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Friday, 21 August 2026

आर्ज-ए-इश्क - 16


 

नाश्ता करने के बाद गुरनूर रावी के साथ कमरे में आई और शाम को पहनने के लिए कपड़े देखने लगी। उसने दो टॉप उठाकर रावी को दिखाते हुए कहा, “रावी, बता ना मैं इन दोनों में से कौन सा टॉप पहनू आज रात।” 


रावी ने उन दोनों टॉप्स को देखा। एक टॉप गुलाबी रंग का था जिसके ऊपर बस फूलों वाला प्रिंट था और दूसरा नीले रंग का टॉप था जिसके गले पर हल्के नीले और सफेद रंग के फूलों से डिज़ाइन बना हुआ था। रावी ने नीले टॉप को पसंद कर दिया। उसके बाद गुरनूर ने रावी से पूछा, “इसके साथ जींस कौन सी पहनू। ब्लू या ब्लैक?” 


“ब्लैक कलर की।” रावी ने कहा और अपने पहनने के लिए भी कपड़े देखने लगी। 


श्रेयांश गुरनूर को छह बजे लेने आने वाला था इसलिए उसने रावी के साथ चार बजे से तैयार होना शुरू कर दिया। तैयार होने के बाद वो दोनों श्रेयांश के फोन का इंतज़ार करने लगी क्योंकि वो विवेक के साथ उन दोनों को लेने आने वाला था। 


थोड़ी देर बाद ही गुरनूर को श्रेयांश का फोन आ गया और वो सबसे मिलकर रावी के साथ घर से बाहर आ गई। वो दोनों चलकर कॉलोनी से बाहर आ गई जहाँ श्रेयांश और विवेक उन दोनों का इंतज़ार कर रहे थे। 


श्रेयांश की नज़र जब गुरनूर पर गई तो वो उसे देखता ही रह गया। गुरनूर बहुत ही ज्यादा खूबसूरत लग रही थी। गुरनूर श्रेयांश के करीब आकर उसके गले लग गई। विवेक ने ये देखा तो उसने श्रेयांश को मुस्कुराकर देखते हुए आँख मार दी जैसे कहना चाहता हो की ये होते है गर्लफ्रेंड होने के मज़े पर श्रेयांश ने उसके ऊपर ध्यान नहीं दिया क्योंकि उसे पता था की गुरनूर ने उसे मोहब्बत में गले लगाया है और यही वजह थी जो गुरनूर के गले लगते ही उसे सुकून और घबराहट एक साथ महसूस होती थी। गुरनूर की मोहब्बत उसके लिए सुकून तो थी पर इसी मोहब्बत के एहसासों से उसे घबराहट भी होती थी ये सोचकर की वो गुरनूर के जज़्बातों के साथ खेल रहा है। 


गुरनूर ने श्रेयांश से दूर होकर विवेक को हेलो कहा। श्रेयांश ने भी रावी को हेलो कहा। गुरनूर श्रेयांश के पीछे उसकी बाइक पर बैठ गई। उसने रावी को देखा और कहा, “तुम भी विवेक के पीछे बैठ जाओ।”


रावी भी विवेक के पीछे आकर बैठ गई और उसने विवेक को कमर से पकड़ लिया। रावी के ऐसा करने से विवेक को बहुत अलग सा एहसास हुआ। विवेक, जो लड़कियों के साथ प्यार के नाम पर सिर्फ टाइमपास करता था, आज उसे रावी के साथ कुछ अलग ही एहसास महसूस हो रहा था। ये एहसास इतना मजबूत था की उसके मन में इश्क़ के ख्याल आने लगे। श्रेयांश ने बाइक स्टार्ट कर आगे बढ़ा दी। उसे जाते हुए देख विवेक ने अपने मन में चल रहे सारे ख्यालों को झटका और बाइक स्टार्ट कर आगे बढ़ा दी। 


वो सभी पार्टी में पहुँचे। ये पार्टी इंदौर के बहुत ही फेमस क्लब के अंदर थी। गुरनूर और रावी जैसे ही श्रेयांश और विवेक के साथ अंदर गई, दोनों ही हैरान रह गई। क्लब में कुछ लड़के लड़कियाँ नाच रहे थे तो कुछ साथ बैठे हुए ड्रिंक्स कर रहे थे। लड़कियाँ भी ड्रिंक कर रही थी जिसे देखकर गुरनूर और रावी को और ज्यादा हैरानी हुई। वो दोनों हैरानी से अपने चारों तरफ देख रही थी क्योंकि दोनों ही ऐसी किसी जगह पर पहली बार आई थी।


श्रेयांश गुरनूर का हाथ पकड़कर उसे ड्रिंक्स वाले एरिया की तरफ ले आया। विवेक ने भी ऐसा ही किया और रावी ने उसे रोका भी नहीं क्योंकि अपनी हैरानी के चलते उसने इस बात पर ध्यान ही नहीं दिया था की विवेक ने इसका हाथ पकड़ा है। 


श्रेयांश ने बार टेंडर से कुछ कहा और वहीं खड़े होकर इंतजार करने लगा। विवेक भी रावी को लेकर उसके पास आकर खड़ा हो गया। रावी सामने देख रही थी लेकिन गुरनूर ने पीछे मुड़कर क्लब में नाच रहे लड़के लड़कियों को देखा जो एक दूसरे से चिपक पर नाच रहे थे। गुरनूर ने उनसे नज़रें हटाकर सामने देखा तो श्रेयांश उसके लिए ड्रिंक लेकर खड़ा हुआ था। उस ड्रिंक को देखकर गुरनूर ने कहा, “मैं ड्रिंक नहीं करती।” 


श्रेयांश ने गुरनूर और रावी, दोनों को देखकर कहा, “दोनों अनकंफर्टेबल मत हो। मैं और विवेक हैं यहाँ तुम्हारे साथ और मैं जानता हूँ तुम दोनों ड्रिंक नहीं करती इसलिए ये सॉफ्ट ड्रिंक्स है। इन्हें पी सकती हो तुम दोनों।” 


रावी के हाथ में तो पहले से ही गिलास था। गुरनूर ने श्रेयांश के हाथ से गिलास ले लिया और धीरे धीरे पीने लगी। श्रेयांश ने भी अपनी ड्रिंक उठाते हुए गुरनूर को देखकर कहा, “मैं विवेक के साथ अपने दोस्तों से मिलने जा रहा हूँ। तुम रावी के साथ यहीं खड़ी रहना। इधर उधर मत जाना।” 


गुरनूर ने हाँ में सिर हिला दिया। श्रेयांश विवेक के साथ अपने दोस्तों के पास चला गया। गुरनूर रावी से थोड़ी बहुत बातें करने लगी। विवेक ने जब अपने दोस्तों को दूर से ही गुरनूर को दिखाया तो सभी श्रेयांश को छेड़ने लगे और उसके दोस्त रवि ने उससे कहा, “भाई, तू हम सबको मिलवाएगा नही उससे। बस दूर से दिखा दी कौन है।”


“नही, वो पहली बार यहाँ आई है इसलिए थोड़ी अनकंफर्टेबल है। तुम लोगों को ऐसे उसके पास लेकर जाऊॅंगा तो वो और ज्यादा अनकंफर्टेबल हो जाएगी।” श्रेयांश ने कहा तो विवेक ने उसे शक भरी नज़रों से देखते हुए कहा, “तुझे बड़ी फिक्र है उसकी और तू इतना तक समझ गया की वो अनकंफर्टेबल है।” 


“फीलिंग जो भी हो। इस वक्त वो मेरी रिस्पांसिबिलिटी है।” श्रेयांश ने कहा तो विवेक खामोश हो गया। 


श्रेयांश अपने दोस्तों से बातें कर रहा था पर उसकी नज़रें गुरनूर के ऊपर ही थी। बातें करते हुए उसकी नज़र क्लब के कोने में खड़े दो लड़कों पर गई। उनमें से एक लड़का गुरनूर को ही देख रहा था। श्रेयांश ने एक नज़र गुरनूर को देखा और फिर उसने वापिस से उस लड़के को देखा तो इस बार वो लड़का गुरनूर को देखते हुए अपनी गर्दन पर हाथ फेर रहा था। 


ये देख श्रेयांश को गुस्सा आ गया पर उसने अपने गुस्से को काबू में रखने की कोशिश की क्योंकि वो वहाँ कोई तमाशा नहीं करना चाहता था। 


गुरनूर को बिल्कुल अकेला समझकर वो लड़का उसके करीब गया और उसने साइड से अपने हाथ को गुरनूर के हाथ से छुआ। ये देखकर श्रेयांश को अब और ज्यादा गुस्सा आ गया और वो गुस्से से उस लड़के की तरफ बढ़ गया।


Continued In आर्ज-ए-इश्क - 17

Wednesday, 19 August 2026

आर्ज-ए-इश्क - 15

 


श्रेयांश के दिल और दिमाग के बीच में जंग चल रही थी क्योंकि उसे लग रहा था वो गुरनूर के साथ गलत कर रहा है और ये होना ही था क्योंकि बेशक उसका साथ विवेक जैसे दोस्तों का हो पर उसके अंदर संस्कार तो उसकी माँ के दिए हुए थे जो उसे ये इजाजत नही देते थे की वो किसी लड़की के दिल के साथ खेले पर इस वक्त वो विवेक के प्रभाव में भी था जो उसे गुरनूर के साथ सीरियस होने की इजाज़त नही देता था। 


ये सब सोचकर उसका मूड खराब हो चुका था पर उसने इस बारे में गुरनूर से कुछ भी कहना ठीक नही समझा क्योंकि वो गुरनूर के साथ पहली बार ऐसे डेट पर आया था इसलिए वो उसका भी मूड खराब नही करना चाहता था। 


रास्ते भर बस गुरनूर बिना कुछ कहे श्रेयांश की करीबियों के एहसास को महसूस करती रही। थोड़ी देर बाद श्रेयांश ने बाइक एक बहुत ही खूबसूरत जगह पर लाकर रोकी। 


इस जगह पर काफी हरियाली थी जिसे देखकर गुरनूर को अच्छा लग रहा था। बाइक से उतरकर गुरनूर उस जगह को देखने लगी। वो सच में बहुत खुश थी। श्रेयांश भी बाइक पार्क कर उसके पास आया और उसने थोड़ा जबरदस्ती गुरनूर के आगे मुस्कुराने का नाटक करते हुए कहा, “चले अंदर।”


श्रेयांश अपने खराब मूड के चलते गुरनूर के आगे जबरदस्ती मुस्कुराने की कोशिश कर रहा था पर गुरनूर ने अपनी खुशी के चलते इस बात पर ध्यान ही नही दिया। 


श्रेयांश गुरनूर को नीचे ले आया जहाँ सामने एक बहुत ही खूबसूरत झरना था। इस झरने का नाम पातालपानी झरना था। उस झरने को देखकर गुरनूर और ज्यादा खुश हो गई क्योंकि उसने पहली बार अपनी जिंदगी में झरना देखा था। ऊपर से वो श्रेयांश के साथ थी। गुरनूर ने मुस्कुराते हुए श्रेयांश का हाथ थाम लिया पर श्रेयांश को गुरनूर की मुस्कुराहट और गुरनूर का इस तरह से उसका हाथ पकड़ना बेचैन कर रहा था। उसने गुरनूर से कुछ नही कहा, बस चुपचाप उसके साथ चलता रहा। वहीं गुरनूर को भी खामोशियाँ ज्यादा भा रही थी। 


वो श्रेयांश के साथ पातालपानी झरना घूम रही थी की तभी उसने एक प्रेमी जोड़े को देखा। उन्हें देखकर ऐसा लग रहा था जैसे उनकी नई नई शादी हुई है। उसने उन्हें श्रेयांश को दिखाते हुए कहा, “श्रेयांश, शादी के बाद हम भी इतने ही अच्छे लगेंगे न साथ में।” 


श्रेयांश का मूड तो आगे ही खराब था। उसे गुरनूर की ये बात सुनकर गुस्सा भी आने लगा जिसे उसने कंट्रोल करते हुए प्यार से गुरनूर को समझाने के लिए कहा, “गुरनूर, तुम ये शादी के बेफिजूल ख़्वाब देखना बंद करो अभी के लिए। मैं इन सब के लिए न अभी तैयार हूँ और न ही इन सब के बारे में सोचना चाहता हूँ। वैसे भी, तुम शायद हमारे रिलीजियस और कल्चरल डिफरेंस को नही देख पा रही हो।” 


श्रेयांश ने ये बात इस अंदाज में कही की गुरनूर उसके खराब मूड को समझ ही नही पाई। उसने इस बात पर भी ध्यान नही दिया की श्रेयांश ने अपनी बात में उर्दू के शब्दों का इस्तेमाल किया है। गुरनूर ने मुस्कुराते हुए श्रेयांश को देखा और कहा, “क्या तुमने ये सब मुझसे अपनी मोहब्बत का इजहार करते वक्त देखा था?” 


श्रेयांश के पास गुरनूर के इस सवाल का कोई जवाब नही था इसलिए वो खामोश रहा। उसे खामोश देखकर गुरनूर ने धीरे से उसके करीब आकर उसकी आँखों में देखते हुए कहा, “मेरा दीन और धर्म अब सिर्फ इश्क़ है। वो इश्क़ जिसमें मैंने तुम्हारा सब कुछ अपना बना लिया है। मैं तुम्हारे साथ सबसे पहले रूह के फेरे ले चुकी हूँ। कौन अलग कर सकता है हमें।” 


“फिर भी मेरी दुनिया तुम्हारी दुनिया से अलग है।” श्रेयांश ने भी उसकी आँखों में देखते हुए कहा तो गुरनूर ने मुस्कुराकर कहा, “तो फिर दिखाओ कैसी है तुम्हारी दुनिया। तुम्हारी दुनिया का ही तो हिस्सा बनना है मुझे।”


“ये पागलपन है, गुरनूर।” श्रेयांश ने उससे दूर होते हुए गुस्से के साथ थोड़ा तेज आवाज़ में कहा। 


गुरनूर ने उसे प्यार से देखते हुए कहा, “ये मेरा विश्वास है जिसकी वजह से मैं तुम्हें रोज़ भगवान से जाकर माँगती हूँ।”


“ये पागलपन है सिर्फ। ऐसा कुछ नहीं होता।” श्रेयांश ने फिर गुस्से से कहा तो गुरनूर ने कहा, “प्यार में पागलपन भी जरूरी होता है। तुम्हें मेरे जैसी मिलेगी क्या कहीं। अब बताओ कब दिखा रहे हो अपनी दुनिया मुझे।”


श्रेयांश को समझ आ गया की अपने इश्क़ के आगे गुरनूर कुछ और नहीं समझने वाली इसलिए उसने अपने गुस्से को शांत करते हुए कहा, “मेरी दुनिया देखने के लिए तुम्हें शाम में आना होगा।”


“मैं संडे की शाम को आ जाऊँगी घर पर कोई बहाना बनाकर।” गुरनूर ने खुश होते हुए कहा। 


शाम होने से पहले पहले श्रेयांश ने गुरनूर को घर छोड़ने के लिए बाइक रावी के घर से थोड़ी ही दूरी पर रोकी। गुरनूर ने बाइक से उतरकर मुस्कुराते हुए श्रेयांश को देखा और उसके गले लग गई। श्रेयांश को गुरनूर के ऐसे गले लगाने से बेचैनी तो हो रही थी पर फिर भी उसने गुरनूर को गले से लगा लिया। थोड़ी देर बाद गुरनूर वहाँ से घर के अंदर चली गई। 


रात में गुरनूर ने रावी को अपने और श्रेयांश के बीच हुई बातों के बारे में बताया जिसपर रावी ने कहा, “वो सब तो ठीक है लेकिन घर में मम्मी पापा से क्या कहकर जाएँगे।”


“अब कोई बहाना तो बनाना ही पड़ेगा उनके आगे।” गुरनूर ने धीरे से रावी को देखते हुए कहा। दोनों ने बेड पर लेटकर थोड़ी देर तक इस बारे में बात की और फिर सो गई। 


संडे वाले दिन सुबह सुबह सभी नाश्ता कर रहे थे। गुरनूर ने रावी को देखा तो रावी ने अपनी पलकें झपकाई और फिर शुभम को देखकर कहा, “पापा, आपसे परमिशन चाहिए थी।” 


“किस लिए?” शुभम ने चाय पीते हुए उससे पूछा तो रावी ने कहा, “वो पापा मेरे कॉलेज की फ्रेंड थी ना, राशि। वो यहीं आकर सैटल हो गई थी अपनी फैमिली के साथ। उसने और मैंने मिलकर मूवी देखने का प्लैन बनाया है। मैं गुरनूर को भी अपने साथ ले जाना चाहती हूँ। ये घर पर अकेले मेरे बिना क्या करेगी न। तो अगर आप परमिशन दे देते तो हम दोनों चले जाते। आई प्रॉमिस हम दोनों दस बजे तक घर आ जाएँगे।” 


शुभम ने पहले एक नजर गुरनूर को देखा, जो चुपचाप अपना नाश्ता कर रही थी और फिर रावी को देखकर कहा, “ठीक है। तुम दोनों चली जाना और टाइम से घर वापिस आ जाना। कोई प्रॉब्लम हो तो मुझे या नील को फोन कर देना।” 


शुभम ने जैसी ही हाँ कहा, गुरनूर मन ही मन में खुश हो गई पर उसने अपनी खुशी अपने चेहरे पर नही आने दी। शुभम से परमिशन मिलने के बाद उसकी एक्साइटमेंट बढ़ गई थी। वो सच में श्रेयांश की दुनिया को देखने और उसका हिस्सा बनने के लिए काफी एक्साइटेड थी। उसे ये भी नही पता था की श्रेयांश की दुनिया उसे पसंद आएगी या नहीं। वो तो बस इतना जानती थी की अपनी मोहब्बत में वो श्रेयांश की दुनिया को भी अपना बना लेगी।


Continued In आर्ज-ए-इश्क - 16


Tuesday, 11 August 2026

आर्ज-ए-इश्क - 14

 


गुरनूर को श्रेयांश से मिलने जाना था पर उसने ये नही सोचा था की वो रावी की फैमिली से क्या कहेगी कि वो कहाँ जा रही है और अगर किसी को भी सच पता चला तो वो बचेगी नहीं। उसने उम्मीद भरी नज़रों से पहले रावी को देखा और फिर कुछ कहने ही वाली थी की उससे पहले ही रावी ने उसके लिए शुभम से झूठ बोलते हुए कहा, “पापा, वो ये ओपन माइक्स पर जाती है ना। वहीं जा रही है।”


“यहाँ भी काम, बेटा। यहाँ तो घूमने आई हो तुम।” शुभम ने मुस्कुराते हुए कहा तो गुरनूर ने कहा, “अंकल, दिल्ली में तो बहुत ओपन माइक्स शोज का एक्सपीरिएंस लिया है। मुझे पता चला यहाँ भी होते है इसलिए सोचा एक अटेन्ड करकर देखा जाए यहाँ वाला भी। सिर्फ एक या दो घंटे की ही तो बात है। क्या पता ऐसे दूसरों को देखकर एक्सपीरिएंस लेते हुए एक दिन मैं परफॉर्म भी करने लग जाऊँ।”


गुरनूर ने रावी को मुस्कुराकर देखा और आँखों ही आँखों में उसे थैंकयू कहा। 


“ये तो बहुत अच्छी बात है। इतना कॉन्फिडेंस होना चाहिए।” शुभम ने गुरनूर को मुस्कुराकर देखते हुए कहा और फिर रावी को देखकर कहा, “तुम सीखो कुछ अपनी प्यारी सी दोस्त से। अपने काम और सपनों को लेकर कितनी सिरियस है और एक तुम हो जिससे पढ़ाई भी ठीक से नहीं होती। ज्यादातर तुम गुरनूर के साथ रहती हो फिर भी कुछ नहीं सीखती तुम गुरनूर से।” 


रावी शुभम की बातें सुनते हुए गुस्से से गुरनूर को देख रही थी क्योंकी गुरनूर को बचाने के लिए उसने झूठ बोला था जिसमें वो खुद ही फँस गई थी। उसने गुरनूर को घूरते हुए कहा, “तुम्हें देर हो रही है ना। अगर तुम थोड़ी देर और यहाँ रुकी तो मैं तुम्हें जाने नहीं दूंगी।”


रावी की धमकी सुनकर गुरनूर सबको बाय बोलकर घर से बाहर जाने लगी तो शुभम ने उसे रोकते हुए कहा, “बेटा, नील छोड़ आता है तुम्हें लोकेशन पर।”


“नहीं अंकल, मैं चली जाऊँगी।” कहकर गुरनूर घर से बाहर आ गई। कॉलोनी से थोड़ा बाहर आकर उसने एक ऑटो रुकवाया और उसमें बैठ गई। वो ऑटो में बैठे हुए श्रेयांश के बारे में सोच ही रही थी की तभी उसके फोन पर किसी का मैसेज आया। गुरनूर ने अपने बैग से फोन निकालकर देखा तो रावी का मैसेज आया हुआ था। गुरनूर वो मैसेज पढ़ने लगी। “तुम्हें बचाने के चक्कर में मैंने झूठ बोला जिसमें मैं ही फँस गई और तुम्हारी इतनी ज्यादा तारीफ हुई। कोई नहीं बेटा। श्रेयांश से मिलकर आना तो तुम्हें मेरे घर में ही है। मैं बताऊँगी तुम्हें तारीफ़ें कैसे सुनते है।”


रावी का मैसेज पढ़कर गुरनूर हँसने लगी और उसने लिखा, “दोस्त नहीं है।” 


थोड़ी देर बाद ही रावी का रिप्लाइ आ गया जिसमें लिखा था, “बस तुम्हारा यही कहना है ना मुझे हर बार तुम्हारा साथ देने पर मजबूर करता है।” 


“अच्छा चलो, अब मूड ठीक करलो अपना और मेरा भी रहने दो। मैं खुश हूँ न आज।” गुरनूर ने लिखा तो रावी ने उसे एन्जॉय करने के लिए कहा। 


थोड़ी ही देर बाद गुरनूर एक मार्केट में पहूँच गई। वो ऑटो से उतरकर ऑटो वाले को पैसे देकर जैसे ही मुड़ी, उसके चेहरे पर एक मुस्कान आ गई। उसके बिल्कुल सामने श्रेयांश खड़ा था जो अपनी बाइक के पास खड़े होकर उसका ही इंतजार कर रहा था। 


गुरनूर मुस्कुराते हुए श्रेयांश के करीब आकर उसके गले से लग गई। गुरनूर के एकदम से ऐसे गले लगाने से श्रेयांश हैरान तो हो गया था पर उसे बहुत सुकून भी महसूस हो रहा था। श्रेयांश के दिमाग के हिसाब से उसे गुरनूर से मोहब्बत नही थी फिर गुरनूर के गले लगाते ही उसे इतना सुकून क्यों महसूस हुआ, वो ये नही समझ रहा था या ये कहे की वो दिमाग के आगे अपने दिल की बात नही समझ रहा था क्योंकि उसके दिमाग में विवेक ने ये बात बैठा दी थी की उसे गुरनूर के साथ सीरियस नही होना है। 


गुरनूर जैसे ही उससे दूर होने लगी, श्रेयांश ने अपनी बाहें उसकी कमर पर लपेटते हुए कहा, “ऐसे ही गले लगी रहो थोड़ी देर। मुझे सुकून मिल रहा है।” 


श्रेयांश ने अपने मन में चल रहे सारे ख्यालों को बहुत मुश्किल से झटककर गुरनूर के साथ उस पल को जीने का फैसला किया। गुरनूर ने मुस्कुराते हुए श्रेयांश को फिर से गले लगा लिया। आसपास के लोग उन्हें देख रहे थे। कुछ उम्र में बड़े लोग उन्हें देखकर बातें कर रहे थे और जो जवान प्रेमी जोड़े या दोस्त थे, वो उन्हें देखकर मुस्कुरा रहे थे लेकिन श्रेयांश और गुरनूर को किसी की परवाह नही थी। 


थोड़ी देर ऐसे ही गले लगे रहने के बाद श्रेयांश ने उसे छोड़कर खुद से हल्का सा दूर किया और उसके चेहरे को ध्यान से देखने लगा। गुरनूर मुस्कुराते हुए उसे ही देख रही थी। उसके बाल उसके चेहरे पर आ रहे थे जिन्हें हटाने के लिए श्रेयांश ने उसके चेहरे को छुआ। श्रेयांश के छूने के एहसास से गुरनूर ने अपनी आँखें बंद कर ली। गुरनूर ने आँखें खोलकर श्रेयांश को देखा तो वो मुस्कुराते हुए उसे देख रहा था। 


गुरनूर ने मुस्कुराकर अपनी नज़रें झुका ली जिससे उसकी नज़र श्रेयांश की स्पोर्ट्स बाइक पर गई। वो उस बाइक को देखकर एक्साइटेड हो गई और उसने कहा, “तुम्हारी बाइक कितनी अच्छी है रीयल में देखने में।” 


“तुमने अब देखी है।” श्रेयांश ने हैरानी से कहा तो गुरनूर ने कहा, “फोटोज में देखी थी। रियल में तो आज देखी है ना।” 


“तो चलो अब इसके ऊपर बैठकर भी देख लो।” कहते हुए श्रेयांश बाइक पर बैठ गया और उसे स्टार्ट किया। 


गुरनूर ने बाइक पर उसके पीछे बैठते हुए पूछा, “हम कहाँ जा रहे है?” 


“एक बहुत ही खूबसूरत जगह पर।” कहते हुए श्रेयांश ने उसे देखा और फिर पूछा, “मैं बाइक थोड़ी तेज चलाता हूँ। तुम्हें डर तो नही लगेगा।” 


“मुझे तुम्हारे ऊपर पूरा भरोसा है।” गुरनूर ने कहा तो श्रेयांश के चेहरे पर एक मुस्कान आ गई। वो मुस्कुराते बाइक चलाने लगा। गुरनूर ने अपनी बाहें उसकी कमर पर लपेट दी और अपना सिर उसकी पीठ से लगाकर उसके एहसासों को महसूस करने लगी। 


गुरनूर के ऐसा करने से वो श्रेयांश के बिल्कुल करीब आ गई जिससे उनके नीच दूरियों की कोई गुंजाइश नही थी। गुरनूर को तो ये एहसास अच्छे लग रहे थे पर श्रेयांश को इस एहसास से घबराहट हो रही थी। उसके दिल और दिमाग के बीच में वही जंग फिर शुरू हो गई थी क्योंकि उसे गुरनूर के ऐसे करीब आने से सुकून तो मिल रहा था पर उसे ये भी लग रहा था की वो गुरनूर के साथ गलत कर रहा है।


Continued In आर्ज-ए-इश्क - 15

Monday, 10 August 2026

आर्ज-ए-इश्क - 13

 


गुरनूर इंदौर आ रही है, ये बात सुनकर श्रेयांश हैरान हो गया। उसने गुरनूर से थोड़ी देर बात करने के बाद फोन काट दिया। उसने फोन बेड पर फैंका और फिर बेड के एक कोने में बैठकर अपने दोनों हाथों को आपस में जोड़कर अपनी कोहनियों को घुटनों पर टिकाते हुए आगे की तरफ झुककर अपने हाथों को अपने होठों से लगाते हुए मन ही मन में ऐसे सोचते हुए कहने लगा जैसे वो गुरनूर से कह रहा हो, “क्या पंडित जी ने मुझसे सही कहा था जब मैं मंदिर में गया था। क्या तुम सच में मेरी किस्मत हो गुरनूर जो मुझे मंदिर तक लेकर गई थी और उस दिन मैंने तुम्हारे कहने पर ही भगवान से ये माँगा की वो मुझे तुम्हारे पास भेज दे और अब तुम आ रही हो।” 


श्रेयांश यही सोचते सोचते बेड पर लेट गया और जल्दी ही नींद ने उसे अपनी आगोश में ले लिया। 


अगले दिन श्रेयांश विवेक और अपने दोस्तों के साथ कैफे में बैठा हुआ था। वो सब आपस में बातें कर रहे थे लेकिन श्रेयांश तो कल रात से ही गुरनूर के ख्यालों में खोया हुआ था। उसका ध्यान उन सबकी बातों में बिल्कुल भी नहीं था। विवेक इस बात को नोटिस कर रहा था की श्रेयांश कहीं और ही खोया हुआ है। बातें करते हुए उनके दोस्त, रवि ने शेयांश के बारे में कुछ कहा और फिर उसे देखकर पूछा, “क्यों श्रेयांश, सही कह रहा हूँ न मैं।” 


श्रेयांश ने रवि की बात पर ध्यान ही नहीं दिया। रवि ने एक बार फिर श्रेयांश को आवाज़ लगाकर पूछा पर इस बार भी श्रेयांश कुछ नहीं बोला। रवि ने श्रेयांश के साथ बैठे हुए विवेक और वहाँ बैठे हुए अपने बाकी दोस्तों को देखा। वो सब भी श्रेयांश को ही देख रहे थे। रवि ने फिर से श्रेयांश को देखा और इस बार उसे कंधे से पकड़कर हिलाया तो श्रेयांश ने अपने ख्यालों से बाहर आकर उसे देखते हुए पूछा, “क्या हुआ है?” 


रवि ने उसे देखा और कहा, “ये तो तू बता की क्या हुआ है? मैं कब से तुझे आवाज़ लगा रहा हूँ और तू पता नहीं कहाँ खोया हुआ है?” 


विवेक को पक्का यकीन था की श्रेयांश गुरनूर के ख्यालों में खोया हुआ है इसलिए इससे पहले की श्रेयांश रवि से कुछ कहता, विवेक ने खड़े होकर उससे कहा, “श्रेयांश, मेरे साथ चल। मुझे तुझसे कुछ बात करनी है।” 


श्रेयांश सबको देखकर खड़ा हो गया और विवेक के साथ कैफे के दूसरी तरफ आ गया। विवेक ने उसे देखा और कहा, “चुपचाप पूरी बात बता दे की तुझे हुआ क्या है। ऐसे इतना कहाँ खोया हुआ था तू।” 


श्रेयांश ने विवेक को सब बता दिया की कैसे उसे गुरनूर ने मंदिर जाने के लिए कहा था और जब वो मंदिर में गया तो पंडित से उससे क्या कहा और अब सच में गुरनूर इंदौर आ रही है। ये सब सुनकर विवेक भी एक पल के लिए हैरान रह गया लेकिन फिर उसने श्रेयांश को समझाते हुए कहा, “तू इस बारे में ज्यादा बिल्कुल मत सोच। ये सिर्फ़ एक इतेफाक है। जितना सोचेगा उतना उलझेगा और इस रिश्ते को भी उलझाएगा। याद रख, गुरनूर के साथ सीरियस नहीं होना है तुझे।” 


श्रेयांश ने विवेक के आगे हाँ में सिर हिला दिया लेकिन उसका दिल ये मानने की कोशिश नहीं कर रहा है। विवेक की बातों की वजह से वो कन्फ्यूज हो गया और उसके दिल और दिमाग के बीच इस बारे में सोचते हुए एक अलग ही लड़ाई चलने लग गई। श्रेयांश अपने दोस्तों की बातों में आकर गुरनूर के साथ इस रिश्ते में तो आ गया था लेकिन अब इस रिश्ते को संभालना था या ऐसे ही गुरनूर के साथ रहना था, ये उसे समझ नहीं आ रहा था। एक तरफ उसका अपना दिल था और दूसरी तरफ विवेक की बातें, उसे नहीं समझ आ रहा था की वो किसकी सुने। 


वहीं गुरनूर खुशी खुशी रावी और उसकी फैमिली के साथ इंदौर जाने के लिए अपनी पैकिंग कर रही थी जिसमें शीतल उसकी मदद कर रही थी। उसे अगली सुबह ही इंदौर के लिए निकलना था। 


पैकिंग खत्म होने के बाद गुरनूर ने जाकर खाना खाया और फिर सोने के लिए बेड पर आकर लेट गई लेकिन उसे श्रेयांश से मिलने की इतनी एक्साइटमेंट थी की उसे पूरी रात नींद ही नही आई। 


सुबह वो विक्रम और शीतल से मिलकर रावी की फैमिली के साथ इंदौर जाने के लिए निकल गई। जैसे ही वो सभी ट्रेन में बैठे, गुरनूर के मन की खुशी और ज्यादा बढ़ गई। रावी तो सबकी नज़रों से बचकर गुरनूर को चोरी छुपके छेड़ रही थी क्योंकि श्रेयांश से मिलने जाने की खुशी गुरनूर के चेहरे पर साफ नज़र आ रही थी। 


एक लंबे सफर के बाद वो सभी देर रात इंदौर पहूँच गए। सभी बहुत थके हुए थे और सबको बहुत भूख लग रही थी इसलिए रावी के पिता, शुभम ने घर जाने से पहले बाहर कुछ खाने का फैसला किया। 


नील ने गूगल पर देर रात खुलने वाले रेस्टोरेंट के बारे में सर्च किया और सभी स्टेशन से सीधा उस रेस्टोरेंट में आ गए। खाना खाने के बाद सभी घर पहुँच गए। 


शुभम ने मधु को देखकर कहा, “अभी सब थके हुए हैं इसलिए अभी आराम करो। सुबह उठकर सैटल करलेंगे घर।” 


सभी अपने अपने कमरों में चले गए। गुरनूर ने अपना फोन लेकर श्रेयांश को मैसेज किया, “आ गई हूँ मैं तुम्हारे शहर में।” 


श्रेयांश का तुरंत ही रिप्लाई आ गया, “मुझसे कब मिलने आओगी अब।” 


“परसो तुम मुझे अपना शहर घुमाने ले चलना। मन तो कल ही मिलने का है पर मुझे रावी और आंटी की हेल्प करनी होगी ना सेटल होने में।” गुरनूर ने मुस्कुराते हुए लिखा। 


“समझ सकता हूँ।” श्रेयांश ने लिखा। थोड़ी देर तक वो दोनों ऐसे ही बातें करते रहे और फिर गुरनूर सो गई। 


सुबह नाश्ता करने के बाद सभी मिलकर घर को सेटल करने में लग गए जिसमें गुरनूर भी उनका साथ दे रही थी। घर में सारा फर्नीचर और बहुत सी चीज़ें पहले से ही मौजूद थी इसलिए उन्हें बिना किसी परेशानी के सैटल होने में सिर्फ एक दिन लगा। 


अगले दिन गुरनूर तैयार होकर नीचे आई। वो आज बहुत खुश थी क्योंकि वो श्रेयांश से मिलने जा रही थी। इसके चलते ही वो खुशी से पूरी रात सो नहीं पाई थी। उसने सबके साथ नाश्ता किया और सबको बाय बोलकर जाने लगी तो शुभम ने उससे पूछा, “कहाँ जा रही हो, बेटा तुम?” 


ये सवाल सुनते ही गुरनूर घबरा गई क्योंकि अपनी खुशी में उसने किसी और को अपने बाहर जाने का बताया ही नहीं था और ना ही ये सोचा था की कोई उससे पूछेगा तो वो क्या कहेगी।


Continued In आर्ज-ए-इश्क - 14

Saturday, 8 August 2026

आर्ज-ए-इश्क - 12

 


गुरनूर ने जब श्रेयांश से कहा की वो भगवान से क्यों नहीं कहता की वो उसे उसके पास भेज दे तो श्रेयांश ने कहा, “मैं भगवान पर विश्वास नहीं करता गुरनूर। मैं तो मंदिर भी नहीं जाता हूँ। दूर रहता हूँ इन सब से मैं।” 


“कोई बात नहीं। ये सब अपने अपने विश्वास और भरोसे की बात है।” गुरनूर ने कहा कि तभी उसे शीतल की आवाज़ आई जो उसे नीचे बुला रही थी। 


“मैं तुमसे बाद में बात करती हूँ। मम्मी बुला रही हैं।” कहकर गुरनूर ने फोन  काट दिया। श्रेयांश फोन की स्क्रीन को देखते हुए गुरनूर के बारे में सोचने लगा। 


अगले दिन सुबह सुबह ही श्रेयांश अपनी बाइक लेकर किसी काम से जा रहा था की तभी वो मंदिर के सामने से गुजरा। मंदिर को देखकर उसे गुरनूर की कही बात याद आ गई। उसने अपनी बाइक वापिस मोड़कर मंदिर के सामने लाकर रोकी। 


वो बाइक से उतरा और जूते उतारकर मंदिर के अंदर चला गया। उसने महादेव की बड़ी सी मूर्ति को देखते हुए हाथ जोड़े और कहने लगा, “मैं आपके ऊपर ज्यादा विश्वास नहीं रखता और ना ही आप में मानता हूँ पर गुरनूर ने कहा की मैं एक बार आपसे कहकर देखूं की आप उसे मेरे पास भेज दें। वो शायद इस बात पर यकीन करती है की आपसे जो माँगो वो मिल ही जाता हैं। अगर आप भेज सकते है तो उसे मेरे पास भेज दीजिए। मेरे विश्वास के लिए तो नहीं हो सकता क्योंकि मेरा विश्वास तो बहुत कमज़ोर है। आप गुरनूर के विश्वास के लिए ये कर दीजिए।” 


उसने कहना खत्म ही किया था की पंडित जी ने उसके पास आकर उसे टीका लगाते हुए कहा, “तुम जो भी माँग रहे हो वो जरूर मिलेगा तुम्हें। तुम यहाँ खुद नहीं आए। तुम्हारी किस्मत तुम्हें यहाँ लाई है और तुम्हारी किस्मत वही है जिसे तुम माँग रहे हो और जिसके लिए तुम माँग रहे हो।” 


श्रेयांश ने कुछ नहीं कहा। वो महादेव की मूर्ति को देखकर बाहर आ गया। उसने जूते पहने और बाइक लेकर वहाँ से निकल गया। बाइक चलाते हुए उसने खुद से ही कहा, “गुरनूर मेरी किस्मत कैसे हो सकती हो। मैं तो उसे लेकर सीरियस भी नहीं हूँ।” 


गुरनूर के लिए श्रेयांश ने थोड़ी थोड़ी उर्दू सीखनी शुरू की। वो ये क्यों कर रहा था उसे समझ नहीं आ रहा था जिस वजह से उसे ये अजीब भी लग रहा था और अच्छा भी। 


गुरनूर इस वक्त श्रेयांश से बात करने के बाद छत पर खड़ी थी की तभी रावी वहाँ आई और उसने गुरनूर को पीछे से गले लगाते हुए कहा, “मेरे पास इस वक्त तुम्हारे लिए एक बैड न्यूज़ भी है और एक गुड न्यूज़ भी। कौन सी सुनोगी पहले।” 


“बैड क्या है?” गुरनूर ने पूछा तो रावी ने उदास होते हुए कहा, “पापा का ट्रांसफर हो गया है। मुझे तुम्हें छोड़कर जाना होगा।” 

“और गुड।” गुरनूर ने फिर पूछा तो इस बार रावी ने खुश होते हुए कहा, “गुड ये है की पापा का ट्रांसफर इंदौर में हुआ है। मैं तुम्हें श्रेयांश से मिलवाने अपने साथ ले जा सकती हूँ।” 


गुरनूर ने पहले उसे खुशी से देखते हुए कहा, “क्या सच में?” पर फिर उसने उदास होकर कहा, “मम्मी पापा को मनाकर उनसे परमिशन कौन लेगा।” 


ये सुनकर रावी ने भी सोचते हुए कहा, “अब ये तो प्रॉब्लम है।” 


“बात तो एक को ही करनी होगी।” कहते हुए गुरनूर ने रावी की तरफ इशारा कर दिया तो रावी ने कहा, “मैं बात नहीं करने वाली। तुम खुद करो।” 


गुरनूर ने थोड़ी इमोशनल सी शक्ल बनाकर रावी को देखकर उसे मनाने के लिए कहा, “दोस्त नहीं है।” 


रावी ने एक गहरी साँस ली और कहा, “प्रेम कहानी तुम्हारी और बात मैं करूॅं। चलो मेरे साथ।” 


रावी गुरनूर के साथ नीचे विक्रम से बात करने के लिए आ गई। विक्रम लिविंग रूम में बैठे हुए कोई किताब पढ़ रहे थे। उसने गुरनूर के साथ विक्रम के सामने आकर कहा, “अंकल, मुझे आपसे कुछ बात करनी है।” 


“बोलो बेटा क्या बात है?” विक्रम ने अपने हाथ में पकड़ी किताब को साइड रखकर अपना चश्मा उतारते हुए कहा। 


रावी उनके पास बैठी और उसने कहा, “अंकल, आप तो जानते ही हैं की पापा का ट्रांसफर इंदौर में हो चुका है। मैं चाहती हूँ की आप गुरनूर को मेरे साथ थोड़े दिनों के लिए इंदौर भेज दे। वो अंकल नई नई जगह है तो इतनी जल्दी मेरा मन वहाँ लगेगा नहीं इसलिए मैं चाहती हूँ गुरनूर मेरे साथ चले। एक बार वहाँ मेरा मन लग जाएगा तो मैं इसे नील भैया के साथ वापिस छोड़ने आ जाऊँगी।” 


विक्रम ने कुछ नहीं कहा तो रावी ने कहा, “प्लीज़ अंकल, इसे मेरे साथ इंदौर भेज दीजिए।” 


“ठीक है। जाओ जीलो अपनी जिंदगी दोनों।” विक्रम ने मुस्कुराते हुए कहा तो वो दोनों खुश हो गई और उन्हें थैंक यू बोलकर वहाँ से चली गई। 


शीतल जो अबतक रसोई में खड़े होकर उनकी बातें सुन रही थी, रावी और गुरनूर के जाते ही बाहर आई और उसने विक्रम से पूछा, “विक्रम, आपने गुरनूर को जाने के लिए अलाउ क्यों किया?” 


“शीतल, कई बार बच्चों को समझा करो। वो बचपन से एक साथ रही हैं। अब एकदम से अलग होना उन्हें अच्छा थोड़ी लगेगा और वैसे भी तुम तो अच्छे से जानती हो, उन्हें जब भी किसी बात के लिए हमसे परमिशन लेनी होती हैं तो वो दोनों एक दूसरे के साथ डिस्कस करने के बाद हमारे पास आती हैं। इस बार भी वो यही करकर आई होंगी। हमारी गुरनूर को पहले से ही पता था की रावी ने मुझसे क्या बात करनी है। इनफैक्ट, ये आइडिया ही गुरनूर का होगा की रावी मुझसे बात करे क्योंकि वो जाना चाहती हैं तो उसे जाने दो और वैसे भी हमारी गुरनूर का तो कोई भाई बहन भी नहीं है। जो हैं रावी और नील ही है। जाने दो तुम गुरनूर को। उसे भी थोड़ा ब्रेक मिल जाएगा।” विक्रम ने शीतल को समझाने के लिए कहा तो शीतल मान गई। 


रात को खाना खाने के बाद गुरनूर ने अपने कमरे में आकर श्रेयांश को फोन लगाया लेकिन श्रेयांश ने उसका फोन नहीं उठाया। उसने दोबारा फोन लगाया तो इस बार श्रेयांश ने फोन उठा लिया। गुरनूर ने अपनी खुशी से भरी आवाज़ में कहा, “मेरे पास तुम्हारे लिए एक गुड न्यूज़ है। गैस करो क्या हो सकता है।” 


“क्या बात है, गुरनूर?” श्रेयांश ने पूछा तो गुरनूर ने कहा, “गैस तो करो एक बार।” 


श्रेयांश ने थोड़ी देर सोचा पर उसके मन में ऐसा कुछ नहीं आया इसलिए उसने कहा, “मैं नहीं समझ पा रहा, गुरनूर। तुम बता दो ना मुझे।” 


“तुम चाहते थे ना मैं तुम्हारे पास आ जाऊँ। मैं आ रही हूँ।” गुरनूर ने खुशी से चहकते हुए कहा लेकिन उसकी ये बात सुनकर श्रेयांश हैरान रह गया।


Continued In आर्ज-ए-इश्क - 13

Thursday, 6 August 2026

आर्ज-ए-इश्क - 11



गुरनूर मंदिर के बाहर रूककर अंदर देखने लगी। रावी ने उसे ऐसे देखा तो कहा, “तुम मंदिर के अंदर जाना चाहती हो क्या?” 


गुरनूर ने अंदर देखते हुए कहा, “मन कर रहा है की आज जाऊॅं और थोड़ी दुआ महादेव के आगे भी करूॅं श्रेयांश के लिए।” 


“पर आज से पहले तो तुम कभी नहीं गई मंदिर के अंदर मेरे साथ।” रावी ने कहा तो गुरनूर ने कहा, “आज से पहले इश्क़ भी तो नहीं हुआ था।” 


गुरनूर मंदिर के अंदर चली गई। रावी भी उसके पीछे पीछे अंदर चली गई। गुरनूर हाथ जोड़कर आँखें बंद कर महादेव से प्रार्थना करने लगी। रावी ने गुरनूर को देखते हुए सोचा, “क्या इश्क़ में सच में इतनी ताकत होती हैं की इंसान जिससे प्यार करे, उसका सब कुछ अपनाने के लिए तैयार हो जाए।” 


गुरनूर ने मुस्कुराकर आँखें खोली और माथा टेककर रावी के साथ मंदिर से बाहर आ गई। 


जैसे जैसे दिन बीत रहे थे गुरनूर श्रेयांश को लेकर काफ़ी सीरियस होती जा रही थी। वो उसके साथ शादी के ख़्वाब देखती। उसका फोन आता तो अपना सारा काम छोड़कर उससे बात करने लग जाती। रावी को ये सब सही नहीं लगता था क्योंकि गुरनूर अपने ख़्वाबों से ज्यादा अब श्रेयांश को वक्त देती थी लेकिन उसने कुछ नहीं कहा क्योंकि उसे लगता था की शायद नया नया प्यार है इसलिए गुरनूर ऐसा कर रही है। 


वहीं श्रेयांश इस वक्त विवेक के साथ एक रेस्टोरेंट में बैठकर बर्गर खा रहा  था की तभी उसके फोन पर गुरनूर का मैसेज आया। श्रेयांश ने अपने हाथ में पकड़ा हुआ बर्गर ट्रे में रखा और अपना फोन उठाकर बिना एक भी सेकंड गवाए गुरनूर के मैसेज का रिप्लाई किया। उसके साथ बैठे विवेक ने उसे ये करते हुए देखा तो कहा, “मुझे लगा रहा है तू गुरनूर को लेकर सीरियस हो गया है।” 


श्रेयांश ने फोन की स्क्रीन से नज़रे हटाकर विवेक को देखते हुए कहा, “मैं कभी किसी चीज को लेकर सीरियस नहीं होता और गुरनूर को लेकर तो सीरियस बिल्कुल भी नहीं हूँ मैं।”


श्रेयांश को मोहब्बत तो हो चुकी थी गुरनूर से बस वो मान नहीं पा रहा था। ऐसा शायद उसके दोस्तों की वजह से था या शायद उसके अपने एटिट्यूट की वजह से। 


रात में श्रेयांश को गुरनूर के बारे में सोचते हुए नींद नहीं आ रही थी। विवेक की कही हुई बात उसके दिमाग में बार बार गूंज रही थी। उसने खुद से ही सवाल किया, “मैं गुरनूर को लेकर सीरियस कैसे हो सकता हूँ।” 


वो अपना फोन लेकर कमरे से बाहर आया और छत पर चला गया। उसने गुरनूर को फोन लगाया। गुरनूर सो चुकी थी लेकिन श्रेयांश के फोन की वजह से जाग गई। उसने फोन उठाकर अपनी नींद से भरी आवाज़ में कहा, “हेलो।” 


गुरनूर की आवाज़ सुनकर श्रेयांश को एहसास हुआ की वो सो रही थी इसलिए उसने कहा, “सॉरी, मैंने तुम्हें जगा दिया।” 


“तुम्हारे फोन कॉल का इंतजार करते करते ही सोई थी।” गुरनूर ने कहा। 


“मुझे नींद नहीं आ रही और मैंने पहले कॉल इसलिए नहीं किया क्योंकि मैं तुम्हारे बारे में सोच रहा था।” श्रेयांश ने कहा तो गुरनूर मुस्कुराने लगी और उसने पूछा, “मेरे बारे में क्या सोच रहे थे?” 


श्रेयांश ने गुरनूर के सवाल को नजरअंदाज करते हुए पूछा, “गुरनूर, तुम्हारे सपने क्या है?” 


“इसका ख्याल कहाँ से आ गया तुम्हें आज?” गुरनूर ने उसका सवाल सुनकर हैरान होते हुए पूछा। 


“बताओ ना।” श्रेयांश ने कहा तो गुरनूर ने उसे अपने ख्वाबों के बारे में बताते हुए कहा, “मेरा ख़्वाब है एक फेमस राइटर बनना और मुझे न अपने लिए एक पर्सनल लाइब्रेरी भी चाहिए जहाँ मैं अपनी बुक्स रखूॅं और वहीं बैठकर लिखूं। फिर सक्सेसफुल होने के बाद तुमसे शादी करूॅं और हम दोनों मिलकर अपनी फैमिलीज के साथ रहे।” 


“फैमिलीज? क्या तुम सच में इस बारे में इतनी ज्यादा सीरियस हो?” श्रेयांश ने पूछा तो गुरनूर ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “मैं जिन्हें चाहती हूँ उनके लिए सीरियस ही रहती हूँ बहुत और तुम्हारी फैमिली भी तो मेरी ही हुई न अब।” 


गुरनूर की बात सुनकर श्रेयांश ने अपने मन में सोचा, “और एक मैं हूँ जो कभी किसी को लेकर सीरियस नहीं होता।” 


श्रेयांश ने थोड़ी देर उससे बात की और फिर नीचे आकर अपने कमरे में सो गया। 


अगले दिन वो विवेक और अपने दोस्त, शान के साथ एक रेस्टोरेंट में बैठा हुआ था। उसने विवेक को देखते हुए कहा, “यार मुझे एक बात बताओ। बस लड़की से बात करने को ही फन कहते हो तुम लोग।” 


विवेक ने उसे देखा और कहा, “अब तेरी वाली लॉन्ग डिस्टेंस में है इसमें हमारी क्या गलती।” 


श्रेयांश ने उनके साथ कुछ खाया पीया और फिर वहाँ से अपने घर आ गया। उसने जल्दी से अपने कमरे में आकर गुरनूर को फोन लगाया। 


जैसे ही गुरनूर ने फोन उठाया, श्रेयांश ने जल्दी से कहा, “गुरनूर, तुम मेरे पास नहीं आ सकती।” 


उसकी ये बात सुनकर गुरनूर के चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कान आ गई और उसने कहा, “तिशनगी हो रही हैं तुम्हें मेरी।” 


“तिशनगी मतलब।” श्रेयांंश ने पूछा।


“उर्दू वर्ड है। डिजायर होता है इसका मतलब।” गुरनूर ने कहा तो श्रेयांश ने पूछा, “तुम इतने उर्दू वर्ड्स क्यों यूज करती हो?” 


“क्योंकि मुझे उर्दू अच्छी लगती है। वैसे मैंने फ्रेंच भी पढ़ी हुई है जिसे सब मोस्ट रोमांटिक लैंग्वेज कहते हैं लेकिन जब मैंने उर्दू सीखी तो मुझे सबसे रोमांटिक लैंग्वेज ये लगने लग गई और ये बहुत खूबसूरत भी है।” गुरनूर ने कहा। 


“लगता हैं तुमसे बात करने के लिए थोड़ी सी उर्दू मुझे भी सीखनी पड़ेगी। फिल्हाल तुम मुझे ये बताओ की क्या तुम मेरे पास आ सकती हो?” श्रेयांश ने बेताब होते हुए पूछा जिसका गुरनूर ने प्यार से जवाब देते हुए कहा, “पास ही हूँ मैं तुम्हारे। अपने दिल में देखो। तुम्हारे दिल में हूँ मैं।” 


“वो वाला पास नहीं गुरनूर। वो वाला पास जिसमें मैं तुम्हें गले लगा सकूं। तुम्हें छूकर तुम्हें महसूस कर सकूं।” श्रेयांश ने उस पल के एहसास के बारे में सोचते हुए कहा। 


गुरनूर ने मुस्कराते हुए कहा, “उम्म हम्म, तुम्हारे पास आने का मन मेरा भी करता है क्योंकि मुझे तो तुमसे दूर रहकर ही तुम्हारी आदत सी हो गई है।” 


“आ जाओ ना फिर।” श्रेयांश ने इस बार और ज्यादा बेताबी से कहा तो गुरनूर ने उसे कहा, “तुम भगवान जी से क्यों नहीं कहकर देखते की वो मुझे तुम्हारे पास भेजने के लिए कोई चमत्कार करदे।”


Continued In आर्ज-ए-इश्क - 12

Wednesday, 5 August 2026

आर्ज-ए-इश्क - 10

 



रावी ने गुरनूर को देखते हुए कहा, “गुरनूर, तुम्हें ये क्यों देखना है। तुम तो भगवान में इतना यकीन करती हो। वो किसी गलत इंसान को थोड़ी भेजेंगे तुम्हारी जिंदगी में।” 

“फिर भी मैं ये देखना चाहती हूँ।” गुरनूर ने कुछ सोचते हुए कहा। 

श्रेयांश अपने सभी दोस्तों के साथ पार्टी कर रहा था। बीयर पीने की वजह से वो सभी नशे में थे। श्रेयांश आराम से सोफे पर बैठा हुआ था। उसके सभी दोस्तों ने नशे में खुशी से चिल्लाकर कहा, “फाइनली, हमारे भाई की गर्लफ्रेंड बन गई।” 

उनकी ये बात सुनकर श्रेयांश भी मुस्कुराने लगा और थोड़ी देर बाद विवेक के साथ अपने घर जाने के लिए निकल गया। 

रात के एक बजे के करीब श्रेयांश अपने घर पहुँचा। उसने अपने कमरे में आने के बाद बेड पर लेटकर गुरनूर को कॉल किया। 

रावी तो सो चुकी थी पर गुरनूर को नींद नहीं आ रही थी। वो खिड़की के पास खड़े होकर आसमान में चाँद को देख रही थी की कभी उसके फोन पर किसी का कॉल आया। वो अच्छी तरह से जानती थी की इस वक्त बस श्रेयांश उसे कॉल कर सकता है इसलिए उसने जल्दी से बेड से फोन उठाकर कॉल उठाया जिससे रावी जाग न जाए। 

जैसे ही उसने फोन उठाया, श्रेयांश ने पूछा, “तुम सो तो नहीं रही थी?” 

गुरनूर ने मुस्कुराते हुए कहा, “तुम्हारे ख्याल सोने की इजाज़त नहीं दे रहे। लेट कैसे हो गए तुम?” 

ये सुनकर श्रेयांश के चेहरे पर एक मुस्कान आ गई और उसने कहा, “वो तुमने कहा था ना दोस्तों को पार्टी दे दो। उन्हें पार्टी दे रहा था।” 

गुरनूर ने भांप लिया की श्रेयांश इस वक्त नशे में है इसलिए उसने पूछा, “तुमने ड्रिंक क्यों की?” 

“वो दोस्तों के साथ थोड़ी सी ड्रिंक की। वो भी सिर्फ बीयर। अब पार्टी भी तो मैं दे रहा था ना। वो भी खुश हो गए जब उन्हें पता चला की तुमने मुझे हाँ कह दी और उन्हें पार्टी देने के लिए भी मुझे तुमने कहा है।” श्रेयांश ने कहा। 

गुरनूर हँसने लगी और उसने कहा, “मेरी वजह से पार्टी थी जो मैंने ही देने के लिए कहा था। वो भी तुमने मेरे बिना ही दे दी।” 

“तुम्हारे साथ मिलकर तो दोस्तों को हमारी शादी के वेडिंग रिसेप्शन की पार्टी दूंगा।” श्रेयांश ने उस बारे में सोचते हुए कहा।

“अच्छा जी। ये बात।” गुरनूर ने अदा से कहा। इस वक्त उसके चेहरे पर एक अलग ही नूर था। 

“तुम्हें अगर मेरा ड्रिंक करना नहीं पसंद तो मैं छोड़ दूंगा।” श्रेयांश ने मासूमियत से कहा जिसे सुन गुरनूर मुस्कुराने लगी। वो श्रेयांश की ये बात सुनकर उससे इंप्रेस हो गई थी इसलिए उसने कहा, “कभी कभी कर लिया करो पर ज्यादा नहीं।” 

“ओह गुरनूर, तुम कितनी अच्छी हो।” श्रेयांश ने खुश होते हुए कहा तो गुरनूर खिलखिलाकर हँस पड़ी जिसकी वजह से रावी की नींद खुल गई। वो तो शीतल और विक्रम का कमरा नीचे था वरना गुरनूर की हँसी सुन वो भी कमरे में आ सकते थे। 

रावी ने गुरनूर को देखा और कहा, “गुरनूर, बात करना ठीक है पर कम से कम इतने ज़ोर से हँसो तो मत की  किसी की नींद डिस्टर्ब हो और इस वक्त कौन बात करता है।” 

“जिन्हें प्यार में नींद न आए। तुम सो जाओ।” गुरनुर ने रावी से कहा तो दूसरी ओर से उसे श्रेयांश के हँसने की आवाज़ आई जिसे सुन गुरनूर भी हल्का सा हँसी। रावी ने उसे देखा और फिर कंबल से अपना चेहरा ढककर सो गई। 

श्रेयांश ने गुरनूर से पूछा, “गुरनूर, तुम प्यार के बारे में ही पोयम्स लिखती हो ना?” 

“मैं इश्क़ लिखती हूँ, श्रेयांश।” गुरनूर ने कहा जिसपर श्रेयांश ने पूछा, “क्या तुमने कभी किसी से इश्क़ किया है?” 

गुरनूर ने कहा, “इश्क़ किया नहीं जाता। इश्क बस हो जाता है। जब इश्क की हवाएं छूती हैं ना, तो इन हवाओं को रोका नहीं जाता। ये बस तुम्हें छू जाती है और अपना एहसास तुम्हारे अंदर छोड़ जाती है। मुझे जब किसी से इश्क़ होगा ना तो मैं कयामत तक निभाऊंगी।

“मतलब अभी तुम्हें मुझसे इश्क़ हुआ नहीं है?” श्रेयांश ने पूछा।

गुरनूर ने कुछ सोचा और कहा, “अभी तो नहीं लेकिन जब होगा ना, तो इन इश्क़ की हवाओं को काबू करना ना मेरे बस में होगा ना तुम्हारे। बस छू लेंगी ये हमें बिना इजाजत के।” 

श्रेयांश ने ये सुनकर कहा, “तुम बहुत गहरी बातें नहीं करतीं।” 

“सब यही कहते हैं।” गुरनूर ने कहा और वो बेड पर आकर बैठ गई। थोड़ी देर बाद श्रेयांश के सांस लेने की आवाज़ गुरनूर के कानों में पड़ी जिससे उसे समझ आ गया की श्रेयांश उससे बात करते हुए ही सो चुका है। वो मुस्कुराते हुए लेट गई और ऐसे ही खामोशी से श्रेयांश की सांसों के शोर को सुनने लगी। थोड़ी देर बाद उसे भी नींद आ गई। 

सुबह श्रेयांश की अचानक ही पाँच बजे नींद खुली तो उसने देखा की उसके फोन पर अभी भी गुरनूर का कॉल चल रहा है जिसकी कॉल टाइमिंग पूरे चार घंटे की स्क्रीन पर दिख रही थी। श्रेयांश ने फोन कान पर लगाया तो गुरनूर की सांसों की धीमी आवाज़ उसे सुनाई दी जिसे सुनकर वो मुस्कुरा उठा। वो ऐसे ही फोन कान से लगाए बेड पर लेट गया और गुरनूर की सांसों के शोर को सुनने लगा।

श्रेयांश को थोड़ी देर बाद एक शरारत सूझी। उसने फोन काटा और गुरनूर को दोबारा फोन लगाया। 

जब गुरनूर का फोन वाइब्रेट हुआ तो उसने नींद में ही फोन उठाकर अधखुली आँखों से पहले स्क्रीन पर फोन करने वाले का नाम देखा और श्रेयांश का नाम देखकर फोन उठाते हुए नींद में कहा, “हेलो।” 

“तुम इतनी देर तक कैसे सो सकती हो, मिस गुरनूर।” श्रेयांश ने अपनी हँसी को कंट्रोल करते हुए कहा जिसे सुनकर गुरनूर ने कहा, “तुम भी इतनी सुबह सुबह कैसे उठ सकते हो, मिस्टर श्रेयांंश।” 

“मुझे इतनी सुबह उठने की ही आदत है, मैडम।” श्रेयांश ने कहा। 

गुरनूर ने भी अपनी नींद से भरी आवाज़ में कहा, “और मुझे इतनी सुबह उठने की आदत बिल्कुल नहीं है।” 

श्रेयांश मुस्कुराया और उसने कहा, “तो ये आदत तुम अब डाल लो क्योंकि शादी के बाद मैं तुम्हें सुबह सुबह ही उठाया करूंगा।”

“क्या?” गुरनूर ने हैरानी से कहा तो श्रेयांश ने कहा, “जी हाँ। अभी से उठना शुरू करो सुबह सुबह जिससे तुम्हें हमारी शादी तक आदत हो जाए।”

“कल से करूॅंगी। अभी मैं सो रही हूँ।” कहकर गुरनूर ने जल्दी से फोन काट दिया जिससे श्रेयांश हँसने लगा। 

जैसे जैसे दिन बीत रहे थे, गुरनूर श्रेयांश को अच्छे से जानने लगी और उसे एहसास होने लगा की श्रेयांश ही उसका हमसफर बन सकता है। 

श्रेयांश को उसकी जिंदगी में भेजने के लिए वो भगवान को शुक्रिया कहना चाहती थी इसलिए वो शीतल को बताकर घर से गुरुद्वारा साहिब जाने के लिए निकल गई। 

सबसे पहले वो रावी के घर पहुँची और उसकी मम्मी, मधु को नमस्ते कहकर उनसे रावी के बारे में पूछा तो मधु ने रावी को आवाज़ लगाकर नीचे बुला लिया। रावी नीचे आई तो गुरनूर को देखकर खुश हो गई। गुरनूर ने रावी को देखकर कहा, “गुरुद्वारा साहिब चलोगी मेरे साथ।” 

“थैंक यू बोलना है भगवान जी को।” रावी ने कहा तो गुरनूर ने मुस्कुराते हुए हाँ में सिर हिला दिया। 

रावी तैयार होकर गुरनूर के साथ गुरुद्वारा साहिब जाने के लिए निकल गई। वहाँ पहुँचकर गुरनूर ने हाथ जोड़कर भगवान जी को थैंक यू कहते हुए कहा, “थैंक यू, थैंक यू, थैंक यू सो मच भगवान जी की आपने श्रेयांश को मेरी जिंदगी में भेजा।” 

थोड़ी देर वहाँ बैठकर गुरनूर और रावी बाहर आ गई। रास्ते में मंदिर भी आता था पर गुरनूर कभी भी मंदिर के अंदर नहीं जाती थी। रावी जब भी जाती थी तो वो बाहर ही खड़े होकर रावी का इंतजार करती थी पर आज उसका मन मंदिर के अंदर जाने का भी कर रहा था। 


Continued In आर्ज-ए-इश्क - 11