रावी ने गुरनूर को देखा और कहा, “हाॅं हाॅं, पता है मुझे तुम्हारी ख्वाहिशों की लंबी लिस्ट का।”
“एनीवेज, तुम कल चल रही हो ना मेरे साथ ओपन माइक शो में।” गुरनूर ने खड़े होते हुए पूछा और किचन की तरफ जाने लगी।
“ऑफकोर्स चलूंगी यार। तुम्हारी वजह से ही तो पापा मुझे घर से बाहर आने देते है आसानी से।” रावी ने कहा।
गुरनूर ने किचन के गेट से हल्का सा बाहर निकलकर उसे देखते हुए कहा, “वैसे न अंकल इतने भी स्ट्रिक्ट नही है जितना तुमने और नील भैया ने उन्हें बना दिया है।”
गुरनूर की बात सुनकर रावी हॅंसने लगी।
श्रेयांश और विवेक जैसे ही दिल्ली रेलवे स्टेशन से बाहर निकले, श्रेयांश ने कहा, “फाइनली, इतने वक्त के बाद इंदौर से निकलने का मौका मिला है।”
विवेक उसे देखकर मुस्कुराने लगा। उनका दोस्त, ऋतिक उन्हें वहाॅं लेने आया। ऋतिक उन्हें अपनी गाड़ी में बैठाकर अपने फ्लैट में ले आया।
श्रेयांश रात में खिड़की के पास खड़े होकर दिल्ली की चका चौंध को देख रहा था। ऊॅंची इमारतें, सड़कों पर चलता हुआ ट्रैफिक। सड़कों भर भागती हुई गाड़ियों को देखकर श्रेयांश ने सोचा, “इन बड़े शहरों में हर कोई ऐसे ही जल्दी में रहता है। एक जगह ठहरकर उस लम्हें को खुलकर जीना तो शायद इन्होंने सीखा ही नही है। बस सब जल्दी से आने वाले समय को पकड़ने की रेस में है।”
श्रेयांश को हैरानी हुई की वो ये सब क्या सोच रहा है क्योंकि ऐसे टॉपिक्स से तो उसका कुछ लेना देना ही नही था। वो दिल्ली आया तो बहुत एक्साइटमेंट के साथ था लेकिन अब उसे ये सब देखते हुए हर बार जैसे बोरियत महसूस होने लग गई थी।
ऋतिक ने उसके पास आकर उसे एक ड्रिंक देते हुए कहा, “दिल्ली की खूबसूरती देख रहा है।”
“भाई, तू ये बिल्डिंग्स और ये ट्रैफिक को देखकर बोर नही होता क्या जो इसे खूबसूरती बता रहा है।” श्रेयांश ने कहा तो विवेक, जो सोफे पर आराम से बैठकर अपनी गर्लफ्रेंड से चैटिंग करने में लगा हुआ था, जोर जोर से हॅंसने लगा। ऋतिक ने एक नजर विवेक को देखा और फिर श्रेयांश को देखकर कहा, “भाई, बोर मत हो। चलो तुम दोनों को बाहर लेकर चलता हूॅं।”
तीनों फ्लैट से बाहर आ गए। ऋतिक ने फ्लैट लॉक किया और उन दोनों के साथ नीचे आ गया।
“बाइक मैं चलाऊॅंगा।” कहते हुए श्रेयांश ने चाबी लेने के लिए हाथ आगे बढ़ा दिया। विवेक ने ऋतिक को मना करने के लिए की वो श्रेयांश के हाथ में चाबी न दे, ना में गर्दन दिला दी और अपने हाथ को चाकू समझते हुए अपनी गर्दन के पास लेजाकर चलाया जैसे कहना चाह रहा हो की अगर इसे चाबी दी तो हम दोनों मरेंगे इसके साथ ही।
ऋतिक विवेक को देख ही रहा था की श्रेयांश ने इतने में ही उसके हाथ से चाबी शीन ली और बाइक स्टार्ट कर उन दोनों को बैठने के लिए कहा। ऋतिक और विवेक भगवान से दुआ करते हुए बाइक पर बैठ गए। उनके बैठने के बाद श्रेयांश ने बाइक चलानी शुरू की। ऋतिक पीछे बैठा हुआ उसे रास्ता बता रहा था।
मार्केट में पहुॅंचकर श्रेयांश ने बाइक की स्पीड बिल्कुल बढ़ा दी। मार्केट में अलग ही चका चौंध थी। गाड़ियाॅं और बाइक बिल्कुल बीच में से निकल रहे थे और साइड पर तरह तरह की दुकानें की, जिनपर लोग शॉपिंग कर रहे थे और खाने के स्टॉल थे, जिनपर लड़के लड़कियाॅं खड़े होकर खाने को एंजॉय कर रहे थे। वहीं कुछ प्रेमी जोड़े हाथों में हाथ डाले घूम रहे थे।
श्रेयांश बाइक चलाते हुए इन सब को देख रहा था। उसके पीछे बैठे हुए विवेक और ऋतिक की जान बाइक की बड़ी हुई स्पीड की वजह से हलक में अटकी हुई थी। ट्रैफिक और आसपास की आवाज ज्यादा होने की वजह से विवेक ने श्रेयांश से तेज आवाज़ में कहा, “भाई, मार्केट में है हम लोग और यहाॅं ट्रैफिक बहुत है। स्पीड स्लो करदे वरना किसी से टक्कर हो जाएगी हमारी।”
“कुछ नही होगा। रिलैक्स बैठ।” श्रेयांश ने हल्का सा पीछे मुड़कर उसे देखते हुए कहा और फिर जैसे ही सामने देखा, उसकी बाइक की टक्कर एक कार से होने वाली थी। विवेक और ऋतिक के तो ये देखकर प्राण ही उड़ गए। तेज स्पीड की वजह से ब्रेक लगाना मुश्किल था लेकिन फिर भी उसने टाइम से ब्रेक लगा दी और बाइक एक साइड पर ले आया।
श्रेयांश ने पीछे मुड़कर मुस्कुराते हुए विवेक को देखा जिसने गुस्से से कहा, “तू पागल है क्या? तेरे इस फन और एक्स्टेसी के चक्कर में अभी मर जाते हम।”
“मरे तो नही ना और मुझे ये सब करकर एक अलग खुशी मिलती है।” श्रेयांश ने कहा।
“पहला बंदा देखा है जिसे अपने साथ साथ दूसरों की जिंदगी दाव पर लगाकर खुशी मिलती है। तू ऐसे काम अकेले कर लिया कर। हमें ये हमारी जिंदगी ना बहुत प्यारी है।” विवेक ने बाइक से उतरते हुए कहा।
“अच्छा, चल अब आगे से नही करूॅंगा।” श्रेयांश ने कहा। विवेक को पता था की श्रेयांश झूठ बोल रहा है पर उसने कुछ नही कहा। बाइक पार्क कर वो तीनों एक खाने के स्टॉल की तरफ जाने लगे। श्रेयांश विवेक और ऋतिक की तरफ मुड़ गया और उनसे बातें करते हुए उल्टा चलने लगा। क्योंकि श्रेयांश को पीछे का कुछ दिखाई नही दे रहा था, वो अपने पीछे से आती हुई लड़की से टकरा गया, जो बहुत ही सावधानी से अपने हाथ में जूस के गिलास पकड़कर सामने देखते हुए चल रही थी। उस लड़की के हाथ में जो जूस के गिलास थे, वो टकराने की वजह से आधे श्रेयांश की टी शर्ट पर और आधे नीचे गिर गए थे।
गिरे हुए गिलास को देखकर उस लड़की को श्रेयांश के ऊपर गुस्सा आ गया और उसने गुस्से से श्रेयांश के कंधे पर हाथ रखकर उसे अपनी तरफ करते हुए कहा, “ए मिस्टर, क्या भगवान ने तुम्हें पीछे की तरफ आँखें दी है जो ऐसे चल रहे हो।”
उस लड़की की बात सुनकर विवेक और ऋतिक हॅंसने लगे। श्रेयांश ने कुछ नही कहा। वो तो बस उस लड़की को देखे जा रहा था। खूबसूरत ब्राउन आँखें, गोरा रंग, गुलाब की पंखुड़ियों के जैसे होंठ। खुले बालों में वो लड़की बला की खूबसूरत लग रही थी। श्रेयांश को कुछ न कहता देखकर उस लड़की ने कहा, “मेरा सारा जूस गिरा दिया। इतनी मुश्किल से लिया था मैंने। मन तो कर रहा है तुम्हें पीट दूं यहीं पर ही।”
विवेक और ऋतिक को ये सुनकर और भी ज्यादा हॅंसी आ गई क्योंकि दोनों जानते थे की श्रेयांश इंटरनेशनल लेवल कराटे चैंपियन था जिसकी वजह से आजतक किसी ने उसे पीटने की कोशिश तो दूर की बात है, इस बारे में सोचा तक नही था और ये लड़की उसे उसके सामने ही पीटने की बातें कर रही थी। विवेक ने मजे लेते हुए कहा, “तो पीट दो। इनफैक्ट मार ही दो जान से। इसे मरने के अलग अलग तरीके अपनाने का बहुत शौंक है। ये तरीका भी एक्सपीरियंस कर लेगा ये की लड़की के हाथों कैसे मरते है।”
ये सुनकर श्रेयांश ने गुस्से से विवेक को घूरा। वो लड़की कुछ कहती इससे पहले ही उसकी दोस्त ने उसके पास आते हुए उसे आवाज लगाई, “गुरनूर, क्या हो गया?”
Continued In आर्ज-ए-इश्क - 5

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