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Saturday, 1 August 2026

आर्ज-ए-इश्क - 6



गुरनूर ने जब इश्क़ कहा तो श्रेयांश ने मुस्कुराकर उसे देखते हुए कहा, “सिर्फ लिखती ही हो या कभी करके भी देखा है।” 


“नहीं किया कभी और इश्क़ न किया नही जाता। हो जाता है अपने आप। वैसे तुम्हें इससे क्या मतलब की मुझे इश्क़ हुआ है या नहीं।” गुरनूर ने चिढ़ते हुए कहा। 


“लिखने से क्या होता। इश्क़ करके देखना चाहिए तुम्हें।” श्रेयांश ने कहा तो रावी ने जल्दी से कहा, “मैं भी इससे यही कहती हूँ की इसे इश्क़ करकर देखना चाहिए। कबतक लिखती रहेगी।” 


गुरनूर ने रावी को देखा तो वो दूसरी साइड देखने लगी। गुरनूर ने उससे नजर हटाकर श्रेयांश से कहा, “किससे करूं इश्क़। तुमसे।” 


श्रेयांश ये सुन मुस्कुराने लगा तो गुरनूर ने उसे उँगली दिखाते हुए कहा, “तुम न अपने काम से काम रखो।” 


गुरनूर ने रावी का हाथ पकड़ा और उसके साथ बाहर जाते हुए कहने लगी, “ये हीरो समझता है क्या खुदको। इश्क़ करके देखो। एक दिन भी पूरा नहीं हुआ इससे मिले हुए। इतने कम टाइम में ही पूरा दिमाग खराब कर दिया है इसने।” 


श्रेयांश गुरनूर को जाते हुए देख रहा था। विवेक ने उसे बाजू पकड़कर हिलाया तो उसकी तंद्रा टूटी। विवेक ने उसे देखकर कहा, “वो जा चुकी है, भाई।” 


श्रेयांश मुस्कुराकर बाहर की तरफ चला गया। विवेक भी उसे देखकर सिर हिलाते हुए उसके पीछे आ गया। श्रेयांश ने बाहर आकर देखा की गुरनूर पार्किंग से अपनी स्कूटी लेकर बाहर आ रही थी। रावी उसके पीछे बैठी हुई थी। श्रेयांश गुरनूर की स्कूटी के सामने आकर खड़ा हो गया। उसे सामने देखकर गुरनूर ने जल्दी से ब्रेक लगाई और चिल्लाते हुए कहा, “तुम्हें क्या शौंक चढ़ा है मरने का।” 


“मरने का शौंक।” श्रेयांश ने कन्फ्यूजन में कहा। 


“तुम्हारे दोस्त ने ही तो कल रात बताया था की तुम्हें मरने के अलग अलग तरीके अपनाने का बहुत शौंक है। देखो, अगर तुम मरने का ये तरीका अपनाना चाहते हो ना तो कोई दूसरी गाड़ी या स्कूटी को ढूंढो। मेरी ही मासूम सी स्कूटी मिली है तुम्हें अपना ये स्टूपिड मरने का तरीका अपनाने के लिए।” गुरनूर ने कहा तो श्रेयांश ने विवेक को देखा जो उसे देखकर मुस्कुराने लगा क्योंकि उसे अच्छे से पता था की कल रात उसने गुरनूर के आगे जो बकवास की थी उसके लिए श्रेयांश उसे छोड़ने वाला नही था। 


श्रेयांश ने हल्का सा मुस्कुराकर गुरनूर से कहा, “मैं यहाँ तुम्हारी स्कूटी के नीचे आकर मरने नहीं बल्कि तुम्हारा नम्बर लेने आया हूँ।” 


गुरनूर ने हैरान होकर पूछा, “तुम्हें क्यों चाहिए मेरा नम्बर? कुछ ज्यादा ही जल्दी आगे नहीं बढ़ना चाह रहे हो तुम?” 


“तुम कहो तो दोबारा तुम्हारा नम्बर लेने दिल्ली आ जाऊँगा।” श्रेयांश ने गुरनूर को छेड़ने वाले अंदाज में कहा। 


गुरनूर ने श्रेयांश को देखा और फिर कहा, “रहने ही दो. तुमसे बार बार कौन टकराए।” 


गुरनूर ने अपने बैग से पेन और डायरी को निकाला और उसके एक पेज पर अपना नम्बर लिखकर वो पेज फाड़कर श्रेयांश को दे दिया।


श्रेयांश ने पेपर पर लिखे नम्बर को देखते हुए कहा, “मुझसे बार बार कौन टकराए। अच्छा तरीका है नम्बर देने का।”


गुरनूर ने स्कूटी के हैंडल पर हाथ टिकाकर हल्का सा आगे झुकते हुए उसे देखकर कहा, “तुम्हारे नम्बर माँगने के तरीके से तो कई ज्यादा बैटर है।” 


उसे बाय बोलकर गुरनूर ने स्कूटी स्टार्ट की और रावी के साथ वहाँ से चली गई। श्रेयांश उसे जाते हुए देखता रहा और फिर मुस्कुराने लगा। 


अगले दिन वो विवेक के साथ वापिस इंदौर जाने के लिए निकल गया। जैसे ही वो अपने घर के अंदर आया, सोफे पर बैठे हुए शिवम ने कहा, “तो आ गए तुम वापिस। थोड़े दिन और रुक जाते। घर में थोड़े दिन और सुकून रहता।” 


श्रेयांश उनसे कुछ कहता इससे पहले ही ज्योति ने उसके पास आकर उसके गाल पर हाथ रखते हुए शिवम से कहा, “क्या आप भी। देख नही रहे मेरा बेटा कितना थका हुआ है।” 


“मजदूरी करके नही आया तुम्हारा बेटा जो थक गया है।” शिवम ने कहा पर ज्योति ने उनकी बात पर ध्यान न देते हुए श्रेयांश से कहा, “बेटा, तुम इनकी बातों पर ध्यान न दो और अपने रूम में जाकर थोड़ी देर रेस्ट करलो।” 


श्रेयांश अपना बैग लेकर अपने कमरे में चला गया। रात के खाने के बाद श्रेयांश ने बेड पर लेटकर अपने फोन में गुरनूर का नम्बर सेव कर उसे मैसेज किया। “हेलो, मैडम।” 


थोड़ी देर बाद ही गुरनूर का रिप्लाई आया। “हेलो।” 


“क्या कर रही हो?” श्रेयांश ने पूछा। 


“कुछ नहीं। तुम?” गुरनूर ने पूछा। 


“किसी की यादों में खो रखा हूँ।” श्रेयांश ने मुस्कुराते हुए टाइप किया। ये पढ़कर गुरनूर मुस्कुराने लगी और उसने आगे लिखा, “किसकी यादों में।” 


“तुम्हें मालूम है।” श्रेयांश ने लिखा। वो दोनों काफी देर तक एक दूसरे से बातें करते रहे। 


सुबह श्रेयांश विवेक से एक कैफे में मिला। वो दोनों विवेक की गर्लफ्रेंड का इंतजार कर रहे थे। विवेक ने अपनी कोल्ड कॉफी पीते हुए उससे पूछा, “बात हुई तेरी गुरनूर से।” 


“हम्म्म, कल रात की थी मैंने उससे बात।” श्रेयांश ने कहा। 


“भाई, एक बार उससे कंफर्म करले वो सिंगल है या नहीं। वो जितनी खूबसूरत है ना मुझे नहीं लगता वो सिंगल होगी।” विवेक ने उसे देखते हुए कहा। 


“उसकी बातों से तो नहीं लगा और वैसे भी, तुझे याद है जब हम दिल्ली में थे तो उसकी दोस्त ने कहा था की उसे इश्क करके देखना चाहिए। इससे पता चलता है की वो सिंगल हैं।” श्रेयांश ने सोचते हुए कहा जिसपर विवेक ने कहा, “क्या पता उसका बॉयफ्रेंड हो और उसकी दोस्त को इस बारे में न पता हो।” 


श्रेयांश की नजर दरवाज़े पर गई जहाँ से विवेक की गर्लफ्रेंड, जिया अंदर आकर उनकी तरफ आ रही थी। उसे देखकर श्रेयांश ने विवेक से कहा, “तू गुरनूर को लेकर मेरे मन में डाउट्स पैदा करना बंद कर और अपनी वाली पर ध्यान दे।” 


जिया ने उनके पास आकर विवेक को गले लगाया और श्रेयांश को हेलो बोलकर विवेक के साथ वाली कुर्सी पर बैठ गई। विवेक उसके साथ बातें करने लग गया। श्रेयांश सोचना नही चाहता था की गुरनूर का कोई बॉयफ्रेंड होगा लेकिन विवेक ने उसके मन में अब ये डाउट डाल दिया था जो अब उसे परेशान कर रहा था। उसने अपनी कॉफी खत्म की और विवेक और जिया को बाय बोलकर उन्हें अकेला छोड़कर बाहर आ गया। उसने तय किया की अपने इस डाउट को निकालने के लिए वो गुरनूर से बात करेगा। 


रात में खाने के बाद उसने गुरनूर के साथ मैसेज पर बात करते हुए पूछा, “गुरनूर, क्या तुम्हारा कोई बॉयफ्रेंड है?” 


गुरनूर समझ रही थी श्रेयांश ये क्यों पूछ रहा है इसलिए उसने झूठ बोलते हुए लिखा, “हाँ, है ना।”


Continued In आर्ज-ए-इश्क - 7


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