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Monday, 3 August 2026

आर्ज-ए-इश्क - 8

 


गुरनूर ने गुस्से से श्रेयांश को देखते हुए पूछा, “अब भी ये मत कह देना की तुम मेरा पीछा नहीं कर रहे थे।”


“मैं...मैं तो ये देखने आया हूँ की कौन है वो लकी बंदा जिसके पास तुम्हारे जैसी गर्लफ्रेंड है।” कहते हुए श्रेयांश की नजर गुरनूर के साथ खड़े लड़के पर गई और उसने कहा, “यही है शायद वो।”


“तुम्हारे अंदर इतना कॉन्फिडेंस आता कहाँ से है? स्पेशल इंदौर से तुम ये देखने आ गए की मेरा बॉयफ्रेंड कौन है।” गुरनूर ने उसे देखते हुए पूछा। 


श्रेयांश ने विवेक के कंधे को पकड़ते हुए कहा, “इस जैसे अच्छे दोस्त से।”


गुरनूर ने अपने साथ खड़े लड़के को देखा और श्रेयांश से कहा, “जैसे विवेक तुम्हारा दोस्त है, वैसे ही ये मेरा दोस्त है, सुमित।”


“तो तुम्हारा बॉयफ्रेंड कौन है?” श्रेयांश ने पूछा। 


ये सवाल सुनते ही गुरनूर श्रेयांश से नजरें चुराने लग गई क्योंकि ये तो गुरनूर को खुद भी नहीं पता था की उसका बॉयफ्रेंड कौन है क्योंकि उसका तो कोई बॉयफ्रेंड ही नहीं था। गुरनूर को नज़रें चुराता हुआ देखकर श्रेयांश समझ गया की गुरनूर ने उससे झूठ बोला है और पूछा, “तुमने मुझसे झूठ बोला ना?” 


“कौन सा मैंने किसी से ऐसा झूठ पहली बार बोला है। आजकल के लड़के अच्छे नहीं होते इसलिए मैं ये झूठ बोल देती हूँ जिससे वो मेरे पीछे ना पड़े। तुम्हें भी बोल दिया था पर मुझे क्या पता था की तुम इस बात को कन्फर्म करने दिल्ली आ जाओगे।” गुरनूर ने श्रेयांश को देखकर कहा। 


श्रेयांश को पसंद नहीं था की कोई उससे झूठ बोले। उसने मन ही मन में कहा, “तुमने मुझसे झूठ बोलकर अच्छा नहीं किया। अब इसका हिसाब तो मैं बराबर करके रहूँगा।” 


“अब जब मुझे पता लग गया है की तुम सिंगल हो तो मेरी गर्लफ्रेंड बन जाओ। मुझे मोहब्बत हो गई है तुमसे।” श्रेयांश ने प्यार से गुरनूर को देखकर कहा और फिर अपने मन में कहा, “हिसाब बराबर।” 


श्रेयांश की सुनकर गुरनूर हैरान हो गई क्योंकि उसने अपना प्रोपोजल ऐसा तो कभी नहीं सोचा था। वो चाहती थी की उसका होने वाला बॉयफ्रेंड उसे किसी खास तरीके से इंप्रेस करकर उसे प्रोपोज करे। ऐसे सीधा सीधा नहीं जैसे श्रेयांश ने अभी किया था। उसने श्रेयांश को देखकर कहा, “लड़की को ऐसे कौन प्रोपोज करता है। थोड़ा अच्छे से इंप्रेस करकर प्रोपोज करो।”


“फिर तुम हाँ कह दोगी।” श्रेयांश ने मुस्कुराते हुए पूछा। 


“पहले कोशिश तो करो।” गुरनूर ने कहा और अपने दोस्त के साथ वहाँ से चली गई। 


श्रेयांश और विवेक भी वहाँ से चले गए। वो उसी रात ट्रेन में बैठ गए और अगली सुबह इंदौर पहुँच गए। 


श्रेयांश ने विवेक के साथ जैसे ही अपने घर में कदम रखा, उसका सामना सबसे पहले शिवम से हुआ जो काफी गुस्से से उसे देख रहे थे। शिवम ने उससे बिना कुछ कहे अपनी चप्पल उतारी, जिसे देख श्रेयांश समझ गया की अब उसकी पिटाई होने वाली है। शिवम उसे मारते इससे पहले ही ज्योति ने बीच में आकर उन्हें ऐसा करने से मना कर दिया। ज्योति को देखकर श्रेयांश के चेहरे पर मुस्कान आ गई की अब वो पिटने से बच गया है लेकिन ये मुस्कान जल्दी ही गायब हो गई जब शिवम ने कहा, “नहीं, आज बिल्कुल नहीं ज्योति। आज मैं इसे पीटकर रहूँगा जिससे ये दोबारा ऐसे घर से भागने की गलती न करे।” 


अब ज्योति नीच में कुछ नहीं कह पाई। शिवम श्रेयांश को पीटने लगे। कुशाग्र श्रेयांश को अच्छे से पीटता हुआ देखने के लिए विवेक के पास आकर खड़ा हो गया। विवेक ने श्रेयांश को पिटता हुआ देखकर मुस्कुराते हुए सोचा, “आशिक़ पिट रहा है।” 


श्रेयांश की नजर जब मुस्कुराते हुए विवेक पर गई तो उसने सोचा, “ये तेरा ही आइडिया था ना भागने का। एक बार बस पापा को घर से ऑफिस जाने के लिए निकलने दे, मैं तुझे इससे भी ज्यादा पीटूंगा।” 


ज्योति ने जब देखा की श्रेयांश को ज्यादा ही मार पड़ रही है, उन्होंने आगे आकर शिवम को रोकते हुए कहा, “बस कर दीजिए। बहुत मार चुके हैं आप मेरे बच्चे को।” 


शिवम श्रेयांश को छोड़कर अपने कमरे में ऑफिस जाने के लिए तैयार होने चले गए। ज्योति ने श्रेयांश के गाल को छूकर पूछा, “दर्द तो नहीं हो रहा?” 


“थोड़ा सा।” श्रेयांश ने कहा तो ज्योति ने कहा, “चलो आ जाओ। पहले नाश्ता करलो। फिर थोड़ी देर आराम कर लेना। ठीक हो जाएगा दर्द तुम्हारा।” 


ज्योति श्रेयांश और विवेक को डाइनिंग टेबल की तरफ ले आई। शिवम तैयार होकर बाहर आए और ज्योति से मिलकर ऑफिस जाने के लिए निकल गए। 


नाश्ता करने के बाद श्रेयांश जैसे ही विवेक के साथ अपने कमरे में आया, उसने विवेक को मारते हुए कहा, “तू मुझे पिटता हुआ देखकर मुस्कुरा कैसे रहा था?” 


श्रेयांश विवेक को और मारने लगा। विवेक ने खुदको छुड़वाने की कोशिश करते हुए कहा, “भाई, मैं तो तेरे बारे में एक अच्छी बात सोचते हुए मुस्कुरा रहा था।” 


“मुझे पिटता हुआ देखकर कौन सी अच्छी बात सोच रहा था तू इतना मुस्कुराते हुए।” श्रेयांश ने उसकी पीठ पर मुक्का मारते हुए पूछा। 


“मैं सोच रहा था की आशिक़ पिट रहा है अपनी मोहब्बत की वजह से।” विवेक ने कहा। श्रेयांश ने अपने लिए आशिक़ शब्द सुना तो उसने विवेक को मुस्कुराते हुए छोड़ दिया और कहा, “मैं गुरनूर की वजह से नहीं, तेरी वजह से पिटा हूँ। ये तेरा ही आइडिया था घर से भागने का।” 


“ये तो पता लग गया ना तुझे की गुरनूर का कोई बॉयफ्रेंड नहीं है। अब तो गुरनूर सिर्फ तेरी है।” विवेक ने कहा तो श्रेयांश मुस्कुराने लगा। विवेक ने दीवार पर लगी घड़ी में टाइम देखा और कहा, “चल अब मैं चलता हूँ। मम्मी इंतजार कर रहीं होंगी मेरा। तूने पीट दिया। अभी एक थप्पड़ जाकर मम्मी से भी खाना ही पड़ेगा।” 


विवेक श्रेयांश से मिलकर वहाँ से चला गया। श्रेयांश को अब गुरनूर को इंप्रेस करना था जो की उसे काफी मुश्किल लग रहा था क्योंकि आज से पहले उसने कभी किसी लड़की के लिए ऐसा सब बिल्कुल भी नहीं किया था और उसकी नजर में लड़कियों को समझना भी काफी मुश्किल था। उसने मन ही मन में कहा, “पता नहीं मैं गुरनूर को इंप्रेस कर भी पाऊँगा या नहीं?”


Continued In आर्ज-ए-इश्क - 9

Sunday, 2 August 2026

आर्ज-ए-इश्क - 7



गुरनूर का बॉयफ्रेंड है, ये जानकर श्रेयांश का दिल टूट गया। उसने बेमन से गुरनूर के साथ थोड़ी सी बात करकर फोन साइड पर रख दिया। 


अगले दिन शाम के वक़्त वो अपने दोस्तों के साथ बैठकर पार्टी कर रहा था पर उसका मन नहीं लग रहा था। वो बस एक जगह बैठा हुआ बियर पी रहा था। विवेक ने उसे ऐसे बैठे हुए देखा तो पूछा, “क्या बात है? तू ऐसे देवदास की तरह क्यों बैठा हुआ है?”


“इतनी मुश्किल से एक लड़की पसंद आई थी। उसका भी बॉयफ्रेंड है।” श्रेयांश ने बियर की घूंट भरकर उदासी भरे लहजे में कहा। 


“तो इसमें इतना देवदास जैसे बैठने की क्या जरूरत है। कोई और लड़की ढूंढ लेते है तेरे लिए।” विवेक ने हँसते हुए कहा।


श्रेयांश ने उसे देखा और कहा, “यार, मैं चाहता हूँ सिर्फ वही मेरी गर्लफ्रेंड बने।” 


“मुझे लगता है गुरनूर झूठ बोल रही है। तुझे एक दिल्ली जाकर अपनी आँखों से देखना चाहिए की क्या सच में उसका बॉयफ्रेंड है या नहीं।” विवेक ने कहा तो श्रेयांश ने उसे मारते हुए कहा, “तू न हर बार मेरे मन में  डाउट पैदा करता है। पहले भी तूने मेरे मन में ये डाउट डाला की गुरनूर का बॉयफ्रेंड है या नहीं और अब तू ये डाउट डाल रहा है की उसने मुझसे इस बारे में सच बोला है या झूठ।’’


विवेक ने श्रेयांश के हाथ को पकड़ा जिससे वो उसे मार ना सके और कहा, “देख भाई, अगर तुझे लगता है की उसका रीलेशनशिप है तो तुड़वा दे उसका रीलेशनशिप। वो कौन सा सिरियस रीलेशनशीप में होगी और अगर सिरियस हुआ भी तो वो बस चार दिन रोएगी उसके घम में। संभाल लियो उसे उस वक़्त। प्लस पॉइंट हो जाएगा तेरा भी।’’


“तुड़वाने के लिए दिल्ली जाना पड़ेगा और वहाँ से आए हुए हमें अभी चार दिन ही हुए है। दोबारा इतनी जल्दी फिर से दिल्ली जाने का बोला तो पापा शक करेंगे। जाएँ कैसे।’’ श्रेयांश ने कहा। 


“भाग चलते है।” विवेक ने कहा और दोनों ने एक दूसरे को मुस्कुराकर देखा। वो दोनों वहाँ से निकलकर श्रेयांश की बाइक पर बैठकर उसके घर जाने के लिए निकल गए। शिवम उठ ना जाए इसलिए श्रेयांश ने अपनी बाइक घर से थोड़ी दूर रोकी और विवेक के साथ मिलकर उसे धक्का लगाकर घर के अंदर ले आया। श्रेयांश ने विवेक को नीचे रुकने के लिए कहा और पाइप चढ़कर घर में एंट्री ली। 


श्रेयांश ने अपना बैग लिया और वापिस पाइप से उतरकर नीचे आ गया। विवेक ने उन्हें स्टेशन तक छोड़ने के लिए एक कैब मंगवा ली थी। दोनों जाकर उस कैब में बैठ गए। श्रेयांश को लग रहा था की उसे किसी ने नहीं देखा लेकिन कुशाग्र ने उसे देखा लिया था क्योंकि कुशाग्र पढ़ाई की वजह से जाग रहा था। 


सुबह जब सब नाश्ते के लिए बैठे तो शिवम ने ज्योति से पूछा, “श्रेयांश अभी तक सो रहा है क्या? उसने नाश्ता नही करना?” 


“आ जाएगा अभी।” ज्योति ने उन्हें नाश्ता परोसते हुए कहा तो कुशाग्र ने कहा, “भैया नहीं आएंगे। वो तो कल रात विवेक भैया के साथ घर से भाग गए।” 


ये सुनकर शिवम को गुस्सा आ गया और उन्होंने कहा, “नाक में दम कर रखा है इस लड़के ने। पता नहीं क्या क्या करता फिरता है। ऊपर से इसकी कम्पनी भी ऐसी ही है। ये विवेक जैसे दोस्त। जो न खुद सही से रहते है ना किसी और को रहने देते हैं। मैं कह रहा हूॅं ज्योति अपने बेटे को समझाओ वरना इस विवेक की वजह से ये अपनी जिंदगी में बहुत पछताएगा।” 


श्रेयांश और विवेक दिल्ली पहुँचकर सबसे पहले ऋतिक के घर गए। श्रेयांश का मानना था की शाम होते ही गुरनूर उसे उसी मार्केट में मिलेगी जिसमें वो दोनों पहली बार मिले थे। विवेक और उसने थोड़ी देर रेस्ट किया और शाम होते ही उस मार्केट में आ गए। 


श्रेयांश उसी जगह पहुँचा जहाँ वो गुरनूर से पहली बार मिला था। विवेक ने उसे देखा और कहा, “भाई आ तो गए हैं यहाँ पर क्या तू श्योर है गुरनूर यहीं मिलेगी।” 


श्रेयांश का ध्यान विवेक की बातों में था ही नहीं। उसका ध्यान तो सामने खड़ी गुरनूर में था जो किस्मत से श्रेयांश को वहीं मिल गई। वो किसी लड़के के साथ जूस पीते हुए बातें कर रही थी। श्रेयांश ने विवेक को देखा और कहा, “जब किस्मत साथ हो तो सब मिलता है। सामने देख।” 


विवेक ने सामने देखा तो गुरनूर को वहाँ देखकर हैरान रह गया और उसने श्रेयांश से कहा, ‘‘ये तो गुरनूर है। वो भी किसी लड़के के साथ। चल भाई इसके पास चलते है।’’


विवेक जाने लगा तो श्रेयांश ने उसकी बाजू पकड़कर उसे रोकते हुए कहा, “इतनी क्या जल्दी है तुझे। थोड़ी देर गुरनूर का पीछा करकर देखते है।”


वहाँ से निकलकर गुरनूर उस लड़के के साथ आगे मार्केट घूमने के लिए चली गई। श्रेयांश और विवेक उसका पीछा करने लगे। गुरनूर को जब महसूस हुआ की कोई उसका पीछा कर रहा तो उसने पीछे मुड़कर देखा। उसे मुड़ता हुआ देखकर श्रेयांश और विवेक जल्दी से छुप गए। वहीं गुरनूर के साथ जो लड़का था, उसने उसे ऐसे देखकर पूछा, “क्या हुआ, गुरनूर?”


“मुझे ऐसा लगा जैसे कोई हमारा पीछा कर रहा है।” गुरनूर ने इधर उधर देखने की कोशिश करते हुए कहा। 


“तुम्हारा वहम होगा।” उस लड़के ने कहा तो गुरनूर फिर से उसके साथ आगे चलने लगी। श्रेयांश और विवेक फिर से उसका पीछा करने लगे। गुरनूर को दोबारा महसूस हुआ की कोई उसका पीछा कर रहा है तो वो रुक गई और उसने दोबारा पीछे मुड़कर देखा। 


जिस वक्त गुरनूर रुकी थी, उसी वक्त चलते हुए विवेक की टक्कर एक लड़की से हो गई थी। वो लड़की उसके ऊपर चिल्लाने लगी जिसकी वजह से श्रेयांश का ध्यान गुरनूर से हटकर उसके ऊपर चला गया और गुरनूर जब पीछे मुड़ी तो उसने श्रेयांश को देख लिया। 


श्रेयांश को वहाँ देखकर उसे हैरानी हुई और गुस्सा भी आया। उसने अपने साथ खड़े लड़के से कुछ कहा और उसे लेकर थोड़ा पीछे आ गई। 


वो लड़की जब विवेक को बहुत सारी बातें सुनाकर चली गई। श्रेयांश ने उससे ध्यान हटाकर सामने देखा तो गुरनूर उसे नहीं दिखी। उसने विवेक से कहा, “तेरे चक्कर में हमने गुरनूर को खो दिया।” 


गुरनूर श्रेयांश के पीछे खड़ी थी। विवेक ने चिढ़ते हुए कहा, “ये मार्केट ही ऐसी है। लड़कियों से टक्कर ही होती रहती है यहाँ। तेरी भी तो यहीं गुरनूर से टक्कर हुई थी।” 


गुरनूर को उन्हें देखकर हँसी आ रही थी। उसने श्रेयांश के पास जाकर मुस्कुराते हुए उसका कंधा थपथपाया। श्रेयांंश ने मुड़कर देखा तो गुरनूर को अपने सामने देखकर वो हैरान रह गया। उसे हैरान देखकर गुरनूर उसे गुस्से से देखने लगी।


Continued In आर्ज-ए-इश्क - 8


Saturday, 1 August 2026

आर्ज-ए-इश्क - 6



गुरनूर ने जब इश्क़ कहा तो श्रेयांश ने मुस्कुराकर उसे देखते हुए कहा, “सिर्फ लिखती ही हो या कभी करके भी देखा है।” 


“नहीं किया कभी और इश्क़ न किया नही जाता। हो जाता है अपने आप। वैसे तुम्हें इससे क्या मतलब की मुझे इश्क़ हुआ है या नहीं।” गुरनूर ने चिढ़ते हुए कहा। 


“लिखने से क्या होता। इश्क़ करके देखना चाहिए तुम्हें।” श्रेयांश ने कहा तो रावी ने जल्दी से कहा, “मैं भी इससे यही कहती हूँ की इसे इश्क़ करकर देखना चाहिए। कबतक लिखती रहेगी।” 


गुरनूर ने रावी को देखा तो वो दूसरी साइड देखने लगी। गुरनूर ने उससे नजर हटाकर श्रेयांश से कहा, “किससे करूं इश्क़। तुमसे।” 


श्रेयांश ये सुन मुस्कुराने लगा तो गुरनूर ने उसे उँगली दिखाते हुए कहा, “तुम न अपने काम से काम रखो।” 


गुरनूर ने रावी का हाथ पकड़ा और उसके साथ बाहर जाते हुए कहने लगी, “ये हीरो समझता है क्या खुदको। इश्क़ करके देखो। एक दिन भी पूरा नहीं हुआ इससे मिले हुए। इतने कम टाइम में ही पूरा दिमाग खराब कर दिया है इसने।” 


श्रेयांश गुरनूर को जाते हुए देख रहा था। विवेक ने उसे बाजू पकड़कर हिलाया तो उसकी तंद्रा टूटी। विवेक ने उसे देखकर कहा, “वो जा चुकी है, भाई।” 


श्रेयांश मुस्कुराकर बाहर की तरफ चला गया। विवेक भी उसे देखकर सिर हिलाते हुए उसके पीछे आ गया। श्रेयांश ने बाहर आकर देखा की गुरनूर पार्किंग से अपनी स्कूटी लेकर बाहर आ रही थी। रावी उसके पीछे बैठी हुई थी। श्रेयांश गुरनूर की स्कूटी के सामने आकर खड़ा हो गया। उसे सामने देखकर गुरनूर ने जल्दी से ब्रेक लगाई और चिल्लाते हुए कहा, “तुम्हें क्या शौंक चढ़ा है मरने का।” 


“मरने का शौंक।” श्रेयांश ने कन्फ्यूजन में कहा। 


“तुम्हारे दोस्त ने ही तो कल रात बताया था की तुम्हें मरने के अलग अलग तरीके अपनाने का बहुत शौंक है। देखो, अगर तुम मरने का ये तरीका अपनाना चाहते हो ना तो कोई दूसरी गाड़ी या स्कूटी को ढूंढो। मेरी ही मासूम सी स्कूटी मिली है तुम्हें अपना ये स्टूपिड मरने का तरीका अपनाने के लिए।” गुरनूर ने कहा तो श्रेयांश ने विवेक को देखा जो उसे देखकर मुस्कुराने लगा क्योंकि उसे अच्छे से पता था की कल रात उसने गुरनूर के आगे जो बकवास की थी उसके लिए श्रेयांश उसे छोड़ने वाला नही था। 


श्रेयांश ने हल्का सा मुस्कुराकर गुरनूर से कहा, “मैं यहाँ तुम्हारी स्कूटी के नीचे आकर मरने नहीं बल्कि तुम्हारा नम्बर लेने आया हूँ।” 


गुरनूर ने हैरान होकर पूछा, “तुम्हें क्यों चाहिए मेरा नम्बर? कुछ ज्यादा ही जल्दी आगे नहीं बढ़ना चाह रहे हो तुम?” 


“तुम कहो तो दोबारा तुम्हारा नम्बर लेने दिल्ली आ जाऊँगा।” श्रेयांश ने गुरनूर को छेड़ने वाले अंदाज में कहा। 


गुरनूर ने श्रेयांश को देखा और फिर कहा, “रहने ही दो. तुमसे बार बार कौन टकराए।” 


गुरनूर ने अपने बैग से पेन और डायरी को निकाला और उसके एक पेज पर अपना नम्बर लिखकर वो पेज फाड़कर श्रेयांश को दे दिया।


श्रेयांश ने पेपर पर लिखे नम्बर को देखते हुए कहा, “मुझसे बार बार कौन टकराए। अच्छा तरीका है नम्बर देने का।”


गुरनूर ने स्कूटी के हैंडल पर हाथ टिकाकर हल्का सा आगे झुकते हुए उसे देखकर कहा, “तुम्हारे नम्बर माँगने के तरीके से तो कई ज्यादा बैटर है।” 


उसे बाय बोलकर गुरनूर ने स्कूटी स्टार्ट की और रावी के साथ वहाँ से चली गई। श्रेयांश उसे जाते हुए देखता रहा और फिर मुस्कुराने लगा। 


अगले दिन वो विवेक के साथ वापिस इंदौर जाने के लिए निकल गया। जैसे ही वो अपने घर के अंदर आया, सोफे पर बैठे हुए शिवम ने कहा, “तो आ गए तुम वापिस। थोड़े दिन और रुक जाते। घर में थोड़े दिन और सुकून रहता।” 


श्रेयांश उनसे कुछ कहता इससे पहले ही ज्योति ने उसके पास आकर उसके गाल पर हाथ रखते हुए शिवम से कहा, “क्या आप भी। देख नही रहे मेरा बेटा कितना थका हुआ है।” 


“मजदूरी करके नही आया तुम्हारा बेटा जो थक गया है।” शिवम ने कहा पर ज्योति ने उनकी बात पर ध्यान न देते हुए श्रेयांश से कहा, “बेटा, तुम इनकी बातों पर ध्यान न दो और अपने रूम में जाकर थोड़ी देर रेस्ट करलो।” 


श्रेयांश अपना बैग लेकर अपने कमरे में चला गया। रात के खाने के बाद श्रेयांश ने बेड पर लेटकर अपने फोन में गुरनूर का नम्बर सेव कर उसे मैसेज किया। “हेलो, मैडम।” 


थोड़ी देर बाद ही गुरनूर का रिप्लाई आया। “हेलो।” 


“क्या कर रही हो?” श्रेयांश ने पूछा। 


“कुछ नहीं। तुम?” गुरनूर ने पूछा। 


“किसी की यादों में खो रखा हूँ।” श्रेयांश ने मुस्कुराते हुए टाइप किया। ये पढ़कर गुरनूर मुस्कुराने लगी और उसने आगे लिखा, “किसकी यादों में।” 


“तुम्हें मालूम है।” श्रेयांश ने लिखा। वो दोनों काफी देर तक एक दूसरे से बातें करते रहे। 


सुबह श्रेयांश विवेक से एक कैफे में मिला। वो दोनों विवेक की गर्लफ्रेंड का इंतजार कर रहे थे। विवेक ने अपनी कोल्ड कॉफी पीते हुए उससे पूछा, “बात हुई तेरी गुरनूर से।” 


“हम्म्म, कल रात की थी मैंने उससे बात।” श्रेयांश ने कहा। 


“भाई, एक बार उससे कंफर्म करले वो सिंगल है या नहीं। वो जितनी खूबसूरत है ना मुझे नहीं लगता वो सिंगल होगी।” विवेक ने उसे देखते हुए कहा। 


“उसकी बातों से तो नहीं लगा और वैसे भी, तुझे याद है जब हम दिल्ली में थे तो उसकी दोस्त ने कहा था की उसे इश्क करके देखना चाहिए। इससे पता चलता है की वो सिंगल हैं।” श्रेयांश ने सोचते हुए कहा जिसपर विवेक ने कहा, “क्या पता उसका बॉयफ्रेंड हो और उसकी दोस्त को इस बारे में न पता हो।” 


श्रेयांश की नजर दरवाज़े पर गई जहाँ से विवेक की गर्लफ्रेंड, जिया अंदर आकर उनकी तरफ आ रही थी। उसे देखकर श्रेयांश ने विवेक से कहा, “तू गुरनूर को लेकर मेरे मन में डाउट्स पैदा करना बंद कर और अपनी वाली पर ध्यान दे।” 


जिया ने उनके पास आकर विवेक को गले लगाया और श्रेयांश को हेलो बोलकर विवेक के साथ वाली कुर्सी पर बैठ गई। विवेक उसके साथ बातें करने लग गया। श्रेयांश सोचना नही चाहता था की गुरनूर का कोई बॉयफ्रेंड होगा लेकिन विवेक ने उसके मन में अब ये डाउट डाल दिया था जो अब उसे परेशान कर रहा था। उसने अपनी कॉफी खत्म की और विवेक और जिया को बाय बोलकर उन्हें अकेला छोड़कर बाहर आ गया। उसने तय किया की अपने इस डाउट को निकालने के लिए वो गुरनूर से बात करेगा। 


रात में खाने के बाद उसने गुरनूर के साथ मैसेज पर बात करते हुए पूछा, “गुरनूर, क्या तुम्हारा कोई बॉयफ्रेंड है?” 


गुरनूर समझ रही थी श्रेयांश ये क्यों पूछ रहा है इसलिए उसने झूठ बोलते हुए लिखा, “हाँ, है ना।”


Continued In आर्ज-ए-इश्क - 7


Friday, 31 July 2026

आर्ज-ए-इश्क - 5

 


गुरनूर की दोस्त, जो और कोई नही बल्कि रावी ही थी ने उसके पास आकर कहा, “मैं और प्रिया कबसे इंतज़ार कर रहे है तुम्हारा। खाना ठंडा हो रहा है। क्या कर रही हो तुम इतनी देर से यहाँ।”


“हाँ, चलते है रावी। एक मिनट दो बस मुझे।” कहकर गुरनूर ने श्रेयांश को गुस्से से घूरकर देखते हुए कहा, “तुम्हारे पास एक मिनट है। जल्दी से माजरत करो।” 

   

श्रेयांश को उसकी बात समझ नहीं आई तो उसने विवेक और ऋतिक की तरफ देखा। उनको भी गुरनूर की बात समझ नही आई थी इसलिए दोनों ने श्रेयांश को देखकर अपने कंधे उचका दिए। श्रेयांश को कन्फ्यूज देखकर रावी ने उसे समझाते हुए कहा, ‘‘ये आपको सॉरी बोलने के लिए कह रही है उर्दू में। इसे उर्दू लैंग्वेज काफी पसंद है न।’’ 


उसने फिर गुरनूर को देखकर पूछा, ‘‘सॉरी किस बात के लिए लेकिन। क्या किया है इन्होंने तुम्हारे साथ।’’


‘‘क्या किया इन्होंने। ये देखो, इनकी वजह से सारा जूस गिर गया हमारा।’’ गुरनूर ने रावी को दिखाते हुए कहा।    


‘‘आइ एम रेयली वेरी सॉरी मिस।’’ श्रेयांश ने कहा तो गुरनूर उसे घुरते हुए रावी के साथ वहाँ से चली गई। 


उसे जाते देख श्रेयांश ने मन ही मन में कहा, “गुरनूर, सच में ही जान से मारकर जा चुकी हो तुम मुझे। तुम्हारी खूबसूरती ने मेरे दिल के अंदर जो थोड़ी सी मोहब्बत पैदा कर दी है, उसके तीर सीधा दिल पर लगे है।’’ 


उन तीनों ने वहीं पर खाते पीते हुए खूब एन्जॉय किया और फिर घर आकर सो गए।  


अगली सुबह श्रेयांश विवेक के साथ ओपन माइक शो में जाने के लिए निकल गया। ऋतिक को अपनी जॉब पर जाना था इसलिए वो उनके साथ नहीं गया।


वहीं गुरनूर ने भी अपने छोटे से बैग में अपनी डायरी और पेन डाला और अपने पापा, विक्रम और मम्मी, शीतल को बाय बोलकर रावी के साथ ओपन माइक शो में जाने के लिए निकल गई। 


वो दोनों थोड़ी ही देर में वेन्यू पर पहुँच गई। स्कूटी पार्क कर वो दोनों बातें करते हुए अंदर जा ही रही थी की तभी गुरनूर की टक्कर दूसरी तरफ से आते हुए श्रेयांश से हो गई। वो गिरने ही वाली थी लेकिन श्रेयांश ने उसे कमर से पकड़कर गिरने से बचा लिया। श्रेयांश उसकी ब्राउन आँखों में खो गया। 


उसे वहाँ देखकर गुरनूर को फिर से गुस्सा आ गया। उसने सीधा खड़ा होकर श्रेयांश के हाथ अपनी कमर से हटाते हुए उसके ऊपर चिल्लाकर कहा, ‘‘तुमने मुझसे टकराने का कान्ट्रैक्ट लिया हुआ है क्या किसी से और तुम यहाँ क्या कर रहे हो। पीछा कर रहे हो मेरा।’’


उसकी बातें सुन अब श्रेयांश को भी गुस्सा आ गया और उसने कहा, “लिस्टेन मैडम, मुझे कोई शौंक नहीं है तुमसे टकराने का और तुम्हारा पीछा करने का। श्रेयांश को एक ही काम दोबारा दोबारा करना बिल्कुल नहीं पसंद और कल रात मेरी गलती थी इसलिए सॉरी बोल दिया मैंने तुम्हें। इस बार नहीं बोलूँगा क्योंकि यहाँ मेरे साथ साथ तुम्हारी भी गलती है।’’


गुरनूर उसे बिना कुछ कहे रावी का हाथ पकड़कर अंदर चली गई और हमेशा की तरह अपनी फेवरेट जगह पर जाकर बैठ गई। श्रेयांश भी अंदर आ गया। वो यहाँ परफॉर्म करने आया था लेकिन गुरनूर हर बार की तरह यहाँ पर सिर्फ कविताएं सुनने और लिखने के लिए आई थी। गुरनूर ने अपने बैग में से अपनी डायरी और पेन निकालकर लिखना शुरू किया। ओपन माइक शो शुरू हो गया। श्रेयांश की नजर गुरनूर के ऊपर गई तो वो उसे देखने लग गया। गुरनूर चेहरे पर मुस्कान के साथ लिखे जा रही थी। जब वो पेन होठों में दबाकर कुछ सोचने लगती तो और भी ज्यादा प्यारी लगती। शो से ध्यान हटाकर श्रेयांश गुरनूर में पूरी तरह से खो गया। कुछ लोगों के परफॉर्म करने के बाद होस्ट ने उसका नाम अनाउन्स किया लेकिन उसे तो जैसे कुछ सुनाई ही नहीं दे रहा था। वहीं गुरनूर उसका नाम सुनकर हैरान हो गई और उसने श्रेयांश को देखते हुए खुद से कहा, “ये भी पोएटरी करता है। वेरी इम्प्रेसिव!’’


विवेक ने जब श्रेयांश को गुरनूर को देखते हुए पाया तो धीरे से उसके हाथ पर चुटी काटकर कहा, “भाई, थोड़ी देर के लिए गुरनूर से ध्यान हटा ले। तेरा नाम अनाउन्स हो रहा है स्टेज पर।’’


श्रेयांश गुरनूर से नजरे हटाकर स्टेज की तरफ गया। उसकी पोएटरी सुनने के लिए गुरनूर ने अपने हाथ में पकड़ा हुआ पेन डायरी पर रखा और उसे देखने लगी लेकिन जब श्रेयांश ने कॉमेडी करनी शुरू की तो गुरनूर को चिढ़ सी महसूस हुई जिसकी वजह उसे समझ नहीं आई। 


“यार, ये कितना हॉट है।’’ रावी ने कहा तो गुरनूर ने उसे घूरकर देखा। 


परफॉर्म करने के बाद श्रेयांश वापिस अपनी जगह पर आकर बैठ गया और फिर से गुरनूर को देखने लगा। ये देख विवेक ने उससे कहा, “भाई, तू इसे ऐसे देखे जा रहा है। पसंद आ गई क्या।’’


“ये कितनी खूबसूरत है, यार। मन तो कर रहा है अब इससे एक बार और टकराऊँ जिससे इस बार हमारे  साथ साथ हमारे नैन से नैन भी टकरा जाएँ।’’ श्रेयांश ने कहा। 


“बनाले फिर गर्लफ्रेंड इसे।’’ विवेक ने कहा। कुछ और लोगों के परफॉर्म करने के बाद इवेंट खत्म हो गया। श्रेयांश गुरनूर के पास आया तो गुरनूर ने गुस्से में कहा, “दोबारा टकराना है मुझसे तुम्हें।” 


“इरादा तो यही है।” श्रेयांश ने खोए हुए कहा जिसे सुन गुरनूर ने हैरानी से कहा, “क्या?” 


श्रेयांश को जब एहसास हुआ की उसने क्या कहा है तो वो अपनी बात संभालते हुए बोला, “मैं देखे जा रहा हूॅं की तुम सिर्फ लिखे जा रही हो। कुछ सुनाया नही तुमने। ये पूछने आया था मैं तो तुमसे।” 


रावी श्रेयांश को ही देखे जा रही थी लेकिन उसका सारा ध्यान तो गुरनूर में था। गुरनूर ने हल्का सा मुस्कुराकर कहा, “मैं सिर्फ सुनने आती हूँ और सिर्फ अपने लिए लिखती हूँ।”


“कभी तो मेरे लिए भी लिखोगी ही।” श्रेयांश ने मुस्कुराते हुए कहा तो गुरनूर ने उसे देखते हुए कहा, “क्या मैं आपको इतने अच्छे से जानती हूँ, मिस्टर और मैं कॉमेडी नही लिखती।” 


“तो अब जान लो।” कहकर श्रेयांश ने गुरनूर को अपना परिचय दिया और फिर पूछा, “आप क्या लिखती है, गुरनूर?” 


गुरनूर ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “इश्क़।” 


Continued In आर्ज-ए-इश्क - 6

Thursday, 30 July 2026

आर्ज-ए-इश्क - 4

 


रावी ने गुरनूर को देखा और कहा, “हाॅं हाॅं, पता है मुझे तुम्हारी ख्वाहिशों की लंबी लिस्ट का।” 


“एनीवेज, तुम कल चल रही हो ना मेरे साथ ओपन माइक शो में।” गुरनूर ने खड़े होते हुए पूछा और किचन की तरफ जाने लगी। 


“ऑफकोर्स चलूंगी यार। तुम्हारी वजह से ही तो पापा मुझे घर से बाहर आने देते है आसानी से।” रावी ने कहा। 


गुरनूर ने किचन के गेट से हल्का सा बाहर निकलकर उसे देखते हुए कहा, “वैसे न अंकल इतने भी स्ट्रिक्ट नही है जितना तुमने और नील भैया ने उन्हें बना दिया है।” 


गुरनूर की बात सुनकर रावी हॅंसने लगी। 


श्रेयांश और विवेक जैसे ही दिल्ली रेलवे स्टेशन से बाहर निकले, श्रेयांश ने कहा, “फाइनली, इतने वक्त के बाद इंदौर से निकलने का मौका मिला है।” 


विवेक उसे देखकर मुस्कुराने लगा। उनका दोस्त, ऋतिक उन्हें वहाॅं लेने आया। ऋतिक उन्हें अपनी गाड़ी में बैठाकर अपने फ्लैट में ले आया। 


श्रेयांश रात में खिड़की के पास खड़े होकर दिल्ली की चका चौंध को देख रहा था। ऊॅंची इमारतें, सड़कों पर चलता हुआ ट्रैफिक। सड़कों भर भागती हुई गाड़ियों को देखकर श्रेयांश ने सोचा, “इन बड़े शहरों में हर कोई ऐसे ही जल्दी में रहता है। एक जगह ठहरकर उस लम्हें को खुलकर जीना तो शायद इन्होंने सीखा ही नही है। बस सब जल्दी से आने वाले समय को पकड़ने की  रेस में है।” 


श्रेयांश को हैरानी हुई की वो ये सब क्या सोच रहा है क्योंकि ऐसे टॉपिक्स से तो उसका कुछ लेना देना ही नही था। वो दिल्ली आया तो बहुत एक्साइटमेंट के साथ था लेकिन अब उसे ये सब देखते हुए हर बार जैसे बोरियत महसूस होने लग गई थी। 


ऋतिक ने उसके पास आकर उसे एक ड्रिंक देते हुए कहा, “दिल्ली की खूबसूरती देख रहा है।” 


“भाई, तू ये बिल्डिंग्स और ये ट्रैफिक को देखकर बोर नही होता क्या जो इसे खूबसूरती बता रहा है।” श्रेयांश ने कहा तो विवेक, जो सोफे पर आराम से बैठकर अपनी गर्लफ्रेंड से चैटिंग करने में लगा हुआ था, जोर जोर से हॅंसने लगा। ऋतिक ने एक नजर विवेक को देखा और फिर श्रेयांश को देखकर कहा, “भाई, बोर मत हो। चलो तुम दोनों को बाहर लेकर चलता हूॅं।” 


तीनों फ्लैट से बाहर आ गए। ऋतिक ने फ्लैट लॉक किया और उन दोनों के साथ नीचे आ गया। 


“बाइक मैं चलाऊॅंगा।” कहते हुए श्रेयांश ने चाबी लेने के लिए हाथ आगे बढ़ा दिया। विवेक ने ऋतिक को मना करने के लिए की वो श्रेयांश के हाथ में चाबी न दे, ना में गर्दन दिला दी और अपने हाथ को चाकू समझते हुए अपनी गर्दन के पास लेजाकर चलाया जैसे कहना चाह रहा हो की अगर इसे चाबी दी तो हम दोनों मरेंगे इसके साथ ही। 


ऋतिक विवेक को देख ही रहा था की श्रेयांश ने इतने में ही उसके हाथ से चाबी शीन ली और बाइक स्टार्ट कर उन दोनों को बैठने के लिए कहा। ऋतिक और विवेक भगवान से दुआ करते हुए बाइक पर बैठ गए। उनके बैठने के बाद श्रेयांश ने बाइक चलानी शुरू की। ऋतिक पीछे बैठा हुआ उसे रास्ता बता रहा था। 


मार्केट में पहुॅंचकर श्रेयांश ने बाइक की स्पीड बिल्कुल बढ़ा दी। मार्केट में अलग ही चका चौंध थी। गाड़ियाॅं और बाइक बिल्कुल बीच में से निकल रहे थे और साइड पर तरह तरह की दुकानें की, जिनपर लोग शॉपिंग कर रहे थे और खाने के स्टॉल थे, जिनपर लड़के लड़कियाॅं खड़े होकर खाने को एंजॉय कर रहे थे। वहीं कुछ प्रेमी जोड़े हाथों में हाथ डाले घूम रहे थे। 


श्रेयांश बाइक चलाते हुए इन सब को देख रहा था। उसके पीछे बैठे हुए विवेक और ऋतिक की जान बाइक की बड़ी हुई स्पीड की वजह से हलक में अटकी हुई थी। ट्रैफिक और आसपास की आवाज ज्यादा होने की वजह से विवेक ने श्रेयांश से तेज आवाज़ में कहा, “भाई, मार्केट में है हम लोग और यहाॅं ट्रैफिक बहुत है। स्पीड स्लो करदे वरना किसी से टक्कर हो जाएगी हमारी।”


“कुछ नही होगा। रिलैक्स बैठ।” श्रेयांश ने हल्का सा पीछे मुड़कर उसे देखते हुए कहा और फिर जैसे ही सामने देखा, उसकी बाइक की टक्कर एक कार से होने वाली थी। विवेक और ऋतिक के तो ये देखकर प्राण ही उड़ गए। तेज स्पीड की वजह से ब्रेक लगाना मुश्किल था लेकिन फिर भी उसने टाइम से ब्रेक लगा दी और बाइक एक साइड पर ले आया। 


श्रेयांश ने पीछे मुड़कर मुस्कुराते हुए विवेक को देखा जिसने गुस्से से कहा, “तू पागल है क्या? तेरे इस फन और एक्स्टेसी के चक्कर में अभी मर जाते हम।” 


“मरे तो नही ना और मुझे ये सब करकर एक अलग खुशी मिलती है।” श्रेयांश ने कहा। 


“पहला बंदा देखा है जिसे अपने साथ साथ दूसरों की जिंदगी दाव पर लगाकर खुशी मिलती है। तू ऐसे काम अकेले कर लिया कर। हमें ये हमारी जिंदगी ना बहुत प्यारी है।” विवेक ने बाइक से उतरते हुए कहा। 


“अच्छा, चल अब आगे से नही करूॅंगा।” श्रेयांश ने कहा। विवेक को पता था की श्रेयांश झूठ बोल रहा है पर उसने कुछ नही कहा। बाइक पार्क कर वो तीनों एक खाने के स्टॉल की तरफ जाने लगे। श्रेयांश विवेक और ऋतिक की तरफ मुड़ गया और उनसे बातें करते हुए उल्टा चलने लगा। क्योंकि श्रेयांश को पीछे का कुछ दिखाई नही दे रहा था, वो अपने पीछे से आती हुई लड़की से टकरा गया, जो बहुत ही सावधानी से अपने हाथ में जूस के गिलास पकड़कर सामने देखते हुए चल रही थी। उस लड़की के हाथ में जो जूस के गिलास थे, वो टकराने की वजह से आधे श्रेयांश की टी शर्ट पर और आधे नीचे गिर गए थे। 


गिरे हुए गिलास को देखकर उस लड़की को श्रेयांश के ऊपर गुस्सा आ गया और उसने गुस्से से श्रेयांश के कंधे पर हाथ रखकर उसे अपनी तरफ करते हुए कहा, “ए मिस्टर, क्या भगवान ने तुम्हें पीछे की तरफ आँखें दी है जो ऐसे चल रहे हो।” 


उस लड़की की बात सुनकर विवेक और ऋतिक हॅंसने लगे। श्रेयांश ने कुछ नही कहा। वो तो बस उस लड़की को देखे जा रहा था। खूबसूरत ब्राउन आँखें, गोरा रंग, गुलाब की पंखुड़ियों के जैसे होंठ। खुले बालों में वो लड़की बला की खूबसूरत लग रही थी। श्रेयांश को कुछ न कहता देखकर उस लड़की ने कहा, “मेरा सारा जूस गिरा दिया। इतनी मुश्किल से लिया था मैंने। मन तो कर रहा है तुम्हें पीट दूं यहीं पर ही।” 


विवेक और ऋतिक को ये सुनकर और भी ज्यादा हॅंसी आ गई क्योंकि दोनों जानते थे की श्रेयांश इंटरनेशनल लेवल कराटे चैंपियन था जिसकी वजह से आजतक किसी ने उसे पीटने की कोशिश तो दूर की बात है, इस बारे में सोचा तक नही था और ये लड़की उसे उसके सामने ही पीटने की बातें कर रही थी। विवेक ने मजे लेते हुए कहा, “तो पीट दो। इनफैक्ट मार ही दो जान से। इसे मरने के अलग अलग तरीके अपनाने का बहुत शौंक है। ये तरीका भी एक्सपीरियंस कर लेगा ये की लड़की के हाथों कैसे मरते है।” 


ये सुनकर श्रेयांश ने गुस्से से विवेक को घूरा। वो लड़की कुछ कहती इससे पहले ही उसकी दोस्त ने उसके पास आते हुए उसे आवाज लगाई, “गुरनूर, क्या हो गया?” 


Continued In आर्ज-ए-इश्क - 5

Tuesday, 28 July 2026

आर्ज-ए-इश्क - 3



श्रेयांश ने बालकनी की रेलिंग के सहारे उसके ऊपर खड़े होकर शिवम से पूछा, “पापा, आप सोए नही अभी तक?” 


“पहले अंदर तो आ जाओ। पाइप चढ़ने में इतनी मेहनत की है तुमने।” शिवम ने कहा। 


“अंदर आया तो आप मारोगे। पीछे डंडा पकड़ रखा है आपने अपने हाथों में।” श्रेयांश ने घबराते हुए कहा।


शिवम ने उसे देखते हुए कहा, “चुपचाप अंदर आ जाओ। कुछ नही कहूॅंगा तुम्हें और न ही मारूॅंगा। प्यार से कह रहा हूॅं। अंदर आ जाओ।” 


“रहने दीजिए पापा। बहुत अच्छे से समझता हूॅं आपके इस स्कैम को मैं। बचपन से चलता आ रहा है ये। हर बार आप प्यार से यही कहकर अंदर बुलाते है और फिर आपके अंदर टिपिकल इंडियन फादर की आत्मा आ जाती है।” श्रेयांश ने शिवम को देखकर कहा। उनकी बातों के शोर से ज्योति और श्रेयांश के भाई, कुशाग्र की नींद भी खुल गई। वो दोनों भी कमरे से बाहर आ गए। श्रेयांश अंदर नही आया तो शिवम ने इस बार थोड़ा सख्ती से कहा, “अंदर आ रहे हो या यहीं से हाथ पर डंडा मारकर नीचे गिराऊॅं तुम्हें।” 


शिवम की ये बात सुनकर श्रेयांश डर के मारे अंदर आने लगा पर जैसे ही उसकी नजर पीछे खड़ी ज्योति पर गई, वो मुस्कुराते हुए अंदर आ गया क्योंकि उसे पता था ज्योति उसे मार खाने से बचा लेंगी। शिवम जैसी ही श्रेयांश को डंडे से मारने लगे, ज्योति ने पीछे से आकर वो डंडा पकड़ लिया और शिवम को घुरकर देखते हुए कहा, “ज्यादा ना कमीशनर बनने के जरूरत नही है मेरे बच्चों के ऊपर, यहाॅं की डिफेंस मिनिस्टर और होम मिनिस्टर मैं हूॅं। लाइए डंडा दीजिए इधर।” 


शिवम ने डंडा ज्योति को दे दिया। ज्योति सबको सोने के लिए कहकर वहाॅं से अपने कमरे में चली गई। श्रेयांश ने शिवम को देखा और उनसे पूछा, “आपको कैसे पता चला की मैं घर आ चुका हूॅं और मैं बालकनी से ही अंदर आऊॅंगा।” 


“तुम शायद भूल रहे हो की तुम्हें मैंने ही पालकर बड़ा किया है। अच्छी तरह से पता है मुझे की तुम क्या क्या करते हो और तुम्हारी वो बाइक, जो बहुत शोर करती है ना, वो भी तुम्हारी जिद्द पर तुम्हें मैंने ही लेकर दी है।” शिवम ने कहा। 


“तो अब आप मुझे फिर से छोटा करना चाहते है और बाइक वापिस लेना चाहते है।” श्रेयांश ने शरारत से कहा तो शिवम ने जानबूझकर दुख भरी आवाज में कहा, “काश मैं फिर से तुम्हें छोटा कर सकता। जिंदगी सुकून में रहती। तुम्हारी परेशानी में नही।” 


श्रेयांश ने चिढ़ते हुए कहा, “मैं कहाॅं परेशान करता हूॅं पापा आपको।” 


“परेशान ही हूॅं मैं तुम्हें लेकर क्योंकि तुम अपनी जिंदगी में सीरियस नही हो बिल्कुल भी बल्कि तुम तो जिंदगी को लेकर भी सीरियस नही हो। कभी तुम बाइक ऐसे चलाओगे की तुम्हारा एक्सीडेंट ही हो जाए और तभी ये पाइप पर चढ़कर आने जैसी हरकते करोगे जिससे तुमने चोट लगे गिरकर या तुम्हारी जान ही निकले। मिलता क्या है तुम्हें इन सब में।” शिवम ने गुस्से में कहा। 


“एक्स्टेसी।” श्रेयांश ने जवाब दिया। 


शिवम ने उसे घुरकर देखते हुए कहा, “तुम्हारा ये सब करना मुझे बेवकूफी लगता है।” 


श्रेयांश ने थोड़ी देर तक उन्हें देखा और कहा, “पिछले तीन सालों से मैं एक ही चीज को लेकर तो काफी सीरियस हूॅं, पापा। बहुत ज्यादा वक्त बिता दिया है मैंने स्टैंड अप कॉमेडी करते हुए बाकी सारी एक्टिविटीज के बजाए।” 


“बेटा, तुम समझते क्यों नही। इन सब से तो कुछ भी नही मिलने वाला है तुम्हें। मैं चाहता हूॅं तुम अपने किसी जॉब या बिज़नेस को लेकर सीरियस हो।” शिवम ने थोड़ा प्यार से कहा। 


“आप जानते है पापा की ये कभी नही होने वाला और मैं स्टैंड अप कॉमेडी में सक्सेस होकर आपको गलत प्रूफ करकर दिखाऊॅंगा। कल दिल्ली जा रहा हूॅं मैं। अपना पहला आउट ऑफ स्टेट शो करने।” कहकर श्रेयांश अपने कमरे में जाने लगा। 


उसे जाता हुआ देखकर शिवम ने कहा, “मैं फिर से कह रहा हूॅं तुम्हें जॉब करनी चाहिए।” 


श्रेयांश रुक गया और उसने शिवम को चिढ़कर देखते हुए कहा, “ये डिस्कशन हम हर बार क्यों करते है।” 


“क्योंकि तुम देख नही पा रहे हो की तुम कहाॅं जा रहे हो रिस्पॉन्सिबल बनने की एज में। बस ये बेकार के शोज करना, फ्रैंड्स के साथ देर रात तक ऐसे अवारा बनकर घूमना और पार्टी करना। यही सब है तुम्हारी लाइफ में। कोई ढंग का काम तो है ही नही। ऊपर से मेरी गलती है जो तुम्हारी जिद्द पर और तुम्हारी माॅं की सिफारिश पर तुम्हें बाइक और दिला दी।” शिवम ने फिर गुस्से में कहा। 


“बस कर दीजिए, पापा। मैं जा रहा हूॅं कल। आपके चार दिन मुझे देखे बिना सुकून से निकलेंगे।” कहकर श्रेयांश अपने कमरे में चला गया और पैकिंग करने लगा। 


सुबह वो तैयार होकर नाश्ते करने के बाद ज्योति, शिवम और कुशाग्र से मिलकर विवेक के साथ दिल्ली जाने के लिए निकल गया। 


गुरनूर खिड़की के पास हाथों में अपनी डायरी और पेन लिए हुए कुर्सी पर बैठी हुई थी। वो बाहर एक छोटी सी चिड़िया को देखकर मुस्कुराते हुए डायरी में कुछ लिख रही थी की तभी रावी वहाॅं आई। उसने गुरनूर के हाथों में डायरी और पेन को देखकर कहा, “अब क्या लिख रही हो, मैडम?” 


“इश्क ही लिखती हूॅं मैं हर बार।” गुरनूर ने खोए हुए कहा और फिर रावी को देखा। 


“हाय, इश्क लिखती ही रहोगी क्या। कभी करके भी देखो।” रावी ने गुरनूर को छेड़ते हुए कहा। 


गुरनूर ने अपनी डायरी को बंद कर उसे देखा और कहा, “इश्क न किया नही जाता। बस हो जाता है। मुझे जब इश्क होना तो अपने आप ही जाएगा। तब न मैं इस दिल को इश्क करने से रोक पाऊॅंगी और न ही कोई और रोक पाएगा।”


“तुम इतनी गहरी बातें कैसे कर लेती हो?” रावी ने पूछा जिसपर गुरनूर ने हॅंसते हुए कहा, “जैसे तुम बेवकूफी वाली करती हो।“ 


ये सुनते ही रावी ने गुरनूर के हाथ पर मारते हुए कहा, “वेरी फनी! वैसे तुम्हें अपने आप प्यार होगा कैसे। लड़को से तो तुम दूर भागती हो।” 


“मैं बेकार लड़को से दूर भागती हूॅं। तुम तो जानती ही हो की मुझे ये टाइमपास और फन वाला प्यार पसंद नही है। जब मेरे जिंदगी में मेरा ड्रीम बॉय आएगा तो देखना। उसके और मेरे इश्क में कितना जुनून होगा।” गुरनूर ने मुस्कुराकर कहा। 


Continued In आर्ज-ए-इश्क - 4

Monday, 27 July 2026

आर्ज-ए-इश्क - 2



 

श्रेयांश ऐसे ही खामोशी से बैठा रहा तो विवेक ने उससे कहा, “भाई, तू गर्लफ्रेंड क्यों नही बना लेता।” 


श्रेयांश ने अपने दोस्तों को देखकर कहा, “तुम सबको मेरे सिंगल होने से क्या प्रॉब्लम है।” 


“भाई, कॉमेडी तो तू करता ही है पर जिंदगी में हॅंसी मजाक के साथ फन भी तो होना चाहिए न।” विवेक ने कहा।


“ये कर ही रहा हूॅं फन इस वक्त। तुम सब के साथ बाइक रेसेस करता हूॅं, पार्टीज करता हूॅं। फन ही है ये सब। जिंदगी में एक लड़की के आने से ज्यादा फन हो जाएगा।” श्रेयांश ने बीयर की सिप लेकर कहा। 


विवेक उसके साथ आकर बैठा और उसने उसके कंधे पर हाथ रखकर कहा, “भाई, तू एक बार गर्लफ्रेंड बनाकर तो देख। तुझे पता लग जाएगा तू लाइफ में क्या मिस कर रहा है।” 


“मुझे कोई इंटरेस्ट नही है।” श्रेयांश ने उसे देखते हुए कहा।


विवेक ने उसे देखा और कहा, “क्यों नही है। हमें देख ले। हम सबकी भी तो गर्लफ्रेंड है और तेरे लिए तो गर्लफ्रेंड बनाना और भी आसान है क्योंकि तुझे आदत है किसी भी चीज को लेकर ज्यादा सीरियस न होने की।”


“मेरे किसी बात को लेकर सीरियस न होने का इससे क्या कनेक्शन है?” श्रेयांश ने कंफ्यूज होते हुए पूछा।


“भाई, तुझे क्या लगता है। हम सब अपनी अपनी गर्लफ्रेंड्स के साथ सीरियस रिलेशनशिप में है। नही, हम सब सिर्फ टाइमपास कर रहे है उनके साथ। आज कल की लड़कियाँ भी ऐसे ही रिलेशनशिप चाहती है तो तू भी कोई लड़की ढूंढकर ऐसा ही टाइमपास वाला रिलेशनशिप बना ले। सीरियस होने की वैसे भी कौन सा तुझे आदत है।” विवेक ने उसे समझाते हुए कहा। 


श्रेयांश ने कुछ नही कहा। उसने अपनी बीयर खत्म कर सोफे से उठते हुए विवेक से कहा, “चल एक बाइक रेस हो जाए।” 


श्रेयांश सबको बाय कहकर विवेक के साथ उस कमरे से बाहर आ गया। ये कमरा उनके ही किसी एक दोस्त का था जो उसने अपने अकेले रहने के लिए खरीदा था। वो अकेला रहता था इसलिए सभी हर बार उसके इस कमरे में आकर ही पार्टी किया करते थे। 


श्रेयांश और विवेक ने लिफ्ट से नीचे आकर हेलमेट पहनकर अपनी बाइक स्टार्ट की और बहुत ही तेज़ स्पीड में बाइक चलाते हुए वहाॅं से निकल गए। 


एक खाली सड़क पर आकर श्रेयांश ने अपनी बाइक की स्पीड विवेक की बाइक की स्पीड से तेज की और एकदम से विवेक की बाइक के सामने साइड से घुमाकर रोक दी। विवेक ने बहुत ही मुश्किल से ब्रेक लगाई। उसकी बाइक का टायर बिल्कुल श्रेयांश के पैर के करीब आकर रुका।

“तू पागल हो गया है क्या। अभी एक्सीडेंट हो जाता।” विवेक ने हेलमेट उतारकर चिल्लाते हुए कहा। श्रेयांश ने भी अपना हेलमेट उतार दिया। 


“फन करवाना चाह रहा था तुझे।” श्रेयांश ने बिल्कुल अलग ही अंदाज में आगे बाइक के हैंडल की तरफ झुककर अपनी दोनों बाजू बाइक के हैंडल के ऊपर टिकाकर विवेक को देखते हुए कहा। 


उसकी बात सुनकर विवेक को गुस्सा आ गया और उसने कहा, “तेरे इस फन के चक्कर में अभी हम घर के बजाय सीधा ऊपर पहुॅंचते।” 


“ज्यादा से ज्यादा मर ही जाते ना। जीकर भी क्या कर पा रहे है हम। कुछ बन पाए है जीकर आजतक पैरेंट्स की नजरों में। मरकर कम से कम भूत तो बनेंगे।” श्रेयांश ने हॅंसते हुए कहा। 


“तेरी इस सोच को तो सलामी दिलवानी चाहिए।” विवेक ने कहा तो श्रेयांश और ज्यादा हॅंसने लगा जिसे देख विवेक ने चिढ़ते हुए कहा, “तू ही मर इतनी जल्दी। मैं तो गिनती भी भूल चुका हूॅं की कितनी बार ऐसा करकर तूने खुदको और मुझे मारने की कोशिश की है। देख भाई, तू मर सकता है पर मुझे जीना है क्योंकि मेरे पास जीने की बहुत सारी वजह है।”  


“और हर बार हम दोनों बच जाते है और ये जीने की वजह क्या है। ऐसा सब भी सोचता है तू।” श्रेयांश ने कहा। 


विवेक ने हेलमेट फिर से पहनते हुए कहा, “ये सारे सीरियस टॉपिक्स है और तू रहता है सीरियसनेस से कोसों दूर वरना एक बार जीने की वजह ढूंढने की सोचे तो पता लगे कि किसी के लिए जीना भी कितना खूबसूरत होता है।” 


“मेरे पास तो सारी वजह मरने की है और किसी के लिए जीना। ये मुझसे नही होगा। मैं अगर जी रहा हूॅं तो सिर्फ खुद के लिए और मरना चाहता हूॅं तो वो भी खुद के लिए। मैं किसी और के लिए न जीना चाहता हूॅं, न मरना और वैसे भी अगर ये सोच रही तो सिर्फ कुछ वक्त तक रहेगी। जैसे चार दिन की चाॅंदनी। उसके बाद फिर अंधेरी रात है।” श्रेयांश ने मुस्कुराकर कहा तो विवेक ने कहा, “तेरा कुछ नही हो सकता।” 


“हो सकता है। मैं मरने के बाद भूत बन सकता हूॅं।” श्रेयांश ने कहकर हॅंसते हुए अपनी बाइक स्टार्ट की। विवेक ने भी अपनी बाइक स्टार्ट की और वो दोनों फिर से बाइक चलाने लगे। 


एक मोड़ पर आकर दोनों ने अपनी बाइक रोकी क्योंकि यहाॅं से उन दोनों के घर जाने का रास्ता अलग था। श्रेयांश ने विवेक को बाय कहा और उनके रास्ते अलग हो गए। 


कुछ वक्त बाद श्रेयांश ने बाइक अपने घर के सामने रोकी। रात के दो बज रहे थे इसलिए उसे लगा कि शिवम अभी तक सो चुके होंगे और ये सच भी था लेकिन उसकी बाइक की आवाज इतनी तेज थी की वो उससे जाग चुके थे। उन्हें मालूम था की श्रेयांश पाइप चढ़कर बालकनी से घर के अंदर आएगा क्योंकि घर मेन डोर तो बंद था। वो उठकर अपने कमरे से बाहर आए और श्रेयांश का अच्छे से स्वागत करने के लिए एक डंडा लेकर बालकनी के सामने जाकर खड़े हो गए। 


श्रेयांश ने अपनी बाइक पार्क की और हेलमेट उतारकर रखते हुए कहा, “मेन डोर तो बंद होगा। चलो श्रेयांश बेटा, पाइप चढ़कर घर में एंट्री ले।” 


पाइप की तरफ आकर वो उसके ऊपर चढ़ने लगा। जैसे ही वो चढ़ते हुए बालकनी तक पहुॅंचा, सामने शिवम को खड़ा हुआ देखकर हैरान हो गया। शिवम के हाथ पीछे की तरफ थे क्योंकि उन्होंने हाथ में डंडा पकड़ा हुआ था। उनके हाथों को पीछे की तरफ देखकर श्रेयांश समझ गया की उनके हाथ में डंडा है जो उसका पीटकर स्वागत करने के लिए उन्होंने पकड़ा हुआ है। श्रेयांश बस दुआ करने लगा की हर बार की तरह ज्योति आकर उसे बचा ले।


Continued In आर्ज-ए-इश्क - 3