गुरनूर का बॉयफ्रेंड है, ये जानकर श्रेयांश का दिल टूट गया। उसने बेमन से गुरनूर के साथ थोड़ी सी बात करकर फोन साइड पर रख दिया।
अगले दिन शाम के वक़्त वो अपने दोस्तों के साथ बैठकर पार्टी कर रहा था पर उसका मन नहीं लग रहा था। वो बस एक जगह बैठा हुआ बियर पी रहा था। विवेक ने उसे ऐसे बैठे हुए देखा तो पूछा, “क्या बात है? तू ऐसे देवदास की तरह क्यों बैठा हुआ है?”
“इतनी मुश्किल से एक लड़की पसंद आई थी। उसका भी बॉयफ्रेंड है।” श्रेयांश ने बियर की घूंट भरकर उदासी भरे लहजे में कहा।
“तो इसमें इतना देवदास जैसे बैठने की क्या जरूरत है। कोई और लड़की ढूंढ लेते है तेरे लिए।” विवेक ने हँसते हुए कहा।
श्रेयांश ने उसे देखा और कहा, “यार, मैं चाहता हूँ सिर्फ वही मेरी गर्लफ्रेंड बने।”
“मुझे लगता है गुरनूर झूठ बोल रही है। तुझे एक दिल्ली जाकर अपनी आँखों से देखना चाहिए की क्या सच में उसका बॉयफ्रेंड है या नहीं।” विवेक ने कहा तो श्रेयांश ने उसे मारते हुए कहा, “तू न हर बार मेरे मन में डाउट पैदा करता है। पहले भी तूने मेरे मन में ये डाउट डाला की गुरनूर का बॉयफ्रेंड है या नहीं और अब तू ये डाउट डाल रहा है की उसने मुझसे इस बारे में सच बोला है या झूठ।’’
विवेक ने श्रेयांश के हाथ को पकड़ा जिससे वो उसे मार ना सके और कहा, “देख भाई, अगर तुझे लगता है की उसका रीलेशनशिप है तो तुड़वा दे उसका रीलेशनशिप। वो कौन सा सिरियस रीलेशनशीप में होगी और अगर सिरियस हुआ भी तो वो बस चार दिन रोएगी उसके घम में। संभाल लियो उसे उस वक़्त। प्लस पॉइंट हो जाएगा तेरा भी।’’
“तुड़वाने के लिए दिल्ली जाना पड़ेगा और वहाँ से आए हुए हमें अभी चार दिन ही हुए है। दोबारा इतनी जल्दी फिर से दिल्ली जाने का बोला तो पापा शक करेंगे। जाएँ कैसे।’’ श्रेयांश ने कहा।
“भाग चलते है।” विवेक ने कहा और दोनों ने एक दूसरे को मुस्कुराकर देखा। वो दोनों वहाँ से निकलकर श्रेयांश की बाइक पर बैठकर उसके घर जाने के लिए निकल गए। शिवम उठ ना जाए इसलिए श्रेयांश ने अपनी बाइक घर से थोड़ी दूर रोकी और विवेक के साथ मिलकर उसे धक्का लगाकर घर के अंदर ले आया। श्रेयांश ने विवेक को नीचे रुकने के लिए कहा और पाइप चढ़कर घर में एंट्री ली।
श्रेयांश ने अपना बैग लिया और वापिस पाइप से उतरकर नीचे आ गया। विवेक ने उन्हें स्टेशन तक छोड़ने के लिए एक कैब मंगवा ली थी। दोनों जाकर उस कैब में बैठ गए। श्रेयांश को लग रहा था की उसे किसी ने नहीं देखा लेकिन कुशाग्र ने उसे देखा लिया था क्योंकि कुशाग्र पढ़ाई की वजह से जाग रहा था।
सुबह जब सब नाश्ते के लिए बैठे तो शिवम ने ज्योति से पूछा, “श्रेयांश अभी तक सो रहा है क्या? उसने नाश्ता नही करना?”
“आ जाएगा अभी।” ज्योति ने उन्हें नाश्ता परोसते हुए कहा तो कुशाग्र ने कहा, “भैया नहीं आएंगे। वो तो कल रात विवेक भैया के साथ घर से भाग गए।”
ये सुनकर शिवम को गुस्सा आ गया और उन्होंने कहा, “नाक में दम कर रखा है इस लड़के ने। पता नहीं क्या क्या करता फिरता है। ऊपर से इसकी कम्पनी भी ऐसी ही है। ये विवेक जैसे दोस्त। जो न खुद सही से रहते है ना किसी और को रहने देते हैं। मैं कह रहा हूॅं ज्योति अपने बेटे को समझाओ वरना इस विवेक की वजह से ये अपनी जिंदगी में बहुत पछताएगा।”
श्रेयांश और विवेक दिल्ली पहुँचकर सबसे पहले ऋतिक के घर गए। श्रेयांश का मानना था की शाम होते ही गुरनूर उसे उसी मार्केट में मिलेगी जिसमें वो दोनों पहली बार मिले थे। विवेक और उसने थोड़ी देर रेस्ट किया और शाम होते ही उस मार्केट में आ गए।
श्रेयांश उसी जगह पहुँचा जहाँ वो गुरनूर से पहली बार मिला था। विवेक ने उसे देखा और कहा, “भाई आ तो गए हैं यहाँ पर क्या तू श्योर है गुरनूर यहीं मिलेगी।”
श्रेयांश का ध्यान विवेक की बातों में था ही नहीं। उसका ध्यान तो सामने खड़ी गुरनूर में था जो किस्मत से श्रेयांश को वहीं मिल गई। वो किसी लड़के के साथ जूस पीते हुए बातें कर रही थी। श्रेयांश ने विवेक को देखा और कहा, “जब किस्मत साथ हो तो सब मिलता है। सामने देख।”
विवेक ने सामने देखा तो गुरनूर को वहाँ देखकर हैरान रह गया और उसने श्रेयांश से कहा, ‘‘ये तो गुरनूर है। वो भी किसी लड़के के साथ। चल भाई इसके पास चलते है।’’
विवेक जाने लगा तो श्रेयांश ने उसकी बाजू पकड़कर उसे रोकते हुए कहा, “इतनी क्या जल्दी है तुझे। थोड़ी देर गुरनूर का पीछा करकर देखते है।”
वहाँ से निकलकर गुरनूर उस लड़के के साथ आगे मार्केट घूमने के लिए चली गई। श्रेयांश और विवेक उसका पीछा करने लगे। गुरनूर को जब महसूस हुआ की कोई उसका पीछा कर रहा तो उसने पीछे मुड़कर देखा। उसे मुड़ता हुआ देखकर श्रेयांश और विवेक जल्दी से छुप गए। वहीं गुरनूर के साथ जो लड़का था, उसने उसे ऐसे देखकर पूछा, “क्या हुआ, गुरनूर?”
“मुझे ऐसा लगा जैसे कोई हमारा पीछा कर रहा है।” गुरनूर ने इधर उधर देखने की कोशिश करते हुए कहा।
“तुम्हारा वहम होगा।” उस लड़के ने कहा तो गुरनूर फिर से उसके साथ आगे चलने लगी। श्रेयांश और विवेक फिर से उसका पीछा करने लगे। गुरनूर को दोबारा महसूस हुआ की कोई उसका पीछा कर रहा है तो वो रुक गई और उसने दोबारा पीछे मुड़कर देखा।
जिस वक्त गुरनूर रुकी थी, उसी वक्त चलते हुए विवेक की टक्कर एक लड़की से हो गई थी। वो लड़की उसके ऊपर चिल्लाने लगी जिसकी वजह से श्रेयांश का ध्यान गुरनूर से हटकर उसके ऊपर चला गया और गुरनूर जब पीछे मुड़ी तो उसने श्रेयांश को देख लिया।
श्रेयांश को वहाँ देखकर उसे हैरानी हुई और गुस्सा भी आया। उसने अपने साथ खड़े लड़के से कुछ कहा और उसे लेकर थोड़ा पीछे आ गई।
वो लड़की जब विवेक को बहुत सारी बातें सुनाकर चली गई। श्रेयांश ने उससे ध्यान हटाकर सामने देखा तो गुरनूर उसे नहीं दिखी। उसने विवेक से कहा, “तेरे चक्कर में हमने गुरनूर को खो दिया।”
गुरनूर श्रेयांश के पीछे खड़ी थी। विवेक ने चिढ़ते हुए कहा, “ये मार्केट ही ऐसी है। लड़कियों से टक्कर ही होती रहती है यहाँ। तेरी भी तो यहीं गुरनूर से टक्कर हुई थी।”
गुरनूर को उन्हें देखकर हँसी आ रही थी। उसने श्रेयांश के पास जाकर मुस्कुराते हुए उसका कंधा थपथपाया। श्रेयांंश ने मुड़कर देखा तो गुरनूर को अपने सामने देखकर वो हैरान रह गया। उसे हैरान देखकर गुरनूर उसे गुस्से से देखने लगी।
Continued In आर्ज-ए-इश्क - 8

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