गुरनूर मंदिर के बाहर रूककर अंदर देखने लगी। रावी ने उसे ऐसे देखा तो कहा, “तुम मंदिर के अंदर जाना चाहती हो क्या?”
गुरनूर ने अंदर देखते हुए कहा, “मन कर रहा है की आज जाऊॅं और थोड़ी दुआ महादेव के आगे भी करूॅं श्रेयांश के लिए।”
“पर आज से पहले तो तुम कभी नहीं गई मंदिर के अंदर मेरे साथ।” रावी ने कहा तो गुरनूर ने कहा, “आज से पहले इश्क़ भी तो नहीं हुआ था।”
गुरनूर मंदिर के अंदर चली गई। रावी भी उसके पीछे पीछे अंदर चली गई। गुरनूर हाथ जोड़कर आँखें बंद कर महादेव से प्रार्थना करने लगी। रावी ने गुरनूर को देखते हुए सोचा, “क्या इश्क़ में सच में इतनी ताकत होती हैं की इंसान जिससे प्यार करे, उसका सब कुछ अपनाने के लिए तैयार हो जाए।”
गुरनूर ने मुस्कुराकर आँखें खोली और माथा टेककर रावी के साथ मंदिर से बाहर आ गई।
जैसे जैसे दिन बीत रहे थे गुरनूर श्रेयांश को लेकर काफ़ी सीरियस होती जा रही थी। वो उसके साथ शादी के ख़्वाब देखती। उसका फोन आता तो अपना सारा काम छोड़कर उससे बात करने लग जाती। रावी को ये सब सही नहीं लगता था क्योंकि गुरनूर अपने ख़्वाबों से ज्यादा अब श्रेयांश को वक्त देती थी लेकिन उसने कुछ नहीं कहा क्योंकि उसे लगता था की शायद नया नया प्यार है इसलिए गुरनूर ऐसा कर रही है।
वहीं श्रेयांश इस वक्त विवेक के साथ एक रेस्टोरेंट में बैठकर बर्गर खा रहा था की तभी उसके फोन पर गुरनूर का मैसेज आया। श्रेयांश ने अपने हाथ में पकड़ा हुआ बर्गर ट्रे में रखा और अपना फोन उठाकर बिना एक भी सेकंड गवाए गुरनूर के मैसेज का रिप्लाई किया। उसके साथ बैठे विवेक ने उसे ये करते हुए देखा तो कहा, “मुझे लगा रहा है तू गुरनूर को लेकर सीरियस हो गया है।”
श्रेयांश ने फोन की स्क्रीन से नज़रे हटाकर विवेक को देखते हुए कहा, “मैं कभी किसी चीज को लेकर सीरियस नहीं होता और गुरनूर को लेकर तो सीरियस बिल्कुल भी नहीं हूँ मैं।”
श्रेयांश को मोहब्बत तो हो चुकी थी गुरनूर से बस वो मान नहीं पा रहा था। ऐसा शायद उसके दोस्तों की वजह से था या शायद उसके अपने एटिट्यूट की वजह से।
रात में श्रेयांश को गुरनूर के बारे में सोचते हुए नींद नहीं आ रही थी। विवेक की कही हुई बात उसके दिमाग में बार बार गूंज रही थी। उसने खुद से ही सवाल किया, “मैं गुरनूर को लेकर सीरियस कैसे हो सकता हूँ।”
वो अपना फोन लेकर कमरे से बाहर आया और छत पर चला गया। उसने गुरनूर को फोन लगाया। गुरनूर सो चुकी थी लेकिन श्रेयांश के फोन की वजह से जाग गई। उसने फोन उठाकर अपनी नींद से भरी आवाज़ में कहा, “हेलो।”
गुरनूर की आवाज़ सुनकर श्रेयांश को एहसास हुआ की वो सो रही थी इसलिए उसने कहा, “सॉरी, मैंने तुम्हें जगा दिया।”
“तुम्हारे फोन कॉल का इंतजार करते करते ही सोई थी।” गुरनूर ने कहा।
“मुझे नींद नहीं आ रही और मैंने पहले कॉल इसलिए नहीं किया क्योंकि मैं तुम्हारे बारे में सोच रहा था।” श्रेयांश ने कहा तो गुरनूर मुस्कुराने लगी और उसने पूछा, “मेरे बारे में क्या सोच रहे थे?”
श्रेयांश ने गुरनूर के सवाल को नजरअंदाज करते हुए पूछा, “गुरनूर, तुम्हारे सपने क्या है?”
“इसका ख्याल कहाँ से आ गया तुम्हें आज?” गुरनूर ने उसका सवाल सुनकर हैरान होते हुए पूछा।
“बताओ ना।” श्रेयांश ने कहा तो गुरनूर ने उसे अपने ख्वाबों के बारे में बताते हुए कहा, “मेरा ख़्वाब है एक फेमस राइटर बनना और मुझे न अपने लिए एक पर्सनल लाइब्रेरी भी चाहिए जहाँ मैं अपनी बुक्स रखूॅं और वहीं बैठकर लिखूं। फिर सक्सेसफुल होने के बाद तुमसे शादी करूॅं और हम दोनों मिलकर अपनी फैमिलीज के साथ रहे।”
“फैमिलीज? क्या तुम सच में इस बारे में इतनी ज्यादा सीरियस हो?” श्रेयांश ने पूछा तो गुरनूर ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “मैं जिन्हें चाहती हूँ उनके लिए सीरियस ही रहती हूँ बहुत और तुम्हारी फैमिली भी तो मेरी ही हुई न अब।”
गुरनूर की बात सुनकर श्रेयांश ने अपने मन में सोचा, “और एक मैं हूँ जो कभी किसी को लेकर सीरियस नहीं होता।”
श्रेयांश ने थोड़ी देर उससे बात की और फिर नीचे आकर अपने कमरे में सो गया।
अगले दिन वो विवेक और अपने दोस्त, शान के साथ एक रेस्टोरेंट में बैठा हुआ था। उसने विवेक को देखते हुए कहा, “यार मुझे एक बात बताओ। बस लड़की से बात करने को ही फन कहते हो तुम लोग।”
विवेक ने उसे देखा और कहा, “अब तेरी वाली लॉन्ग डिस्टेंस में है इसमें हमारी क्या गलती।”
श्रेयांश ने उनके साथ कुछ खाया पीया और फिर वहाँ से अपने घर आ गया। उसने जल्दी से अपने कमरे में आकर गुरनूर को फोन लगाया।
जैसे ही गुरनूर ने फोन उठाया, श्रेयांश ने जल्दी से कहा, “गुरनूर, तुम मेरे पास नहीं आ सकती।”
उसकी ये बात सुनकर गुरनूर के चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कान आ गई और उसने कहा, “तिशनगी हो रही हैं तुम्हें मेरी।”
“तिशनगी मतलब।” श्रेयांंश ने पूछा।
“उर्दू वर्ड है। डिजायर होता है इसका मतलब।” गुरनूर ने कहा तो श्रेयांश ने पूछा, “तुम इतने उर्दू वर्ड्स क्यों यूज करती हो?”
“क्योंकि मुझे उर्दू अच्छी लगती है। वैसे मैंने फ्रेंच भी पढ़ी हुई है जिसे सब मोस्ट रोमांटिक लैंग्वेज कहते हैं लेकिन जब मैंने उर्दू सीखी तो मुझे सबसे रोमांटिक लैंग्वेज ये लगने लग गई और ये बहुत खूबसूरत भी है।” गुरनूर ने कहा।
“लगता हैं तुमसे बात करने के लिए थोड़ी सी उर्दू मुझे भी सीखनी पड़ेगी। फिल्हाल तुम मुझे ये बताओ की क्या तुम मेरे पास आ सकती हो?” श्रेयांश ने बेताब होते हुए पूछा जिसका गुरनूर ने प्यार से जवाब देते हुए कहा, “पास ही हूँ मैं तुम्हारे। अपने दिल में देखो। तुम्हारे दिल में हूँ मैं।”
“वो वाला पास नहीं गुरनूर। वो वाला पास जिसमें मैं तुम्हें गले लगा सकूं। तुम्हें छूकर तुम्हें महसूस कर सकूं।” श्रेयांश ने उस पल के एहसास के बारे में सोचते हुए कहा।
गुरनूर ने मुस्कराते हुए कहा, “उम्म हम्म, तुम्हारे पास आने का मन मेरा भी करता है क्योंकि मुझे तो तुमसे दूर रहकर ही तुम्हारी आदत सी हो गई है।”
“आ जाओ ना फिर।” श्रेयांश ने इस बार और ज्यादा बेताबी से कहा तो गुरनूर ने उसे कहा, “तुम भगवान जी से क्यों नहीं कहकर देखते की वो मुझे तुम्हारे पास भेजने के लिए कोई चमत्कार करदे।”
Continued In आर्ज-ए-इश्क - 12






