गुरनूर इंदौर आ रही है, ये बात सुनकर श्रेयांश हैरान हो गया। उसने गुरनूर से थोड़ी देर बात करने के बाद फोन काट दिया। उसने फोन बेड पर फैंका और फिर बेड के एक कोने में बैठकर अपने दोनों हाथों को आपस में जोड़कर अपनी कोहनियों को घुटनों पर टिकाते हुए आगे की तरफ झुककर अपने हाथों को अपने होठों से लगाते हुए मन ही मन में ऐसे सोचते हुए कहने लगा जैसे वो गुरनूर से कह रहा हो, “क्या पंडित जी ने मुझसे सही कहा था जब मैं मंदिर में गया था। क्या तुम सच में मेरी किस्मत हो गुरनूर जो मुझे मंदिर तक लेकर गई थी और उस दिन मैंने तुम्हारे कहने पर ही भगवान से ये माँगा की वो मुझे तुम्हारे पास भेज दे और अब तुम आ रही हो।”
श्रेयांश यही सोचते सोचते बेड पर लेट गया और जल्दी ही नींद ने उसे अपनी आगोश में ले लिया।
अगले दिन श्रेयांश विवेक और अपने दोस्तों के साथ कैफे में बैठा हुआ था। वो सब आपस में बातें कर रहे थे लेकिन श्रेयांश तो कल रात से ही गुरनूर के ख्यालों में खोया हुआ था। उसका ध्यान उन सबकी बातों में बिल्कुल भी नहीं था। विवेक इस बात को नोटिस कर रहा था की श्रेयांश कहीं और ही खोया हुआ है। बातें करते हुए उनके दोस्त, रवि ने शेयांश के बारे में कुछ कहा और फिर उसे देखकर पूछा, “क्यों श्रेयांश, सही कह रहा हूँ न मैं।”
श्रेयांश ने रवि की बात पर ध्यान ही नहीं दिया। रवि ने एक बार फिर श्रेयांश को आवाज़ लगाकर पूछा पर इस बार भी श्रेयांश कुछ नहीं बोला। रवि ने श्रेयांश के साथ बैठे हुए विवेक और वहाँ बैठे हुए अपने बाकी दोस्तों को देखा। वो सब भी श्रेयांश को ही देख रहे थे। रवि ने फिर से श्रेयांश को देखा और इस बार उसे कंधे से पकड़कर हिलाया तो श्रेयांश ने अपने ख्यालों से बाहर आकर उसे देखते हुए पूछा, “क्या हुआ है?”
रवि ने उसे देखा और कहा, “ये तो तू बता की क्या हुआ है? मैं कब से तुझे आवाज़ लगा रहा हूँ और तू पता नहीं कहाँ खोया हुआ है?”
विवेक को पक्का यकीन था की श्रेयांश गुरनूर के ख्यालों में खोया हुआ है इसलिए इससे पहले की श्रेयांश रवि से कुछ कहता, विवेक ने खड़े होकर उससे कहा, “श्रेयांश, मेरे साथ चल। मुझे तुझसे कुछ बात करनी है।”
श्रेयांश सबको देखकर खड़ा हो गया और विवेक के साथ कैफे के दूसरी तरफ आ गया। विवेक ने उसे देखा और कहा, “चुपचाप पूरी बात बता दे की तुझे हुआ क्या है। ऐसे इतना कहाँ खोया हुआ था तू।”
श्रेयांश ने विवेक को सब बता दिया की कैसे उसे गुरनूर ने मंदिर जाने के लिए कहा था और जब वो मंदिर में गया तो पंडित से उससे क्या कहा और अब सच में गुरनूर इंदौर आ रही है। ये सब सुनकर विवेक भी एक पल के लिए हैरान रह गया लेकिन फिर उसने श्रेयांश को समझाते हुए कहा, “तू इस बारे में ज्यादा बिल्कुल मत सोच। ये सिर्फ़ एक इतेफाक है। जितना सोचेगा उतना उलझेगा और इस रिश्ते को भी उलझाएगा। याद रख, गुरनूर के साथ सीरियस नहीं होना है तुझे।”
श्रेयांश ने विवेक के आगे हाँ में सिर हिला दिया लेकिन उसका दिल ये मानने की कोशिश नहीं कर रहा है। विवेक की बातों की वजह से वो कन्फ्यूज हो गया और उसके दिल और दिमाग के बीच इस बारे में सोचते हुए एक अलग ही लड़ाई चलने लग गई। श्रेयांश अपने दोस्तों की बातों में आकर गुरनूर के साथ इस रिश्ते में तो आ गया था लेकिन अब इस रिश्ते को संभालना था या ऐसे ही गुरनूर के साथ रहना था, ये उसे समझ नहीं आ रहा था। एक तरफ उसका अपना दिल था और दूसरी तरफ विवेक की बातें, उसे नहीं समझ आ रहा था की वो किसकी सुने।
वहीं गुरनूर खुशी खुशी रावी और उसकी फैमिली के साथ इंदौर जाने के लिए अपनी पैकिंग कर रही थी जिसमें शीतल उसकी मदद कर रही थी। उसे अगली सुबह ही इंदौर के लिए निकलना था।
पैकिंग खत्म होने के बाद गुरनूर ने जाकर खाना खाया और फिर सोने के लिए बेड पर आकर लेट गई लेकिन उसे श्रेयांश से मिलने की इतनी एक्साइटमेंट थी की उसे पूरी रात नींद ही नही आई।
सुबह वो विक्रम और शीतल से मिलकर रावी की फैमिली के साथ इंदौर जाने के लिए निकल गई। जैसे ही वो सभी ट्रेन में बैठे, गुरनूर के मन की खुशी और ज्यादा बढ़ गई। रावी तो सबकी नज़रों से बचकर गुरनूर को चोरी छुपके छेड़ रही थी क्योंकि श्रेयांश से मिलने जाने की खुशी गुरनूर के चेहरे पर साफ नज़र आ रही थी।
एक लंबे सफर के बाद वो सभी देर रात इंदौर पहूँच गए। सभी बहुत थके हुए थे और सबको बहुत भूख लग रही थी इसलिए रावी के पिता, शुभम ने घर जाने से पहले बाहर कुछ खाने का फैसला किया।
नील ने गूगल पर देर रात खुलने वाले रेस्टोरेंट के बारे में सर्च किया और सभी स्टेशन से सीधा उस रेस्टोरेंट में आ गए। खाना खाने के बाद सभी घर पहुँच गए।
शुभम ने मधु को देखकर कहा, “अभी सब थके हुए हैं इसलिए अभी आराम करो। सुबह उठकर सैटल करलेंगे घर।”
सभी अपने अपने कमरों में चले गए। गुरनूर ने अपना फोन लेकर श्रेयांश को मैसेज किया, “आ गई हूँ मैं तुम्हारे शहर में।”
श्रेयांश का तुरंत ही रिप्लाई आ गया, “मुझसे कब मिलने आओगी अब।”
“परसो तुम मुझे अपना शहर घुमाने ले चलना। मन तो कल ही मिलने का है पर मुझे रावी और आंटी की हेल्प करनी होगी ना सेटल होने में।” गुरनूर ने मुस्कुराते हुए लिखा।
“समझ सकता हूँ।” श्रेयांश ने लिखा। थोड़ी देर तक वो दोनों ऐसे ही बातें करते रहे और फिर गुरनूर सो गई।
सुबह नाश्ता करने के बाद सभी मिलकर घर को सेटल करने में लग गए जिसमें गुरनूर भी उनका साथ दे रही थी। घर में सारा फर्नीचर और बहुत सी चीज़ें पहले से ही मौजूद थी इसलिए उन्हें बिना किसी परेशानी के सैटल होने में सिर्फ एक दिन लगा।
अगले दिन गुरनूर तैयार होकर नीचे आई। वो आज बहुत खुश थी क्योंकि वो श्रेयांश से मिलने जा रही थी। इसके चलते ही वो खुशी से पूरी रात सो नहीं पाई थी। उसने सबके साथ नाश्ता किया और सबको बाय बोलकर जाने लगी तो शुभम ने उससे पूछा, “कहाँ जा रही हो, बेटा तुम?”
ये सवाल सुनते ही गुरनूर घबरा गई क्योंकि अपनी खुशी में उसने किसी और को अपने बाहर जाने का बताया ही नहीं था और ना ही ये सोचा था की कोई उससे पूछेगा तो वो क्या कहेगी।
Continued In आर्ज-ए-इश्क - 14






