगी बस मुझे आहना को मारने में इनकी मदद करनी थी। तुम्हें कुछ भी करके दूर भेजना था आहना से जिससे तुम उसे बचा न पाओ। मैं उस बिज़नेस को जाने नही देना चाहता था क्योंकि ये मेरी मेहनत है और तुम्हारा फ्यूचर। इसलिए मैंने आहना और अपने बिजनेस में से बिजनेस को चुना।” 


“एक बिज़नेस के लिए आपने आहना की जान ले ली। इतना-सा भी मेरा ख्याल नही आया आपके मन में की मुझे ये सब पता चलेगा तो मेरे ऊपर क्या बीतेगी और क्या गलती थी उसकी, इतना प्यार करती थी वो आपसे।” अयांश ने कहा। 


“इसे कुछ फ़र्क नही पड़ता, अयांश।” कबीर अंदर आए और राकेश के सामने आकर कहने लगे, “सही कहा था तुमने आहना से राकेश। लोग बिजनेस और पैसे के लिए इंसानियत की हदें भी पार कर देते है। तुमने भी यही किया और मार डाला मेरी बच्ची को। उस बच्ची को जिसने तुम्हें अपना पिता माना था।” 


राकेश ने अपनी नजरें झुका ली क्योंकि उन्हें बहुत ज्यादा पछतावा हो रहा था। अयांश नुपुर के सामने आया और उससे कहा, “और तुम, नुपुर। तुमसे तो कुछ कहना ही सही नही है। आखिरकार, तुम जो चाहती थी वो कर ही लिया तुमने।” 


नूपुर ने उसे देखा और गुस्से से कहा, “वो आहना यही डिजर्व करती थी। बहुत शौक था ना उसे मेरे और तुम्हारे बीच आने का इसलिए मैंने उसे हमेशा हमेशा के लिए तुमसे दूर भेज दिया।” 


“तुम आहना के लिए मेरा प्यार खत्म नही कर पाई इसलिए तुमने उसे ही मुझसे दूर कर दिया क्योंकि मेरी आहना मुझसे किसी भी हालत में दूर नही जाना चाहती थी और वो जिंदा रहने के लिए लड़ती भी पर शायद उसे पता लग गया था की ये दुनिया मुझे उसके साथ नही देख सकती और उसे मुझसे दूर करने के लिए बार बार सब उसे तकलीफ पहुँचाएंगे इसलिए उसने हार मान ली जिंदगी से और चली गई वो मुझे छोड़कर पर वो मुझसे दूर जाकर भी कभी मुझसे दूर नही होगी। वो मेरे अंदर हमेशा जिंदा रहेगी। मेरे दिल में, मेरी सांसों में और मेरी आँखों में भी। कभी भी अलग नही होगी वो मुझसे।” अयांश की ये बातें सुनकर नुपुर ने गुस्से से उसे देखा तो अयांश ने कहा, “पर तुम्हें खुद से अलग करने जा रहा हूँ मैं। मैं अपनी आहना के बिना रहूंगा और तुम मेरे बिना रहना।” 


अयांश ने राकेश और रिद्धिमा को देखा और उनसे कहा, “मैं कुछ दिनों बाद हमेशा के लिए अमेरिका चला जाऊंगा आप दोनों को छोड़कर मॉम डैड क्योंकि आप दोनों भी मेरी नज़रों में आहना के उतने ही गुनहगार है जितनी नुपुर।” 


“अयांश बेटा, तुम…,” राकेश ने अयांश को देखकर कहना चाहा पर अयांश ने उनकी बात बीच में ही काटते हुए कहा, “मैं कुछ नही सुनना चाहता पापा। चाहूँ तो आप सबको अरेस्ट करवा सकता  हूँ। प्रूफ भी है मेरे पास पर जाते जाते आहना ने ये वादा लिया था की किसी के साथ कुछ भी नही करना है क्योंकि वो खुद तकलीफ सह सकती है पर अपनी वजह से किसी को तकलीफ में नही देख सकती इसलिए अब आपकी सजा यहीं है की आपको मुझसे दूर होना होगा। जा रहा हूँ मैं हमेशा हमेशा के लिए अमेरिका। आपका वो बिजनेस जिसके लिए आपने मेरी आहना को मुझसे दूर कर दिया, आप ही रखेंगे अब उसे। मुझे नही चाहिए वो।” 


अयांश वहाँ से चला गया। कबीर भी उसके पीछे पीछे घर से बाहर आ गए। उसके जाने के बाद नुपुर को घर लौटना पड़ा क्योंकि अयांश ने उसे डायवोर्स दे दिया था पर अंबर ने उसे अपने घर में रहने की परमिशन नही थी। नुपुर को डायवोर्स देने के कुछ दिनों बाद ही अयांश अमेरिका जाने के लिए निकल गया। वो फ्लाइट में बैठे हुए खिड़की से आसमान को देख रहा था की तभी उसे वो पल याद आ गया जब अपने बर्थडे के एक दिन पहले वो आहना के साथ उसके कमरे में बैठा हुआ था और आहना ने उसे एक नॉवेल के बारे में बताते हुए उससे कहा था की, “हमारी कहानी तो बहुत खूबसूरत है क्योंकि हमारा प्यार तो पूरा होगा ना।” 


ये याद करते ही अयांश की आँख में से आँसू निकलकर गाल पर बह गया। उसने उसे जल्दी से पोंछा। 


“हमारी कहानी बेशक दुनिया की नजरों में अधूरी है पर मैं इस कहानी को पूरा करूंगा आहना। हमारी कहानी अधूरी रहकर भी पूरी होगी। दुनिया के लिए तुम मेरी जिंदगी से गई हो पर मैं तुम्हें अपनी जिंदगी में हमेशा रखूंगा।” अयांश ने अपने मन में कहा जैसे की वो आहना से ही ये सब कह रहा हो।


अमेरिका, वर्तमान समय


आहना का उसको छोड़ कर जाना याद करते हुए अयांश की आँखें आँसूओं से भरी हुई थी। वो खड़े होकर आहना की तस्वीर के पास गया और छूते हुए कहने लगा, “मैंने अपना वादा निभाया आहना। तुम मुझमें हमेशा जिंदा रहोगी और मैं अपनी आखिरी सांस तक सिर्फ तुम्हारा रहूंगा। किस्मत की मर्जी थी तुम्हें मुझसे दूर करना पर मेरी मर्जी है तुम्हारे साथ जीना। अपनी आखिरी सांस तक तुम्हारी उन यादों के साथ जीना जो हमने बहुत सारे खूबसूरत लम्हों को जीकर बनाई थी। आई लव यू, आहना।” 


अपने आँसू पोंछते हुए अयांश जैसे ही मुड़ा, हैरान रह गया क्योंकि उसके सामने आहना खड़ी थी जो मुस्कुराते हुए उसे देख रही थी। उसने सफेद रंग का गाउन पहन रखा था जिसमें वो बहुत खूबसूरत लग रही थी। अयांश उसे देखकर मुस्कुराने लगा। उसने आहना के करीब आने की कोशिश की तो आहना ने कहा, “रूक जाओ, अयांश।” 


अयांश वहीं रुक गया तो आहना ने कहा, “तुम मुझे देख सकते हो और मेरे करीब होने के एहसास को महसूस कर सकते हो पर मुझे छू नही सकते क्योंकि मैं अब बस एक परछाई हूँ। तुमसे कहा था ना की खुदको कभी भी अकेला मत समझना क्योंकि मेरे पास होने का एहसास तुम्हें होता रहेगा। जैसे तुमने मुझे जिंदा रखा हुआ है वैसे ही मैं भी हमेशा एक परछाई बनकर तुम्हारे साथ रही  हूँ।”


“तुम्हें नही छोड़कर जाना चाहिए था मुझे आहना।” अयांश ने कहा। उसकी आवाज में एक दर्द था।


“ये मेरे हाथ में नही था अयांश। मैं तुम्हें इस हालत में छोड़कर कभी नही जाना चाहती थी पर शायद हमारी किस्मत में यही लिखा था। अयांश, तुमने मुझसे एक बार कहा था की अगर हम किसी से प्यार करते है तो उस प्यार को जिंदा रखते हुए उसे खुशी से याद करना चाहिए। उदास होकर नही। तो तुम भी मुझे खुशी से याद किया करो। इन आँसूओं के साथ नही क्योंकि मैं कहीं नही गई  हूँ। तुमने हमारे प्यार को जिंदा रखा हुआ है ना। उस प्यार के साथ मैं भी तुम्हारे अंदर जिंदा हूँ।” आहना ने कहा। अयांश खामोशी से आँखों में आँसूओं के साथ उसे देखता रहा। 


“अयांश, आज मैं तुमसे फिर से एक वादा लेना चाहती हूँ। मुझसे वादा करोगे?” आहना ने पूछा तो अयांश ने हाँ में सिर हिला दिया। 


“वापिस चले जाओ अयांश। वहाँ जहाँ हमारी यादें रहती है और माफ करदो अब सबको। किसी और के लिए नही अपने लिए। अगर तुम सबको माफ करदोगे न तो खुदको भी इस दर्द से रिहा कर पाओगे जिसे तुम हर रात महसूस करते हो। वो दर्द जिसकी वजह से मुझे भी तकलीफ होती है क्योंकि मैं तुम्हें ऐसे नही देख सकती।” आहना ने कहा तो अयांश ने उससे ये वादा कर दिया की वो वापिस चला जाएगा। 


आहना ने उसकी तरफ मुस्कुरा देखते हुए “आई लव यू” कहा और फिर अयांश की आँखों के सामने से ओझल हो गई। 


“आई लव यू, टेडी बियर।” अयांश ने कहा और आहना की तस्वीर को देखकर मुस्कुरा उठा।


दो दिन बाद अयांश इंडिया वापिस आ गया। वो सबसे पहले आहना के घर जाकर कबीर से मिला जो उसे देखकर बहुत खुश थे। कबीर आजतक राकेश को माफ नही कर पाए थे पर उनकी अयांश से कोई नाराज़गी नही थी। 


कबीर से मिलने के बाद अयांश अपने घर गया। उसके यहाँ से जाने के बाद उसके घर में पहले जैसा कुछ भी नही रहा था। राकेश ने आहना के साथ जो भी किया था, उसके पछतावे में जीते हुए वो बीमार रहने लगे थे और रिद्धिमा अयांश का जाना बर्दाश्त नही कर पाई थी इसलिए वो डिप्रेशन में रहने लगी थी। 


राकेश और रिद्धिमा लिविंग रूम में बैठे थे की तभी उन्हें घर के बाहर एक गाड़ी के रुकने की आवाज आई। उन दोनों ने बाहर आकर देखा तो उनकी आँखों में आँसू आ गए। अयांश उनके सामने खड़ा उनकी तरफ ही देख रहा था। रिद्धिमा आकर उसके गले लग गई और रोने लगी। उन्होंने उसके चेहरे को अपने हाथों में थामा और उसे ध्यान से देखने लगी। राकेश भी उनके पास आए और अयांश को गले से लगा लिया। उनके आँसू बता रहे थे की उन्होंने अयांश के लौटकर आने का कितना इंतजार किया था। 


वो दोनों उसे घर के अंदर ले गए। जब अयांश ने उनसे कहा की उसने उन्हें माफ कर दिया है तो वो दोनों खुश हो गए। वो दोनों इतने वक्त के बाद मुस्कुरा रहे थे। उन दोनों ने अयांश के साथ बहुत सारी बातें की। रिद्धिमा ने उस दिन सारा खाना अयांश की पसंद का बनाया। जैसे ही अयांश अपने कमरे में गया, उसने देखा की उसका कमरा पहले जैसा ही था। कुछ भी नही बदला था। 


रिद्धिमा और राकेश ने खाने के बाद उसे सोने के लिए कहा क्योंकि वो सफर से काफी थक चुका था। 


अगली सुबह घर में सब लोग हैरान थे क्योंकी उन्हें इतने वक्त के बाद राकेश पहले जैसे देखने के लिए मिल रहे थे क्योंकि अयांश के जाने के बाद राकेश ने खुद को पूरी तरह से बदल लिया था लेकिन आज वो पहले की ही तरह सुबह सुबह बाहर लॉन में आकर बैठ गए थे और रिद्धिमा जो उनसे पहले हर वक्त लड़ती रहती थी, वो अब उनकी चाय खुद लेकर आ रही थी। रिद्धिमा ने आकर चाय की ट्रे टेबल पर रखी और वो दोनों हँसते हुए चाय पीने लगे। कुछ वक्त के बाद अयांश भी आ गया और उनसे बातें करने लगा। अयांश के आ जाने से तो जैसे उनके घर में खुशियां लौट आई थी। 


दिवाली आने वाली थी इसलिए रिद्धिमा और राकेश ने तय किया की इस बार वो फिर से दिवाली धूम धाम से मनाएंगे। अयांश भी उन्हें खुश देखना चाहता था इसलिए वो भी मान गया। सभी कुछ दिन पहले से ही दिवाली की तैयारियों में लग गए और रिद्धिमा ने अच्छे से पूरे घर को दिवाली के लिए सजवाया। 


दिवाली की शाम को उनके घर जितने मेहमान आए थे, सभी एंजॉय कर रहे थे पर अयांश अकेला खड़ा सबको देख रहा था। जब उसकी नज़र अपने घर के बाहर बनी सीढ़ियों पर गई तो वो मुस्कुराने लगा। उसे वो पल याद आ गया जब दिवाली पर उसने और आहना ने वहाँ एक साथ बैठकर दीए जलाए थे और उसने आहना के साथ फ्लर्ट भी किया था। इतने दिनों में पहली बार वो आहना को खुश होकर याद कर रहा था। वो ये सब सोचते हुए मुस्कुरा रहा था की तभी उसे किसी ने बुलाया। 


अयांश ने आवाज वाली दिशा में देखा तो हैरान रह गया। वहाँ कबीर खड़े थे। अयांश ने उन्हें इनवाइट किया था पर उसे उम्मीद नही थी की कबीर आएंगे। वो जल्दी से उनके पास गया और उनके पैर छूकर उन्हें हैप्पी दिवाली कहा। राकेश ने कबीर को वहाँ देखा तो उन्हें अपनी आँखों पर यकीन ही नही हुआ। कबीर ने आगे बढ़कर राकेश को गले लगा लिया। 


राकेश उनसे अलग होकर रोने लगे तो कबीर ने कहा, “क्या कर रहे हो, राकेश। खुशी का मौका है ये। जो कुछ भी हुआ उसे भुलाकर एक नई शुरुआत करते है।” 


राकेश ने हाँ में सिर हिलाते हुए कबीर को फिर से गले लगा लिया। अयांश भी उन्हें साथ देखकर बहुत खुश था। वो दोनों जब अलग हुए तो अयांश को उनके सामने खड़ी आहना दिखाई दी जो उन सबको देखकर मुस्कुरा रही थी। 


“खुश हो ना अब आहना तुम।” अयांश ने मन ही मन में उससे पूछा तो आहना ने मुस्कुराते हुए हाँ में सिर हिला दिया और फिर अयांश की नज़रों के सामने से ओझल हो गई। 


दिवाली के बाद कबीर ने राकेश के साथ उनके घर आकर रहना शुरू कर दिया था क्योंकि राकेश और अयांश दोनों ही नही चाहते थे की कबीर अकेले रहे। रिद्धिमा भी इसके लिए खुशी खुशी मान गई। 


अयांश ने राकेश का बिजनेस संभालना शुरु कर दिया था और अब राकेश घर में रहकर आराम करते थे। रिद्धिमा चाहती थी की अयांश शादी करके सेटल हो जाए और उन्होंने उससे इस बारे में बात भी की पर अयांश ने ये कहकर मना कर दिया की वो सिर्फ आहना का है। रिद्धिमा ने उसके बाद उससे इस बारे में कोई बात नही की क्योंकि वो अयांश को कोई भी तकलीफ नही पहुँचाना चाहती थी। 


एक दिन ऑफिस के बाद शाम में अयांश उसी पार्क में आया, जिसमें वो और आहना बचपन से आया करते थे और बैंच पर जाकर बैठ गया। वो सामने खेलते हुए बच्चों को देख ही रहा था की तभी उसे ऐसा लगा की किसी ने उसके हाथ को पकड़ा है। उसने देखा तो उसके साथ आहना बैठी हुई थी जो मुस्कुराते हुए प्यार से उसकी आँखों में देख रही थी। तभी अयांश का ध्यान उनके साइड वाली बैंच पर गया और उसने अपने आप को और आहना को वहाँ बैठे हुए देखा जब वो दोनों ही कॉलेज के बाद अकसर इसी पार्क में आकर बैठा करते थे और बहुत सारी बातें किया करते थे। अयांश उस बैंच की तरफ देखकर मुस्कुराया और कहने लगा, “सच ही है ये की इस दुनिया से प्यार करने वाले तो जा सकते है पर जिंदा रहती है हमेशा, मोहब्बतें।” 

समाप्त!


(जल्द ही मुलाक़ात होगी नई कहानियों के साथ).