मधु ने गुरनूर और नील की शादी को लेकर अब तक अपने दिल में बहुत सारे ख़्वाब सजाए थे जिन्हें अब वो टूटता हुआ देख रही थी। शुभम ने उनके कंधे पर हाथ रखकर उन्हें समझाते हुए कहा, “मधु समझने की कोशिश करो। मैं ऐसे ही विक्रम को फोन कर गुरनूर का रिश्ता तोड़ने की बात नही कह सकता। तुम भगवान से दुआ करो क्योंकि मेरा दिल कह रहा है ये शादी गुरनूर बिल्कुल नहीं करेगी।”
शुभम बहुत देर तक मधु को समझाते रहे और मधु समझ भी गई।
गुरनूर ने उस दिन बहुत मुश्किल से श्रेयांश से बात की। वो अपनी आवाज़ से श्रेयांश को इस बात का एहसास नही होने देना चाहती थी की वो उदास या परेशान है पर श्रेयांश इस बात को अपने दिल से महसूस कर पा रहा था की गुरनूर काफी तकलीफ़ में है लेकिन उसने गुरनूर से इस बारे में कुछ नहीं पूछा।
गुरनूर के रोके को अभी तीन दिन ही हुए थे की विक्रम को नीत का फोन आया और नीत ने विक्रम से जो कुछ कहा, उसे सुनकर वो थोड़ा परेशान हो गए। शीतल भी वहीं खड़ी होकर उन्हें देख रही थी। जैसे ही विक्रम ने फोन रखा, शीतल ने पूछा, “क्या कहा है दीदी ने?”
“लड़के वाले शादी जल्दी करना चाहते है इसलिए कल वो हमसे मिलने आएंगे।“ विक्रम ने कहा तो शीतल ने गुस्से से कहा, “मुझे एक बात बताइए। क्या दीदी को हमसे ये नही पूछना चाहिए था की हम कल उनसे मिल सकते है या नहीं। आपकी बहन की न कुछ ज्यादा ही आदत है हमारे घर में दखल देने की। पूछती नही है कुछ भी। सीधा बताती है की ये कर लेना। अरे, उनका हक़ है अपने मायके पर लेकिन इसका मतलब ये तो नही की वो अपने फैसले भी हमसे मनवाएंगी।”
शीतल गुस्से में वहाँ से चली गई। विक्रम को भी अब समझ नही आ रहा था की वो क्या करे। वो अपनी बहन से कुछ कह नहीं सकते थे क्योंकि वो बड़ी थी और शीतल से भी नही क्योंकि उन्हें मालूम था की शीतल भी गलत नही है।
अगले दिन लड़केवाले नीत के साथ आ गए और सबने मिलकर शादी की तारीख अगले महीने की तय कर दी। विक्रम और शीतल को छोड़कर सभी खुश थे और गुरनूर, उसकी उदासी को तो किसी ने देखा तक नही। गुरनूर ने नजर उठाकर उस लड़के को देखा जिससे उसकी शादी होने वाली थी तो पाया कि वो लड़का उसे हवस भरी नज़र से देख रहा था। गुरनूर को उस लड़के की नज़र को अपने ऊपर महसूस करना अच्छा नहीं लग रहा था क्योंकि श्रेयांश ने उसे आजतक ऐसे कभी नहीं देखा था। ये याद करते ही उसे रोना आ गया। वो वहाँ से एकदम से उठकर ऊपर अपने कमरे में चली गई और बेड पर लेटकर रोने लगी।
शीतल और विक्रम ने गुरनूर को ऐसे जाते हुए देखा तो वो दोनों परेशान हो गए। वहीं लड़केवाले भी हैरानी से उस तरफ देख रहे थे जहाँ गुरनूर गई थी। उन्हें ऐसे देखकर नीत ने बात संभालते हुए कहा, “लगता है हमारी गुरनूर शर्मा गई है। लड़की है ना। अपनी शादी की बात सुनकर शर्मा ही जाती है लड़कीयाँ।”
लड़केवाले मुस्कुराने लगे। लड़के की माँ ने मुस्कुराकर विक्रम को देखते हुए कहा, “भाई साहब, ये मेरा एक लौता बेटा है इसलिए मैं चाहती हूँ की ये शादी बहुत धूमधाम से हो। किसी को भी कोई कमी न आए और लेन देन भी आपकी तरफ से एकदम बढ़िया हो जिससे मेरे सारे रिश्तेदार खुश हो जाएं।”
विक्रम को तो जल्दबाजी में कुछ समझ नहीं आ रहा था इसलिए उसने बिना कुछ कहे हाँ में सिर हिला दिया। उनके जाने के बाद शीतल ने गुस्से में विक्रम और नीत को देखते हुए कहा, “अब ये जो इनकी डिमांड है शादी धूमधाम से करने की और सारे लेन देन की। इन सबका इतने कम वक्त में कौन इंतजाम करेगा। पूछ लीजिए अपनी बहन से। जब ये हमारे घर के सभी फैसले खुद लेना चाहती है तो अब पूछिए इनसे। क्या ये करेंगी हमारी गुरनूर की शादी पर इतना सा भी खर्चा।”
“भाभी, आपको मेरे लिए ऐसा कहने की ज़रूरत नहीं है। मैंने अपना मानकर ही गुरनूर का रिश्ता करवाया है इतने अच्छे घर में। इसमें आपके घर के फैसले लेने वाली कौन सी बात आ गई?” नीत ने कहा।
ये सुनकर शीतल का गुस्सा सातवें आसमान पर पहूँच गया और उसने कहा, “ना, आप तो पूछती है हमसे। गुरनूर के लिए रिश्ता लाने से पहले भी आपने हमसे पूछा, फिर पक्का होने लगा तो भी आपने गुरनूर के मना करने के बावजूद भी पक्का करवा दिया रिश्ता बिना हमारी मर्ज़ी के, और कल भी आपने हमसे पूछा कहाँ, की भाई भाभी, वो लोग तारीख तय करना चाहते है। क्या आप लोगों के पास इतना पैसा है अभी की शादी में खर्च कर पाओ। नही, आपने तो सीधा फैसला सुनाया की वो आ रहे है शादी पक्की करने।”
विक्रम जानते थे शीतल गलत नहीं है फिर भी उन्होंने कहा, “शीतल, बस शांत हो जाओ। अब जो होना था वो हो गया। अब हमें मिलकर आगे का सोचना होगा की क्या करना है।”
“मुझे ही शांत करवाना आप। अपनी बहन को मत समझाना कुछ भी। आजतक जितनी हमने सेविंग्स की है, वो तो लगेंगी ही इस शादी में। जैसी उनकी डिमांड्स है ना, लोन भी लेना पड़ जाएगा हमें।” कहकर शीतल गुस्से में वहाँ से चली गई।
नीत को अपनी भाभी की बातों का बुरा लगा था इसलिए वो भी अपने घर जाने के लिए निकल गए। विक्रम वहीं बैठकर इन सब के बारे में सोचने लगे। उन्होंने सोचा नही था की एक गुरनूर की शादी को लेकर घर में इतना कलेश होगा। अब उन्हें पछतावा हो रहा था और उन्हें सच में लग रहा था की उन्हें गुरनूर के इनकार के खिलाफ जाकर ये रिश्ता पक्का नही करना चाहिए था।
थोड़ी देर रोने के बाद गुरनूर ने उठकर अपने आँसू पोंछे। उसने पहले गुस्से से अपने कानों में पहने हुए झुमके उतारकर जमीन पर फैंके और फिर अपने हाथों में पहनी हुई चूड़ियाँ भी उतारकर जमीन पर फैंकने लगी जिससे वो सारी चूड़ियाँ टूट गई। उन टूटी हुई चूड़ियों को देखते हुए गुरनूर ने फैसला किया की वो खुदको और अपनी जिंदगी को ऐसे इन चूड़ियों की तरह टूटकर बिखरने नही देगी। वो घर से भाग जाएगी।
Continued In आर्ज-ए-इश्क - 24

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