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Monday, 27 July 2026

आर्ज-ए-इश्क - 2



 

श्रेयांश ऐसे ही खामोशी से बैठा रहा तो विवेक ने उससे कहा, “भाई, तू गर्लफ्रेंड क्यों नही बना लेता।” 


श्रेयांश ने अपने दोस्तों को देखकर कहा, “तुम सबको मेरे सिंगल होने से क्या प्रॉब्लम है।” 


“भाई, कॉमेडी तो तू करता ही है पर जिंदगी में हॅंसी मजाक के साथ फन भी तो होना चाहिए न।” विवेक ने कहा।


“ये कर ही रहा हूॅं फन इस वक्त। तुम सब के साथ बाइक रेसेस करता हूॅं, पार्टीज करता हूॅं। फन ही है ये सब। जिंदगी में एक लड़की के आने से ज्यादा फन हो जाएगा।” श्रेयांश ने बीयर की सिप लेकर कहा। 


विवेक उसके साथ आकर बैठा और उसने उसके कंधे पर हाथ रखकर कहा, “भाई, तू एक बार गर्लफ्रेंड बनाकर तो देख। तुझे पता लग जाएगा तू लाइफ में क्या मिस कर रहा है।” 


“मुझे कोई इंटरेस्ट नही है।” श्रेयांश ने उसे देखते हुए कहा।


विवेक ने उसे देखा और कहा, “क्यों नही है। हमें देख ले। हम सबकी भी तो गर्लफ्रेंड है और तेरे लिए तो गर्लफ्रेंड बनाना और भी आसान है क्योंकि तुझे आदत है किसी भी चीज को लेकर ज्यादा सीरियस न होने की।”


“मेरे किसी बात को लेकर सीरियस न होने का इससे क्या कनेक्शन है?” श्रेयांश ने कंफ्यूज होते हुए पूछा।


“भाई, तुझे क्या लगता है। हम सब अपनी अपनी गर्लफ्रेंड्स के साथ सीरियस रिलेशनशिप में है। नही, हम सब सिर्फ टाइमपास कर रहे है उनके साथ। आज कल की लड़कियाँ भी ऐसे ही रिलेशनशिप चाहती है तो तू भी कोई लड़की ढूंढकर ऐसा ही टाइमपास वाला रिलेशनशिप बना ले। सीरियस होने की वैसे भी कौन सा तुझे आदत है।” विवेक ने उसे समझाते हुए कहा। 


श्रेयांश ने कुछ नही कहा। उसने अपनी बीयर खत्म कर सोफे से उठते हुए विवेक से कहा, “चल एक बाइक रेस हो जाए।” 


श्रेयांश सबको बाय कहकर विवेक के साथ उस कमरे से बाहर आ गया। ये कमरा उनके ही किसी एक दोस्त का था जो उसने अपने अकेले रहने के लिए खरीदा था। वो अकेला रहता था इसलिए सभी हर बार उसके इस कमरे में आकर ही पार्टी किया करते थे। 


श्रेयांश और विवेक ने लिफ्ट से नीचे आकर हेलमेट पहनकर अपनी बाइक स्टार्ट की और बहुत ही तेज़ स्पीड में बाइक चलाते हुए वहाॅं से निकल गए। 


एक खाली सड़क पर आकर श्रेयांश ने अपनी बाइक की स्पीड विवेक की बाइक की स्पीड से तेज की और एकदम से विवेक की बाइक के सामने साइड से घुमाकर रोक दी। विवेक ने बहुत ही मुश्किल से ब्रेक लगाई। उसकी बाइक का टायर बिल्कुल श्रेयांश के पैर के करीब आकर रुका।

“तू पागल हो गया है क्या। अभी एक्सीडेंट हो जाता।” विवेक ने हेलमेट उतारकर चिल्लाते हुए कहा। श्रेयांश ने भी अपना हेलमेट उतार दिया। 


“फन करवाना चाह रहा था तुझे।” श्रेयांश ने बिल्कुल अलग ही अंदाज में आगे बाइक के हैंडल की तरफ झुककर अपनी दोनों बाजू बाइक के हैंडल के ऊपर टिकाकर विवेक को देखते हुए कहा। 


उसकी बात सुनकर विवेक को गुस्सा आ गया और उसने कहा, “तेरे इस फन के चक्कर में अभी हम घर के बजाय सीधा ऊपर पहुॅंचते।” 


“ज्यादा से ज्यादा मर ही जाते ना। जीकर भी क्या कर पा रहे है हम। कुछ बन पाए है जीकर आजतक पैरेंट्स की नजरों में। मरकर कम से कम भूत तो बनेंगे।” श्रेयांश ने हॅंसते हुए कहा। 


“तेरी इस सोच को तो सलामी दिलवानी चाहिए।” विवेक ने कहा तो श्रेयांश और ज्यादा हॅंसने लगा जिसे देख विवेक ने चिढ़ते हुए कहा, “तू ही मर इतनी जल्दी। मैं तो गिनती भी भूल चुका हूॅं की कितनी बार ऐसा करकर तूने खुदको और मुझे मारने की कोशिश की है। देख भाई, तू मर सकता है पर मुझे जीना है क्योंकि मेरे पास जीने की बहुत सारी वजह है।”  


“और हर बार हम दोनों बच जाते है और ये जीने की वजह क्या है। ऐसा सब भी सोचता है तू।” श्रेयांश ने कहा। 


विवेक ने हेलमेट फिर से पहनते हुए कहा, “ये सारे सीरियस टॉपिक्स है और तू रहता है सीरियसनेस से कोसों दूर वरना एक बार जीने की वजह ढूंढने की सोचे तो पता लगे कि किसी के लिए जीना भी कितना खूबसूरत होता है।” 


“मेरे पास तो सारी वजह मरने की है और किसी के लिए जीना। ये मुझसे नही होगा। मैं अगर जी रहा हूॅं तो सिर्फ खुद के लिए और मरना चाहता हूॅं तो वो भी खुद के लिए। मैं किसी और के लिए न जीना चाहता हूॅं, न मरना और वैसे भी अगर ये सोच रही तो सिर्फ कुछ वक्त तक रहेगी। जैसे चार दिन की चाॅंदनी। उसके बाद फिर अंधेरी रात है।” श्रेयांश ने मुस्कुराकर कहा तो विवेक ने कहा, “तेरा कुछ नही हो सकता।” 


“हो सकता है। मैं मरने के बाद भूत बन सकता हूॅं।” श्रेयांश ने कहकर हॅंसते हुए अपनी बाइक स्टार्ट की। विवेक ने भी अपनी बाइक स्टार्ट की और वो दोनों फिर से बाइक चलाने लगे। 


एक मोड़ पर आकर दोनों ने अपनी बाइक रोकी क्योंकि यहाॅं से उन दोनों के घर जाने का रास्ता अलग था। श्रेयांश ने विवेक को बाय कहा और उनके रास्ते अलग हो गए। 


कुछ वक्त बाद श्रेयांश ने बाइक अपने घर के सामने रोकी। रात के दो बज रहे थे इसलिए उसे लगा कि शिवम अभी तक सो चुके होंगे और ये सच भी था लेकिन उसकी बाइक की आवाज इतनी तेज थी की वो उससे जाग चुके थे। उन्हें मालूम था की श्रेयांश पाइप चढ़कर बालकनी से घर के अंदर आएगा क्योंकि घर मेन डोर तो बंद था। वो उठकर अपने कमरे से बाहर आए और श्रेयांश का अच्छे से स्वागत करने के लिए एक डंडा लेकर बालकनी के सामने जाकर खड़े हो गए। 


श्रेयांश ने अपनी बाइक पार्क की और हेलमेट उतारकर रखते हुए कहा, “मेन डोर तो बंद होगा। चलो श्रेयांश बेटा, पाइप चढ़कर घर में एंट्री ले।” 


पाइप की तरफ आकर वो उसके ऊपर चढ़ने लगा। जैसे ही वो चढ़ते हुए बालकनी तक पहुॅंचा, सामने शिवम को खड़ा हुआ देखकर हैरान हो गया। शिवम के हाथ पीछे की तरफ थे क्योंकि उन्होंने हाथ में डंडा पकड़ा हुआ था। उनके हाथों को पीछे की तरफ देखकर श्रेयांश समझ गया की उनके हाथ में डंडा है जो उसका पीटकर स्वागत करने के लिए उन्होंने पकड़ा हुआ है। श्रेयांश बस दुआ करने लगा की हर बार की तरह ज्योति आकर उसे बचा ले।


Continued In आर्ज-ए-इश्क - 3


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