श्रेयांश गुरनूर को इंप्रेस करने के तरीके सोचने लगा। उसने अपनी जेब से अपना फोन निकाला और गुगल खोलकर उसपर सर्च किया, “लड़की को इंप्रेस करने के तरीके।”
गूगल से उसे बहुत सारे तरीके पता लगे जिसमें सॉन्ग्स, ग्रीटिंग कार्ड्स, रोमांटिक डेट्स जैसे आईडियाज शामिल थे लेकिन उसे कोई भी तरीका पसंद नहीं आया। वो पूरे दिन यही सोचता रहा लेकिन उसे कुछ भी नहीं सूझा।
रात को भी खाना खाने के बाद श्रेयांश बेड पर लेटकर इसी बारे में सोच रहा था की अचानक से उसे याद आया की गुरनूर पोएम्स और शायरियाँ लिखती हैं। ये सोचकर वो खुश हो गया और उसने खुद से कहा, “ये मेरे दिमाग में पहले क्यों नहीं आया। वो राइटर साहिबा तो शायरी से ही इंप्रेस हो जाएगी। बेकार में ही सुबह से इतनी मेहनत कर रहा हूॅं उसे इंप्रेस करने के तरीके सोचने में।”
अगली सुबह नाश्ता करने के बाद श्रेयांश ने खुद को अपने कमरे में बंद कर लिया और एक कॉपी और पेन लेकर गुरनूर के लिए शायरी लिखने लगा हालांकि ये उसके लिए मुश्किल था क्योंकि उसने आज से पहले कोई शायरी नहीं लिखी थी लेकिन फिर भी वो गुरनूर के लिए ये करना चाहता था।
उसने एक शायरी लिखी लेकिन उसे वो पसंद नहीं आई इसलिए उसने कॉपी में से वो पेज फाड़कर उसका बॉल बनाकर कमरे में फेंक दिया। उसने फिर से शायरी लिखी लेकिन इस बार भी यहीं हुआ। ऐसा उसने कई बार किया पर उसे कोई भी शायरी पसंद नहीं आ रही थी। इतनी कोशिशों के बाद उसके मन में ख्याल आया की गूगल से कॉपी करकर कोई सी शायरी गुरनूर को भेज दे लेकिन ऐसा करने का उसका मन नहीं किया। इस बीच उसे विवेक ने भी फोन किया लेकिन उसने विवेक का फोन नहीं उठाया इसलिए विवेक उसे मिलने घर आ गया।
ज्योति से मिलकर जब विवेक उसके कमरे में गया तो हैरान रह गया क्योंकि कमरे का नज़ारा देखने लायक था। श्रेयांश नीचे जमीन पर बेड से टिककर बैठा हुआ कॉपी में लिख रहा था और पूरे कमरे में कागज़ के बॉल्स फैले हुए थे। विवेक ने अंदर आकर हैरानी से श्रेयांश से पूछा, “ये सब क्या है? ये क्या कर रहा है तू?”
श्रेयांश ने उसकी आवाज़ सुनकर उसे देखा और कहा, “शायरी लिख रहा हूँ गुरनूर को इम्प्रेस करने के लिए।”
“अपने कमरे की हालत देख क्या बना ली है तूने गुरनूर के लिए शायरी लिखने के चक्कर में और तुझे ऐसे आंटी या कुशाग्र देख लेते तो।” विवेक ने कहा तो श्रेयांश ने उसकी बात का कोई जवाब नहीं दिया जिसपर विवेक ने पूछा, “क्या तू इतना सीरियस हैं उसके लिए।”
“मैं किसी को लेकर सीरियस नहीं होता।” श्रेयांश ने कहा।
“तो तू छोड़ फिर ये सब कुछ। कोई और लड़की ढूंढ लेंगे यार तेरे लिए।” विवेक ने कहा तो श्रेयांश ने उसे देखकर कहा, “नहीं यार, मैं चाहता हूँ की सिर्फ़ वही मेरी गर्लफ्रेंड बने।”
विवेक भी उसके सामने बैठ गया और उससे पूछा, “अच्छा, ऐसा क्या खास है उसमें।”
“ये तो नहीं पता बस जबसे उसे देखा है, मेरा दिल उसकी तरफ ही खींचता चला जा रहा है। उसका चेहरा मेरी नज़रों के सामने बार बार आता है। उसकी आँखों में जो कशिश है। उसके चेहरे की मासूमियत और उसके चेहरे पर वो नूर। उसका अदा के साथ मुस्कुराना। इन सब ने मुझे उसका दीवाना बना दिया है।” श्रेयांश ने गुरनूर के ख्यालों में खोए हुए कहा।
उसकी बातें सुनकर विवेक ने पूछा, “भाई, तू शायरी लिखने की कितनी बार कोशिश कर चुका है।”
श्रेयांश ने उसे हैरानी से देखा और पूछा, “क्यों? क्या हुआ?”
“तू गुरनूर को ऐसे डिस्क्राइब कर रहा है जैसे एक शायर अपनी प्रेमिका को करता है। कुछ ज्यादा ही प्रैक्टिस नहीं हो गई तुझे।” विवेक की बात सुनकर श्रेयांश मुस्कुराने लगा।
थोड़ी देर बाद विवेक वहाँ से चला गया। उसके जाते ही श्रेयांश फिर से शायरी लिखने में लग गया। थोड़ी और कोशिशों के बाद उसने आखिरकार एक अच्छी सी शायरी लिख ही ली। उसने बेड पर पड़ा हुआ अपना फोन उठाया और वो शायरी गुरनूर को भेज दी।
गुरनूर एक नॉवेल पढ़ रही थी की तभी उसके फोन पर किसी का मैसेज आया। उसने फोन उठाकर देखा तो स्क्रीन पर श्रेयांश का नाम आ रहा था। उसने श्रेयांश का मैसेज खोलकर देखा तो मुस्कुराने लगी क्योंकि श्रेयांश ने उसे शायरी भेजी थी। गुरनूर नॉवेल को साइड में रखकर वो शायरी पढ़ने लगी।
“कुछ ऐसा हाल हो गया है मेरे दिल का तुम्हारे प्यार में,
चाँद में अब मामा की जगह तुम नज़र आती हो,
इश्क़ से दूर रहने वाले दिल को,
अब मोहब्बत के नाम पर सिर्फ तुम भाती हो,
मुझे अब होश नहीं कि क्या हो रहा है मेरे साथ,
बस हर तरफ हर जगह,
तुम ही नज़र आती हो।”
शायरी पढ़कर गुरनूर के चेहरे पर मुस्कान आ गई। उसने श्रेयांश को फोन लगाया। श्रेयांश ने एक ही रिंग में जल्दी से फोन उठा लिया और पूछा, “कैसी लगी शायरी तुम्हें?”
“कोशिश तो बड़ी अच्छी की है, शर्मा जी। आई एम इंप्रेस्ड।” गुरनूर ने हँसते हुए कहा जिसे सुन श्रेयांश ने जल्दी से कहा, “तो फिर अब मेरी गर्लफ्रेंड बन जाओ।”
गुरनूर मुस्कुराई और उसने कहा, “चलो मान ली तुम्हारी बात। जाओ जाकर दे दो अपने दोस्तों को पार्टी।”
गुरनूर की बात सुनकर श्रेयांश खुश हो गया। उसने गुरनूर से थोड़ी देर बात की और फिर फोन काटकर विवेक को फोन लगाया। जैसे ही विवेक ने फोन उठाया, श्रेयांश ने कहा, “गुरनूर मान गई।”
“क्या?” विवेक ने हैरानी से कहा जिसपर श्रेयांश ने खुश होते हुए कहा, “हाँ भाई, गुरनूर ने मुझे हाँ बोल दिया है।”
“वाउ! यकीन तो नहीं हो रहा की वो मान गई पर कंग्रेटुलेशनस। अब इस खुशी में तेरा पार्टी देना तो बनता है।” विवेक ने कहा।
“अभी आ रहा हूँ। आज तो खुशी खुशी पार्टी देगा तुम्हारा भाई तुम सबको।” कहकर श्रेयांश ने फोन काटा और अपनी बाइक की चाबी लेकर कमरे से बाहर आ गया। ज्योति को बाहर जाने का कहकर वो घर से निकल गया।
जल्दी ही वो अपने दोस्त के उसी फ्लैट में पहुँच गया जहाँ वो सब अक्सर पार्टी किया करते थे। जब विवेक ने सबको बताया की श्रेयांश की गर्लफ्रेंड बन चुकी हैं, तो वो सभी खुश हो गए और इस बात की पार्टी करते हुए एन्जॉय करने लगे।
वहीं गुरनूर और रावी ने मिलकर आज साथ सोने का प्लैन बनाया था। वो दोनों ऐसे प्लैन अक्सर बनाया करती थी और पूरी रात बातें करती रहती थी। इस वक्त दोनों खाना खाने के बाद कमरे में आकर बेड पर लेटी हुई थी। गुरनूर ने रावी को देखा और कहा, “मुझे तुम्हें कुछ बताना है।”
रावी ने उसकी तरफ करवट लेते हुए कहा, “बताओ।”
“मैंने श्रेयांश को हाँ कह दिया।” गुरनूर ने जैसे ही ये कहा, रावी खुशी और हैरानी से बेड पर बैठ गई और उसने खुशी से चिल्लाते हुए कहा, “ओह माय गॉड! ओह माय गॉड!”
रावी का इस तरह चिल्लाना कोई सुन न ले इसलिए गुरनूर ने उसके मुँह पर हाथ रखकर उसे चुप कराया लेकिन नीचे जाती हुई शीतल ने रावी की आवाज़ सुन ली थी। वो गुरनूर के कमरे के अंदर आई और उन्होंने रावी से पूछा, “क्या हो गया, रावी बेटा? चिल्लाई क्यों तुम इतनी जोर से।”
“वो…वो मम्मी, इसने कमरे में चूहा देख लिया था। इसे चूहे से डर लगता है ना बचपन से ही।” गुरनूर ने बात संभालते हुए कहा।
“तुम और तुम्हारा चूहे का डर। मैंने सोचा पता नहीं क्या हो गया।” शीतल ने रावी के गाल को छूकर कहा और फिर कमरे से चली गई। उनके जाते ही गुरनूर ने जोर से रावी के हाथ पर मारकर कहा, “तुम थोड़ा धीरे नहीं चिल्ला सकती। अभी मम्मी को पता लग जाता।”
“सॉरी।” रावी ने कहा और फिर गुरनूर को साइड से गले लगाते हुए कहा, “पर मैं खुश हूँ बहुत। फाइनली जिसका तुम्हें इंतजार था वो आ ही गया तुम्हारी लाइफ में।”
गुरनूर ने उसके दोनों हाथों को पकड़कर उसे देखते हुए कहा, “नहीं, अभी ये देखना बाकी है की वो वैसा है या नहीं।”
Continued In आर्ज-ए-इश्क - 10

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