गुरनूर ने गुस्से से श्रेयांश को देखते हुए पूछा, “अब भी ये मत कह देना की तुम मेरा पीछा नहीं कर रहे थे।”
“मैं...मैं तो ये देखने आया हूँ की कौन है वो लकी बंदा जिसके पास तुम्हारे जैसी गर्लफ्रेंड है।” कहते हुए श्रेयांश की नजर गुरनूर के साथ खड़े लड़के पर गई और उसने कहा, “यही है शायद वो।”
“तुम्हारे अंदर इतना कॉन्फिडेंस आता कहाँ से है? स्पेशल इंदौर से तुम ये देखने आ गए की मेरा बॉयफ्रेंड कौन है।” गुरनूर ने उसे देखते हुए पूछा।
श्रेयांश ने विवेक के कंधे को पकड़ते हुए कहा, “इस जैसे अच्छे दोस्त से।”
गुरनूर ने अपने साथ खड़े लड़के को देखा और श्रेयांश से कहा, “जैसे विवेक तुम्हारा दोस्त है, वैसे ही ये मेरा दोस्त है, सुमित।”
“तो तुम्हारा बॉयफ्रेंड कौन है?” श्रेयांश ने पूछा।
ये सवाल सुनते ही गुरनूर श्रेयांश से नजरें चुराने लग गई क्योंकि ये तो गुरनूर को खुद भी नहीं पता था की उसका बॉयफ्रेंड कौन है क्योंकि उसका तो कोई बॉयफ्रेंड ही नहीं था। गुरनूर को नज़रें चुराता हुआ देखकर श्रेयांश समझ गया की गुरनूर ने उससे झूठ बोला है और पूछा, “तुमने मुझसे झूठ बोला ना?”
“कौन सा मैंने किसी से ऐसा झूठ पहली बार बोला है। आजकल के लड़के अच्छे नहीं होते इसलिए मैं ये झूठ बोल देती हूँ जिससे वो मेरे पीछे ना पड़े। तुम्हें भी बोल दिया था पर मुझे क्या पता था की तुम इस बात को कन्फर्म करने दिल्ली आ जाओगे।” गुरनूर ने श्रेयांश को देखकर कहा।
श्रेयांश को पसंद नहीं था की कोई उससे झूठ बोले। उसने मन ही मन में कहा, “तुमने मुझसे झूठ बोलकर अच्छा नहीं किया। अब इसका हिसाब तो मैं बराबर करके रहूँगा।”
“अब जब मुझे पता लग गया है की तुम सिंगल हो तो मेरी गर्लफ्रेंड बन जाओ। मुझे मोहब्बत हो गई है तुमसे।” श्रेयांश ने प्यार से गुरनूर को देखकर कहा और फिर अपने मन में कहा, “हिसाब बराबर।”
श्रेयांश की सुनकर गुरनूर हैरान हो गई क्योंकि उसने अपना प्रोपोजल ऐसा तो कभी नहीं सोचा था। वो चाहती थी की उसका होने वाला बॉयफ्रेंड उसे किसी खास तरीके से इंप्रेस करकर उसे प्रोपोज करे। ऐसे सीधा सीधा नहीं जैसे श्रेयांश ने अभी किया था। उसने श्रेयांश को देखकर कहा, “लड़की को ऐसे कौन प्रोपोज करता है। थोड़ा अच्छे से इंप्रेस करकर प्रोपोज करो।”
“फिर तुम हाँ कह दोगी।” श्रेयांश ने मुस्कुराते हुए पूछा।
“पहले कोशिश तो करो।” गुरनूर ने कहा और अपने दोस्त के साथ वहाँ से चली गई।
श्रेयांश और विवेक भी वहाँ से चले गए। वो उसी रात ट्रेन में बैठ गए और अगली सुबह इंदौर पहुँच गए।
श्रेयांश ने विवेक के साथ जैसे ही अपने घर में कदम रखा, उसका सामना सबसे पहले शिवम से हुआ जो काफी गुस्से से उसे देख रहे थे। शिवम ने उससे बिना कुछ कहे अपनी चप्पल उतारी, जिसे देख श्रेयांश समझ गया की अब उसकी पिटाई होने वाली है। शिवम उसे मारते इससे पहले ही ज्योति ने बीच में आकर उन्हें ऐसा करने से मना कर दिया। ज्योति को देखकर श्रेयांश के चेहरे पर मुस्कान आ गई की अब वो पिटने से बच गया है लेकिन ये मुस्कान जल्दी ही गायब हो गई जब शिवम ने कहा, “नहीं, आज बिल्कुल नहीं ज्योति। आज मैं इसे पीटकर रहूँगा जिससे ये दोबारा ऐसे घर से भागने की गलती न करे।”
अब ज्योति नीच में कुछ नहीं कह पाई। शिवम श्रेयांश को पीटने लगे। कुशाग्र श्रेयांश को अच्छे से पीटता हुआ देखने के लिए विवेक के पास आकर खड़ा हो गया। विवेक ने श्रेयांश को पिटता हुआ देखकर मुस्कुराते हुए सोचा, “आशिक़ पिट रहा है।”
श्रेयांश की नजर जब मुस्कुराते हुए विवेक पर गई तो उसने सोचा, “ये तेरा ही आइडिया था ना भागने का। एक बार बस पापा को घर से ऑफिस जाने के लिए निकलने दे, मैं तुझे इससे भी ज्यादा पीटूंगा।”
ज्योति ने जब देखा की श्रेयांश को ज्यादा ही मार पड़ रही है, उन्होंने आगे आकर शिवम को रोकते हुए कहा, “बस कर दीजिए। बहुत मार चुके हैं आप मेरे बच्चे को।”
शिवम श्रेयांश को छोड़कर अपने कमरे में ऑफिस जाने के लिए तैयार होने चले गए। ज्योति ने श्रेयांश के गाल को छूकर पूछा, “दर्द तो नहीं हो रहा?”
“थोड़ा सा।” श्रेयांश ने कहा तो ज्योति ने कहा, “चलो आ जाओ। पहले नाश्ता करलो। फिर थोड़ी देर आराम कर लेना। ठीक हो जाएगा दर्द तुम्हारा।”
ज्योति श्रेयांश और विवेक को डाइनिंग टेबल की तरफ ले आई। शिवम तैयार होकर बाहर आए और ज्योति से मिलकर ऑफिस जाने के लिए निकल गए।
नाश्ता करने के बाद श्रेयांश जैसे ही विवेक के साथ अपने कमरे में आया, उसने विवेक को मारते हुए कहा, “तू मुझे पिटता हुआ देखकर मुस्कुरा कैसे रहा था?”
श्रेयांश विवेक को और मारने लगा। विवेक ने खुदको छुड़वाने की कोशिश करते हुए कहा, “भाई, मैं तो तेरे बारे में एक अच्छी बात सोचते हुए मुस्कुरा रहा था।”
“मुझे पिटता हुआ देखकर कौन सी अच्छी बात सोच रहा था तू इतना मुस्कुराते हुए।” श्रेयांश ने उसकी पीठ पर मुक्का मारते हुए पूछा।
“मैं सोच रहा था की आशिक़ पिट रहा है अपनी मोहब्बत की वजह से।” विवेक ने कहा। श्रेयांश ने अपने लिए आशिक़ शब्द सुना तो उसने विवेक को मुस्कुराते हुए छोड़ दिया और कहा, “मैं गुरनूर की वजह से नहीं, तेरी वजह से पिटा हूँ। ये तेरा ही आइडिया था घर से भागने का।”
“ये तो पता लग गया ना तुझे की गुरनूर का कोई बॉयफ्रेंड नहीं है। अब तो गुरनूर सिर्फ तेरी है।” विवेक ने कहा तो श्रेयांश मुस्कुराने लगा। विवेक ने दीवार पर लगी घड़ी में टाइम देखा और कहा, “चल अब मैं चलता हूँ। मम्मी इंतजार कर रहीं होंगी मेरा। तूने पीट दिया। अभी एक थप्पड़ जाकर मम्मी से भी खाना ही पड़ेगा।”
विवेक श्रेयांश से मिलकर वहाँ से चला गया। श्रेयांश को अब गुरनूर को इंप्रेस करना था जो की उसे काफी मुश्किल लग रहा था क्योंकि आज से पहले उसने कभी किसी लड़की के लिए ऐसा सब बिल्कुल भी नहीं किया था और उसकी नजर में लड़कियों को समझना भी काफी मुश्किल था। उसने मन ही मन में कहा, “पता नहीं मैं गुरनूर को इंप्रेस कर भी पाऊँगा या नहीं?”
Continued In आर्ज-ए-इश्क - 9

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