श्रेयांश के दिल और दिमाग के बीच में जंग चल रही थी क्योंकि उसे लग रहा था वो गुरनूर के साथ गलत कर रहा है और ये होना ही था क्योंकि बेशक उसका साथ विवेक जैसे दोस्तों का हो पर उसके अंदर संस्कार तो उसकी माँ के दिए हुए थे जो उसे ये इजाजत नही देते थे की वो किसी लड़की के दिल के साथ खेले पर इस वक्त वो विवेक के प्रभाव में भी था जो उसे गुरनूर के साथ सीरियस होने की इजाज़त नही देता था।
ये सब सोचकर उसका मूड खराब हो चुका था पर उसने इस बारे में गुरनूर से कुछ भी कहना ठीक नही समझा क्योंकि वो गुरनूर के साथ पहली बार ऐसे डेट पर आया था इसलिए वो उसका भी मूड खराब नही करना चाहता था।
रास्ते भर बस गुरनूर बिना कुछ कहे श्रेयांश की करीबियों के एहसास को महसूस करती रही। थोड़ी देर बाद श्रेयांश ने बाइक एक बहुत ही खूबसूरत जगह पर लाकर रोकी।
इस जगह पर काफी हरियाली थी जिसे देखकर गुरनूर को अच्छा लग रहा था। बाइक से उतरकर गुरनूर उस जगह को देखने लगी। वो सच में बहुत खुश थी। श्रेयांश भी बाइक पार्क कर उसके पास आया और उसने थोड़ा जबरदस्ती गुरनूर के आगे मुस्कुराने का नाटक करते हुए कहा, “चले अंदर।”
श्रेयांश अपने खराब मूड के चलते गुरनूर के आगे जबरदस्ती मुस्कुराने की कोशिश कर रहा था पर गुरनूर ने अपनी खुशी के चलते इस बात पर ध्यान ही नही दिया।
श्रेयांश गुरनूर को नीचे ले आया जहाँ सामने एक बहुत ही खूबसूरत झरना था। इस झरने का नाम पातालपानी झरना था। उस झरने को देखकर गुरनूर और ज्यादा खुश हो गई क्योंकि उसने पहली बार अपनी जिंदगी में झरना देखा था। ऊपर से वो श्रेयांश के साथ थी। गुरनूर ने मुस्कुराते हुए श्रेयांश का हाथ थाम लिया पर श्रेयांश को गुरनूर की मुस्कुराहट और गुरनूर का इस तरह से उसका हाथ पकड़ना बेचैन कर रहा था। उसने गुरनूर से कुछ नही कहा, बस चुपचाप उसके साथ चलता रहा। वहीं गुरनूर को भी खामोशियाँ ज्यादा भा रही थी।
वो श्रेयांश के साथ पातालपानी झरना घूम रही थी की तभी उसने एक प्रेमी जोड़े को देखा। उन्हें देखकर ऐसा लग रहा था जैसे उनकी नई नई शादी हुई है। उसने उन्हें श्रेयांश को दिखाते हुए कहा, “श्रेयांश, शादी के बाद हम भी इतने ही अच्छे लगेंगे न साथ में।”
श्रेयांश का मूड तो आगे ही खराब था। उसे गुरनूर की ये बात सुनकर गुस्सा भी आने लगा जिसे उसने कंट्रोल करते हुए प्यार से गुरनूर को समझाने के लिए कहा, “गुरनूर, तुम ये शादी के बेफिजूल ख़्वाब देखना बंद करो अभी के लिए। मैं इन सब के लिए न अभी तैयार हूँ और न ही इन सब के बारे में सोचना चाहता हूँ। वैसे भी, तुम शायद हमारे रिलीजियस और कल्चरल डिफरेंस को नही देख पा रही हो।”
श्रेयांश ने ये बात इस अंदाज में कही की गुरनूर उसके खराब मूड को समझ ही नही पाई। उसने इस बात पर भी ध्यान नही दिया की श्रेयांश ने अपनी बात में उर्दू के शब्दों का इस्तेमाल किया है। गुरनूर ने मुस्कुराते हुए श्रेयांश को देखा और कहा, “क्या तुमने ये सब मुझसे अपनी मोहब्बत का इजहार करते वक्त देखा था?”
श्रेयांश के पास गुरनूर के इस सवाल का कोई जवाब नही था इसलिए वो खामोश रहा। उसे खामोश देखकर गुरनूर ने धीरे से उसके करीब आकर उसकी आँखों में देखते हुए कहा, “मेरा दीन और धर्म अब सिर्फ इश्क़ है। वो इश्क़ जिसमें मैंने तुम्हारा सब कुछ अपना बना लिया है। मैं तुम्हारे साथ सबसे पहले रूह के फेरे ले चुकी हूँ। कौन अलग कर सकता है हमें।”
“फिर भी मेरी दुनिया तुम्हारी दुनिया से अलग है।” श्रेयांश ने भी उसकी आँखों में देखते हुए कहा तो गुरनूर ने मुस्कुराकर कहा, “तो फिर दिखाओ कैसी है तुम्हारी दुनिया। तुम्हारी दुनिया का ही तो हिस्सा बनना है मुझे।”
“ये पागलपन है, गुरनूर।” श्रेयांश ने उससे दूर होते हुए गुस्से के साथ थोड़ा तेज आवाज़ में कहा।
गुरनूर ने उसे प्यार से देखते हुए कहा, “ये मेरा विश्वास है जिसकी वजह से मैं तुम्हें रोज़ भगवान से जाकर माँगती हूँ।”
“ये पागलपन है सिर्फ। ऐसा कुछ नहीं होता।” श्रेयांश ने फिर गुस्से से कहा तो गुरनूर ने कहा, “प्यार में पागलपन भी जरूरी होता है। तुम्हें मेरे जैसी मिलेगी क्या कहीं। अब बताओ कब दिखा रहे हो अपनी दुनिया मुझे।”
श्रेयांश को समझ आ गया की अपने इश्क़ के आगे गुरनूर कुछ और नहीं समझने वाली इसलिए उसने अपने गुस्से को शांत करते हुए कहा, “मेरी दुनिया देखने के लिए तुम्हें शाम में आना होगा।”
“मैं संडे की शाम को आ जाऊँगी घर पर कोई बहाना बनाकर।” गुरनूर ने खुश होते हुए कहा।
शाम होने से पहले पहले श्रेयांश ने गुरनूर को घर छोड़ने के लिए बाइक रावी के घर से थोड़ी ही दूरी पर रोकी। गुरनूर ने बाइक से उतरकर मुस्कुराते हुए श्रेयांश को देखा और उसके गले लग गई। श्रेयांश को गुरनूर के ऐसे गले लगाने से बेचैनी तो हो रही थी पर फिर भी उसने गुरनूर को गले से लगा लिया। थोड़ी देर बाद गुरनूर वहाँ से घर के अंदर चली गई।
रात में गुरनूर ने रावी को अपने और श्रेयांश के बीच हुई बातों के बारे में बताया जिसपर रावी ने कहा, “वो सब तो ठीक है लेकिन घर में मम्मी पापा से क्या कहकर जाएँगे।”
“अब कोई बहाना तो बनाना ही पड़ेगा उनके आगे।” गुरनूर ने धीरे से रावी को देखते हुए कहा। दोनों ने बेड पर लेटकर थोड़ी देर तक इस बारे में बात की और फिर सो गई।
संडे वाले दिन सुबह सुबह सभी नाश्ता कर रहे थे। गुरनूर ने रावी को देखा तो रावी ने अपनी पलकें झपकाई और फिर शुभम को देखकर कहा, “पापा, आपसे परमिशन चाहिए थी।”
“किस लिए?” शुभम ने चाय पीते हुए उससे पूछा तो रावी ने कहा, “वो पापा मेरे कॉलेज की फ्रेंड थी ना, राशि। वो यहीं आकर सैटल हो गई थी अपनी फैमिली के साथ। उसने और मैंने मिलकर मूवी देखने का प्लैन बनाया है। मैं गुरनूर को भी अपने साथ ले जाना चाहती हूँ। ये घर पर अकेले मेरे बिना क्या करेगी न। तो अगर आप परमिशन दे देते तो हम दोनों चले जाते। आई प्रॉमिस हम दोनों दस बजे तक घर आ जाएँगे।”
शुभम ने पहले एक नजर गुरनूर को देखा, जो चुपचाप अपना नाश्ता कर रही थी और फिर रावी को देखकर कहा, “ठीक है। तुम दोनों चली जाना और टाइम से घर वापिस आ जाना। कोई प्रॉब्लम हो तो मुझे या नील को फोन कर देना।”
शुभम ने जैसी ही हाँ कहा, गुरनूर मन ही मन में खुश हो गई पर उसने अपनी खुशी अपने चेहरे पर नही आने दी। शुभम से परमिशन मिलने के बाद उसकी एक्साइटमेंट बढ़ गई थी। वो सच में श्रेयांश की दुनिया को देखने और उसका हिस्सा बनने के लिए काफी एक्साइटेड थी। उसे ये भी नही पता था की श्रेयांश की दुनिया उसे पसंद आएगी या नहीं। वो तो बस इतना जानती थी की अपनी मोहब्बत में वो श्रेयांश की दुनिया को भी अपना बना लेगी।
Continued In आर्ज-ए-इश्क - 16






