अगली सुबह गुरनूर सबके साथ बैठकर नाश्ता कर रही थी की तभी उसका फोन बजा। उसने चम्मच नीचे प्लेट में रखकर टेबल से फोन उठाकर देखा तो उसके ऊपर पापा लिखा आ रहा था। विक्रम का फोन था इसलिए गुरनूर ने जल्दी से फोन उठाते हुए कहा, “हेलो, पापा।”
“कैसी हो, बेटा और तुम वापिस कब आओगी। तुम्हारे पापा का मन नही लग रहा तुम्हारे बिना।” विक्रम ने कहा तो गुरनूर के होठों पर मुस्कान आ गई और उसने कहा, “कल मेरा एक लास्ट ओपन माइक अटेंड करना रहता है यहाँ। उसे अटेंड करने के बाद आ जाऊॅंगी।”
गुरनूर की बात सुनकर रावी थोड़ा हैरान हो गई क्योंकि गुरनूर ने उसे ऐसा कुछ भी नही बताया था की उसका कोई और ओपन माइक है। रावी ने गुरनूर को देखा पर सबके सामने उससे कुछ नही पूछा। गुरनूर ने विक्रम से ये बात इसलिए कही थी क्योंकि दिल्ली वापिस जाने से पहले उसे आखिरी बार श्रेयांश से मिलना था।
विक्रम से थोड़ी देर बात करने के बाद गुरनूर ने फोन काटकर टेबल पर वापिस रख दिया और नाश्ता करने लगी। रावी को जानना था की गुरनूर ने विक्रम से ओपन माइक शो का क्यों कहा इसलिए उसने जल्दी से अपना नाश्ता खत्म करकर गुरनूर से कहा, “मुझे तुमसे कुछ बात करनी है। तुम अभी चलो मेरे साथ।”
रावी ने गुरनूर का हाथ पकड़ लिया। मधु ने देखा की रावी गुरनूर का हाथ पकड़कर उसे ठीक से नाश्ता नहीं करने दे रही और उसे नाश्ते से उठाना चाह रही है तो उसने रावी को डाटते हुए कहा, “रावी, ये क्या कर रही हो तुम। जो भी बात करनी है बाद में कर लेना उससे। कहीं भाग थोड़ी रही है वो। उसे नाश्ता तो आराम से करने दो। हाथ छोड़ो उसका।”
रावी ने गुरनूर का हाथ छोड़ दिया। गुरनूर जल्दी से नाश्ता करने लगी। जैसे ही उसने नाश्ता खत्म किया और कुर्सी से खड़ी हुई, रावी बिना वक्त गवाए उसका हाथ पकड़कर उसे अपने साथ ऊपर अपने कमरे में ले जाने लगी। उन्हें जाता हुआ देखकर मधु ने शुभम से कहा, “पता नही ये क्या खिचड़ी पकाना चाहती है अब गुरनूर के साथ मिलकर।”
“मम्मी, आपको पता तो है वो दोनों बचपन से ऐसी ही रही है। पहले मिलकर प्लैन बनाती है। फिर उसे पूरा डिस्कस करने के बाद किसी बड़े से परमिशन लेने आती है। आप इतना मत सोचो। ज्यादा से ज्यादा शॉपिंग या घूमने का ही प्लैन बना लेंगी ना। जाने देना आप दोनों को। वैसे भी, गुरनूर के दिल्ली जाने के बाद इन दोनों बचपन की सहेलियों ने अलग ही रहना है। करने दीजिए एन्जॉय उन्हें साथ में।” नील ने कहा तो शुभम ने भी उसकी बातों को समझते हुए कहा, “नील सही कह रहा है। यही वक्त है इन दोनों सहेलियों के पास। एन्जॉय करने दो उन्हें साथ में। आने वाले वक्त में क्या पता दोनों में से किसकी शादी कहाँ हो जाए। फिर क्या पता एक दूसरे से ऐसे हर आए दिन मिल पाएंगी दोनों या नही।”
दोनों बाप बेटे की बात सुनकर मधु मुस्कुराने लगी।
रावी ने गुरनूर को अपने कमरे में लाकर कमरे का दरवाज़ा बंद किया और फिर गुरनूर से पूछा, “तुमने अंकल से ओपन माइक के बारे में क्यों कहा? अब तो कोई ओपन माइक नहीं है या फिर तुमने मुझे इस बारे में बताया नही?”
गुरनूर ने बेड पर बैठकर रावी को देखते हुए कहा, “रिलैक्स हो जाओ। मैंने ऐसा इसलिए कहा क्योंकि मैं जाने से पहले श्रेयांश से मिलने चाहती हूँ।”
“तो तुमने ओपन माइक का बहाना क्यों बनाया?” रावी ने पूछा तो गुरनूर ने हैरानी से उसे देखकर कहा, “तो क्या मैं सीधा सीधा सबके सामने श्रेयांश का ज़िक्र कर देती। थोड़ा तो सोचा कर रावी।”
“ये तो मैंने सोचा ही नहीं। सॉरी यार।” रावी ने भी उसके पास बैठते हुए कहा।
अगले दिन गुरनूर जाकर श्रेयांश से मिली। विवेक के घर में आज विवेक के अलावा कोई भी नही था इसलिए उसने गुरनूर को वहीं बुला लिया और वो विवेक के घर में आ भी गई क्योंकि उसे श्रेयांश पर पूरा भरोसा था।
इस वक्त श्रेयांश गुरनूर के साथ विवेक के कमरे में था और विवेक उन दोनों को डिस्टर्ब ना करने के लिए अपने पेरेंट्स के कमरे में बैठकर अपनी गर्लफ्रेंड से बात कर रहा था।
श्रेयांश बेड पर गुरनूर को अपनी बाहों में भरकर बैठा हुआ था। गुरनूर उसके सीने से लगी हुई उसके दिल की धड़कनों को सुन रही थी। उसने गुरनूर के बालों को सहलाते हुए पूछा, “तुम फिर कब आओगी?”
“अब तुम आना।” गुरनूर ने श्रेयांश के सीने पर अपने दाएं हाथ की उंगलियाँ फेरते हुए मुस्कुराकर कहा। श्रेयांश ने गुरनूर का वो हाथ पकड़ लिया तो उसकी नज़र गुरनूर की रिंग फिंगर में पहनी हुई अंगूठी पर गई। वो एक चांदी की अंगूठी थी जिसमें हल्के गुलाबी रंग का मोती लगा हुआ था। उसने उस अंगूठी को देखते हुए पूछा, “ये रिंग किसने दी तुम्हें?”
“तुम्हें जलन हो रही है?” गुरनूर ने अपना सिर उठाकर श्रेयांश की आँखों में देखते हुए कहा। श्रेयांश ने कुछ नहीं कहा तो गुरनूर ने फिर से उसके सीने पर अपना सिर रखकर उस अंगूठी को देखते हुए कहा, “ये रिंग मुझे दादी ने दिलाई थी। उनकी आखिरी याद है मेरे पास इसलिए पहनती हूँ।”
“तुम अपनी फैमिली को लेकर बहुत सेंसिटिव और इमोशनल हो ना।” श्रेयांश ने पूछा।
गुरनूर ने अपनी बाहें श्रेयांश की कमर पर लपेटते हुए खामोशी से हाँ में सिर हिला दिया। थोड़ी देर बाद गुरनूर ने श्रेयांश से थोड़ा सा दूर होकर टाइम देखा और फिर श्रेयांश की आँखों में देखते हुए कहा, “अब मुझे चलना चाहिए।”
श्रेयांश ने फिर से गुरनूर को अपने करीब खींचकर उसे अपनी बाहों में कसते हुए कहा, “मुझे थोड़ी देर और अपना एहसास लेने दो, प्लीज़।”
गुरनूर ने श्रेयांश के दिल की धड़कनों को महसूस करते हुए अपनी आँखें बंद कर ली। श्रेयांश ने उसे गले लगाए हुए ही उसके माथे पर किस किया।
दोनों ही इस वक्त अपने बीच की करीबियों को पूरी तरह से महसूस कर रहे थे बिना इस बात की परवाह किए की आगे ये करीबियाँ और ज्यादा बढ़ेंगी या दोनों के बीच इन करीबियों की जगह दूरियाॅं ले लेंगी।
Continued In आर्ज-ए-इश्क - 20

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