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Tuesday, 28 July 2026

आर्ज-ए-इश्क - 3



श्रेयांश ने बालकनी की रेलिंग के सहारे उसके ऊपर खड़े होकर शिवम से पूछा, “पापा, आप सोए नही अभी तक?” 


“पहले अंदर तो आ जाओ। पाइप चढ़ने में इतनी मेहनत की है तुमने।” शिवम ने कहा। 


“अंदर आया तो आप मारोगे। पीछे डंडा पकड़ रखा है आपने अपने हाथों में।” श्रेयांश ने घबराते हुए कहा।


शिवम ने उसे देखते हुए कहा, “चुपचाप अंदर आ जाओ। कुछ नही कहूॅंगा तुम्हें और न ही मारूॅंगा। प्यार से कह रहा हूॅं। अंदर आ जाओ।” 


“रहने दीजिए पापा। बहुत अच्छे से समझता हूॅं आपके इस स्कैम को मैं। बचपन से चलता आ रहा है ये। हर बार आप प्यार से यही कहकर अंदर बुलाते है और फिर आपके अंदर टिपिकल इंडियन फादर की आत्मा आ जाती है।” श्रेयांश ने शिवम को देखकर कहा। उनकी बातों के शोर से ज्योति और श्रेयांश के भाई, कुशाग्र की नींद भी खुल गई। वो दोनों भी कमरे से बाहर आ गए। श्रेयांश अंदर नही आया तो शिवम ने इस बार थोड़ा सख्ती से कहा, “अंदर आ रहे हो या यहीं से हाथ पर डंडा मारकर नीचे गिराऊॅं तुम्हें।” 


शिवम की ये बात सुनकर श्रेयांश डर के मारे अंदर आने लगा पर जैसे ही उसकी नजर पीछे खड़ी ज्योति पर गई, वो मुस्कुराते हुए अंदर आ गया क्योंकि उसे पता था ज्योति उसे मार खाने से बचा लेंगी। शिवम जैसी ही श्रेयांश को डंडे से मारने लगे, ज्योति ने पीछे से आकर वो डंडा पकड़ लिया और शिवम को घुरकर देखते हुए कहा, “ज्यादा ना कमीशनर बनने के जरूरत नही है मेरे बच्चों के ऊपर, यहाॅं की डिफेंस मिनिस्टर और होम मिनिस्टर मैं हूॅं। लाइए डंडा दीजिए इधर।” 


शिवम ने डंडा ज्योति को दे दिया। ज्योति सबको सोने के लिए कहकर वहाॅं से अपने कमरे में चली गई। श्रेयांश ने शिवम को देखा और उनसे पूछा, “आपको कैसे पता चला की मैं घर आ चुका हूॅं और मैं बालकनी से ही अंदर आऊॅंगा।” 


“तुम शायद भूल रहे हो की तुम्हें मैंने ही पालकर बड़ा किया है। अच्छी तरह से पता है मुझे की तुम क्या क्या करते हो और तुम्हारी वो बाइक, जो बहुत शोर करती है ना, वो भी तुम्हारी जिद्द पर तुम्हें मैंने ही लेकर दी है।” शिवम ने कहा। 


“तो अब आप मुझे फिर से छोटा करना चाहते है और बाइक वापिस लेना चाहते है।” श्रेयांश ने शरारत से कहा तो शिवम ने जानबूझकर दुख भरी आवाज में कहा, “काश मैं फिर से तुम्हें छोटा कर सकता। जिंदगी सुकून में रहती। तुम्हारी परेशानी में नही।” 


श्रेयांश ने चिढ़ते हुए कहा, “मैं कहाॅं परेशान करता हूॅं पापा आपको।” 


“परेशान ही हूॅं मैं तुम्हें लेकर क्योंकि तुम अपनी जिंदगी में सीरियस नही हो बिल्कुल भी बल्कि तुम तो जिंदगी को लेकर भी सीरियस नही हो। कभी तुम बाइक ऐसे चलाओगे की तुम्हारा एक्सीडेंट ही हो जाए और तभी ये पाइप पर चढ़कर आने जैसी हरकते करोगे जिससे तुमने चोट लगे गिरकर या तुम्हारी जान ही निकले। मिलता क्या है तुम्हें इन सब में।” शिवम ने गुस्से में कहा। 


“एक्स्टेसी।” श्रेयांश ने जवाब दिया। 


शिवम ने उसे घुरकर देखते हुए कहा, “तुम्हारा ये सब करना मुझे बेवकूफी लगता है।” 


श्रेयांश ने थोड़ी देर तक उन्हें देखा और कहा, “पिछले तीन सालों से मैं एक ही चीज को लेकर तो काफी सीरियस हूॅं, पापा। बहुत ज्यादा वक्त बिता दिया है मैंने स्टैंड अप कॉमेडी करते हुए बाकी सारी एक्टिविटीज के बजाए।” 


“बेटा, तुम समझते क्यों नही। इन सब से तो कुछ भी नही मिलने वाला है तुम्हें। मैं चाहता हूॅं तुम अपने किसी जॉब या बिज़नेस को लेकर सीरियस हो।” शिवम ने थोड़ा प्यार से कहा। 


“आप जानते है पापा की ये कभी नही होने वाला और मैं स्टैंड अप कॉमेडी में सक्सेस होकर आपको गलत प्रूफ करकर दिखाऊॅंगा। कल दिल्ली जा रहा हूॅं मैं। अपना पहला आउट ऑफ स्टेट शो करने।” कहकर श्रेयांश अपने कमरे में जाने लगा। 


उसे जाता हुआ देखकर शिवम ने कहा, “मैं फिर से कह रहा हूॅं तुम्हें जॉब करनी चाहिए।” 


श्रेयांश रुक गया और उसने शिवम को चिढ़कर देखते हुए कहा, “ये डिस्कशन हम हर बार क्यों करते है।” 


“क्योंकि तुम देख नही पा रहे हो की तुम कहाॅं जा रहे हो रिस्पॉन्सिबल बनने की एज में। बस ये बेकार के शोज करना, फ्रैंड्स के साथ देर रात तक ऐसे अवारा बनकर घूमना और पार्टी करना। यही सब है तुम्हारी लाइफ में। कोई ढंग का काम तो है ही नही। ऊपर से मेरी गलती है जो तुम्हारी जिद्द पर और तुम्हारी माॅं की सिफारिश पर तुम्हें बाइक और दिला दी।” शिवम ने फिर गुस्से में कहा। 


“बस कर दीजिए, पापा। मैं जा रहा हूॅं कल। आपके चार दिन मुझे देखे बिना सुकून से निकलेंगे।” कहकर श्रेयांश अपने कमरे में चला गया और पैकिंग करने लगा। 


सुबह वो तैयार होकर नाश्ते करने के बाद ज्योति, शिवम और कुशाग्र से मिलकर विवेक के साथ दिल्ली जाने के लिए निकल गया। 


गुरनूर खिड़की के पास हाथों में अपनी डायरी और पेन लिए हुए कुर्सी पर बैठी हुई थी। वो बाहर एक छोटी सी चिड़िया को देखकर मुस्कुराते हुए डायरी में कुछ लिख रही थी की तभी रावी वहाॅं आई। उसने गुरनूर के हाथों में डायरी और पेन को देखकर कहा, “अब क्या लिख रही हो, मैडम?” 


“इश्क ही लिखती हूॅं मैं हर बार।” गुरनूर ने खोए हुए कहा और फिर रावी को देखा। 


“हाय, इश्क लिखती ही रहोगी क्या। कभी करके भी देखो।” रावी ने गुरनूर को छेड़ते हुए कहा। 


गुरनूर ने अपनी डायरी को बंद कर उसे देखा और कहा, “इश्क न किया नही जाता। बस हो जाता है। मुझे जब इश्क होना तो अपने आप ही जाएगा। तब न मैं इस दिल को इश्क करने से रोक पाऊॅंगी और न ही कोई और रोक पाएगा।”


“तुम इतनी गहरी बातें कैसे कर लेती हो?” रावी ने पूछा जिसपर गुरनूर ने हॅंसते हुए कहा, “जैसे तुम बेवकूफी वाली करती हो।“ 


ये सुनते ही रावी ने गुरनूर के हाथ पर मारते हुए कहा, “वेरी फनी! वैसे तुम्हें अपने आप प्यार होगा कैसे। लड़को से तो तुम दूर भागती हो।” 


“मैं बेकार लड़को से दूर भागती हूॅं। तुम तो जानती ही हो की मुझे ये टाइमपास और फन वाला प्यार पसंद नही है। जब मेरे जिंदगी में मेरा ड्रीम बॉय आएगा तो देखना। उसके और मेरे इश्क में कितना जुनून होगा।” गुरनूर ने मुस्कुराकर कहा। 


Continued In आर्ज-ए-इश्क - 4

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